वैभव भूति पाहि रहे, होत न तेतक हर्ष ।
पाहि भूति गवाईं के,जेतक होत अमर्ष ।११०१।
----- ॥ ग्रेगरी ॥ -----
भावार्थ : -- धन-सम्पति पास में रहने से उतना आनंद नहीं होता, जितना उसके खो जाने अथवा छिन जाने से दुःख होता है ॥
'अपात्रे दीयते दातारं नरकं नयेत्'
अर्थात : -- "अपात्र को दिया गया दान नरक ( दुर्गत) में ले जाता है"
जस पाहन के नाइ सन, तरत जन डूब जाए ।
मूरख दाता अरु गाहि, दुनहु नरक डूबाए ।११०२।
यथा प्लवे नौ पलेन निमज्जत्युदके तरन् ।
तथा निमज्जतो S धस्ता दज्ञो दातृ प्रतीच्छकौ ॥
----- ॥ मनुस्मृति ४ / १९४ ॥ -----
अर्थात : - जिस प्रकार पानी में पत्थर की नाव से तैरता हुवा व्यक्ति उस नाव के साथ ही डूब जाता है । उसी प्रकार मूर्ख दाता एवं मुर्ख ग्रहीता दोनी नरक में डूबते और डुबाते हैं ॥
प्रश्न : - धन सम्पद के तो सुपात्र है, किन्तु 'मत' का सुपात्र कोई नहीं ?
उत्तर : -- तो मत दे डागदर नै थोड़े बता रखी है कि देणोंए है
गा गा कहता रे पढन, भेजो पुत परधाम ।
ऐसो भेजणु लाह का, आवै ना कछु काम ।११०३।
------ ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- बावरा बखान करता फिरे, रे पुत को पराए पढन भेजो है, ऐसो भेजनों का क्या लाभ जो किसी के काम नहीं आवे..... न आपने, न गाम के, न देस के ॥
संखइ बिमुख प्रमुदित होत, बहु संखाई संग ।
समुझत गरुवन आपना, जुझबत बीर एकंग ।११०४।
----- ॥ मोहन दास कर्म चंद गाँधी ॥ -----
भावार्थ :-- कायर बहुसंख्यक होने पर प्रसन्न होते हैं, वीर अकेले ही लड़ने में अपना गौरव समझते हैं ॥
थैले माया भरि रही, हृदय रहा रीताए ।
जूँ जूँ रीति परहित हुँत, तूँ तूँ भरता जाए ।११०५ ।
----- ॥ विक्टर ह्यूगो ॥ ---
भावार्थ : -- विषय विलास की साधन स्वरूपा माया थैली में भरती जाएगी, ह्रदय रिक्त होता जाएगा ।
" परोपकार हेतु यह माया की थैली ज्यों ज्यों रिक्त होती जाएगी, हमारा ह्रदय भी त्यों त्यों भरता जाएगा "
समजन तटिनी ताल तुल, उमगे आपन बाढ़ ।
सद्जन सिंधु बिसाल तुल, उमगि दरस सस गाढ़ ।११०६।
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : - सामान्य जन नदी,सरोवर के समतुल्य होते हैं जो अपनी ही बढ़त पर उत्साहित होते हैं । श्रेष्ठ जन अपार सिंधु के सदृश्य होते हैं जो चंद्रमा की बढ़नी पर अर्थात पराई बढ़नी पर उत्साहित होता है ॥
जेहि सभा मह बिरध नहि, तेइ सभा न अहाहि ।
जोइ धर्म बचन न कहे, बड़े बिराध सो नाहि ।११०७।
----- ।। महाभारत ॥ -----
भावार्थ : -- "जिस सभा में बड़े-बूढ़े नहीं है, वह सभा नहीं, जो धर्म की बात न कहे, वे बड़े-बूढ़े नहीं "
कबीरा ए संसार मैं, प्रीतिहि बहुत प्रकार ।
जोइ पिया सोंह लागिए, सोइ न्यारि नियार ।११०८।
-----॥ संत कबीर ॥ -----
भावार्थ : -- कबीर दास जी कहते हैं : -- इस संसार में प्रेम-अनुराग बहुंत प्रकार का होता है जैसे मात-पिता का, भ्रात-भगिनी का, मित्र-चित्र का, इन सबमें प्रियतम के अथवा ईश्वरके प्रति अनुराग सबसे उत्तम है कारण कि स्त्री--पुरुष के अथवा ईश्वर के प्रेम से ही यह सृष्टि एवं समस्त सम्बन्ध उपजे हैं ॥
पतित गुर तजन जोग है, जोग न पतिता मात ।
मात पद गुरु गरीयसी, गर्भ काल करि धात ।११०९।
पतिता गुर्वस्त्याज्या माता च न कथञ्चन ।
गर्भधारणपोषाभ्याम् तेन माता गरीयसी ॥
----- ॥ स्कंदपुराण मा० कौ० ६/७; मत्स्यपुराण २२७/१५०) ॥ -----
भावार्थ : -- पतित गुरु भी त्याज्य है, किन्तु माता किसी प्रकार भी त्याज्य नहीं है । गर्भ काल में धारण-पोषण करने के कारण माता का गौरव गुरु से भी अधिक है ॥
हंकार के वसीभूत कार अकार न जान ।
कुपथचारी अस गुर के, त्यागन किए बिधान ।१११०।
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत : ।
उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥
----- ॥ पद्मपुराण,स्कंदपुराण, व् महाभारत ॥ -----
भावार्थ : -- अहंकार के वशीभूत होकर यदि सद्गुरु भी कार्याकार्य के विवेक से अन्यमनस्क हो जाए, तब उस गुरु का भी त्याग करने का विधान है ॥
पाहि भूति गवाईं के,जेतक होत अमर्ष ।११०१।
----- ॥ ग्रेगरी ॥ -----
भावार्थ : -- धन-सम्पति पास में रहने से उतना आनंद नहीं होता, जितना उसके खो जाने अथवा छिन जाने से दुःख होता है ॥
'अपात्रे दीयते दातारं नरकं नयेत्'
अर्थात : -- "अपात्र को दिया गया दान नरक ( दुर्गत) में ले जाता है"
जस पाहन के नाइ सन, तरत जन डूब जाए ।
मूरख दाता अरु गाहि, दुनहु नरक डूबाए ।११०२।
यथा प्लवे नौ पलेन निमज्जत्युदके तरन् ।
तथा निमज्जतो S धस्ता दज्ञो दातृ प्रतीच्छकौ ॥
----- ॥ मनुस्मृति ४ / १९४ ॥ -----
अर्थात : - जिस प्रकार पानी में पत्थर की नाव से तैरता हुवा व्यक्ति उस नाव के साथ ही डूब जाता है । उसी प्रकार मूर्ख दाता एवं मुर्ख ग्रहीता दोनी नरक में डूबते और डुबाते हैं ॥
प्रश्न : - धन सम्पद के तो सुपात्र है, किन्तु 'मत' का सुपात्र कोई नहीं ?
उत्तर : -- तो मत दे डागदर नै थोड़े बता रखी है कि देणोंए है
गा गा कहता रे पढन, भेजो पुत परधाम ।
ऐसो भेजणु लाह का, आवै ना कछु काम ।११०३।
------ ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- बावरा बखान करता फिरे, रे पुत को पराए पढन भेजो है, ऐसो भेजनों का क्या लाभ जो किसी के काम नहीं आवे..... न आपने, न गाम के, न देस के ॥
संखइ बिमुख प्रमुदित होत, बहु संखाई संग ।
समुझत गरुवन आपना, जुझबत बीर एकंग ।११०४।
----- ॥ मोहन दास कर्म चंद गाँधी ॥ -----
भावार्थ :-- कायर बहुसंख्यक होने पर प्रसन्न होते हैं, वीर अकेले ही लड़ने में अपना गौरव समझते हैं ॥
थैले माया भरि रही, हृदय रहा रीताए ।
जूँ जूँ रीति परहित हुँत, तूँ तूँ भरता जाए ।११०५ ।
----- ॥ विक्टर ह्यूगो ॥ ---
भावार्थ : -- विषय विलास की साधन स्वरूपा माया थैली में भरती जाएगी, ह्रदय रिक्त होता जाएगा ।
" परोपकार हेतु यह माया की थैली ज्यों ज्यों रिक्त होती जाएगी, हमारा ह्रदय भी त्यों त्यों भरता जाएगा "
समजन तटिनी ताल तुल, उमगे आपन बाढ़ ।
सद्जन सिंधु बिसाल तुल, उमगि दरस सस गाढ़ ।११०६।
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : - सामान्य जन नदी,सरोवर के समतुल्य होते हैं जो अपनी ही बढ़त पर उत्साहित होते हैं । श्रेष्ठ जन अपार सिंधु के सदृश्य होते हैं जो चंद्रमा की बढ़नी पर अर्थात पराई बढ़नी पर उत्साहित होता है ॥
जेहि सभा मह बिरध नहि, तेइ सभा न अहाहि ।
जोइ धर्म बचन न कहे, बड़े बिराध सो नाहि ।११०७।
----- ।। महाभारत ॥ -----
भावार्थ : -- "जिस सभा में बड़े-बूढ़े नहीं है, वह सभा नहीं, जो धर्म की बात न कहे, वे बड़े-बूढ़े नहीं "
कबीरा ए संसार मैं, प्रीतिहि बहुत प्रकार ।
जोइ पिया सोंह लागिए, सोइ न्यारि नियार ।११०८।
-----॥ संत कबीर ॥ -----
भावार्थ : -- कबीर दास जी कहते हैं : -- इस संसार में प्रेम-अनुराग बहुंत प्रकार का होता है जैसे मात-पिता का, भ्रात-भगिनी का, मित्र-चित्र का, इन सबमें प्रियतम के अथवा ईश्वरके प्रति अनुराग सबसे उत्तम है कारण कि स्त्री--पुरुष के अथवा ईश्वर के प्रेम से ही यह सृष्टि एवं समस्त सम्बन्ध उपजे हैं ॥
पतित गुर तजन जोग है, जोग न पतिता मात ।
मात पद गुरु गरीयसी, गर्भ काल करि धात ।११०९।
पतिता गुर्वस्त्याज्या माता च न कथञ्चन ।
गर्भधारणपोषाभ्याम् तेन माता गरीयसी ॥
----- ॥ स्कंदपुराण मा० कौ० ६/७; मत्स्यपुराण २२७/१५०) ॥ -----
भावार्थ : -- पतित गुरु भी त्याज्य है, किन्तु माता किसी प्रकार भी त्याज्य नहीं है । गर्भ काल में धारण-पोषण करने के कारण माता का गौरव गुरु से भी अधिक है ॥
हंकार के वसीभूत कार अकार न जान ।
कुपथचारी अस गुर के, त्यागन किए बिधान ।१११०।
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत : ।
उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥
----- ॥ पद्मपुराण,स्कंदपुराण, व् महाभारत ॥ -----
भावार्थ : -- अहंकार के वशीभूत होकर यदि सद्गुरु भी कार्याकार्य के विवेक से अन्यमनस्क हो जाए, तब उस गुरु का भी त्याग करने का विधान है ॥
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