काज माँगता रीति कू, रीति माँगती राज ।
राज माँगता नीति कू, नीति माँगती प्राज ।११७१।
भावार्थ : -- क्रियान्वयन नियम की अभिलाषा में रहता है,नियम प्रजापालन व्यवस्था की अभिलाषा करता है ॥ प्रजा पालन व्यवस्था नीतियों की आशा करती है, नीतियां विधि, विधान, बुद्धिमान, दक्ष मनुष्य की अभिलाषा करते हैं ॥
साज माँगता प्रीत कू, प्रीत माँगती ताज ।
काम माँगता सुरति कू, सुरति माँगती लाज ।११७२।
भावार्थ : --सुंदरता, प्रीति की अभिलाषा करती है, प्रीति त्याग के आस में रहती है । काम अति अनुरक्ति की आस करता है, अति अनुरक्ति लज्जा की अभिलाषा करती है ॥
प्रीति की रीति पुरानी, जगत सदा चलि आइ ।
आवन-जावन लगे रहि, पर ना प्रीत बिहाइ ।११७३।
भावार्थ : --प्रीति की रीति इस संसार में सदा से चली आई है । कोई आया और कोई गया, किन्तु प्रीति का अंत न हुवा ॥
रहहीं सोइ सिधाए गए, अहहीं सोइ सिधाहिं ।
आगिन अगंतुक के गत, तिनते बिलगित नाहिं ।११७४।
भावार्थ : -- थे वे भी गए, हैं वे भी जाएँगे । जो आएँगे उनकी भी गत 'थे' एवं 'हैं' से भिन्न होने वाली नहीं ॥ ईसी लिए संत लोग कहते हैं, सत्ता एवं माया के पीछू मति भागू रे ॥
भुवन पर भौत निर्मान, भया अधिकाधिकान ।
अजहुँ सम्यक बितरन पर, रे जगत दे ध्यान ।११७५।
भावार्थ : -- लोक में भौतिक निर्माण बहुंत हो गया, और अधिक की आवश्यकता नहीं है । अद्यावधि उचित वितरण की आवश्यकता है । हमें इस पर ध्यान देना चाहिए न कि निर्माण पर । कारण कि अब पृथ्वी पारिस्थितिक असंतुलन को सहने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि ज्यों ज्यों निर्माण होगा यह असंतुलन बढ़ता ही जाएगा ॥
विश्व में अवैध निर्माणों को राजसात करें, इन्हें किसी प्रकार से भी नष्ट न करें, पुराने निर्माणों का रखरखाव करें । आओ मनुष्य जाति से इतर अन्य प्राणियों के निर्माण पर भी ध्यान केंद्रित करें ।
करनीअ अकरनीअ दौ, करे सब एकीकार ।
अकरनीअ का करतार, करनीअ को न कार ।११७६।
भावार्थ : -- करने योग्य कार्य एवं न करने योग्य कार्य दोनों को एक कर दिया । जो नहीं करना चाहिए उसके तो करतार हो गए , जो करना चाहिए वह करते नहीं ॥
पालक बिनु यह देह नहि, नेह नहि बिनु सनेहि ।
बिनु राम अवध अवध नहि, राम न बिनु बैदेहि ।११७७।
भावार्थ : -- जगत पालक अथवा पिता के बिना इस देह का अस्तित्व नहीं, बिना स्नेही अर्थात माता ,पृथ्वी,गौ बिना पोषण नहीं ॥ बिना राम के अवध, अवध नहीं बिना सीता के राम, राम नहीं ।आउर जब कोई राम नहीं हो सकता तो बिना सीता के कोई रावण कैसे हो सकता है ?
गया, मर गया, रोए कहें, पर मर गया न कोइ ।
पाए पद परम सद करम, करत गया मर सोइ ।११७८।
भावार्थ : -- हाय गया ! हाय हाय मर गया !! रो रो कर सब कह रहे थे, पर मर कर गया कोई नहीं था, यहीं चौरासी योनियों में भटक रहा था । कृतकर्म करते हुवे जिसने परमपद प्राप्त किया वास्तव में मर कर वही गया वही विलाप के योग्य भी है ॥
आनंद कँह जँह सुख है, सुख कँह जँह संतोख ।
संतोख कँह जँह मन है, मन जँह पद पतपोख ।११७९।
भावार्थ : -- आनंद कहाँ है ? जहां सुख है ! सुख कहाँ है? जहां संतोष है ! संतोष कहाँ है? जहां मन है (मन में संतोष होना चाहिए , तन में नहीं ) । मन कहाँ है जहां पोषनहार ( पति, प्रियतम, माता-पिता , ईश्वर ) के चरण हैं ॥
मन का मानस दूषिता, करता चोरि चकार ।
थिर निथरए हे उदहरन, गहौ ज्ञान के सार ।११८०।
भावार्थ : -- मन मैला सरोवर कल कल , चंचल चोरि करे प्रतिपल ॥ हे कमंडल ! जब यह मल थल में जाए, और तल निरमल हो जाए , तब तुम इस ज्ञान-जल को गहना ॥
मन मैला सरोवर मंदर लल, साँवल सोर करे प्रतिपल ॥ हे कमंडल ! जब यह सीतल हो जाए और हल हिमवल हो जाए , तब तुम इस ज्ञान जल को गहना ॥
राज माँगता नीति कू, नीति माँगती प्राज ।११७१।
भावार्थ : -- क्रियान्वयन नियम की अभिलाषा में रहता है,नियम प्रजापालन व्यवस्था की अभिलाषा करता है ॥ प्रजा पालन व्यवस्था नीतियों की आशा करती है, नीतियां विधि, विधान, बुद्धिमान, दक्ष मनुष्य की अभिलाषा करते हैं ॥
साज माँगता प्रीत कू, प्रीत माँगती ताज ।
काम माँगता सुरति कू, सुरति माँगती लाज ।११७२।
भावार्थ : --सुंदरता, प्रीति की अभिलाषा करती है, प्रीति त्याग के आस में रहती है । काम अति अनुरक्ति की आस करता है, अति अनुरक्ति लज्जा की अभिलाषा करती है ॥
प्रीति की रीति पुरानी, जगत सदा चलि आइ ।
आवन-जावन लगे रहि, पर ना प्रीत बिहाइ ।११७३।
भावार्थ : --प्रीति की रीति इस संसार में सदा से चली आई है । कोई आया और कोई गया, किन्तु प्रीति का अंत न हुवा ॥
रहहीं सोइ सिधाए गए, अहहीं सोइ सिधाहिं ।
आगिन अगंतुक के गत, तिनते बिलगित नाहिं ।११७४।
भावार्थ : -- थे वे भी गए, हैं वे भी जाएँगे । जो आएँगे उनकी भी गत 'थे' एवं 'हैं' से भिन्न होने वाली नहीं ॥ ईसी लिए संत लोग कहते हैं, सत्ता एवं माया के पीछू मति भागू रे ॥
भुवन पर भौत निर्मान, भया अधिकाधिकान ।
अजहुँ सम्यक बितरन पर, रे जगत दे ध्यान ।११७५।
भावार्थ : -- लोक में भौतिक निर्माण बहुंत हो गया, और अधिक की आवश्यकता नहीं है । अद्यावधि उचित वितरण की आवश्यकता है । हमें इस पर ध्यान देना चाहिए न कि निर्माण पर । कारण कि अब पृथ्वी पारिस्थितिक असंतुलन को सहने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि ज्यों ज्यों निर्माण होगा यह असंतुलन बढ़ता ही जाएगा ॥
विश्व में अवैध निर्माणों को राजसात करें, इन्हें किसी प्रकार से भी नष्ट न करें, पुराने निर्माणों का रखरखाव करें । आओ मनुष्य जाति से इतर अन्य प्राणियों के निर्माण पर भी ध्यान केंद्रित करें ।
करनीअ अकरनीअ दौ, करे सब एकीकार ।
अकरनीअ का करतार, करनीअ को न कार ।११७६।
भावार्थ : -- करने योग्य कार्य एवं न करने योग्य कार्य दोनों को एक कर दिया । जो नहीं करना चाहिए उसके तो करतार हो गए , जो करना चाहिए वह करते नहीं ॥
पालक बिनु यह देह नहि, नेह नहि बिनु सनेहि ।
बिनु राम अवध अवध नहि, राम न बिनु बैदेहि ।११७७।
भावार्थ : -- जगत पालक अथवा पिता के बिना इस देह का अस्तित्व नहीं, बिना स्नेही अर्थात माता ,पृथ्वी,गौ बिना पोषण नहीं ॥ बिना राम के अवध, अवध नहीं बिना सीता के राम, राम नहीं ।आउर जब कोई राम नहीं हो सकता तो बिना सीता के कोई रावण कैसे हो सकता है ?
गया, मर गया, रोए कहें, पर मर गया न कोइ ।
पाए पद परम सद करम, करत गया मर सोइ ।११७८।
भावार्थ : -- हाय गया ! हाय हाय मर गया !! रो रो कर सब कह रहे थे, पर मर कर गया कोई नहीं था, यहीं चौरासी योनियों में भटक रहा था । कृतकर्म करते हुवे जिसने परमपद प्राप्त किया वास्तव में मर कर वही गया वही विलाप के योग्य भी है ॥
आनंद कँह जँह सुख है, सुख कँह जँह संतोख ।
संतोख कँह जँह मन है, मन जँह पद पतपोख ।११७९।
भावार्थ : -- आनंद कहाँ है ? जहां सुख है ! सुख कहाँ है? जहां संतोष है ! संतोष कहाँ है? जहां मन है (मन में संतोष होना चाहिए , तन में नहीं ) । मन कहाँ है जहां पोषनहार ( पति, प्रियतम, माता-पिता , ईश्वर ) के चरण हैं ॥
मन का मानस दूषिता, करता चोरि चकार ।
थिर निथरए हे उदहरन, गहौ ज्ञान के सार ।११८०।
भावार्थ : -- मन मैला सरोवर कल कल , चंचल चोरि करे प्रतिपल ॥ हे कमंडल ! जब यह मल थल में जाए, और तल निरमल हो जाए , तब तुम इस ज्ञान-जल को गहना ॥
मन मैला सरोवर मंदर लल, साँवल सोर करे प्रतिपल ॥ हे कमंडल ! जब यह सीतल हो जाए और हल हिमवल हो जाए , तब तुम इस ज्ञान जल को गहना ॥
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