जह जगती अरु कोउ नहि, तेरे अरि कुल चार ।
मरनी से जो भय लगे, तौ तिन भय को मार ।१०६१।
भावार्थ : -- इस संसार में तेरा शत्रु कोई नहीं यदि कोई है तो केवल काम,क्रोध,मद और लोभ ही हैं । यदि मरने से भय लगता हो तो सर्वप्रथम उस भय के जनितो को मार ॥
निहचिन्त हो सोए रहे, लोचन पलक ढकाए ।
काल उपर भरोसा का , ऐसेउ लेइ जाए ।१०६२।
भावार्थ : -- नयनों में पलकों का पर्दा दिए बड़ा निश्चिन्त होकर सो रहा है, रै माणूस काल पे भरोसा मत कर, ऐसी-वैसी जाने कैसी अवस्था में ले जाए ॥
कोउ आपनी मनवाए, कोउ आपनी मान ।
तिनकी कहि तबहिं माने, जब हो जग कल्यान ।१०६३।
भावार्थ : -- कोई अपनी मान मनवाता है और किसी की नहीं मानता, कोई अपनी ही मानता है और किसी की नहीं मानता । इनकी कहनी तभी मानना चाहिए, जब वह संसार के लिए कल्याणकारी हो ॥
दीपक चूल्हा अँगीठि, बरत करें घर काल ।
किए कज्जल कुल जगत जूँ, बुराई की ज्वाल।१०६४।
भावार्थ : -- दीपक, चूल्हा, अंगीठी जैसे साधन जलाते ही घर को काला कर देते हैं । वैसे ही बुराई की ज्वाला है, जो न केवल कुल एवं समाज को अपितु समूचे जगत को कलंकित कर देती है ॥
दाता निसदिन भूर बिनु, टूक दिए जो स्वान ।
वाके नयन पथ जोगे, तेरे देयन दान ।१०६५।
भावार्थ : -- हे दाता ! तू जब प्रत्येक दिवस भूले बिना स्वान को रोटी के टूक देता है । उसके नयन, तेरे दिए दान की प्रतीक्षा में रहते हैं ॥
पुरइन पावन लाह किए, चरन धरे जो कीच ।
हरिअरु उदरु कंठ गहे, लेवत निजपुर खीँच ।१०५६।
भावार्थ : -- पद्म प्राप्ति की लालच कर यदि कीचड़ में पाँव रखे तो उस कीचड़ का आकर्षण ऐसा है कि वह धीरे धीरे तुम्हारे चरण पकड़ते हुवे उदर तक पहुँच कर गला पकड़ते हुवे अपनी और खैच लेती है ॥
पुंडरीक कीच उपजै, कीचर माहि बिहाए ।
सोइ पावै मुकुति जोइ, भगवन चरन चढ़ाए ।१०५७।
भावार्थ : -- पुण्डरीक कीचड़ में उत्पन्न होता है और कीचड़ में ही विलीन हो जाता है । वह पुण्डरीक मुक्ति प्राप्त करता है जो प्रभु के चरणों में चढ़ता है ॥
दिया पतंग कुसुम बरन, जस जल संग तरंग ।
जग मैं तसहि सुसोहिते, नर नारी के संग ।१०५८।
भावार्थ : -- जिस प्रकार दिया के साथ पतंगा, कुसुम के साथ वर्ण, जल क साथ तरंग सुशोभित होती है संसार मन उसी प्रकार नर एवं नारी का संग ही सुशोभित होता है ॥
चाहे केतक पीट लो , खर तुरग नाहि होत ।
बोलै पागत पेम सन, जरे ज्ञान के जोत ।१०५९।
भावार्थ : -- पीटाई करने से मूर्ख बुद्धिमान नहीं हो जाता । प्रेम रस युक्त वाणी से समझाने पर बुझी हुई ज्ञान की ज्योत भी प्रज्वलित हो जाती है॥
मत मति सरनि चरत जोइ, भाव भीत गहियाए ।
अटकल आनी चाहिये, बानी सबहि बताए ।१०६०।
भावार्थ : -- मस्तिष्क के मार्ग में संचारित विचारों को एवं अंतस के भावों को वाणी व्यक्त कर देती है । इसे समझने की कला आनी चाहिए ॥
मरनी से जो भय लगे, तौ तिन भय को मार ।१०६१।
भावार्थ : -- इस संसार में तेरा शत्रु कोई नहीं यदि कोई है तो केवल काम,क्रोध,मद और लोभ ही हैं । यदि मरने से भय लगता हो तो सर्वप्रथम उस भय के जनितो को मार ॥
निहचिन्त हो सोए रहे, लोचन पलक ढकाए ।
काल उपर भरोसा का , ऐसेउ लेइ जाए ।१०६२।
भावार्थ : -- नयनों में पलकों का पर्दा दिए बड़ा निश्चिन्त होकर सो रहा है, रै माणूस काल पे भरोसा मत कर, ऐसी-वैसी जाने कैसी अवस्था में ले जाए ॥
कोउ आपनी मनवाए, कोउ आपनी मान ।
तिनकी कहि तबहिं माने, जब हो जग कल्यान ।१०६३।
भावार्थ : -- कोई अपनी मान मनवाता है और किसी की नहीं मानता, कोई अपनी ही मानता है और किसी की नहीं मानता । इनकी कहनी तभी मानना चाहिए, जब वह संसार के लिए कल्याणकारी हो ॥
दीपक चूल्हा अँगीठि, बरत करें घर काल ।
किए कज्जल कुल जगत जूँ, बुराई की ज्वाल।१०६४।
भावार्थ : -- दीपक, चूल्हा, अंगीठी जैसे साधन जलाते ही घर को काला कर देते हैं । वैसे ही बुराई की ज्वाला है, जो न केवल कुल एवं समाज को अपितु समूचे जगत को कलंकित कर देती है ॥
दाता निसदिन भूर बिनु, टूक दिए जो स्वान ।
वाके नयन पथ जोगे, तेरे देयन दान ।१०६५।
भावार्थ : -- हे दाता ! तू जब प्रत्येक दिवस भूले बिना स्वान को रोटी के टूक देता है । उसके नयन, तेरे दिए दान की प्रतीक्षा में रहते हैं ॥
पुरइन पावन लाह किए, चरन धरे जो कीच ।
हरिअरु उदरु कंठ गहे, लेवत निजपुर खीँच ।१०५६।
भावार्थ : -- पद्म प्राप्ति की लालच कर यदि कीचड़ में पाँव रखे तो उस कीचड़ का आकर्षण ऐसा है कि वह धीरे धीरे तुम्हारे चरण पकड़ते हुवे उदर तक पहुँच कर गला पकड़ते हुवे अपनी और खैच लेती है ॥
पुंडरीक कीच उपजै, कीचर माहि बिहाए ।
सोइ पावै मुकुति जोइ, भगवन चरन चढ़ाए ।१०५७।
भावार्थ : -- पुण्डरीक कीचड़ में उत्पन्न होता है और कीचड़ में ही विलीन हो जाता है । वह पुण्डरीक मुक्ति प्राप्त करता है जो प्रभु के चरणों में चढ़ता है ॥
दिया पतंग कुसुम बरन, जस जल संग तरंग ।
जग मैं तसहि सुसोहिते, नर नारी के संग ।१०५८।
भावार्थ : -- जिस प्रकार दिया के साथ पतंगा, कुसुम के साथ वर्ण, जल क साथ तरंग सुशोभित होती है संसार मन उसी प्रकार नर एवं नारी का संग ही सुशोभित होता है ॥
चाहे केतक पीट लो , खर तुरग नाहि होत ।
बोलै पागत पेम सन, जरे ज्ञान के जोत ।१०५९।
भावार्थ : -- पीटाई करने से मूर्ख बुद्धिमान नहीं हो जाता । प्रेम रस युक्त वाणी से समझाने पर बुझी हुई ज्ञान की ज्योत भी प्रज्वलित हो जाती है॥
मत मति सरनि चरत जोइ, भाव भीत गहियाए ।
अटकल आनी चाहिये, बानी सबहि बताए ।१०६०।
भावार्थ : -- मस्तिष्क के मार्ग में संचारित विचारों को एवं अंतस के भावों को वाणी व्यक्त कर देती है । इसे समझने की कला आनी चाहिए ॥
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