सिन्हासन की लाह किए, करे बाँदरा नाच ।
पहिले कितनो बांच लिए, अब मत पत्र दे आँच ।१०७१।
भावार्थ : -- सिंहासन की लालच में बन्दर घर घर नाच करते हैं । पहले कितने ही मत पत्रों को बाँच लिया न.....तेरा कुछ हुवा.....नहीं, अब आग लगा दे इन मत पत्रों को ॥
धरे उठौआ चूल्हा, जँह तँह देइ बराए ।
पाके पाक आप खाए, बाकि धुँआ मलिनाइ ।१०७२ ।
भावार्थ : -- बिना अर्थं के इधर-उधर उड़ने वाले जहां पाते हैं वहाँ आग लगा देते हैं । पके पकवान तो आप खाते हैं, बाकियों को काले धुँएँ से मैला कर आते हैं ॥
उजरी समझ उपार कै, बोवएँ मलिन बिचार ।
उजरी सारी बाटिका, अब दे कौन सँवार ।१०७३।
भावार्थ : -- शुद्ध एवं निर्मल विचारों को उखाड़ कर वहाँ कुत्सित विचारों को बोया जा रहा है । ऐसा करके सारी वाटिका ही उजाड़ दी, अब इस उजड़े को कौन सँवारे ॥
नयन पटल घन स्याम, लेख लिखाई लाख ।
यह पत्र सो पढ़ सके जो ,जाने तिनकी भाख ।१०७४।
भावार्थ : -- नयनों की श्याम पट में लाखों लेख लिखे रहते हैं । यह पत्र वही पढ़ सकता है जो उसकी भाषा जानता हो ॥
खाए प्रीति पकवान जो, भूरे नाहि सुवाद ।
दरसन टोटे जिन नैन, कहत ह है बकबाद ।१०७५।
भावार्थ : --जिसने एक बारी प्रीति का पकवान खा लिया फिर वह उसका स्वाद नहीं भूलता । जिन नैनों के इसके दर्शनों के भी टोटे हैं वह तो कहेगा ही ह बकवास है ॥
भूखी भोजन जोग रहि, जब वाकी संतान ।
खाए कवन तेरे भोग, बैस भवन भगवान ।१०७६।
भावार्थ : -- जब उनकी संतान भूखी है और भोजन की प्रतीक्षा कर रही है । तब मंदिर में बैठे भगवान तेरे छप्पन भोग कैसे खा सकते हैं ॥
पुरइन बच्छर पुरनियाँ, नए बच्छर नइ बात ।
नवनै सोंह मीच जुगी, पुरइन पीछ उद्गात ।१०७७।
भावार्थ : -- पुराने वर्ष में पुरानी बात, नव वर्ष की नई बात । नई बात यह है कि नए के साथ मृत्यु का एवं पुराने के साथ जन्म का संयोग है ॥
जोइ उपजे मुख तिस्ना, बुझे कंठ जल घाल ।
कै नदी नल कूप घड़े,के सरबर कै ताल । १०७८।
भावार्थ : -- यदि मुख में तृष्णा जन्म लेती है वह जल ग्रहण करने से ही बुझती है । या तो नदी के या नल के या कुँवें के या घड़े के या सरोवर के या तालाब के ॥
पुरइन जन असिखित रहि, रहहिं पर ज्ञान बान ।
अजहूँ के तौ सिखित हैं, है निपट मूरखान ।१०७९।
भावार्थ : -- बड़े बूढ़े लोग यद्यपि अशिक्षित थे, किन्तु वे ज्ञानी ध्यानी थे । अद्यावधि में लोग शिक्षित अवश्य हैं,किन्तु हैं निपट मूर्ख ॥
हाथी घोड़ा पालकी, को चढ़ि गगन बिमान ।
चाव रहे न भाव रहे, वाका कवन उठान ।१०८०।
भावार्थ : -- कोई हाथी घोड़ों पर चढ़ा हुवा है कोई पालकी पर चढ़ा हुवा है कोई विमान लेकर गगन में चढ़ा फिर रहा है । ऐसे लोगों में किसी प्रकार पञ्च भूत में परस्पर आकर्षण नहीं होता और उनमें कोई भाव भी नहीं होता है । फिर ऐसे व्यक्तियों का उठावना क्या कारण कि वो तो पहले से ही उठे हुवे हैं ॥
पहिले कितनो बांच लिए, अब मत पत्र दे आँच ।१०७१।
भावार्थ : -- सिंहासन की लालच में बन्दर घर घर नाच करते हैं । पहले कितने ही मत पत्रों को बाँच लिया न.....तेरा कुछ हुवा.....नहीं, अब आग लगा दे इन मत पत्रों को ॥
धरे उठौआ चूल्हा, जँह तँह देइ बराए ।
पाके पाक आप खाए, बाकि धुँआ मलिनाइ ।१०७२ ।
भावार्थ : -- बिना अर्थं के इधर-उधर उड़ने वाले जहां पाते हैं वहाँ आग लगा देते हैं । पके पकवान तो आप खाते हैं, बाकियों को काले धुँएँ से मैला कर आते हैं ॥
उजरी समझ उपार कै, बोवएँ मलिन बिचार ।
उजरी सारी बाटिका, अब दे कौन सँवार ।१०७३।
भावार्थ : -- शुद्ध एवं निर्मल विचारों को उखाड़ कर वहाँ कुत्सित विचारों को बोया जा रहा है । ऐसा करके सारी वाटिका ही उजाड़ दी, अब इस उजड़े को कौन सँवारे ॥
नयन पटल घन स्याम, लेख लिखाई लाख ।
यह पत्र सो पढ़ सके जो ,जाने तिनकी भाख ।१०७४।
भावार्थ : -- नयनों की श्याम पट में लाखों लेख लिखे रहते हैं । यह पत्र वही पढ़ सकता है जो उसकी भाषा जानता हो ॥
खाए प्रीति पकवान जो, भूरे नाहि सुवाद ।
दरसन टोटे जिन नैन, कहत ह है बकबाद ।१०७५।
भावार्थ : --जिसने एक बारी प्रीति का पकवान खा लिया फिर वह उसका स्वाद नहीं भूलता । जिन नैनों के इसके दर्शनों के भी टोटे हैं वह तो कहेगा ही ह बकवास है ॥
भूखी भोजन जोग रहि, जब वाकी संतान ।
खाए कवन तेरे भोग, बैस भवन भगवान ।१०७६।
भावार्थ : -- जब उनकी संतान भूखी है और भोजन की प्रतीक्षा कर रही है । तब मंदिर में बैठे भगवान तेरे छप्पन भोग कैसे खा सकते हैं ॥
पुरइन बच्छर पुरनियाँ, नए बच्छर नइ बात ।
नवनै सोंह मीच जुगी, पुरइन पीछ उद्गात ।१०७७।
भावार्थ : -- पुराने वर्ष में पुरानी बात, नव वर्ष की नई बात । नई बात यह है कि नए के साथ मृत्यु का एवं पुराने के साथ जन्म का संयोग है ॥
जोइ उपजे मुख तिस्ना, बुझे कंठ जल घाल ।
कै नदी नल कूप घड़े,के सरबर कै ताल । १०७८।
भावार्थ : -- यदि मुख में तृष्णा जन्म लेती है वह जल ग्रहण करने से ही बुझती है । या तो नदी के या नल के या कुँवें के या घड़े के या सरोवर के या तालाब के ॥
पुरइन जन असिखित रहि, रहहिं पर ज्ञान बान ।
अजहूँ के तौ सिखित हैं, है निपट मूरखान ।१०७९।
भावार्थ : -- बड़े बूढ़े लोग यद्यपि अशिक्षित थे, किन्तु वे ज्ञानी ध्यानी थे । अद्यावधि में लोग शिक्षित अवश्य हैं,किन्तु हैं निपट मूर्ख ॥
हाथी घोड़ा पालकी, को चढ़ि गगन बिमान ।
चाव रहे न भाव रहे, वाका कवन उठान ।१०८०।
भावार्थ : -- कोई हाथी घोड़ों पर चढ़ा हुवा है कोई पालकी पर चढ़ा हुवा है कोई विमान लेकर गगन में चढ़ा फिर रहा है । ऐसे लोगों में किसी प्रकार पञ्च भूत में परस्पर आकर्षण नहीं होता और उनमें कोई भाव भी नहीं होता है । फिर ऐसे व्यक्तियों का उठावना क्या कारण कि वो तो पहले से ही उठे हुवे हैं ॥
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