गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०८ ॥ -----

भगवन बरदाई गाँठ, सोच समझ बरताएँ । 
बरतत भोग बिलास मैं, मानख मूढ़ कहाए ।१०८१। 
भावार्थ : -- ईश्वर द्वारा वरदान दी हुई संचय स्वरुप प्राकृतिक सम्पदा को सोच समझ कर व्यय करनी चाहिए । यदि इसे भोग-विलास में व्यय किया तो  ( आने वाले समय में ) मनुष्य मूर्ख ही कहलाएगा ॥ 

अर्थात : --'क्या हमें अपने निवेश को विषय-विलास में व्यय करना चाहिए' ? 

पाहन लिए मंदर रचे, पानी ते दिए सीच । 
अंतर भाउ ना उपजै, सो तो मचाइ कीच ।१०८२। 
भावार्थ : -- पत्थर लिया एक मंदिर रच दिया फिर जा जा कर पानी से उसे सींच रहे हैं । यदि अंतस में भाव नहीं है, प्रेम नहीं है, श्रद्धा नहीं है, फिर तो वहाँ कीचड़ ही मचाना है ॥  

सद्कर्म आतसी लड़ी, अहम् पलीता गोए । 
एक बारी लगाइ लगे, भस्म भूत छन होए ।१०८३। 
भावार्थ : -- सद्कार्य वह आतिशी लड़ी है जिसमें यदि अहंकार का पलीता हो, फिर तो एक लाग लगाने की देर है वह क्षण भर में भस्मीभूत हो जाएंगे ॥ 

कुल दीपक तो कारता, बस निज कुल उजियार । 
जग नयन जग उजारता, दूर करत अँधियार ।१०८४। 
भावार्थ : -- कुल का दीपक तो केवल अपने कुल को उज्जवल करता है । जो सूर्य स्वरुप होता है वह अन्धकार हरण कर समूचे जगत को उज्जवलित करता है ॥ 

जे ऋतु ऋति जे दिनु रात, पाख पहर के मंच । 
जे अम्बर के अडंबर, सब बिधि रचे प्रपंच ।१०८५। 
भावार्थ : -- यह ऋतुओं की गति ये दिन-रात ,ये पहर, पक्षों का मंच । यह अम्बर का आडम्बर यह सब विधाता का ही रचा हुवा भवजाल है ॥ 

केतिक लोग मरि मरि गए, केतक अरु मरि जाहिं । 
जोइ मरत जिवाई लए, सोइ जगत उपराहिं ।१०८६ । 
भावार्थ : -- जाने कितने ही लोग मर मर कर चले गए जाने और कितने अभी मरेंगे । जो मरते को जीवा ले गए वे ही जगत का उद्धार करते गए ॥ 

जो जन हो सेवक रूप, कारत बिपद निदान । 
प्रजा चरण गह राखिये, राखे सहसै कान ।१०८७। 
भावार्थ : -- यदि कोई जन सेवक स्वरूप हो, तो वह विपत्तियों का निदान करते हुवे जनता जनार्दन के चरण पकड़े रहे और सहस्रों ऐसे कान रखे जिससे जनता जनार्दन के दुखों को सुन सके ॥ 

बिनई तुहिन तिन सरूप, अहम् कलेवर ताड़ । 
ताड़ पहिलै टूट गिरै, जब आवै को बाड़ । १०८८। 
भावार्थ : -- विनम्र तुच्छ तृण के सदृश्य होता है अहम् ताड़ आकृति का होता है । जब कहीं कोई बाड़ आती है तब सर्वप्रथम ताड़ टूट कर गिरता है ॥ 

सुबरन के एकै सरूप, आभूषन बिलगाए । 
बिलग धर्म अस जग अहै, भगवन एकै एकाए ।१०८९। 
भावार्थ : -- स्वर्ण का स्वरुप एक ही होता है,किन्तु आभूषण विभिन्न रूपों में गढ़े जाते हैं । ऐसे ही संसार में विभिन्न धर्म हैं, किन्तु ईश्वर का स्वरुप एक ही है ॥  

दिनकर भया किरन किरन, अंतर गगन समाए । 
वाके परस पावत जल ,हिरनइ होया जाए ।१०९० । 
भावार्थ : -- सूर्य किरणों से युक्त होकर गगन के अंतर में समाता जा रहा है । उसका स्पर्श प्राप्त कर जल भी स्वर्णमयी होता जा रहा है ॥ 

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