मेल बुराई सरल है, मारग चरतै लाहि ।
हेल बहुसहि कठिन है, लहनी भलमनसाहि।११६१।
भावार्थ : -- बुराई का मिलना अत्यधिक सरल है वह तो मार्ग में चलते हुवे भी प्राप्त जाती है । किन्तु भलमनसाही का मेल मिलना बहुंत ही कठिन है ॥
सबहि जने जनक जननी, जग मैं सबहि कुलीन ।
जो कृत कारज करत गए, सोइ मूरि भइ पीन ।११६२।
भावार्थ : -- पेड़ पर कोई नहीं लगा, सभी जनों को उनकी जननी एवं जनक ने जन्म दिया है, अत: सभी कुल विशेष में उत्पन्न हुवे हैं । जो सत्कार्य करते चले, उसकी जड़ सुदृढ़ हुई अथवा होगी॥
'कुकृत्य से, सुदृढ़ जड़े उखड भी सकती हैं'
गा गा के को कहि रहा, रे हरि बसे अगास ।
तेरे मेरे भीत है, वाका मूल निवास ।११६३।
भावार्थ : - गा गा कर कोई कह रहा था, अरे ईश्वर ऊपर आकाश में बसे है । अच्छा ! ईसी लिए उसे ऊपरवाला कहते हैं । रे मूर्ख बुद्धिहीन, ईश्वर का मूल निवास तो तेरे मेरे अंतर में है ॥
नयन पलक पहरी करत, तन कर गेह दुआर ।
अंतर भगवन बास है, पल पल जोग निहार ।११६४।
भावार्थ : -- नयन-पलक को प्रहरी कर देह को घर दुआर कर ॥ कारण कि इसके अंतर में भगवान का वास है, अत: अपने कुत्सित कार्यों का अवलोकन करते हुवे इस द्वार की देखभाल कर ॥
भवांबुधि देही नाउ, मति करनी मत हार।
चलन बायुर परिहर के, केवल कूल निहार।११६५ ।
भावार्थ : -- यह संसार एक सागर है एवं देह एक नाव है, बुद्धि कर्ण ( पतवार) है एवं विचार ही कर्णधार हैं । संसार का चलन तीव्र वायु है जो नाव को भा ले जाती है किन्तु ऐसे वायुर को अनदेखा करते हुवे कर्णधार की दृष्टि तट पर स्थिर रहनी चाहिए ॥
सिस हेरे सदगुरु मिले, होइ धनंजय सोइ ।
हेर मिले गुरु आप जो, सोइ एकलब्य होइ ।११६६।
भावार्थ : -- शिष्य के ढूंढे यदि सद्गुरु मिलता है, वह शिष्य धनंजय है । किन्तु जिसे गुरु स्वयं ढूंढे मिले वह अवश्य ही एकलव्य होगा ॥
महा भारत कथा पौध, फुर भगवदोपदेस ।
भगवन बरन ज्ञान गंध, पत पत सत संदेस ।११६७।
भावार्थ : --महाभारत की कथा यदि एक पौधा है, तो श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेस उसका पुष्प है । ईश्वर उस पुष्प का अक्षर हैं, रंग है, अनुभूति है, ईश्वर उस पुष्प में नित्य है अविनाशी हैं । ज्ञान उसका गंध है । उसका पत्र पत्र सत्य का सन्देश है ॥
साँस साँस बहुमूल है, सोच सोच उछ्बास ।
चरन चरन सद्कर्म कर, तीर तरन उपबास ।११६८।
भावार्थ : -- प्रत्येक सांस बहुमूल्य है, इसे सोच समझ कर मनन करते हुवे ग्रहण एवं निष्कासन करना चाहिए । जीवन के प्रत्येक चरण में कृतकार्य का अभ्यास करते हुवे संसार से पारगमन हेतु अकृत कार्यों से उपवास रखना चाहिए ॥
साँस साँस बहुमूल है, सोच सोच उछ्बास ।
चरन चरन सद्कर्म कर, तीर तरन उपबास ।११६८।
भावार्थ : -- प्रत्येक सांस बहुमूल्य है, इसे सोच समझ कर मनन करते हुवे ग्रहण एवं निष्कासन करना चाहिए । जीवन के प्रत्येक चरण में कृतकार्य का अभ्यास करते हुवे संसार से पारगमन हेतु अकृत कार्यों से उपवास रखना चाहिए ॥
टिप्पणी : -- ध्यान अथवा मनन अथवा चिंतन हेतु स्थान,स्थिति(स्थिरता),अथवा स्थेय ( जैसे अगरबत्ती ,आसन आदि) अनिवार्य नहीं है यह नित्य कर्म करते हुवे भी किया जा सकता है ।
जन संचालन तंत्र मैं सद्गुन जन संतोष ।
सत्ता धारन धारना, लगे अनख घन दोष ।११६९।
भावार्थ : --जन संचालन तंत्र कोई भी जनता संतोष उस संचालन तंत्र का सदगुण है । एवं सत्ता धारण करने की अवधारण में प्रतिस्पर्धा परम दोष है, विद्यमान में यह प्रतिस्पर्धा गला काट हो गई है वो भी लोकतंत्र में?॥
टीका : -- रामराज्य में यद्यपि राज्यतंत्र स्थापित था तद्यपि सत्ता धारण करने में प्रतिस्पर्धा नहीं थी । भगवान् राम अंतिम व्यक्ति सिद्ध हुवे, जिन्हें विवश होकर सत्ता धारण करनी पड़ी॥
नयन है न कर चरन है, करन न मुख रस बैन ।
बहोरि बिधि भल बिधि रखे, चौकस जग दिन रैन ।११७०।
भावार्थ : -- विधाता तो निर्गुण है अर्थात न उनके नयन हैं न हाथ हैं न चरण हैं, न करण हैं, न ही आनन है जिससे कि वह स्वाद ले सकें एवं बोल सकें ॥ फिर भी वे कितनी कुशलता से जगत का चौकस संचालन कर रहे हैं, समय पर दिवस होता है, समय पर निशा आती है ॥
हमने तो इतनी सुन्दर देह धारण की हुई हैं वह भी मनुष्य की, इतना सुगम साधन होते हुवे भी संसार में दुःख व्याप्त किये हुवे हैं ॥
हेल बहुसहि कठिन है, लहनी भलमनसाहि।११६१।
भावार्थ : -- बुराई का मिलना अत्यधिक सरल है वह तो मार्ग में चलते हुवे भी प्राप्त जाती है । किन्तु भलमनसाही का मेल मिलना बहुंत ही कठिन है ॥
सबहि जने जनक जननी, जग मैं सबहि कुलीन ।
जो कृत कारज करत गए, सोइ मूरि भइ पीन ।११६२।
भावार्थ : -- पेड़ पर कोई नहीं लगा, सभी जनों को उनकी जननी एवं जनक ने जन्म दिया है, अत: सभी कुल विशेष में उत्पन्न हुवे हैं । जो सत्कार्य करते चले, उसकी जड़ सुदृढ़ हुई अथवा होगी॥
'कुकृत्य से, सुदृढ़ जड़े उखड भी सकती हैं'
गा गा के को कहि रहा, रे हरि बसे अगास ।
तेरे मेरे भीत है, वाका मूल निवास ।११६३।
भावार्थ : - गा गा कर कोई कह रहा था, अरे ईश्वर ऊपर आकाश में बसे है । अच्छा ! ईसी लिए उसे ऊपरवाला कहते हैं । रे मूर्ख बुद्धिहीन, ईश्वर का मूल निवास तो तेरे मेरे अंतर में है ॥
नयन पलक पहरी करत, तन कर गेह दुआर ।
अंतर भगवन बास है, पल पल जोग निहार ।११६४।
भावार्थ : -- नयन-पलक को प्रहरी कर देह को घर दुआर कर ॥ कारण कि इसके अंतर में भगवान का वास है, अत: अपने कुत्सित कार्यों का अवलोकन करते हुवे इस द्वार की देखभाल कर ॥
भवांबुधि देही नाउ, मति करनी मत हार।
चलन बायुर परिहर के, केवल कूल निहार।११६५ ।
भावार्थ : -- यह संसार एक सागर है एवं देह एक नाव है, बुद्धि कर्ण ( पतवार) है एवं विचार ही कर्णधार हैं । संसार का चलन तीव्र वायु है जो नाव को भा ले जाती है किन्तु ऐसे वायुर को अनदेखा करते हुवे कर्णधार की दृष्टि तट पर स्थिर रहनी चाहिए ॥
सिस हेरे सदगुरु मिले, होइ धनंजय सोइ ।
हेर मिले गुरु आप जो, सोइ एकलब्य होइ ।११६६।
भावार्थ : -- शिष्य के ढूंढे यदि सद्गुरु मिलता है, वह शिष्य धनंजय है । किन्तु जिसे गुरु स्वयं ढूंढे मिले वह अवश्य ही एकलव्य होगा ॥
महा भारत कथा पौध, फुर भगवदोपदेस ।
भगवन बरन ज्ञान गंध, पत पत सत संदेस ।११६७।
भावार्थ : --महाभारत की कथा यदि एक पौधा है, तो श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेस उसका पुष्प है । ईश्वर उस पुष्प का अक्षर हैं, रंग है, अनुभूति है, ईश्वर उस पुष्प में नित्य है अविनाशी हैं । ज्ञान उसका गंध है । उसका पत्र पत्र सत्य का सन्देश है ॥
साँस साँस बहुमूल है, सोच सोच उछ्बास ।
चरन चरन सद्कर्म कर, तीर तरन उपबास ।११६८।
भावार्थ : -- प्रत्येक सांस बहुमूल्य है, इसे सोच समझ कर मनन करते हुवे ग्रहण एवं निष्कासन करना चाहिए । जीवन के प्रत्येक चरण में कृतकार्य का अभ्यास करते हुवे संसार से पारगमन हेतु अकृत कार्यों से उपवास रखना चाहिए ॥
साँस साँस बहुमूल है, सोच सोच उछ्बास ।
चरन चरन सद्कर्म कर, तीर तरन उपबास ।११६८।
भावार्थ : -- प्रत्येक सांस बहुमूल्य है, इसे सोच समझ कर मनन करते हुवे ग्रहण एवं निष्कासन करना चाहिए । जीवन के प्रत्येक चरण में कृतकार्य का अभ्यास करते हुवे संसार से पारगमन हेतु अकृत कार्यों से उपवास रखना चाहिए ॥
टिप्पणी : -- ध्यान अथवा मनन अथवा चिंतन हेतु स्थान,स्थिति(स्थिरता),अथवा स्थेय ( जैसे अगरबत्ती ,आसन आदि) अनिवार्य नहीं है यह नित्य कर्म करते हुवे भी किया जा सकता है ।
जन संचालन तंत्र मैं सद्गुन जन संतोष ।
सत्ता धारन धारना, लगे अनख घन दोष ।११६९।
भावार्थ : --जन संचालन तंत्र कोई भी जनता संतोष उस संचालन तंत्र का सदगुण है । एवं सत्ता धारण करने की अवधारण में प्रतिस्पर्धा परम दोष है, विद्यमान में यह प्रतिस्पर्धा गला काट हो गई है वो भी लोकतंत्र में?॥
टीका : -- रामराज्य में यद्यपि राज्यतंत्र स्थापित था तद्यपि सत्ता धारण करने में प्रतिस्पर्धा नहीं थी । भगवान् राम अंतिम व्यक्ति सिद्ध हुवे, जिन्हें विवश होकर सत्ता धारण करनी पड़ी॥
नयन है न कर चरन है, करन न मुख रस बैन ।
बहोरि बिधि भल बिधि रखे, चौकस जग दिन रैन ।११७०।
भावार्थ : -- विधाता तो निर्गुण है अर्थात न उनके नयन हैं न हाथ हैं न चरण हैं, न करण हैं, न ही आनन है जिससे कि वह स्वाद ले सकें एवं बोल सकें ॥ फिर भी वे कितनी कुशलता से जगत का चौकस संचालन कर रहे हैं, समय पर दिवस होता है, समय पर निशा आती है ॥
हमने तो इतनी सुन्दर देह धारण की हुई हैं वह भी मनुष्य की, इतना सुगम साधन होते हुवे भी संसार में दुःख व्याप्त किये हुवे हैं ॥
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