सोमवार, 9 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०३ ॥ -----

तेतक ही मैं निबाहिए, जेतैक सुख प्रभु दाए । 
आपन नीचे देख कै, आगे सोइ अधिकाए ।१०३१। 
भावार्थ : -- जितना ईश्वर ने दिया है उतने सुख में ही निर्वहन कर लेना चाहिए । यदि अपने से नीचे को देखा जाए तो वह सुख भी अधिक लगेगा ॥ 

तासु कौनो खाहीं जौ, कोइ काहु के खाइ । 
ताहि कौनौ खाहीं जौ, कोइ कोउ खा जाइ ।१०३२। 
भावार्थ : -- उसका कोई खाएगा, जो कोई किसी का खाएगा । उसको कोई खाएगा, जो कोई किसी को खाएगा ॥ 

कबीर रहिमन रसखान, फिर तुलसी की बोलि । 
सुर सरित थिरकी अस जस, धरा मेरु धर डोलि ।१०३३। 
भावार्थ : -- कबीर, रहीम, रसखान, फिर तुलसी की अवधी बोली । उसके साथ सुरसरिता ऐसे थिरकी जैसे धरती करधनी धारण किये नृत्य कर रही हो ॥  

पर्बत निचोड़ नदि तरी , छाइ धूप के कोर  । 
रयन निचोड़ ओस ढरी, नयन पलक पट नोर।१०३४। 
भावार्थ : -- उफनती नदियाँ पर्वतों का निचोड़ हैं;छाया, धूप के कोरों(किनारों) का निचोड़ है । ढुलकती ओस, रयनी का निचोड़ है;अश्रु,,नयनों के पलक पट का निचोड़ हैं ॥ 

कलिंद नंदिनि कंज धर, बही चली इतराइ । 
जोई बिंदु कूल लगे, सोई तीस बुझाइ ।१०३५। 
भावार्थ : -- कलिंद नंदिनी यमुना अमृत लेकर इतराती हुई बही चली । जो जल कण तट पर जा लगे केवल उन्होंने ही तृष्णा को शांत किया ॥  

नेम नियामक रचित किए, रुचिकर बारहि बार । 
आगिन पालन कारहीं, तिनहि  होनिहार ।१०३६। 
भावार्थ : -- नियम बनाने वाले, रूचि ले लेकर बार बार नियम तो गढ़े जा रहे है । यह भी ध्यान देने योग्य विषय है कि भविष्य में इन नियमों की पालनकर्त्ता इनकी ही संताने होंगी ॥ 

रघुबर सोंह तापस जुगे,यदूबर सोंह हेम । 
दुहु जग मंगल मूरतें, दुहु सोंह जुगे पेम ।१०३७। 
भावार्थ : -- रघुवर श्री रामचन्द्र  तपस्या /सूर्य से संयोजित हैं यदूवर श्री कृष्ण शीतलता /चंद्रमा से संयोजित हैं अर्थात एक सूर्यवंशी हैं, एक चंद्रवंशी है । दोनों ही संसार का कल्याण करने वाली प्रतिमाएँ हैं, दोनों ही के सह अनुराग संयोजित है ॥ 

साँचे जन जीउते जी, परमम पदवी पाएँ । 
झूठा मरनोपरांत, नीचे ही रहि जाएँ ।१०३८। 
भावार्थ : -- सत्यवादी जीते जी ही परम पद को प्राप्त हो जाते हैं । असत्यवादी मरने के पश्चात भी संसार से नहीं उठते, वे यहीं रह जाते हैं ॥ 

बिरधन के असीर बचन, जूँ बरगद की छाँह । 

वाकी घटनी तब खले, जब बरगद रहि नाह ।१०३९। 
भावार्थ : -- बड़ों के आशीर्वचन,वटवृक्ष की छाया जैसे होते हैं । इनकी न्यूनता तब चुभती है, जब यह वृक्ष नहीं रहते  ॥ 

कुकरम कै सुकरम जौइ, तूरे जगजन भाव । 
जितो धारे ऊँच पीठ, तितौ डारे प्रभाउ ।१०४०। 
भावार्थ : -- कुकर्म हो अथवा सुकर्म हों उन्हें यदि सांसारिक सत्ता से तोला जाए तो जो जितना उच्च पद धारण करता है उसका उतना ही प्रभाव पड़ता है ॥ 

अर्थात : -- यदि आप राष्ट्र प्रमुख होकर कोई कुकर्म या सुकर्म करते हैं, तो उससे न केवल एक राष्ट्र अपितु समूचा विश्व प्रभावित होगा ॥ 

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