बुधवार, 22 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११७॥ -----

काज माँगता रीति कू, रीति माँगती राज । 
राज माँगता नीति कू, नीति माँगती प्राज ।११७१। 
भावार्थ : -- क्रियान्वयन नियम की अभिलाषा में रहता है,नियम प्रजापालन व्यवस्था की अभिलाषा करता है ॥ प्रजा पालन व्यवस्था नीतियों की आशा करती है, नीतियां विधि, विधान, बुद्धिमान, दक्ष मनुष्य की अभिलाषा करते हैं ॥ 

साज माँगता प्रीत कू, प्रीत माँगती ताज । 
काम माँगता सुरति कू, सुरति माँगती लाज ।११७२। 
भावार्थ : --सुंदरता, प्रीति की  अभिलाषा करती है, प्रीति त्याग के आस में रहती है । काम अति अनुरक्ति की आस  करता है, अति अनुरक्ति लज्जा की अभिलाषा करती है ॥ 

प्रीति की रीति पुरानी, जगत सदा चलि आइ । 
आवन-जावन लगे रहि, पर ना प्रीत बिहाइ ।११७३। 
भावार्थ : --प्रीति की रीति इस संसार में सदा से चली आई है । कोई आया और कोई गया, किन्तु प्रीति का अंत न हुवा ॥ 

रहहीं सोइ सिधाए गए, अहहीं सोइ सिधाहिं । 
आगिन अगंतुक के गत, तिनते बिलगित नाहिं ।११७४। 
भावार्थ : -- थे वे भी गए, हैं वे भी जाएँगे ।  जो आएँगे उनकी भी गत 'थे' एवं 'हैं' से भिन्न होने वाली नहीं ॥ ईसी लिए संत लोग कहते हैं, सत्ता एवं माया के पीछू मति भागू रे ॥  

भुवन पर भौत निर्मान, भया अधिकाधिकान । 
अजहुँ सम्यक बितरन पर, रे जगत दे ध्यान ।११७५। 
भावार्थ : -- लोक में भौतिक निर्माण बहुंत हो गया, और अधिक की आवश्यकता नहीं है । अद्यावधि उचित वितरण की आवश्यकता है । हमें इस पर ध्यान देना चाहिए न कि निर्माण पर । कारण कि अब पृथ्वी पारिस्थितिक असंतुलन को सहने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि ज्यों ज्यों निर्माण होगा यह असंतुलन बढ़ता ही जाएगा ॥ 
             विश्व में अवैध निर्माणों को राजसात करें, इन्हें किसी प्रकार से भी नष्ट न करें, पुराने निर्माणों का रखरखाव करें । आओ मनुष्य जाति से इतर अन्य प्राणियों के निर्माण पर भी ध्यान केंद्रित करें । 

करनीअ अकरनीअ दौ, करे सब एकीकार । 
अकरनीअ का करतार, करनीअ को न कार ।११७६। 
भावार्थ : -- करने योग्य कार्य एवं न करने योग्य कार्य दोनों को एक कर दिया । जो नहीं करना चाहिए उसके तो करतार हो गए , जो करना चाहिए वह करते नहीं ॥ 

पालक बिनु यह देह नहि, नेह नहि बिनु सनेहि  । 
बिनु राम अवध अवध नहि, राम न बिनु बैदेहि ।११७७। 
भावार्थ : -- जगत पालक अथवा पिता के बिना इस देह का अस्तित्व नहीं, बिना स्नेही अर्थात माता ,पृथ्वी,गौ बिना पोषण नहीं ॥ बिना राम के अवध, अवध नहीं बिना सीता के राम, राम नहीं ।आउर जब कोई राम नहीं हो सकता तो बिना सीता के कोई रावण कैसे हो सकता है ? 

गया, मर गया, रोए कहें, पर मर गया न कोइ । 
पाए पद परम सद करम,  करत गया मर सोइ ।११७८। 
भावार्थ : -- हाय गया ! हाय हाय मर गया !! रो रो कर सब कह रहे थे, पर मर कर गया कोई नहीं था, यहीं चौरासी योनियों में भटक रहा था । कृतकर्म करते हुवे जिसने परमपद प्राप्त किया वास्तव में मर कर वही गया वही विलाप के योग्य भी है ॥ 

आनंद कँह जँह सुख है, सुख कँह जँह संतोख । 
संतोख कँह जँह मन है, मन जँह पद पतपोख ।११७९। 
भावार्थ : -- आनंद कहाँ है ? जहां सुख है ! सुख कहाँ है? जहां संतोष है ! संतोष कहाँ है? जहां मन है (मन में संतोष होना चाहिए , तन में नहीं ) । मन कहाँ है जहां पोषनहार ( पति, प्रियतम, माता-पिता , ईश्वर ) के चरण हैं ॥ 

मन का मानस दूषिता, करता चोरि चकार । 
थिर निथरए हे उदहरन, गहौ ज्ञान के सार ।११८०। 
भावार्थ : -- मन मैला सरोवर कल कल , चंचल चोरि करे प्रतिपल  ॥ हे कमंडल  ! जब यह मल थल में जाए, और तल निरमल हो जाए , तब तुम इस ज्ञान-जल को गहना  ॥  

मन मैला सरोवर मंदर लल, साँवल सोर करे प्रतिपल ॥ हे कमंडल ! जब यह सीतल हो जाए और हल हिमवल हो जाए , तब तुम इस ज्ञान जल को गहना ॥ 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...