शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११३॥ -----

जग एक रंग मंच जहाँ , भाँति भाँति के रंग । 
आगिन धरे जोत बरे , जर जर मरे पतंग ।११३१। 
भावार्थ : -- यह संसार एक रंगमंच के सदृश्य है जहाँ भाँती भाँती की अनुभूतियाँ हैं । अग्नि तो ज्योति ने धारण की है, और जल जल कर मर रहा पतिंगा है ॥

मरते मरते ना मरे, करें बिषय  के भोग । 
अघ अवगुन धन नाथ के, जिउते जी के सोग ।११३२। 
भावार्थ : - मृत्य के सन्निकट होते हुवे भी जिनकी मृत्यु नहीं हुई, वे विषयों के ही उपभोग में संलग्न रहे । पाप एवं अवगुण रूपी धन के ऐसे धनवानों की मृत्यु का नहीं अपितु जीवित रहने का शोक होता है ॥

जो जग मैं बिनु काज के, जिनके दाइँ न बाएँ । 
ऐसे खलगन के सहुँहु, सज्जन सीस नवाएँ ।११३३। 
भावार्थ : -- जो इस संसार में बिना प्रयोजन के हैं, जो अपना हितकारी के प्रति भी प्रतिकूल आचरण बरतते हैं । सद चरित्र साधुगण, ऐसे दुष्ट जनों के सम्मुख भी नतमस्तक रहते हैं ॥

करते धरते बहुंत पर, करें बिषय के भोग । 
जो करतारी करतबी, सो सासन पद जोग ।११३४। 
भावार्थ : -- जग में शासक अर्थात राजा तो बहुंत मिले और बहुंत मिल जाएंगे,  पर सभी केवल विषयों के भोगी मिले एवं मिलेंगें । जो मुखिया गुणी हो, पुरुषार्थी अर्थात पुण्यात्मा हो, लोक-निति में कुशल हो ( राजनीति में नहीं) वह शासन के पदों के योग्य है ॥

मन में मरनी भय भरे, सो करतारी नाहिँ ।
जो जन जन निर्भय करेँ, दे करतब कर ताहिं ।११३५।

 भावार्थ : -- जिसके स्वयं के चित्त में मृत्यु का भय हो वह कैसा मुखिया हुवा ॥ जो स्वयं भयभीत है वह जनता
को भयमुक्त कैसे करेगा, उसे स्वयं निर्भयी शासक की आवश्यकता है ॥ जो जन-जन को भयमुक्त करे,शासन उसी के हाथ में सौंपना चाहिए ॥

दीन दरिद दूर दुराए, धनिक पाहि बैठाए । 
आसन चढ़े सासन किए, तिनको दूर भगाएँ ।११३६। 

भावार्थ : -- जो अशक्तजनों को, दुर्दशा ग्रस्त को, विकलता से भरे हुवों को दूर से ही नमस्कार करते हैं । और धन के कामी, चन्दा से घर चलाने वाले लौलुपचारी धनिकों के चरण पकड़े रहते हैं । जो ऊंचे आसनों पर बैठ कर शासन करते हैं, उनके नमस्कार से पूर्व उन्हें नमस्ते कह दें ॥

सजन जीवन पंथ चरत, जो धन पाछिन धाइँ  । 
गतागत मनोरम दिरिस , पाछिनु छूटत जाइँ ।११३७। 
भावार्थ : -- जीवन के पथ पर चलते यदि धन के पीछे भागे, तब आते-जाते मनोरम दृश्य पीछे छूटते चले जाएंगे ॥

रैनी मैल जगत बले, उबटन किरन लगाइ । 
महि मंदारु मीर मले, देखु सकल उजराइ ।११३८। 
भावार्थ : -- रयनी ने सारे जगत में मैल लपटा दिया । तो क्या किरणों ने उबटन लगा दिया ॥ अब अवनि, अवनि पालक, सागर, नदी आदि उस उबटन को मले जा रहे हैं । देखो तो सारे कैसे उजले हो गए ॥

मैं चल चपला चंचला, तुम मेघ घनस्याम । 
मैं माया मन मोहनी, तुम अविरल अभिराम ।११३९-क। 
भावार्थ : -- मैं अस्थिर चंचल विद्युत हूँ,  तुम घने काले मेघ हो । मैं मन को मोहने वाली विलासिता की साधन स्वरूपा हूँ, तुम मुझमें अनुरक्त, तन-मन को भाने वाली अनुभूति हो ॥

मैं घनरस की गागरी, तुम पनियन पनिहार । 
मैं मीर गहि मेखल महि, तुम जगती जगहार ।११३९-ख । 
भावार्थ : -- मैं जल से भरी घघरी हूँ, तुम भीगते हुवे कांवड़िये हो । मैं  करधनी में सागर सजाई हुई भूमि हूँ । तुम तुम इस जगती-जगत के धाता हो ॥

मैं निंदिया नयन बसी, पिय तुम सपन सलौन। 
मैं बिंदिया बदन लसी, अरु पूछूँ तुम कौन ।११३९-ग। 
भावार्थ : -- मैं नयनों में बसी निंदिया हूँ, प्रिय तुम सलोने स्वप्न हो । मैं मस्तक की दमकती बिंदिया हूँ । और पूछ रही तुम कौन ॥

मैं जल लोचन लावनी  , तुम अंतर के भाउ । 
मैं बिरहन अलगाउ करुँ, तुम पिय हिय हिलगाउ ।११३९-घ। 
भावार्थ : -- मैं नयन की सुन्दर अश्रु कणिका हूँ, तुम अंतर के भाव हो । मैं नयनों से वियुक्त होकर तुमसे अलगाव किये हूँ । फिर भी तुम ह्रदय से लगाए हुवे हो ॥

मैं नीर धरि निर्झरनी, तुम पनघट के पौर । 
मैं सुमंगल अवतरनी, तुम अर्थित के ठौर ।११३९-ङ । 
भावार्थ : -- मैं जल धारण कि हुई झरने से निकली नदी हूँ, तुम पनघट की ड्योढ़ी हो । मैं स्वागतकांक्षणी हूँ, तुम प्यासे पंथी के ठौर हो ॥

मैं बंसरी अधर धरी, तुम बंसी धर रूप । 
मैं चंचरि गिरि नंदिनी , तुम सिव के सरूप ।११३९-च। 
भावार्थ : -- मैं अधरों पर धरी वंसी हूँ तुम वंशीधर श्रीकृषण का रूप हो । मैं कंठ लगी भ्रमरी( पार्वती) हूँ तुम शिव शंकर का स्वरुप हो ॥

खादन खाया जल पिआ, दिआ देहि ओहार । 
अचरज कर तेरो करम, कैसे जगत नियार ।११४०। 
भावार्थ : -- वही खाद्यान खाया, वही पानी पिया, वही देहि को बसन छत-छादन दिया, वही नित्य कर्म किया । आश्चर्य है !  तेरे कर्म जगत से न्यारे कैसे हैं ? ॥





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