गुरुवार, 2 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११०॥ -----

वैभव भूति पाहि रहे, होत न तेतक हर्ष । 
पाहि भूति गवाईं के,जेतक होत अमर्ष ।११०१। 
 ----- ॥ ग्रेगरी ॥ -----
भावार्थ : -- धन-सम्पति पास में रहने से उतना आनंद नहीं होता, जितना उसके खो जाने अथवा छिन जाने से दुःख होता है ॥ 


'अपात्रे दीयते दातारं नरकं नयेत्' 

अर्थात : -- "अपात्र को दिया गया दान नरक ( दुर्गत)  में ले जाता है"

जस पाहन के नाइ सन, तरत जन डूब जाए । 
मूरख दाता अरु गाहि, दुनहु नरक डूबाए ।११०२। 

यथा प्लवे नौ पलेन  निमज्जत्युदके तरन् । 
तथा निमज्जतो S धस्ता दज्ञो दातृ प्रतीच्छकौ ॥ 
   ----- ॥ मनुस्मृति ४ / १९४ ॥ -----

अर्थात : - जिस प्रकार पानी में पत्थर की नाव से तैरता हुवा व्यक्ति उस नाव के साथ ही डूब जाता है । उसी प्रकार मूर्ख दाता एवं मुर्ख ग्रहीता दोनी नरक में डूबते और डुबाते हैं  ॥ 

 प्रश्न : - धन सम्पद के तो सुपात्र है, किन्तु 'मत' का सुपात्र कोई नहीं ? 
उत्तर : -- तो मत दे डागदर नै थोड़े बता रखी है कि देणोंए है 

गा गा कहता रे पढन, भेजो पुत परधाम । 
ऐसो भेजणु लाह का, आवै ना कछु काम ।११०३। 
 ------ ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- बावरा बखान करता फिरे, रे पुत को पराए   पढन भेजो है, ऐसो भेजनों का क्या लाभ जो किसी के काम नहीं आवे..... न आपने, न गाम के, न देस के ॥ 

संखइ बिमुख प्रमुदित होत, बहु संखाई संग । 
समुझत गरुवन आपना, जुझबत बीर एकंग ।११०४। 
 ----- ॥ मोहन दास कर्म चंद गाँधी ॥ -----
भावार्थ :-- कायर बहुसंख्यक होने पर प्रसन्न होते हैं, वीर अकेले ही लड़ने में अपना गौरव समझते हैं ॥ 

थैले माया भरि रही, हृदय रहा रीताए । 
जूँ जूँ रीति परहित हुँत, तूँ तूँ भरता जाए ।११०५ । 
 ----- ॥ विक्टर ह्यूगो ॥ ---
भावार्थ : -- विषय विलास की साधन स्वरूपा माया थैली में भरती जाएगी, ह्रदय रिक्त होता जाएगा  । 
                " परोपकार हेतु यह माया की थैली ज्यों ज्यों रिक्त होती जाएगी, हमारा ह्रदय भी त्यों त्यों भरता                       जाएगा " 

समजन तटिनी ताल तुल, उमगे आपन बाढ़ । 
सद्जन सिंधु बिसाल तुल, उमगि दरस सस गाढ़ ।११०६। 
 ----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : - सामान्य जन नदी,सरोवर के समतुल्य होते हैं जो अपनी ही बढ़त पर उत्साहित होते हैं । श्रेष्ठ जन अपार सिंधु के सदृश्य होते हैं जो चंद्रमा की बढ़नी पर अर्थात पराई बढ़नी पर उत्साहित होता है ॥ 

 जेहि सभा मह बिरध नहि, तेइ सभा न अहाहि । 
  जोइ धर्म बचन न कहे, बड़े बिराध सो नाहि ।११०७। 
     ----- ।। महाभारत ॥ -----
भावार्थ : -- "जिस सभा में बड़े-बूढ़े नहीं है, वह सभा नहीं, जो धर्म की बात न कहे, वे बड़े-बूढ़े नहीं "

कबीरा ए संसार मैं, प्रीतिहि बहुत प्रकार । 
जोइ पिया सोंह लागिए, सोइ न्यारि नियार ।११०८। 
  -----॥ संत कबीर ॥ -----
भावार्थ : --  कबीर दास जी कहते हैं : -- इस संसार में प्रेम-अनुराग बहुंत प्रकार का होता है जैसे मात-पिता का, भ्रात-भगिनी का, मित्र-चित्र का, इन सबमें प्रियतम के अथवा ईश्वरके प्रति अनुराग सबसे उत्तम है कारण कि स्त्री--पुरुष के अथवा ईश्वर के प्रेम से ही यह सृष्टि एवं समस्त सम्बन्ध उपजे हैं ॥

पतित गुर तजन जोग है, जोग न पतिता मात । 
मात पद गुरु गरीयसी, गर्भ काल करि धात ।११०९। 

पतिता गुर्वस्त्याज्या माता च न कथञ्चन । 

गर्भधारणपोषाभ्याम् तेन माता गरीयसी ॥ 
 ----- ॥ स्कंदपुराण मा० कौ० ६/७; मत्स्यपुराण २२७/१५०) ॥ ----- 
भावार्थ : -- पतित गुरु भी त्याज्य है, किन्तु माता किसी प्रकार भी त्याज्य नहीं है । गर्भ काल में धारण-पोषण करने के कारण माता का गौरव गुरु से भी अधिक है ॥

हंकार के वसीभूत कार अकार न जान । 
कुपथचारी अस गुर के, त्यागन किए बिधान ।१११०। 

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत : । 
उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥ 
----- ॥ पद्मपुराण,स्कंदपुराण, व् महाभारत ॥ -----
 भावार्थ : -- अहंकार के वशीभूत होकर यदि सद्गुरु भी कार्याकार्य के विवेक से अन्यमनस्क हो जाए, तब उस गुरु का भी त्याग करने का विधान है ॥




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