मोहन माखन ना देइ, तो सों लेइ चुराए ।
ऐसी छींकी ना बनी, जँह जा दिए लुकियाए ।१०२१।
भावार्थ : -- मोहन को अपना मख्खन नहीं दोगे या अपना क्रोध नहीं दोगे.....तो वो चुरा लेगा । ऐसी कोई छींकी बनी ही नहीं है जहां उस मख्खन को छिपाया जा सकता है ॥
नभ मैं चमकत चन्द्रमा, बैठा निज अस्थान ।
तमस मैं दिरिस मान रहे , अदरस रहे बिहान ।१०२२।
भावार्थ : -- दैदीप्यमान चंद्रमा तो नभ में अपने स्थान पर ही विराजित है । जो अँधेरे में तो दृश्यमान है उजाले में अदृश्य है ॥
अर्थात : -- १ )चंद्रमा के सदृश्य ही हमारी त्रुटियां भी हैं जो विलासिता की साधन स्वरूपा के चकाचौंध से अदृश्य रहती हैं । साधनहिन् होने पर ये त्रुटियां दृश्यमान हो जाती हैं ॥
२)भारतीय वेद-शास्त्रों एवं पुराणों ने ग्रहों एवं नक्षत्रों की सटीक गणना की हैं, किस साधन से की, यह तो सत्य है कि वर्त्तमान की तुलना में उस समय भाषा अत्यधिक सुसंस्कृत थी तो क्या शब्द साधन से, ध्वनी से, किसी यन्त्र से, किससे ? क्या उस समय की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वे शुद्ध नेत्रों से ही दिखाई देते थे ?क्या रात और भी अधिक श्यामल थी ? फिर क्या हुवा ?रयनी न होती तो हमें चाँद-तारे दिखाई नहीं देते.....
कहत सचिव मैं दास हूँ, बसा जा राउ बास ।
नैनन धूरहि झौंक के, चढ़त फिरै आकास ।१०२३।
भावार्थ : -- लोकतंत्र का मंत्री-प्रधान मंत्री यह कहता हुवा कि मैं तो जनता का दास हूँ, राजा के निवास में जा बैठा और आँखों में धूल झोकते हुवे अब आकाश में उड़ता फिर रहा है, एतना तो राजा लोग भी नहीं उड़ते थे ई कौन सा तंत्र है भाई ॥
काम कलिंजि भाउ चढ़े, सो तो काचा रंग ।
काम घटाए भाउ घटे, जूँ जल घटा प्रसंग ।१०२४।
भावार्थ : -- काम के आवरण चढ़ा प्रीत का रंग कच्चा होता है । काम के घटते ही यह भी ऐसे घटता है, जैसे जल के घटते ही घटा का रंग घटता है ॥
कथन किये बन बाटिका, भाव किये बनराइ ।
सूक्ति ऐसो देस जँह, ज्ञान गंग बहि आइ ।१०२५।
भावार्थ : -- कथन जहां वन वाटिका है, भाव जहां पेड़-पौध हैं ॥ सूक्ति ऐसा देश है, जहाँ ज्ञान की सुरसरिता प्रवाहित होती है ॥
रट्टु तोता रटत रहे, देवत जपनी राम ।
भाव लहे न ज्ञान गहे, सोइ नाम किस काम ।१०२६।
भावार्थ : -- रट्टू तोते को राम नाम की जपनी दे दो वह उसे ही जपता रहेगा । न तो वह उसके भाव समझेगा न ही उस भाव से ज्ञान ग्रहण करेगा ऐसा रटा रटाया राम का नाम किस काम का ॥
पुजारी की भगतिहि का, रहत गहत का दान ।
अघहाए की बिरक्ति का, जग माने का मान ।१०२७।
भावार्थ : -- पुजारी कि केसी भक्ति प्रभु सेवा तो उसका कार्य है, भरे पूरे का दान क्या, देने के पश्चात वह फिर भर लेगा अर्थात भरेपूरे का दान त्याग में है। तृप्त मानस की विरक्ति क्या, जो जग में जानामाना हो उसका मान क्या ॥
जनमन तबहि मान रहे, समउ पर मरनि होए ।
बिरधा बढ़नी बैस के, पूछ रहे ना कोए ।१०२८।
भावार्थ : -- उचित समय पर मृत्यु हो तभी लोगों के मन में सम्मान रहता है । वृद्ध की बढ़ती आयु को फिर पूछने वाला कोई नहीं होता ॥
नाउ समंदर डारि दिए, बही बहि जेहिं ओर ।
सारे पंथ भूरी गए, मिला न वाकू छोर ।१०२९।
भावार्थ : -- नाव तो समुद्र में उतार दी, वह उधर ही बही जिधर की हवा थी ॥ सारे मार्ग फिर भूल पड़े उसे तट नहीं मिला ॥
अर्थात : -- नाव उधर जानी चाहिए जिधर किनारा हो, न की जिधर की हवा हो"
एक दीपक के बारते, सकल भवन उजराए ।
एकै माछरी के होत , सकल ताल मलिनाए ।१०३०।
भावार्थ : -- एक दीपक प्रज्वलित होते ही सारे घर में उजाला हो जाता है । एक मछली के होते सारा तालाब मैला हो जाता है ॥
अर्थात : -- एक सुसंतान सारे कुल का नाम उज्जवल कर देती है, एक कुसंतान सारे कुल को कलंकित कर देती है ॥
ऐसी छींकी ना बनी, जँह जा दिए लुकियाए ।१०२१।
भावार्थ : -- मोहन को अपना मख्खन नहीं दोगे या अपना क्रोध नहीं दोगे.....तो वो चुरा लेगा । ऐसी कोई छींकी बनी ही नहीं है जहां उस मख्खन को छिपाया जा सकता है ॥
नभ मैं चमकत चन्द्रमा, बैठा निज अस्थान ।
तमस मैं दिरिस मान रहे , अदरस रहे बिहान ।१०२२।
भावार्थ : -- दैदीप्यमान चंद्रमा तो नभ में अपने स्थान पर ही विराजित है । जो अँधेरे में तो दृश्यमान है उजाले में अदृश्य है ॥
अर्थात : -- १ )चंद्रमा के सदृश्य ही हमारी त्रुटियां भी हैं जो विलासिता की साधन स्वरूपा के चकाचौंध से अदृश्य रहती हैं । साधनहिन् होने पर ये त्रुटियां दृश्यमान हो जाती हैं ॥
२)भारतीय वेद-शास्त्रों एवं पुराणों ने ग्रहों एवं नक्षत्रों की सटीक गणना की हैं, किस साधन से की, यह तो सत्य है कि वर्त्तमान की तुलना में उस समय भाषा अत्यधिक सुसंस्कृत थी तो क्या शब्द साधन से, ध्वनी से, किसी यन्त्र से, किससे ? क्या उस समय की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वे शुद्ध नेत्रों से ही दिखाई देते थे ?क्या रात और भी अधिक श्यामल थी ? फिर क्या हुवा ?रयनी न होती तो हमें चाँद-तारे दिखाई नहीं देते.....
कहत सचिव मैं दास हूँ, बसा जा राउ बास ।
नैनन धूरहि झौंक के, चढ़त फिरै आकास ।१०२३।
भावार्थ : -- लोकतंत्र का मंत्री-प्रधान मंत्री यह कहता हुवा कि मैं तो जनता का दास हूँ, राजा के निवास में जा बैठा और आँखों में धूल झोकते हुवे अब आकाश में उड़ता फिर रहा है, एतना तो राजा लोग भी नहीं उड़ते थे ई कौन सा तंत्र है भाई ॥
काम कलिंजि भाउ चढ़े, सो तो काचा रंग ।
काम घटाए भाउ घटे, जूँ जल घटा प्रसंग ।१०२४।
भावार्थ : -- काम के आवरण चढ़ा प्रीत का रंग कच्चा होता है । काम के घटते ही यह भी ऐसे घटता है, जैसे जल के घटते ही घटा का रंग घटता है ॥
कथन किये बन बाटिका, भाव किये बनराइ ।
सूक्ति ऐसो देस जँह, ज्ञान गंग बहि आइ ।१०२५।
भावार्थ : -- कथन जहां वन वाटिका है, भाव जहां पेड़-पौध हैं ॥ सूक्ति ऐसा देश है, जहाँ ज्ञान की सुरसरिता प्रवाहित होती है ॥
रट्टु तोता रटत रहे, देवत जपनी राम ।
भाव लहे न ज्ञान गहे, सोइ नाम किस काम ।१०२६।
भावार्थ : -- रट्टू तोते को राम नाम की जपनी दे दो वह उसे ही जपता रहेगा । न तो वह उसके भाव समझेगा न ही उस भाव से ज्ञान ग्रहण करेगा ऐसा रटा रटाया राम का नाम किस काम का ॥
पुजारी की भगतिहि का, रहत गहत का दान ।
अघहाए की बिरक्ति का, जग माने का मान ।१०२७।
भावार्थ : -- पुजारी कि केसी भक्ति प्रभु सेवा तो उसका कार्य है, भरे पूरे का दान क्या, देने के पश्चात वह फिर भर लेगा अर्थात भरेपूरे का दान त्याग में है। तृप्त मानस की विरक्ति क्या, जो जग में जानामाना हो उसका मान क्या ॥
जनमन तबहि मान रहे, समउ पर मरनि होए ।
बिरधा बढ़नी बैस के, पूछ रहे ना कोए ।१०२८।
भावार्थ : -- उचित समय पर मृत्यु हो तभी लोगों के मन में सम्मान रहता है । वृद्ध की बढ़ती आयु को फिर पूछने वाला कोई नहीं होता ॥
नाउ समंदर डारि दिए, बही बहि जेहिं ओर ।
सारे पंथ भूरी गए, मिला न वाकू छोर ।१०२९।
भावार्थ : -- नाव तो समुद्र में उतार दी, वह उधर ही बही जिधर की हवा थी ॥ सारे मार्ग फिर भूल पड़े उसे तट नहीं मिला ॥
अर्थात : -- नाव उधर जानी चाहिए जिधर किनारा हो, न की जिधर की हवा हो"
एक दीपक के बारते, सकल भवन उजराए ।
एकै माछरी के होत , सकल ताल मलिनाए ।१०३०।
भावार्थ : -- एक दीपक प्रज्वलित होते ही सारे घर में उजाला हो जाता है । एक मछली के होते सारा तालाब मैला हो जाता है ॥
अर्थात : -- एक सुसंतान सारे कुल का नाम उज्जवल कर देती है, एक कुसंतान सारे कुल को कलंकित कर देती है ॥
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