दान गहन पाखण्ड किए, खाए जगत कौ चुंड ।
मुंड चनक ले जोग लिए, तिन मुण्डक दै मुंड ।११४१ ।
भावार्थ : -- दान प्राप्त करने के लिए जिन्होंने पाखण्ड रचा रखा है, जो मटर की माला हाथ में लिए भोग वाले योगी होकर योग सिखा रहे हैं,वे सारे जगत को नोच नोच कर खाए जा रहे हैं उनके सिर नाई को मुंड देना चाहिए ॥
को दुखहा को भूखहा, को झुगियन को अगार ॥
अस कुसासन को जन जन, दुर्बादित दैं गार ।११४२।
भावार्थ : --संविधान की प्रस्तावना को ठेंगा दिखाती इस कुव्यवस्था में कोई अटारियों में भण्डार भर कर भी भूखा है, कोई झुग्गियों में है इसलिए दुखी है, अर्थात दीनता सर्वत्र व्याप्त है । ऐसे कुशासन को सभीजन दुर्वचन कहते गालियां दे रहें हैं, उतने ऊपर सुनाई नहीं देता।।
को देईं जग सम्पदा , को देईं धन धान ।
वाके सोता जान ले, फिर कर गान बखान ।११४३।
भावार्थ : -- कोई जग को अपनी सम्पदा दान कर रहा है, कोई अन्न दान कर रहा है कोई धन दान कर रहा । उस दान का प्रशंसात्मक व्याख्यान से पूर्व दाता के धन-धामन-धान के स्त्रोत का संज्ञान ले लेना चाहिए ॥
सुख बदले दुःख मोल लिए, दिए मुँहु माँगे दाम ।
जोइ अस ब्यबहार किए, सो जग जोग प्रनाम ।११४४।
भावार्थ : - सुख के बदले दुःख मोल लिया वो भी मुंह मांगे दाम में । जिसने भी ऐसा व्यवहार किया वह संसार में आदर के योग्य है ॥
गरुवन निसदिन ग्रास दै, पखियन को कन दान ।
स्वान सेष असन देत , दे जीवन सब प्रान ।११४५।
भावार्थ : -- प्रत्येक दिवस गौग्रास देना चाहिए, पक्षियों को अन्न-कण दान करना चाहिए । बचा हुवा भोजन स्वान को देकर , प्रत्येक प्राणी को जीवन-दान देना चाहिए ॥
कर कंगन कस आरसी, बोले बहुस सलोन ।
जब पूछूं तो चुप रहे, पीतर है की सोन ।११४६।
भावार्थ : -- रे दर्पण ! यह हाथों के कंगन कैसे है ? वह कहे बहुंत सुन्दर । जब पूछूं, पीतल के हैं कि स्वर्ण के तब वह चुप हो जाता है ॥
नीति रहि न न्याय रहा, रहे न भगवन पंच ।
पद के लोभी लालची, रहे बिकाऊ बंच ।११४७।
भावार्थ : - शासन की न तो कुछ नीतिया ही हैं न देश में कहीं न्याय है, न्यायाधीश भी भगवान नहीं रहे ॥ रह गए तो लोभी लालची धूर्त, कपटी, दुष्ट ठग ॥
हर बाट हटबार भया, जन जन रहा बिकाए ।
मुठी वाका मोल धरे, तो फिर सकै बिसाए ।११४८।
भावार्थ : -- प्रत्येक पथ हाट हो गया । राष्ट्र पति,प्रधानमन्त्री से लेकर पार्षद, सरपंच सचिव तक जहां प्रत्येक व्यक्ति बिकाऊ है । यदि मुट्ठी में उसका मूल्य धारण किया है, तभी उसे मोल ले सकते हैं ॥
साजन काको मुखहु मैं, अब तौ रहा न राम ।
छुरी काखे गही रही, जब तब लिए तिन काम ।११४९।
भावार्थ : -- सज्जनों अब तो किसी के मुख में राम भी नहीं रहा । हाँ बगल में छुरी विराजित रही, जब आवशकता पड़ी तब उसे काम में ले लिया ॥
गली गली यह गूंज करि, नृप पर कासत बिंग ।
गधा कहाता फिर रहा, नाम धरा नर सिंग ।११५०।
भावार्थ : --गली गली में शोर है, सब शासक पर व्यंग कसकर कह रहे है : -- देखो गधा कहलाता फिर रहा है और नाम धरा है 'नरसिंग ' कैसा डागदर है ये ॥
मुंड चनक ले जोग लिए, तिन मुण्डक दै मुंड ।११४१ ।
भावार्थ : -- दान प्राप्त करने के लिए जिन्होंने पाखण्ड रचा रखा है, जो मटर की माला हाथ में लिए भोग वाले योगी होकर योग सिखा रहे हैं,वे सारे जगत को नोच नोच कर खाए जा रहे हैं उनके सिर नाई को मुंड देना चाहिए ॥
को दुखहा को भूखहा, को झुगियन को अगार ॥
अस कुसासन को जन जन, दुर्बादित दैं गार ।११४२।
भावार्थ : --संविधान की प्रस्तावना को ठेंगा दिखाती इस कुव्यवस्था में कोई अटारियों में भण्डार भर कर भी भूखा है, कोई झुग्गियों में है इसलिए दुखी है, अर्थात दीनता सर्वत्र व्याप्त है । ऐसे कुशासन को सभीजन दुर्वचन कहते गालियां दे रहें हैं, उतने ऊपर सुनाई नहीं देता।।
को देईं जग सम्पदा , को देईं धन धान ।
वाके सोता जान ले, फिर कर गान बखान ।११४३।
भावार्थ : -- कोई जग को अपनी सम्पदा दान कर रहा है, कोई अन्न दान कर रहा है कोई धन दान कर रहा । उस दान का प्रशंसात्मक व्याख्यान से पूर्व दाता के धन-धामन-धान के स्त्रोत का संज्ञान ले लेना चाहिए ॥
सुख बदले दुःख मोल लिए, दिए मुँहु माँगे दाम ।
जोइ अस ब्यबहार किए, सो जग जोग प्रनाम ।११४४।
भावार्थ : - सुख के बदले दुःख मोल लिया वो भी मुंह मांगे दाम में । जिसने भी ऐसा व्यवहार किया वह संसार में आदर के योग्य है ॥
गरुवन निसदिन ग्रास दै, पखियन को कन दान ।
स्वान सेष असन देत , दे जीवन सब प्रान ।११४५।
भावार्थ : -- प्रत्येक दिवस गौग्रास देना चाहिए, पक्षियों को अन्न-कण दान करना चाहिए । बचा हुवा भोजन स्वान को देकर , प्रत्येक प्राणी को जीवन-दान देना चाहिए ॥
कर कंगन कस आरसी, बोले बहुस सलोन ।
जब पूछूं तो चुप रहे, पीतर है की सोन ।११४६।
भावार्थ : -- रे दर्पण ! यह हाथों के कंगन कैसे है ? वह कहे बहुंत सुन्दर । जब पूछूं, पीतल के हैं कि स्वर्ण के तब वह चुप हो जाता है ॥
नीति रहि न न्याय रहा, रहे न भगवन पंच ।
पद के लोभी लालची, रहे बिकाऊ बंच ।११४७।
भावार्थ : - शासन की न तो कुछ नीतिया ही हैं न देश में कहीं न्याय है, न्यायाधीश भी भगवान नहीं रहे ॥ रह गए तो लोभी लालची धूर्त, कपटी, दुष्ट ठग ॥
हर बाट हटबार भया, जन जन रहा बिकाए ।
मुठी वाका मोल धरे, तो फिर सकै बिसाए ।११४८।
भावार्थ : -- प्रत्येक पथ हाट हो गया । राष्ट्र पति,प्रधानमन्त्री से लेकर पार्षद, सरपंच सचिव तक जहां प्रत्येक व्यक्ति बिकाऊ है । यदि मुट्ठी में उसका मूल्य धारण किया है, तभी उसे मोल ले सकते हैं ॥
साजन काको मुखहु मैं, अब तौ रहा न राम ।
छुरी काखे गही रही, जब तब लिए तिन काम ।११४९।
भावार्थ : -- सज्जनों अब तो किसी के मुख में राम भी नहीं रहा । हाँ बगल में छुरी विराजित रही, जब आवशकता पड़ी तब उसे काम में ले लिया ॥
गली गली यह गूंज करि, नृप पर कासत बिंग ।
गधा कहाता फिर रहा, नाम धरा नर सिंग ।११५०।
भावार्थ : --गली गली में शोर है, सब शासक पर व्यंग कसकर कह रहे है : -- देखो गधा कहलाता फिर रहा है और नाम धरा है 'नरसिंग ' कैसा डागदर है ये ॥
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