गुरुवार, 30 जनवरी 2014

----- मिनिस्टर राजू १२२ -----

राजू : -- मास्टर जी ! राष्ट्र पति कैयां बण सी ?

" घोड़ी को सनेह पी के"

राजू : -- मास्टर जी! पण म्हारे बालक, कै तो मैय्या का रस कै गौरस पी के बड़े होसी,

 " पण जो घोड़ी को सनेह पी के जी गया, वोई राष्ट्र पति बण सी.....इतनो बड़ो अस्तबल, बीके इतने घोड़े घोड़ी, गोरसिया सै थोड़ी संभलोगो

बुधवार, 29 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११९ ॥ -----

पोथी सौमुख धार कै, श्री मन कथा सुनाए । 
जनार्दन की छाँड़ कै, आपनी गाए जाए ।११९१। 
भावार्थ  - एक लाम्बी पोथी आग्गै धर ली, महाराज कथा सुनावै हैं । जनार्दन की तो छोड़ दी, अपनी गाइ जावै  है ॥

चारु चुनरिया दुलन की, चढ़े रंग सो दून । 
पाए लावन लालिमा, मिले हरदि जूँ चून ।११९२। 
भावार्थ : -- दुहन की सुन्दर चुनरी है, जिसपर दुगुना रंग चढ़ा है । जैसे हल्दी चूने  के संग मिल कर सुन्दर लालिमा देती है उसी प्रकार यह दुलहन के कर्पूरी रंग के संग मिलकर लावण्यता प्रदान कर रही है ।

किसान भया बनिहारी, दान भया बैपार । 
सुधारें ब्यवस्था तब सुधारत  ब्यबहार ।११९३। 
भावार्थ : -- जब किसान बँधवा श्रमिक हो जाए, और दान व्यापार बन जाए । तब व्यवहार का सुधारीकरण करते हुवे व्यवस्था में सुधार करनी चाहिए ॥

तेरे दानै पंख सन, उरिने गगन बिहंग । 
उठल्लूहु का चूल्हा, चेले चेली संग ।११९४। 
भावार्थ : -- तुम्हारे दान किए पंखों से , अपने चेलो चमेलों के साथ ये परिंदे गगन में उठल्लू का चूल्हा जैसे बिना मतलब के उड़ते  फिर रहे हैं ॥

टीका : -- "मतदान यदि दायित्व हैतब इन्हें मत देने वाले  इसका उत्तर दें कि ये हमारे दिए कर का दुरूपयोग क्यों कर रहे हैं"

बिआ बिअ सो एकै मूठि, अरु जा सोया खाट । 
निसदिन देखे बावरा, सुपक उपज की बाट ।११९५। 
भावार्थ : --  खेत इतना बड़ा, बीज तो बोया एक मुट्ठी और जा कार खाट में पसर गयो । जाते जाते बनिहारी से कह गयो बढ़िया पकी उपज से कोठो भर जाणो चाहिए, अब बावरा निसदिन बाट देखे ॥

मायादास कह को प्रभु, कौन मूरति अकाल । 
सकल देव सुरताए जब दिए अकाल एक गाल ।११९६। 
भावार्थ : -- विषय विलास की साधन स्वरूपा माया का दास कह रह है प्रभु कौन, परमात्मा कौन है ॥ जब गाल पर अभावों का एक थप्पड़ पड़ा, तब सारे भगवान स्मरण हो आए ॥

हे जननी तू भगत जन, के दाता कै बीर । 
तेरे दीपक दीपिका, बने गगन के हीर ।११९७।
भावार्थ : -- हे माता तू या तो भक्त को जन्म दे या फिर दाता या वीर को जन्म दे(इन भिखारियों को मत जन) । तेरे कुल का दीपक तेरी कुल की ज्योति फिर गगन के सूर्य बने ॥

भाव लगे कुकरमन मैं, भगती लाहन लाहि । 
तिनकी सेवा पूरनन , लगी सुवारथ माहि ।११९८। 
भावार्थ : --   जिनके भाव कुकर्मों में लगे हैं एवं भक्ति लब्ध-लाभ अर्जित करने में लगी हैं । उनकी सेवा सुश्रुता स्वार्थ पूर्ण करने में ही लगी रहती है ॥

गंगा तो गंगा रही, जल नित नवल नयाए ।
दुनिया तो दुनिया रही, नउ नउ जिउ जन्माए ।११९९।
भावार्थ : -- गंगा तो गंगा है वही पुऱानी, किन्तु उसका जल नित्य ही नया रहा । दुनिया तो दुनिया रही वही पूरानी, जीव नए नए जन्म लेते रहे ॥

हरी भरी धरनि की जो, जोग रखे बनराए । 
मरजादा भित नदपत रहे, नदि मग ना बिसराए । १२००। 
भावार्थ : -- यदि हरी भरी इस धरती की रक्षा वृक्ष करेंगे तब समुद्र मर्यादा में रहेगा एवं नदी मार्ग नहीं भूलेगी॥


----- मिनिस्टर राजू १२१ -----

" राजू ! के पड रिया सै?

राजू : -- मास्टर जी ! एक ग्रन्थ पड रिया सूँ.....इस ग्रन्थ नै, एक महा रिसी मुनि हिमालय के सिखर पर चड के अतिसय जप तप जज्ञ करके लिखा सै"

" लै इसे इसे ग्रन्थ तो म्हारी गिरहनियाँ रोट्टी बणाते बणाते लिख दें.....वो बावली बूझ ( मूर्ख) जब सिखर पे चड ही गया था तो किम्मे ढंग का करता..... 

शनिवार, 25 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११८॥ -----

जलज परे जल जल हरे, जलज परे कर नेह । 
आपनि तौ जल जल बरे, जलज जलज करि देह ।११८१।  
भावार्थ : -- सिंधु ऊपर पड़ता है तो ईर्ष्या वश उसका जल हर लेता है, चंद्रमा/कमल पर पड़ता है तो स्नेह काहे करता है ।  आप तो जल जल कर बर रहा है ,  देह को मुक्ता मुक्ता किए है॥

तन सों तो लागे रहे, मन लागे कहि और । 
जिन सों मन लागे रहे, बैसे सोई ठौर ।११८२। 
 भावार्थ : -- यदि तन किसी भाव में लगा है, और मन किसी और भाव में लगा है ॥ तो ? जिस भाव में मन लगा है, आप वहीँ विराज मान है ॥

नवल वचन बिपल पुरान, पुरान बहुस पुरान ।
उद्धरन समरथ सोइ दें, जीवन में अस्थान ।११८३।
भावार्थ : --नवल विचारों की आयु विपल भर है  उनका परिक्षण-प्रयोग नहीं हुवा है उनका  निष्कर्ष नहीं आया है कि वह जीवन के हेतु हानि कारक है की लाभदायक  । जो पुराने हैं उनकी आयु अतिशय है । अत: जो विचार संसार का उद्धरण करने में समर्थ हो उसे ही अपनाना चाहिए, वे चाहे नविन हो चाहे पुराण ॥

टिप्पणी : -- "संसार के उद्धरण में ही प्राणि-जगत का उद्धरण है"
                    " उन्मुक्त वातावरण को किसी भी दृष्टि से आधुनिक नहीं कहा जा सकता"
                     " अल्पायु में देहिक सम्बन्ध यह एक पुरातन विचार है, जिसके दुष्परिणाम को भारत भुगत                                 चुका है, एवं भुगत रहा है"

देखु तिन जन सेवक कू, भरे राजसी सोंह । 
औरन थुड़ी थुड़ी करत, आप पाखनी जोह ।११८४। 
भावार्थ : --उस जन-सेवक को देखो, राजसी शोभा पहन के स्वयं को जनता का सेवक कहता है । जो स्वयं तो पाखंडी है, औरों पर थूकता फिर रहा है ॥

काल के कहहि काल, तू अजहूँ की कर बात । 
ए देस ए बयस इ काल मैं, पलक काल हो जात ।११८५। 
भावार्थ : -- कल की कल कहेगा या काल/समय/मृत्यु कहेगा , तू केवल अभी की कह  । इस देश काल में एवं इस परिस्थिति में पलक में मृत्यु हो जाती है

टीका : --  कल मैं वज़ीर बनूंगा तो ये कर दूँगा वो कर दूँगा, अरे भैया लोग( लुगाई नहीं)  ! उसे अभी करो ।  ये देश-प्रदेश तुम्हारे ही है हमारे थोड़ी हैं ॥

तू कहे आगिन बढ़ पर, जनम जुगे हैं पीछ । 
आगिन बिरधा बै संग, जुहार रहि पथ मीच ।११८६। 
भावार्थ : -- तू कहता आगे बढ़ो, और बढे चलो किन्तु जन्म जुड़े है पीछे । आगे वृद्धवस्था के संग मृत्यु प्रतीक्षा कर रही है ॥

घर मैं सिख भतेरी फिर सिखे पराई सीख । 
आप तो अंधरा भया, दूज की फोड़ी दीख ।११८४। 
भावार्थ : -- घर में भतेरा ज्ञान पड़ा है, फिर भी पराई की सीखाई सिखे है । आप तो आँधा हुवा फिरे, दूसरों की ओर फोड़ दी ॥

धरम के चारि चरन सन, जाकी ऊंची बात । 
जो तुल दीन दारिद सो, पर निंदा के पात ।११८५। 
भावार्थ : -- जो धर्म के चार चरण अर्थात : -- सत्य, शौच ( तप के सह शुद्धि) दया एवं दान के साथ जिसके उच्च विचार हों एवं जो स्वयं की तुलना में अधिक दीन-दरिद्र हो वो निंदा करने का अधिकारी होता है, उसे ही आँगन में कुटिया बना कर रखना चाहिए ॥

कहनाउत सुख सार गहि, कथनी तबहि मिठाइ । 
कटुक बचन के कटुर लहि, सो खट मीठ खटाइ ।११८६। 
भावार्थ : --  कहावतों का सार गरहन की हुई हो,  कथनी तभी मीठी लगती है । और जो कटूक्ति की छाछ प्राप्त हो वह तो खट्टी मीठी खटाई है ॥

भगत जानै भगवन कू, भगवन भगतनु जान । 
बाक़ी मूर्ख हुँत बने, पुर पुर प्रनब पाषान ।११८७। 
भावार्थ : -- भक्त भगवान को जानते हैं, भगवान भक्त को जानता है । जो घर घर, नगर नगर, पुरी पुरी में पत्थर के भगवान हैं वो बाकी मूर्खों के लिए हैं ॥

चेतावनी : -- "अपने को परम भक्त भी नहीं समझना चाहिए, अन्यथा अंतत: बगुले भगत सिद्ध होंगे "

जननी नै जना बाछड़ा, माँगे रोदत सार । 
अपनी देह उतरै नहि, सो फिर धेनु अधार ।११८८। 
भावार्थ : -- माता ने बालक को जन्म दिया, वह रो रो कर स्नेह मांग रहा है । माता की देह से तो उतरे नहीं, फिर वह धरती और गौ के आधार रहेगा  ॥

जननी जगत जितौ जहाँ, जने जो कोउ बाल । 
किंचित काल लग तिन्ह , पवित पेयुखहि पाल ।११८९। 
संसार में माता जहां कहीं भी हो, वो यदि बालक को जन्म दे। तो कुछ समय तक  पवित्र पीयूष से ही उसका पोषण होता है ॥

को सिक्खन को सिखावन, परबासें परदेस ।
दोनौ जो एक ठौर करूँ, अब लै दे उपदेस ।११९०-क।

तिन निपट मूरखान कू, सदमति दे भगवान ।
गौन भया जिन देसना, भया देस परधान ।११९०-ख।

भावार्थ : -- एक पंडित जी  सीखने बिदेस गए एक सिखाने बिदेस गए । उन दोनों को एक स्थान पर इकट्ठा कर दूँ लो लेओ और देओ.....उपदेस केतना दोगे ।।

उन निपट मूर्खों को थोड़ी सद्बुद्धि दे भगवान । जिनके लिए शिक्षा गौण है, स्थान महत्वपूर्ण है ॥










बुधवार, 22 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११७॥ -----

काज माँगता रीति कू, रीति माँगती राज । 
राज माँगता नीति कू, नीति माँगती प्राज ।११७१। 
भावार्थ : -- क्रियान्वयन नियम की अभिलाषा में रहता है,नियम प्रजापालन व्यवस्था की अभिलाषा करता है ॥ प्रजा पालन व्यवस्था नीतियों की आशा करती है, नीतियां विधि, विधान, बुद्धिमान, दक्ष मनुष्य की अभिलाषा करते हैं ॥ 

साज माँगता प्रीत कू, प्रीत माँगती ताज । 
काम माँगता सुरति कू, सुरति माँगती लाज ।११७२। 
भावार्थ : --सुंदरता, प्रीति की  अभिलाषा करती है, प्रीति त्याग के आस में रहती है । काम अति अनुरक्ति की आस  करता है, अति अनुरक्ति लज्जा की अभिलाषा करती है ॥ 

प्रीति की रीति पुरानी, जगत सदा चलि आइ । 
आवन-जावन लगे रहि, पर ना प्रीत बिहाइ ।११७३। 
भावार्थ : --प्रीति की रीति इस संसार में सदा से चली आई है । कोई आया और कोई गया, किन्तु प्रीति का अंत न हुवा ॥ 

रहहीं सोइ सिधाए गए, अहहीं सोइ सिधाहिं । 
आगिन अगंतुक के गत, तिनते बिलगित नाहिं ।११७४। 
भावार्थ : -- थे वे भी गए, हैं वे भी जाएँगे ।  जो आएँगे उनकी भी गत 'थे' एवं 'हैं' से भिन्न होने वाली नहीं ॥ ईसी लिए संत लोग कहते हैं, सत्ता एवं माया के पीछू मति भागू रे ॥  

भुवन पर भौत निर्मान, भया अधिकाधिकान । 
अजहुँ सम्यक बितरन पर, रे जगत दे ध्यान ।११७५। 
भावार्थ : -- लोक में भौतिक निर्माण बहुंत हो गया, और अधिक की आवश्यकता नहीं है । अद्यावधि उचित वितरण की आवश्यकता है । हमें इस पर ध्यान देना चाहिए न कि निर्माण पर । कारण कि अब पृथ्वी पारिस्थितिक असंतुलन को सहने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि ज्यों ज्यों निर्माण होगा यह असंतुलन बढ़ता ही जाएगा ॥ 
             विश्व में अवैध निर्माणों को राजसात करें, इन्हें किसी प्रकार से भी नष्ट न करें, पुराने निर्माणों का रखरखाव करें । आओ मनुष्य जाति से इतर अन्य प्राणियों के निर्माण पर भी ध्यान केंद्रित करें । 

करनीअ अकरनीअ दौ, करे सब एकीकार । 
अकरनीअ का करतार, करनीअ को न कार ।११७६। 
भावार्थ : -- करने योग्य कार्य एवं न करने योग्य कार्य दोनों को एक कर दिया । जो नहीं करना चाहिए उसके तो करतार हो गए , जो करना चाहिए वह करते नहीं ॥ 

पालक बिनु यह देह नहि, नेह नहि बिनु सनेहि  । 
बिनु राम अवध अवध नहि, राम न बिनु बैदेहि ।११७७। 
भावार्थ : -- जगत पालक अथवा पिता के बिना इस देह का अस्तित्व नहीं, बिना स्नेही अर्थात माता ,पृथ्वी,गौ बिना पोषण नहीं ॥ बिना राम के अवध, अवध नहीं बिना सीता के राम, राम नहीं ।आउर जब कोई राम नहीं हो सकता तो बिना सीता के कोई रावण कैसे हो सकता है ? 

गया, मर गया, रोए कहें, पर मर गया न कोइ । 
पाए पद परम सद करम,  करत गया मर सोइ ।११७८। 
भावार्थ : -- हाय गया ! हाय हाय मर गया !! रो रो कर सब कह रहे थे, पर मर कर गया कोई नहीं था, यहीं चौरासी योनियों में भटक रहा था । कृतकर्म करते हुवे जिसने परमपद प्राप्त किया वास्तव में मर कर वही गया वही विलाप के योग्य भी है ॥ 

आनंद कँह जँह सुख है, सुख कँह जँह संतोख । 
संतोख कँह जँह मन है, मन जँह पद पतपोख ।११७९। 
भावार्थ : -- आनंद कहाँ है ? जहां सुख है ! सुख कहाँ है? जहां संतोष है ! संतोष कहाँ है? जहां मन है (मन में संतोष होना चाहिए , तन में नहीं ) । मन कहाँ है जहां पोषनहार ( पति, प्रियतम, माता-पिता , ईश्वर ) के चरण हैं ॥ 

मन का मानस दूषिता, करता चोरि चकार । 
थिर निथरए हे उदहरन, गहौ ज्ञान के सार ।११८०। 
भावार्थ : -- मन मैला सरोवर कल कल , चंचल चोरि करे प्रतिपल  ॥ हे कमंडल  ! जब यह मल थल में जाए, और तल निरमल हो जाए , तब तुम इस ज्ञान-जल को गहना  ॥  

मन मैला सरोवर मंदर लल, साँवल सोर करे प्रतिपल ॥ हे कमंडल ! जब यह सीतल हो जाए और हल हिमवल हो जाए , तब तुम इस ज्ञान जल को गहना ॥ 


रविवार, 19 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११६॥ -----

मेल बुराई सरल है, मारग चरतै लाहि । 
हेल बहुसहि कठिन है, लहनी भलमनसाहि।११६१। 
भावार्थ : -- बुराई का मिलना अत्यधिक सरल है वह तो मार्ग में चलते हुवे भी प्राप्त जाती है । किन्तु भलमनसाही का मेल मिलना बहुंत ही कठिन है ॥

सबहि जने जनक जननी, जग मैं सबहि कुलीन । 
जो कृत कारज करत गए, सोइ मूरि भइ पीन ।११६२।
भावार्थ : -- पेड़ पर कोई नहीं लगा, सभी जनों को उनकी जननी एवं जनक ने जन्म दिया है, अत: सभी कुल विशेष में उत्पन्न हुवे हैं । जो सत्कार्य करते चले, उसकी जड़ सुदृढ़ हुई अथवा होगी॥

'कुकृत्य से, सुदृढ़ जड़े उखड भी सकती हैं'

गा गा के को कहि रहा, रे हरि बसे अगास ।
तेरे मेरे भीत है, वाका मूल निवास ।११६३।
भावार्थ : - गा गा कर कोई कह रहा था, अरे ईश्वर ऊपर आकाश में बसे है । अच्छा ! ईसी लिए उसे ऊपरवाला कहते हैं । रे मूर्ख बुद्धिहीन, ईश्वर का मूल निवास तो तेरे मेरे अंतर में है ॥

नयन पलक पहरी करत, तन कर गेह दुआर ।
अंतर भगवन बास है, पल पल  जोग निहार ।११६४।
भावार्थ : -- नयन-पलक को प्रहरी कर देह को घर दुआर कर ॥ कारण कि इसके अंतर में भगवान का वास है, अत: अपने कुत्सित कार्यों का अवलोकन करते हुवे इस द्वार की देखभाल कर ॥

भवांबुधि देही नाउ, मति करनी मत हार।
चलन  बायुर परिहर के, केवल कूल निहार।११६५ ।
भावार्थ : -- यह संसार एक सागर है एवं देह एक नाव है, बुद्धि कर्ण ( पतवार)  है एवं विचार ही कर्णधार हैं । संसार का चलन तीव्र वायु है जो नाव को भा ले जाती है किन्तु ऐसे वायुर को अनदेखा करते हुवे कर्णधार की दृष्टि तट पर स्थिर रहनी चाहिए ॥

सिस हेरे सदगुरु मिले, होइ धनंजय सोइ । 
हेर मिले गुरु आप जो, सोइ एकलब्य होइ ।११६६। 

भावार्थ : -- शिष्य के ढूंढे यदि सद्गुरु मिलता है, वह शिष्य धनंजय है । किन्तु जिसे गुरु स्वयं ढूंढे मिले वह अवश्य ही एकलव्य होगा ॥ 

महा भारत कथा पौध, फुर भगवदोपदेस । 
भगवन बरन ज्ञान गंध, पत पत सत संदेस ।११६७। 
भावार्थ : --महाभारत की कथा यदि एक पौधा है, तो श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेस उसका पुष्प है । ईश्वर उस पुष्प का अक्षर हैं, रंग है, अनुभूति है, ईश्वर उस पुष्प में नित्य है अविनाशी हैं । ज्ञान उसका गंध है । उसका  पत्र पत्र सत्य का सन्देश है ॥ 

साँस साँस बहुमूल है, सोच सोच उछ्बास । 
चरन चरन सद्कर्म कर, तीर तरन उपबास ।११६८। 
भावार्थ : -- प्रत्येक सांस बहुमूल्य है, इसे सोच समझ कर मनन करते हुवे ग्रहण एवं निष्कासन करना चाहिए । जीवन के प्रत्येक चरण में कृतकार्य का अभ्यास करते हुवे संसार से पारगमन हेतु अकृत कार्यों से उपवास रखना चाहिए ॥ 


साँस साँस बहुमूल है, सोच सोच उछ्बास । 
चरन चरन सद्कर्म कर, तीर तरन उपबास ।११६८। 
भावार्थ : -- प्रत्येक सांस बहुमूल्य है, इसे सोच समझ कर मनन करते हुवे ग्रहण एवं निष्कासन करना चाहिए । जीवन के प्रत्येक चरण में कृतकार्य का अभ्यास करते हुवे संसार से पारगमन हेतु अकृत कार्यों से उपवास रखना चाहिए ॥ 

टिप्पणी : -- ध्यान अथवा मनन अथवा चिंतन हेतु स्थान,स्थिति(स्थिरता),अथवा स्थेय ( जैसे अगरबत्ती ,आसन आदि) अनिवार्य नहीं है यह नित्य कर्म करते हुवे भी किया जा सकता है । 

जन संचालन तंत्र मैं सद्गुन जन संतोष । 
सत्ता धारन धारना, लगे अनख घन दोष ।११६९। 
भावार्थ : --जन संचालन तंत्र कोई भी जनता  संतोष उस संचालन तंत्र का सदगुण है । एवं सत्ता धारण करने की अवधारण में प्रतिस्पर्धा परम दोष है, विद्यमान में यह प्रतिस्पर्धा गला काट हो गई है वो भी लोकतंत्र में?॥  

टीका : -- रामराज्य में यद्यपि राज्यतंत्र स्थापित था तद्यपि सत्ता धारण करने में प्रतिस्पर्धा नहीं थी । भगवान् राम अंतिम व्यक्ति सिद्ध हुवे, जिन्हें विवश होकर सत्ता धारण करनी पड़ी॥

नयन है न कर चरन है, करन न मुख रस बैन । 
बहोरि बिधि भल बिधि रखे, चौकस जग दिन रैन ।११७०। 
भावार्थ : -- विधाता तो निर्गुण है अर्थात न उनके नयन हैं न हाथ हैं न चरण हैं, न करण हैं, न ही आनन है जिससे कि वह स्वाद ले सकें एवं बोल सकें ॥ फिर भी वे  कितनी कुशलता से जगत का चौकस संचालन कर रहे हैं, समय पर दिवस होता है, समय पर निशा आती है ॥

                                         हमने तो इतनी सुन्दर देह धारण की हुई हैं वह भी मनुष्य की, इतना सुगम साधन होते हुवे भी संसार में दुःख व्याप्त किये हुवे हैं ॥



गुरुवार, 16 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११५॥ -----

सत्ता ऐसी कुलछिनी, छाँड़े ना जो ईस । 
तासु गहन तब धरम जब, हो ना कोउ अधीस ।११५१। 
भावार्थ : -- सत्ता ऐसी कुलक्षणी है ऐसी कुलटा है ऐसी कुचालि ऐसी.....जिसने भगवान को भी नहीं छोड़ा ॥ इसका ग्रहण तभी पुण्य है, जब कोई शासक बनना न चाहता हो ॥ 

राजन कोष कर उर्बर, प्रजा उपजाउ खेत । 
सम सरूप जब उरारे, तबहि बर उपज देत ।११५२। 
भावार्थ : -- शासक के कर के धन का भंडार उर्वरक के सदृश्य होता है, जनता उपजाऊ क्षेत्र के सरिस होती है ॥ 
उर्वरक को जब समान स्वरुप में वितरण करेंगे तभी यह उन्नत उपज उपजाएगी ।। 

                                             
जगत प्रभुता जोग लिये, पाए बढ़ाई मान । 
मान तब कहाँ रह गया, लूटा होत बिहान ।११५३। 
भावार्थ : -- जगत का सारा महात्म्य सारा वैभव समस्त गौरव को जोड़ लिया, अतिशय बढ़ाई एवं सम्मान पाया । यह मान सम्मान तब कहाँ रह गया, जब अंत होते ही इसे लूट लिया जावेगा ॥ 

रसरी लमान मान है, सर्प के का लमान । 
बुराईहि के मान को, सुजन ऐसेउ जान ।११५४। 
भावार्थ : - रस्सी /जिह्वा की लम्बाई छोटी बड़ी उचित है किन्तु सर्प तो सर्प है, सर्प का भी क्या छोटा एवं क्या बड़ा । सज्जन बुराई के मान को भी सर्प के सदृश्य ही मानते हैं ॥ 

थोड़ै कारत रे मना, होत अधिकाधिकान । 
थोड़े थोड़े जल बढ़त, डूबि जात जलजान ।११५६। 
भावार्थ : -- रे मनमानस ! थोड़ा करते अधिकाधिक हो जाता है । थोड़ा थोड़ा जल बढ़ने से  जलयान भी डूब जाता है ॥ 

सेवक बिकता हाट मैं, लै लो लै लो मोल । 
कहे हरि का लेवेंगे, तुहरे असीर बोल ।११५७। 
भावार्थ : -- सेवक हटवार में बिक रहा है, ले लो मोल ले लो । जब हरि ने पूछा कहो क्या लोगे । तो हटबया (विक्रेता ) ने कहा भगवान केवल आपके आशीर्वचन ॥ 

 कलुख करम काल धन को, छिनु छिनु जोगे नैन । 
तिनको दुआरि जोग दिए, गया गेह का चैन ।११५८। 
भावार्थ : -- जो श्रम नहीं करना चाहते, प्रत्येक क्षण केवल पाप कर्म से उत्पन्न काले धन की ही प्रतीक्षा में रहते हैं । ऐसों को यदि द्वार का प्रहरी रखा, तो फिर घर का सुख-चैन गया समझो, 

अर्थात : -- "चोरों के कर-कमलों में घर की चौकीदारी मत सौंपों"

माँगे हाथ पसार नहि,  वासो को अपमान । 
नयबिद जा कोउ लेखे , खड़े तजे जो मान ।११५९। 
भावार्थ : -- हाथ पसार कर भीख माँगने के समान कोई अपमान नहीं है । कोई इन 'राजनीति' के सुसम्पन्न ज्ञाताओं को जाकर समझाए जो अपना सम्मान त्याग कर फिर भीख मांगने खड़े हो गए ॥ 

पुन कमाई के अवसरु , मिले जगत कठिनाए । 
जो तिन लहन बिलम करे, सो अभागे कहाए ।११६०।  
भावार्थ : -- संसार में पुण्य कमाने के अवसर कठिनाई से प्राप्त होते हैं । जो इन अवसरों को प्राप्त करने में विलम्ब करता है, वह भाग्यहीन कहलाता है ॥ 

----- मिनिस्टर राजू १२० -----

राजू : -- 

                                गली गली यह गूंज करि, नृप पर कासत बिंग । 
                               गधा कहाता फिर रहा, नाम धरा नर सिंग ।११५०। 
अर्थात : - गली गली में शोर है, सब शासक पर व्यंग कसकर कह रहे है : -- देखो गधा कहलाता फिर रहा है और नाम धरा है 'नरसिंग ' 
                            मास्टर जी ! कैसा डागदर है ये ॥ 

"और इसका कंपोडर देखो, एम्बुलैंस की बत्ती बना हुवा है"

सोमवार, 13 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११४॥ -----

दान गहन पाखण्ड किए, खाए जगत कौ चुंड । 
मुंड चनक ले जोग लिए, तिन मुण्डक दै मुंड ।११४१ । 
भावार्थ : -- दान प्राप्त करने के लिए जिन्होंने पाखण्ड रचा रखा है, जो मटर की माला हाथ में लिए भोग वाले योगी होकर योग सिखा रहे हैं,वे सारे जगत को नोच नोच कर खाए जा रहे हैं  उनके सिर नाई को मुंड देना चाहिए ॥

को दुखहा को भूखहा, को झुगियन को अगार ॥ 
अस कुसासन को जन जन, दुर्बादित दैं गार ।११४२। 
भावार्थ : --संविधान की प्रस्तावना को ठेंगा दिखाती इस कुव्यवस्था में कोई अटारियों में भण्डार भर कर भी भूखा है, कोई झुग्गियों में है इसलिए दुखी है, अर्थात दीनता सर्वत्र व्याप्त है ।  ऐसे कुशासन को सभीजन दुर्वचन कहते गालियां दे रहें हैं, उतने ऊपर सुनाई नहीं देता।।

को देईं जग सम्पदा , को देईं धन धान । 
वाके सोता जान ले, फिर कर गान बखान ।११४३। 
भावार्थ : -- कोई जग को अपनी सम्पदा दान कर रहा है, कोई अन्न दान कर रहा है कोई धन दान कर रहा  । उस दान का प्रशंसात्मक व्याख्यान से पूर्व दाता के धन-धामन-धान के स्त्रोत का संज्ञान ले लेना चाहिए ॥

सुख बदले दुःख मोल लिए, दिए मुँहु माँगे दाम । 
जोइ अस ब्यबहार किए, सो जग जोग प्रनाम ।११४४।
भावार्थ : - सुख के बदले दुःख मोल लिया वो भी मुंह मांगे दाम में । जिसने भी ऐसा व्यवहार किया वह संसार में आदर के योग्य है ॥

गरुवन निसदिन ग्रास दै, पखियन को कन दान । 
स्वान सेष असन देत , दे जीवन सब प्रान ।११४५। 
भावार्थ : -- प्रत्येक दिवस गौग्रास देना चाहिए, पक्षियों को अन्न-कण दान करना चाहिए । बचा हुवा भोजन स्वान को देकर , प्रत्येक प्राणी को जीवन-दान देना चाहिए ॥ 

कर कंगन कस आरसी, बोले बहुस सलोन । 
जब पूछूं तो चुप रहे, पीतर है की सोन ।११४६। 
भावार्थ : -- रे दर्पण ! यह हाथों के कंगन कैसे है ? वह कहे बहुंत सुन्दर । जब पूछूं, पीतल के हैं कि स्वर्ण के तब वह चुप हो जाता है ॥ 

नीति रहि न न्याय रहा, रहे न भगवन पंच । 
पद के लोभी लालची, रहे बिकाऊ बंच ।११४७। 
भावार्थ : - शासन की न तो कुछ नीतिया ही हैं न देश में कहीं न्याय है, न्यायाधीश भी भगवान नहीं रहे ॥ रह गए तो  लोभी लालची धूर्त, कपटी, दुष्ट ठग ॥ 

हर बाट हटबार भया, जन जन रहा बिकाए । 
मुठी वाका मोल धरे, तो फिर सकै बिसाए ।११४८। 
भावार्थ : -- प्रत्येक पथ हाट हो गया । राष्ट्र पति,प्रधानमन्त्री से लेकर पार्षद, सरपंच सचिव तक जहां प्रत्येक व्यक्ति बिकाऊ है । यदि मुट्ठी में उसका मूल्य धारण किया है, तभी उसे मोल ले सकते हैं ॥ 

साजन काको मुखहु मैं, अब तौ रहा न राम । 
छुरी काखे गही रही, जब तब लिए तिन काम ।११४९। 
भावार्थ : -- सज्जनों अब तो किसी के मुख में राम भी नहीं रहा । हाँ बगल में छुरी विराजित रही, जब आवशकता पड़ी तब उसे काम में ले लिया ॥ 

गली गली यह गूंज करि, नृप पर कासत बिंग । 
गधा कहाता फिर रहा, नाम धरा नर सिंग ।११५०। 
भावार्थ : --गली गली में शोर है, सब शासक पर व्यंग कसकर कह रहे है : -- देखो गधा कहलाता फिर रहा है और नाम धरा है 'नरसिंग ' कैसा डागदर है ये ॥ 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११३॥ -----

जग एक रंग मंच जहाँ , भाँति भाँति के रंग । 
आगिन धरे जोत बरे , जर जर मरे पतंग ।११३१। 
भावार्थ : -- यह संसार एक रंगमंच के सदृश्य है जहाँ भाँती भाँती की अनुभूतियाँ हैं । अग्नि तो ज्योति ने धारण की है, और जल जल कर मर रहा पतिंगा है ॥

मरते मरते ना मरे, करें बिषय  के भोग । 
अघ अवगुन धन नाथ के, जिउते जी के सोग ।११३२। 
भावार्थ : - मृत्य के सन्निकट होते हुवे भी जिनकी मृत्यु नहीं हुई, वे विषयों के ही उपभोग में संलग्न रहे । पाप एवं अवगुण रूपी धन के ऐसे धनवानों की मृत्यु का नहीं अपितु जीवित रहने का शोक होता है ॥

जो जग मैं बिनु काज के, जिनके दाइँ न बाएँ । 
ऐसे खलगन के सहुँहु, सज्जन सीस नवाएँ ।११३३। 
भावार्थ : -- जो इस संसार में बिना प्रयोजन के हैं, जो अपना हितकारी के प्रति भी प्रतिकूल आचरण बरतते हैं । सद चरित्र साधुगण, ऐसे दुष्ट जनों के सम्मुख भी नतमस्तक रहते हैं ॥

करते धरते बहुंत पर, करें बिषय के भोग । 
जो करतारी करतबी, सो सासन पद जोग ।११३४। 
भावार्थ : -- जग में शासक अर्थात राजा तो बहुंत मिले और बहुंत मिल जाएंगे,  पर सभी केवल विषयों के भोगी मिले एवं मिलेंगें । जो मुखिया गुणी हो, पुरुषार्थी अर्थात पुण्यात्मा हो, लोक-निति में कुशल हो ( राजनीति में नहीं) वह शासन के पदों के योग्य है ॥

मन में मरनी भय भरे, सो करतारी नाहिँ ।
जो जन जन निर्भय करेँ, दे करतब कर ताहिं ।११३५।

 भावार्थ : -- जिसके स्वयं के चित्त में मृत्यु का भय हो वह कैसा मुखिया हुवा ॥ जो स्वयं भयभीत है वह जनता
को भयमुक्त कैसे करेगा, उसे स्वयं निर्भयी शासक की आवश्यकता है ॥ जो जन-जन को भयमुक्त करे,शासन उसी के हाथ में सौंपना चाहिए ॥

दीन दरिद दूर दुराए, धनिक पाहि बैठाए । 
आसन चढ़े सासन किए, तिनको दूर भगाएँ ।११३६। 

भावार्थ : -- जो अशक्तजनों को, दुर्दशा ग्रस्त को, विकलता से भरे हुवों को दूर से ही नमस्कार करते हैं । और धन के कामी, चन्दा से घर चलाने वाले लौलुपचारी धनिकों के चरण पकड़े रहते हैं । जो ऊंचे आसनों पर बैठ कर शासन करते हैं, उनके नमस्कार से पूर्व उन्हें नमस्ते कह दें ॥

सजन जीवन पंथ चरत, जो धन पाछिन धाइँ  । 
गतागत मनोरम दिरिस , पाछिनु छूटत जाइँ ।११३७। 
भावार्थ : -- जीवन के पथ पर चलते यदि धन के पीछे भागे, तब आते-जाते मनोरम दृश्य पीछे छूटते चले जाएंगे ॥

रैनी मैल जगत बले, उबटन किरन लगाइ । 
महि मंदारु मीर मले, देखु सकल उजराइ ।११३८। 
भावार्थ : -- रयनी ने सारे जगत में मैल लपटा दिया । तो क्या किरणों ने उबटन लगा दिया ॥ अब अवनि, अवनि पालक, सागर, नदी आदि उस उबटन को मले जा रहे हैं । देखो तो सारे कैसे उजले हो गए ॥

मैं चल चपला चंचला, तुम मेघ घनस्याम । 
मैं माया मन मोहनी, तुम अविरल अभिराम ।११३९-क। 
भावार्थ : -- मैं अस्थिर चंचल विद्युत हूँ,  तुम घने काले मेघ हो । मैं मन को मोहने वाली विलासिता की साधन स्वरूपा हूँ, तुम मुझमें अनुरक्त, तन-मन को भाने वाली अनुभूति हो ॥

मैं घनरस की गागरी, तुम पनियन पनिहार । 
मैं मीर गहि मेखल महि, तुम जगती जगहार ।११३९-ख । 
भावार्थ : -- मैं जल से भरी घघरी हूँ, तुम भीगते हुवे कांवड़िये हो । मैं  करधनी में सागर सजाई हुई भूमि हूँ । तुम तुम इस जगती-जगत के धाता हो ॥

मैं निंदिया नयन बसी, पिय तुम सपन सलौन। 
मैं बिंदिया बदन लसी, अरु पूछूँ तुम कौन ।११३९-ग। 
भावार्थ : -- मैं नयनों में बसी निंदिया हूँ, प्रिय तुम सलोने स्वप्न हो । मैं मस्तक की दमकती बिंदिया हूँ । और पूछ रही तुम कौन ॥

मैं जल लोचन लावनी  , तुम अंतर के भाउ । 
मैं बिरहन अलगाउ करुँ, तुम पिय हिय हिलगाउ ।११३९-घ। 
भावार्थ : -- मैं नयन की सुन्दर अश्रु कणिका हूँ, तुम अंतर के भाव हो । मैं नयनों से वियुक्त होकर तुमसे अलगाव किये हूँ । फिर भी तुम ह्रदय से लगाए हुवे हो ॥

मैं नीर धरि निर्झरनी, तुम पनघट के पौर । 
मैं सुमंगल अवतरनी, तुम अर्थित के ठौर ।११३९-ङ । 
भावार्थ : -- मैं जल धारण कि हुई झरने से निकली नदी हूँ, तुम पनघट की ड्योढ़ी हो । मैं स्वागतकांक्षणी हूँ, तुम प्यासे पंथी के ठौर हो ॥

मैं बंसरी अधर धरी, तुम बंसी धर रूप । 
मैं चंचरि गिरि नंदिनी , तुम सिव के सरूप ।११३९-च। 
भावार्थ : -- मैं अधरों पर धरी वंसी हूँ तुम वंशीधर श्रीकृषण का रूप हो । मैं कंठ लगी भ्रमरी( पार्वती) हूँ तुम शिव शंकर का स्वरुप हो ॥

खादन खाया जल पिआ, दिआ देहि ओहार । 
अचरज कर तेरो करम, कैसे जगत नियार ।११४०। 
भावार्थ : -- वही खाद्यान खाया, वही पानी पिया, वही देहि को बसन छत-छादन दिया, वही नित्य कर्म किया । आश्चर्य है !  तेरे कर्म जगत से न्यारे कैसे हैं ? ॥





शनिवार, 4 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम ११४ ॥ -----

ऐस मेस कारि कै फिर सौ फैसन दिखलाए । 
मरजानी नै म्हारौ, छोरो लियो फँसाए ।११४१।  


आप बाँध के लायो कि लाइ बाँध के कार । 
शाह सवारी करबला, नेता शाह सवार ।११४३। 

----- ॥ दोहा-दशम ११३ ॥ -----

दरिया मानिंद दुनिया, सतहे-आब जहाज़ । 
मंजिल साहिले-अल्ला, रहे बंदा निवाज़ ।११३१। 
भावार्थ : -- ये दुनिया दरिया के मानिंद है यह जिस्म जहाज है जो आबे-सतह पर है । जिसकी मंजिल अल्लाह का कनारा है ।  मेरे निवाज़,राह में ये रूह है ॥

चरे समंदर पाउ अस, प्रीतिहि के बरताउ । 
आगिन दरिया पार किए, चढ़े लाकरी नाउ।११३२। 
भावार्थ : -- प्रेम का व्यवहार ऐसा है कि, समनदर को पांवों से चलकर पार करना पड़ता है, और आग के दरिया को लकड़ी की नाव से ॥

महजिद महला मुहल्ला, मीनारो सह कार । 
कहँ गए मलिके-मुअज्जम,  कँह गए वो दरबार ।११३३। 
भावार्थ : -- जिन मुगलों की सल्तनत हिंदुस्तान में हज़ार बरसों तक रही । उन की निशानियाँ ये मस्जिद ये महल ये मुहल्ला ये अजीमो-शानो-शहकार मीनार के शहंशाह कहाँ गए? और उनके दरबार वे कहाँ गए ?

लहर लहर टकराइ के, करे समंदर शोर । 
कल फिर आए नज़र मिरी, किश्तीयों के चोर । ११३४।  

जिक्रे ख़ुदा औ ख़ैर में, लगी रहे ये जान । 
पराइ जान अमान में, तेरी जान अमान ।११३५। 
भावार्थ : -- ईश्वर का स्मरण करते हुवे सत्कार्य में ही तेरा जीवन लगा रहे । पराए जीवन की रक्षा में ही तेरे जीवन की सुरक्षा है, सनद रहे ॥ 

सुलग उठी शामे-शम्म,रुखसारों पुरनूर । 
कहीं सरोदो-सारँगी, कही बजे संतूर ।११३६।  

अमन का पैरवीकार, दिल से जफ़ा शियार 
लब से खुदा खुदा करे, दस्ते-बंद तलवार ।११३७। 
भावार्थ : - जो अमनो-अमां का पैरोंकार है वह दिल से जफ़ाशियार (अत्याचारी) है । जो लब से तो खुदा खुदा कर रहा है उसके दस्त में  तलवारें बन्द हैं ॥ 

जफ़ा शियार = जुल्मी, अत्याचारी  

मुलक दारी जमहूरी, रइअत खूनम खून । 
शाहानी सकूनत मेँ, गुलाम बड़े सकून ।११३८। 
भावार्थ : -  मुल्क में रअय्यत दारी तो जम्हूरी है और रिआया खूनम खुण हो गई । और गुलाम शाही महलो-मलम्मों में आराम फरमाएं ॥ िानको बस शाही महलमलम्मा चाहिए  ॥ 

जाँ रहे ना ज़िस्म रहे, रहे न रौब रुआब । 
हुए जो बुत ए बुतपरस्त, रहे सवाबी ताब ।११३९। 

भावार्थ : -- न ये जिस्म रहता न ये जाँ रहती है.. , 
                न रुआब रहता न वो रौब-दाब रहता..,  
                हुवे बुतो-ताबूत ए हुस्न परस्त तब.., 
                 बस तिरे सवाबों की ही ताब रहती है..... 

  जाँ = जॉब 

ख़ैरात किए कफ़े -दस्त, सर पर मारे चोट । 
वो इस कसब कादिर हुए, शबे कफ़न खसोट ।११४० । 

भावार्थ : -- इत्तफाक खैराते दस्त किए मुश्तहर हुवे..,   
                वो कहने-जख्म दिए ज़ख़्मी हर सर हुए..,
                ख़सलत से मजबूर हुवे इस कसब कादिर..,  
                शबे -कफ़न खसोट के सुब्हे पेशतर हुवे.....

कसब = धंधा 
कादिर  = सेठ 

गुरुवार, 2 जनवरी 2014

----- ॥ दोहा-दशम १११ ॥ -----

गंगा धुनी गंगोदक, गंगा तट गंगौट । 
ते गंगा गति लहे जे, धारे तिन्ह पपोट ।११११।
भावार्थ : -- बड़े -बूढ़ों का कहना है, जो गंगा की ध्वनि, गंगा का जल, गंगा के तट, गंगा की रेणु, को  पलकों पर धारण करता है वह परम गति का अधिकारी होता है ॥  

भगति सेवा प्रनय दान, सुमिरन सुरत सुभाउ । 
भाव गहे ना कछु लहे, पतियाउ न पतियाउ ।१११२। 
भावार्थ : -- विश्वास करो या न करो सेवा, भक्ति, प्रेम,दान,चिंतन, स्मरण, धर्म आदि विषयों में यदि श्रद्धा संयुक्त न हो तो वह व्यर्थ है ॥  

भाव राखत पिया मिलै, करत पग सेउकाइ । 
ते सब भरमन तोड़ि दैं, रह जे रूप मताइ ।१११३। 
भावार्थ : -- श्रद्धा एवं प्रीत रख कर एवं चरणों की सेवा करने से ही पिया मिलते हैं । वे सब अपना भ्रम तोड़ दें,जो रूप के घमंड में इतराती फिर रही हैं ॥ 

झूठा झूठन जा जुगे , कूट कपट फैलाए । 
साँचा साँचै आ जुगे, प्रभुताइ प्रभूताए ।१११४। 
भावार्थ : -- झूठा यदि झूठे से जा मिलता है तब संसार में कूट-कपट ही फैलता है । साँचा सांचे से आ मिलता है तब प्रभु का भाव, प्रभु का वैभव, प्रभु का महत्व, प्रभु का गौरव ही वर्धित होता है ॥ 

बरन बरन मैं भेद है, बरन बरन मैं भाउ । 
सोइ बरन नित बंदिये , बताए भाउ सुभाउ ।१११५। 
भावार्थ : -- वर्ण वर्ण में भेद है,विभिन्न वर्ण में भिन्न भिन्न भाव ग्रहण किये होते हैं । केवल उन्हीं वर्णों की वंदना करनी चाहिए अर्थात उन्हीं वर्णों को ग्रहण करना चाहिए जो उस भाव का स्वभाव बताते हो,अर्थात यह उत्तम है कि अनुत्तम ॥ 

अर्थात : -- लेखक भी एक मनुष्य ही है, उससे भी त्रुटियां होती हैं । उसके वर्णों में उन्हीं भावों को ग्रहण करना चाहिए जो जगत हेतु कल्याणकारी हो ॥ 

तैरन हारा तैर के, पानी थाह बताए । 
तैर न हारा तैर के, अवगाहत मरि जाए ।१११६। 
भावार्थ : -- तैरने वाला तैर कर पानी की थाह बता देता है । अनाड़ी डूब के मर जाता है ॥ 

तब लग जीवन जी लिए, जब लग काया लाहि । 
काइ कमन के भजन किए, हाथ लगे कछु नाहि ।१११७। 
भावार्थ : -- जीवात्मा को एक देह की आवश्यकता होती है, देह में उत्तम है मनुष्य की देह । मनुष्य का तब तक का जीवना है जब तक यह देह प्राप्त है ।संसार का उत्थान करने के लिए देह एक  श्रेष्ठ साधन है  यदि देह को सजाने में ही व्यस्त रहे तो फिर कुछ हाथ नहीं आएगा ॥ 

भगवन को सब ना चहेँ, भगवन सब कौ चाहिँ । 
भूखन के कर अन धरे, तिसनई तीस बुझाहिँ ।१११८। 
भावार्थ : -- भगवान को कोई चाहता है कोई नहीं, कोई मानता है कोई नहीं  । किन्तु,भगवान सभी को मानते हैं भगवान सभी को चाहते हैं । वे भूखों की भूख मिटाते हैं प्यासों की प्यास बुझाते हैं ॥ 

का को लावनै लावना, का को भया अलोन । 
ऐसो भोजन चाहिये, सबजन ले रस लोन ।१११९। 
भावार्थ : -- किसी के भोजन में नमक ही नमक है, किसी का फीका फाका है । किसी को मिठाई कड़वी लगती है किसी के भोजन में करेले की भी मिठास नहीं है । भोजन ऐसा होना चाहिए कि रसों का स्वाद सभी वर्ग ले सकें ॥ 

कहन रही जह सदा की, गगन रहे जस सौर । 
प्रियजन रूठे ठौर है, प्रिय रूठे नहि ठौर ।११२०। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार गगन में सूर्य सदैव विद्यामान है उसी  प्रकार यह कहावत चली आ रही है कि प्रियजनों के रूठने से कूछ बिगड़ने वाला नहीं, किन्तु प्रियतम यदि रूठ जाएं तब कुछ संवरने वाला नहीं दूसरे शब्दों में परिजन रूठत जाएं तो जाएँ प्रियतम रूठे कहो कहाँ जाएं लाग लगई तो प्रियतम बिथुरे ये रुसवाई सही नहीं जाए ॥ 




----- ॥ दोहा-दशम ११०॥ -----

वैभव भूति पाहि रहे, होत न तेतक हर्ष । 
पाहि भूति गवाईं के,जेतक होत अमर्ष ।११०१। 
 ----- ॥ ग्रेगरी ॥ -----
भावार्थ : -- धन-सम्पति पास में रहने से उतना आनंद नहीं होता, जितना उसके खो जाने अथवा छिन जाने से दुःख होता है ॥ 


'अपात्रे दीयते दातारं नरकं नयेत्' 

अर्थात : -- "अपात्र को दिया गया दान नरक ( दुर्गत)  में ले जाता है"

जस पाहन के नाइ सन, तरत जन डूब जाए । 
मूरख दाता अरु गाहि, दुनहु नरक डूबाए ।११०२। 

यथा प्लवे नौ पलेन  निमज्जत्युदके तरन् । 
तथा निमज्जतो S धस्ता दज्ञो दातृ प्रतीच्छकौ ॥ 
   ----- ॥ मनुस्मृति ४ / १९४ ॥ -----

अर्थात : - जिस प्रकार पानी में पत्थर की नाव से तैरता हुवा व्यक्ति उस नाव के साथ ही डूब जाता है । उसी प्रकार मूर्ख दाता एवं मुर्ख ग्रहीता दोनी नरक में डूबते और डुबाते हैं  ॥ 

 प्रश्न : - धन सम्पद के तो सुपात्र है, किन्तु 'मत' का सुपात्र कोई नहीं ? 
उत्तर : -- तो मत दे डागदर नै थोड़े बता रखी है कि देणोंए है 

गा गा कहता रे पढन, भेजो पुत परधाम । 
ऐसो भेजणु लाह का, आवै ना कछु काम ।११०३। 
 ------ ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- बावरा बखान करता फिरे, रे पुत को पराए   पढन भेजो है, ऐसो भेजनों का क्या लाभ जो किसी के काम नहीं आवे..... न आपने, न गाम के, न देस के ॥ 

संखइ बिमुख प्रमुदित होत, बहु संखाई संग । 
समुझत गरुवन आपना, जुझबत बीर एकंग ।११०४। 
 ----- ॥ मोहन दास कर्म चंद गाँधी ॥ -----
भावार्थ :-- कायर बहुसंख्यक होने पर प्रसन्न होते हैं, वीर अकेले ही लड़ने में अपना गौरव समझते हैं ॥ 

थैले माया भरि रही, हृदय रहा रीताए । 
जूँ जूँ रीति परहित हुँत, तूँ तूँ भरता जाए ।११०५ । 
 ----- ॥ विक्टर ह्यूगो ॥ ---
भावार्थ : -- विषय विलास की साधन स्वरूपा माया थैली में भरती जाएगी, ह्रदय रिक्त होता जाएगा  । 
                " परोपकार हेतु यह माया की थैली ज्यों ज्यों रिक्त होती जाएगी, हमारा ह्रदय भी त्यों त्यों भरता                       जाएगा " 

समजन तटिनी ताल तुल, उमगे आपन बाढ़ । 
सद्जन सिंधु बिसाल तुल, उमगि दरस सस गाढ़ ।११०६। 
 ----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : - सामान्य जन नदी,सरोवर के समतुल्य होते हैं जो अपनी ही बढ़त पर उत्साहित होते हैं । श्रेष्ठ जन अपार सिंधु के सदृश्य होते हैं जो चंद्रमा की बढ़नी पर अर्थात पराई बढ़नी पर उत्साहित होता है ॥ 

 जेहि सभा मह बिरध नहि, तेइ सभा न अहाहि । 
  जोइ धर्म बचन न कहे, बड़े बिराध सो नाहि ।११०७। 
     ----- ।। महाभारत ॥ -----
भावार्थ : -- "जिस सभा में बड़े-बूढ़े नहीं है, वह सभा नहीं, जो धर्म की बात न कहे, वे बड़े-बूढ़े नहीं "

कबीरा ए संसार मैं, प्रीतिहि बहुत प्रकार । 
जोइ पिया सोंह लागिए, सोइ न्यारि नियार ।११०८। 
  -----॥ संत कबीर ॥ -----
भावार्थ : --  कबीर दास जी कहते हैं : -- इस संसार में प्रेम-अनुराग बहुंत प्रकार का होता है जैसे मात-पिता का, भ्रात-भगिनी का, मित्र-चित्र का, इन सबमें प्रियतम के अथवा ईश्वरके प्रति अनुराग सबसे उत्तम है कारण कि स्त्री--पुरुष के अथवा ईश्वर के प्रेम से ही यह सृष्टि एवं समस्त सम्बन्ध उपजे हैं ॥

पतित गुर तजन जोग है, जोग न पतिता मात । 
मात पद गुरु गरीयसी, गर्भ काल करि धात ।११०९। 

पतिता गुर्वस्त्याज्या माता च न कथञ्चन । 

गर्भधारणपोषाभ्याम् तेन माता गरीयसी ॥ 
 ----- ॥ स्कंदपुराण मा० कौ० ६/७; मत्स्यपुराण २२७/१५०) ॥ ----- 
भावार्थ : -- पतित गुरु भी त्याज्य है, किन्तु माता किसी प्रकार भी त्याज्य नहीं है । गर्भ काल में धारण-पोषण करने के कारण माता का गौरव गुरु से भी अधिक है ॥

हंकार के वसीभूत कार अकार न जान । 
कुपथचारी अस गुर के, त्यागन किए बिधान ।१११०। 

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत : । 
उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥ 
----- ॥ पद्मपुराण,स्कंदपुराण, व् महाभारत ॥ -----
 भावार्थ : -- अहंकार के वशीभूत होकर यदि सद्गुरु भी कार्याकार्य के विवेक से अन्यमनस्क हो जाए, तब उस गुरु का भी त्याग करने का विधान है ॥




----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...