जलज परे जल जल हरे, जलज परे कर नेह ।
आपनि तौ जल जल बरे, जलज जलज करि देह ।११८१।
भावार्थ : -- सिंधु ऊपर पड़ता है तो ईर्ष्या वश उसका जल हर लेता है, चंद्रमा/कमल पर पड़ता है तो स्नेह काहे करता है । आप तो जल जल कर बर रहा है , देह को मुक्ता मुक्ता किए है॥
तन सों तो लागे रहे, मन लागे कहि और ।
जिन सों मन लागे रहे, बैसे सोई ठौर ।११८२।
भावार्थ : -- यदि तन किसी भाव में लगा है, और मन किसी और भाव में लगा है ॥ तो ? जिस भाव में मन लगा है, आप वहीँ विराज मान है ॥
नवल वचन बिपल पुरान, पुरान बहुस पुरान ।
उद्धरन समरथ सोइ दें, जीवन में अस्थान ।११८३।
भावार्थ : --नवल विचारों की आयु विपल भर है उनका परिक्षण-प्रयोग नहीं हुवा है उनका निष्कर्ष नहीं आया है कि वह जीवन के हेतु हानि कारक है की लाभदायक । जो पुराने हैं उनकी आयु अतिशय है । अत: जो विचार संसार का उद्धरण करने में समर्थ हो उसे ही अपनाना चाहिए, वे चाहे नविन हो चाहे पुराण ॥
टिप्पणी : -- "संसार के उद्धरण में ही प्राणि-जगत का उद्धरण है"
" उन्मुक्त वातावरण को किसी भी दृष्टि से आधुनिक नहीं कहा जा सकता"
" अल्पायु में देहिक सम्बन्ध यह एक पुरातन विचार है, जिसके दुष्परिणाम को भारत भुगत चुका है, एवं भुगत रहा है"
देखु तिन जन सेवक कू, भरे राजसी सोंह ।
औरन थुड़ी थुड़ी करत, आप पाखनी जोह ।११८४।
भावार्थ : --उस जन-सेवक को देखो, राजसी शोभा पहन के स्वयं को जनता का सेवक कहता है । जो स्वयं तो पाखंडी है, औरों पर थूकता फिर रहा है ॥
काल के कहहि काल, तू अजहूँ की कर बात ।
ए देस ए बयस इ काल मैं, पलक काल हो जात ।११८५।
भावार्थ : -- कल की कल कहेगा या काल/समय/मृत्यु कहेगा , तू केवल अभी की कह । इस देश काल में एवं इस परिस्थिति में पलक में मृत्यु हो जाती है
टीका : -- कल मैं वज़ीर बनूंगा तो ये कर दूँगा वो कर दूँगा, अरे भैया लोग( लुगाई नहीं) ! उसे अभी करो । ये देश-प्रदेश तुम्हारे ही है हमारे थोड़ी हैं ॥
तू कहे आगिन बढ़ पर, जनम जुगे हैं पीछ ।
आगिन बिरधा बै संग, जुहार रहि पथ मीच ।११८६।
भावार्थ : -- तू कहता आगे बढ़ो, और बढे चलो किन्तु जन्म जुड़े है पीछे । आगे वृद्धवस्था के संग मृत्यु प्रतीक्षा कर रही है ॥
घर मैं सिख भतेरी फिर सिखे पराई सीख ।
आप तो अंधरा भया, दूज की फोड़ी दीख ।११८४।
भावार्थ : -- घर में भतेरा ज्ञान पड़ा है, फिर भी पराई की सीखाई सिखे है । आप तो आँधा हुवा फिरे, दूसरों की ओर फोड़ दी ॥
धरम के चारि चरन सन, जाकी ऊंची बात ।
जो तुल दीन दारिद सो, पर निंदा के पात ।११८५।
भावार्थ : -- जो धर्म के चार चरण अर्थात : -- सत्य, शौच ( तप के सह शुद्धि) दया एवं दान के साथ जिसके उच्च विचार हों एवं जो स्वयं की तुलना में अधिक दीन-दरिद्र हो वो निंदा करने का अधिकारी होता है, उसे ही आँगन में कुटिया बना कर रखना चाहिए ॥
कहनाउत सुख सार गहि, कथनी तबहि मिठाइ ।
कटुक बचन के कटुर लहि, सो खट मीठ खटाइ ।११८६।
भावार्थ : -- कहावतों का सार गरहन की हुई हो, कथनी तभी मीठी लगती है । और जो कटूक्ति की छाछ प्राप्त हो वह तो खट्टी मीठी खटाई है ॥
भगत जानै भगवन कू, भगवन भगतनु जान ।
बाक़ी मूर्ख हुँत बने, पुर पुर प्रनब पाषान ।११८७।
भावार्थ : -- भक्त भगवान को जानते हैं, भगवान भक्त को जानता है । जो घर घर, नगर नगर, पुरी पुरी में पत्थर के भगवान हैं वो बाकी मूर्खों के लिए हैं ॥
चेतावनी : -- "अपने को परम भक्त भी नहीं समझना चाहिए, अन्यथा अंतत: बगुले भगत सिद्ध होंगे "
जननी नै जना बाछड़ा, माँगे रोदत सार ।
अपनी देह उतरै नहि, सो फिर धेनु अधार ।११८८।
भावार्थ : -- माता ने बालक को जन्म दिया, वह रो रो कर स्नेह मांग रहा है । माता की देह से तो उतरे नहीं, फिर वह धरती और गौ के आधार रहेगा ॥
जननी जगत जितौ जहाँ, जने जो कोउ बाल ।
किंचित काल लग तिन्ह , पवित पेयुखहि पाल ।११८९।
संसार में माता जहां कहीं भी हो, वो यदि बालक को जन्म दे। तो कुछ समय तक पवित्र पीयूष से ही उसका पोषण होता है ॥
को सिक्खन को सिखावन, परबासें परदेस ।
दोनौ जो एक ठौर करूँ, अब लै दे उपदेस ।११९०-क।
तिन निपट मूरखान कू, सदमति दे भगवान ।
गौन भया जिन देसना, भया देस परधान ।११९०-ख।
भावार्थ : -- एक पंडित जी सीखने बिदेस गए एक सिखाने बिदेस गए । उन दोनों को एक स्थान पर इकट्ठा कर दूँ लो लेओ और देओ.....उपदेस केतना दोगे ।।
उन निपट मूर्खों को थोड़ी सद्बुद्धि दे भगवान । जिनके लिए शिक्षा गौण है, स्थान महत्वपूर्ण है ॥
आपनि तौ जल जल बरे, जलज जलज करि देह ।११८१।
भावार्थ : -- सिंधु ऊपर पड़ता है तो ईर्ष्या वश उसका जल हर लेता है, चंद्रमा/कमल पर पड़ता है तो स्नेह काहे करता है । आप तो जल जल कर बर रहा है , देह को मुक्ता मुक्ता किए है॥
तन सों तो लागे रहे, मन लागे कहि और ।
जिन सों मन लागे रहे, बैसे सोई ठौर ।११८२।
भावार्थ : -- यदि तन किसी भाव में लगा है, और मन किसी और भाव में लगा है ॥ तो ? जिस भाव में मन लगा है, आप वहीँ विराज मान है ॥
नवल वचन बिपल पुरान, पुरान बहुस पुरान ।
उद्धरन समरथ सोइ दें, जीवन में अस्थान ।११८३।
भावार्थ : --नवल विचारों की आयु विपल भर है उनका परिक्षण-प्रयोग नहीं हुवा है उनका निष्कर्ष नहीं आया है कि वह जीवन के हेतु हानि कारक है की लाभदायक । जो पुराने हैं उनकी आयु अतिशय है । अत: जो विचार संसार का उद्धरण करने में समर्थ हो उसे ही अपनाना चाहिए, वे चाहे नविन हो चाहे पुराण ॥
टिप्पणी : -- "संसार के उद्धरण में ही प्राणि-जगत का उद्धरण है"
" उन्मुक्त वातावरण को किसी भी दृष्टि से आधुनिक नहीं कहा जा सकता"
" अल्पायु में देहिक सम्बन्ध यह एक पुरातन विचार है, जिसके दुष्परिणाम को भारत भुगत चुका है, एवं भुगत रहा है"
देखु तिन जन सेवक कू, भरे राजसी सोंह ।
औरन थुड़ी थुड़ी करत, आप पाखनी जोह ।११८४।
भावार्थ : --उस जन-सेवक को देखो, राजसी शोभा पहन के स्वयं को जनता का सेवक कहता है । जो स्वयं तो पाखंडी है, औरों पर थूकता फिर रहा है ॥
काल के कहहि काल, तू अजहूँ की कर बात ।
ए देस ए बयस इ काल मैं, पलक काल हो जात ।११८५।
भावार्थ : -- कल की कल कहेगा या काल/समय/मृत्यु कहेगा , तू केवल अभी की कह । इस देश काल में एवं इस परिस्थिति में पलक में मृत्यु हो जाती है
टीका : -- कल मैं वज़ीर बनूंगा तो ये कर दूँगा वो कर दूँगा, अरे भैया लोग( लुगाई नहीं) ! उसे अभी करो । ये देश-प्रदेश तुम्हारे ही है हमारे थोड़ी हैं ॥
तू कहे आगिन बढ़ पर, जनम जुगे हैं पीछ ।
आगिन बिरधा बै संग, जुहार रहि पथ मीच ।११८६।
भावार्थ : -- तू कहता आगे बढ़ो, और बढे चलो किन्तु जन्म जुड़े है पीछे । आगे वृद्धवस्था के संग मृत्यु प्रतीक्षा कर रही है ॥
घर मैं सिख भतेरी फिर सिखे पराई सीख ।
आप तो अंधरा भया, दूज की फोड़ी दीख ।११८४।
भावार्थ : -- घर में भतेरा ज्ञान पड़ा है, फिर भी पराई की सीखाई सिखे है । आप तो आँधा हुवा फिरे, दूसरों की ओर फोड़ दी ॥
धरम के चारि चरन सन, जाकी ऊंची बात ।
जो तुल दीन दारिद सो, पर निंदा के पात ।११८५।
भावार्थ : -- जो धर्म के चार चरण अर्थात : -- सत्य, शौच ( तप के सह शुद्धि) दया एवं दान के साथ जिसके उच्च विचार हों एवं जो स्वयं की तुलना में अधिक दीन-दरिद्र हो वो निंदा करने का अधिकारी होता है, उसे ही आँगन में कुटिया बना कर रखना चाहिए ॥
कहनाउत सुख सार गहि, कथनी तबहि मिठाइ ।
कटुक बचन के कटुर लहि, सो खट मीठ खटाइ ।११८६।
भावार्थ : -- कहावतों का सार गरहन की हुई हो, कथनी तभी मीठी लगती है । और जो कटूक्ति की छाछ प्राप्त हो वह तो खट्टी मीठी खटाई है ॥
भगत जानै भगवन कू, भगवन भगतनु जान ।
बाक़ी मूर्ख हुँत बने, पुर पुर प्रनब पाषान ।११८७।
भावार्थ : -- भक्त भगवान को जानते हैं, भगवान भक्त को जानता है । जो घर घर, नगर नगर, पुरी पुरी में पत्थर के भगवान हैं वो बाकी मूर्खों के लिए हैं ॥
चेतावनी : -- "अपने को परम भक्त भी नहीं समझना चाहिए, अन्यथा अंतत: बगुले भगत सिद्ध होंगे "
जननी नै जना बाछड़ा, माँगे रोदत सार ।
अपनी देह उतरै नहि, सो फिर धेनु अधार ।११८८।
भावार्थ : -- माता ने बालक को जन्म दिया, वह रो रो कर स्नेह मांग रहा है । माता की देह से तो उतरे नहीं, फिर वह धरती और गौ के आधार रहेगा ॥
जननी जगत जितौ जहाँ, जने जो कोउ बाल ।
किंचित काल लग तिन्ह , पवित पेयुखहि पाल ।११८९।
संसार में माता जहां कहीं भी हो, वो यदि बालक को जन्म दे। तो कुछ समय तक पवित्र पीयूष से ही उसका पोषण होता है ॥
को सिक्खन को सिखावन, परबासें परदेस ।
दोनौ जो एक ठौर करूँ, अब लै दे उपदेस ।११९०-क।
तिन निपट मूरखान कू, सदमति दे भगवान ।
गौन भया जिन देसना, भया देस परधान ।११९०-ख।
भावार्थ : -- एक पंडित जी सीखने बिदेस गए एक सिखाने बिदेस गए । उन दोनों को एक स्थान पर इकट्ठा कर दूँ लो लेओ और देओ.....उपदेस केतना दोगे ।।
उन निपट मूर्खों को थोड़ी सद्बुद्धि दे भगवान । जिनके लिए शिक्षा गौण है, स्थान महत्वपूर्ण है ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें