तेतक ही मैं निबाहिए, जेतैक सुख प्रभु दाए ।
आपन नीचे देख कै, आगे सोइ अधिकाए ।१०३१।
भावार्थ : -- जितना ईश्वर ने दिया है उतने सुख में ही निर्वहन कर लेना चाहिए । यदि अपने से नीचे को देखा जाए तो वह सुख भी अधिक लगेगा ॥
तासु कौनो खाहीं जौ, कोइ काहु के खाइ ।
ताहि कौनौ खाहीं जौ, कोइ कोउ खा जाइ ।१०३२।
भावार्थ : -- उसका कोई खाएगा, जो कोई किसी का खाएगा । उसको कोई खाएगा, जो कोई किसी को खाएगा ॥
कबीर रहिमन रसखान, फिर तुलसी की बोलि ।
सुर सरित थिरकी अस जस, धरा मेरु धर डोलि ।१०३३।
भावार्थ : -- कबीर, रहीम, रसखान, फिर तुलसी की अवधी बोली । उसके साथ सुरसरिता ऐसे थिरकी जैसे धरती करधनी धारण किये नृत्य कर रही हो ॥
पर्बत निचोड़ नदि तरी , छाइ धूप के कोर ।
रयन निचोड़ ओस ढरी, नयन पलक पट नोर।१०३४।
भावार्थ : -- उफनती नदियाँ पर्वतों का निचोड़ हैं;छाया, धूप के कोरों(किनारों) का निचोड़ है । ढुलकती ओस, रयनी का निचोड़ है;अश्रु,,नयनों के पलक पट का निचोड़ हैं ॥
कलिंद नंदिनि कंज धर, बही चली इतराइ ।
जोई बिंदु कूल लगे, सोई तीस बुझाइ ।१०३५।
भावार्थ : -- कलिंद नंदिनी यमुना अमृत लेकर इतराती हुई बही चली । जो जल कण तट पर जा लगे केवल उन्होंने ही तृष्णा को शांत किया ॥
नेम नियामक रचित किए, रुचिकर बारहि बार ।
आगिन पालन कारहीं, तिनहि होनिहार ।१०३६।
भावार्थ : -- नियम बनाने वाले, रूचि ले लेकर बार बार नियम तो गढ़े जा रहे है । यह भी ध्यान देने योग्य विषय है कि भविष्य में इन नियमों की पालनकर्त्ता इनकी ही संताने होंगी ॥
रघुबर सोंह तापस जुगे,यदूबर सोंह हेम ।
दुहु जग मंगल मूरतें, दुहु सोंह जुगे पेम ।१०३७।
भावार्थ : -- रघुवर श्री रामचन्द्र तपस्या /सूर्य से संयोजित हैं यदूवर श्री कृष्ण शीतलता /चंद्रमा से संयोजित हैं अर्थात एक सूर्यवंशी हैं, एक चंद्रवंशी है । दोनों ही संसार का कल्याण करने वाली प्रतिमाएँ हैं, दोनों ही के सह अनुराग संयोजित है ॥
साँचे जन जीउते जी, परमम पदवी पाएँ ।
झूठा मरनोपरांत, नीचे ही रहि जाएँ ।१०३८।
भावार्थ : -- सत्यवादी जीते जी ही परम पद को प्राप्त हो जाते हैं । असत्यवादी मरने के पश्चात भी संसार से नहीं उठते, वे यहीं रह जाते हैं ॥
बिरधन के असीर बचन, जूँ बरगद की छाँह ।
वाकी घटनी तब खले, जब बरगद रहि नाह ।१०३९।
भावार्थ : -- बड़ों के आशीर्वचन,वटवृक्ष की छाया जैसे होते हैं । इनकी न्यूनता तब चुभती है, जब यह वृक्ष नहीं रहते ॥
कुकरम कै सुकरम जौइ, तूरे जगजन भाव ।
जितो धारे ऊँच पीठ, तितौ डारे प्रभाउ ।१०४०।
भावार्थ : -- कुकर्म हो अथवा सुकर्म हों उन्हें यदि सांसारिक सत्ता से तोला जाए तो जो जितना उच्च पद धारण करता है उसका उतना ही प्रभाव पड़ता है ॥
अर्थात : -- यदि आप राष्ट्र प्रमुख होकर कोई कुकर्म या सुकर्म करते हैं, तो उससे न केवल एक राष्ट्र अपितु समूचा विश्व प्रभावित होगा ॥
आपन नीचे देख कै, आगे सोइ अधिकाए ।१०३१।
भावार्थ : -- जितना ईश्वर ने दिया है उतने सुख में ही निर्वहन कर लेना चाहिए । यदि अपने से नीचे को देखा जाए तो वह सुख भी अधिक लगेगा ॥
तासु कौनो खाहीं जौ, कोइ काहु के खाइ ।
ताहि कौनौ खाहीं जौ, कोइ कोउ खा जाइ ।१०३२।
भावार्थ : -- उसका कोई खाएगा, जो कोई किसी का खाएगा । उसको कोई खाएगा, जो कोई किसी को खाएगा ॥
कबीर रहिमन रसखान, फिर तुलसी की बोलि ।
सुर सरित थिरकी अस जस, धरा मेरु धर डोलि ।१०३३।
भावार्थ : -- कबीर, रहीम, रसखान, फिर तुलसी की अवधी बोली । उसके साथ सुरसरिता ऐसे थिरकी जैसे धरती करधनी धारण किये नृत्य कर रही हो ॥
पर्बत निचोड़ नदि तरी , छाइ धूप के कोर ।
रयन निचोड़ ओस ढरी, नयन पलक पट नोर।१०३४।
भावार्थ : -- उफनती नदियाँ पर्वतों का निचोड़ हैं;छाया, धूप के कोरों(किनारों) का निचोड़ है । ढुलकती ओस, रयनी का निचोड़ है;अश्रु,,नयनों के पलक पट का निचोड़ हैं ॥
कलिंद नंदिनि कंज धर, बही चली इतराइ ।
जोई बिंदु कूल लगे, सोई तीस बुझाइ ।१०३५।
भावार्थ : -- कलिंद नंदिनी यमुना अमृत लेकर इतराती हुई बही चली । जो जल कण तट पर जा लगे केवल उन्होंने ही तृष्णा को शांत किया ॥
नेम नियामक रचित किए, रुचिकर बारहि बार ।
आगिन पालन कारहीं, तिनहि होनिहार ।१०३६।
भावार्थ : -- नियम बनाने वाले, रूचि ले लेकर बार बार नियम तो गढ़े जा रहे है । यह भी ध्यान देने योग्य विषय है कि भविष्य में इन नियमों की पालनकर्त्ता इनकी ही संताने होंगी ॥
रघुबर सोंह तापस जुगे,यदूबर सोंह हेम ।
दुहु जग मंगल मूरतें, दुहु सोंह जुगे पेम ।१०३७।
भावार्थ : -- रघुवर श्री रामचन्द्र तपस्या /सूर्य से संयोजित हैं यदूवर श्री कृष्ण शीतलता /चंद्रमा से संयोजित हैं अर्थात एक सूर्यवंशी हैं, एक चंद्रवंशी है । दोनों ही संसार का कल्याण करने वाली प्रतिमाएँ हैं, दोनों ही के सह अनुराग संयोजित है ॥
साँचे जन जीउते जी, परमम पदवी पाएँ ।
झूठा मरनोपरांत, नीचे ही रहि जाएँ ।१०३८।
भावार्थ : -- सत्यवादी जीते जी ही परम पद को प्राप्त हो जाते हैं । असत्यवादी मरने के पश्चात भी संसार से नहीं उठते, वे यहीं रह जाते हैं ॥
बिरधन के असीर बचन, जूँ बरगद की छाँह ।
वाकी घटनी तब खले, जब बरगद रहि नाह ।१०३९।
भावार्थ : -- बड़ों के आशीर्वचन,वटवृक्ष की छाया जैसे होते हैं । इनकी न्यूनता तब चुभती है, जब यह वृक्ष नहीं रहते ॥
कुकरम कै सुकरम जौइ, तूरे जगजन भाव ।
जितो धारे ऊँच पीठ, तितौ डारे प्रभाउ ।१०४०।
भावार्थ : -- कुकर्म हो अथवा सुकर्म हों उन्हें यदि सांसारिक सत्ता से तोला जाए तो जो जितना उच्च पद धारण करता है उसका उतना ही प्रभाव पड़ता है ॥
अर्थात : -- यदि आप राष्ट्र प्रमुख होकर कोई कुकर्म या सुकर्म करते हैं, तो उससे न केवल एक राष्ट्र अपितु समूचा विश्व प्रभावित होगा ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें