चूल्हा माटी लिपाए, लकरी अगन धराए ।
कब लग हाँड़ी ना चढ़े, तबलग रहे भुखाए ।१०५१।
भावार्थ : -- चूल्हा लीप के तैयार कर दिया, लकड़ी में आग भी लगा दी । जब तक हांडी नहीं चढ़ती तब तक मरो भूखे ॥
अर्थात :- दल बन गया, मत भी मिल गए, अब सत्ता की हांडी नहीं चढ़ी तो स्वाद कहाँ से आए सो मरो भूखे ॥
बैठे नभ सिहासन जब,चन्दा चरन पसार ।
सरोबर के सुठि सुन्दर, कमलिन कुंचित कार ।१०५२।
भावार्थ : -- जब नभ -सिंहासन पर चंद्रमा पैर पसार कर विराजित होता है तब वह सरोवरों में खिले सुन्दर कमलों को मुरझा देता है ॥
अर्थात : -- जब शासन अत्याचारी हो जाता है, तब वह समाज के सुन्दर गुण रूपी कमल पुष्पों को संकुचित कर देता है ॥
जब एक विधान किसी दूसरे विधान का अतिक्रमण करता है तब न केवल न्यायकर्त्ता को न्याय प्रदान करने में कठिनाई होती है, अपितु समाज सुधारक का कार्य भी संघर्षपूर्ण हो जाता है ॥
नारी सोहे नर सोंह, स्वान सोंह स्वान ।
जे नेम बिधि के तेरे, जगत न्यारे कान ।१०५३।
भावार्थ : -- नारी, नर के संग ही शोभा देती है, कुकरा कुकरी के साथ सुशोभित होता है । गांय एवं बैल का संग ही सुहाता है । यह विधाता ने नियम बनाए हैं । ई हमरी सरकार के तो जगत से न्यारे ही नियम हैं ।
मानौ चाहे न मानौ, बिधि नै किये बिधान ।
जो जग जनम जराए लिए, सो फिर होंहि बिहान ।१०५४।
भावार्थ : - मानो चाहे न मानो यह विधाता ने विधान बनाया है जो शाश्वत सत्य है । जिसने संसार में जीवन से बंधन जोड़ लिया उसका अंत होना निश्चित है ॥
मुख सोंह जापे हरि हरि, हरिअर ना हरियाए ।
हर जुताई भुइँ हरिहरि, हरिअरना हरिआए ।१०५५।
भावार्थ : -- मुख में हरि हरि का जाप करने भर से सब कुछ हरा भरा नहीं होता ॥ जब भूमि में हल जुताई होती है तब फिर धीरे धीरे वह हरी-भरी होती है
अर्थात : --विधान लिख देने भर से अपराध नहीं रुकते, उसको पालन करना / करवाना पड़ता है । बने हैं ना...... कितने नियम.....कोई अंदर है...... नहीं......नए कौन सा चिमत्कार करेंगे"। पहले हल जोतो, फिर उत्पादन देखो, फिर यह देखो कि उसमें कितनी उर्वरा और लगेगी.....
सौहरिदै के भंडार, जन जन क कर दाए ।
जूँ मन मेल मिलित रहे , मिले न दौड़ लगाए ।१०५६।
भावार्थ : -- अपनी सद्भावना की, मित्रता की सम्पति के भण्डार को जन जन के हाथों में दान देकर फिर चित्त एकात्म होते हैं । मन के घोड़े दौड़ाने से नहीं ॥
अर्थात : --"देवालयों की दौड़ लगाने से प्रभु का जोड़ नहीं मिलता,प्रभु का जोड़ भाव से मिलता है"
आगत सुवागत कर पत, पूज मान बहु दाए ।
आगत के जे करनीय, सोइ गह न मलिनाए ।१०५७।
भावार्थ : -- आतिथेय का यह कर्त्तव्य है कि वह अतिथि का अतिशय मान सम्मान करे । अतिथि का भी कर्त्तव्य है कि वह अपने आचरणों से अतिथिगृह को गंदा न करे ॥
काल का रंग काल है, काल न देइ दिखाए ।
बिषय भोग के चाँदना, काल कहाँ दरसाए ।१०५८।
भावार्थ : -- काल का रंग काला होता है, वह दिखाई नहीं देता । कारण कि भोग विषयों का चमकारा इतना होता है कि वह कालापन दर्शाने में असमर्थ रहता है ॥
पर्बत मुख उन्मुख रहे, चरन धरा के भीत ।
बदरा गगन उड़त फिरी, ते कर भइ पौ जीत ।१०५९।
भावार्थ : - पर्वत का मुख-मस्तक ऊँचा रहता है, किन्तु उसके चरण धरती में ही धंसे रहते हैं, अत:वायु उसका अहित नहीं कर सकता । बदली आकाश में उड़ती फिरती है, इस कारण वह वायु से जीती जाती है ॥
भव सागर ग्रह नख देस, धरती कारावास ।
काटि सकै जोइ बंधन, पावै सोइ निकास ।१०६०।
भावार्थ : -- इस संसार के ग्रह एवं नक्षत्र राष्ट्र स्वरुप हैं, एवं यह धरती कारावास है । जो इस जीवन-मरण के चक्र को काटने का सामर्थ्यता रखता है, वही यहाँ से छूट सकता है ॥
कब लग हाँड़ी ना चढ़े, तबलग रहे भुखाए ।१०५१।
भावार्थ : -- चूल्हा लीप के तैयार कर दिया, लकड़ी में आग भी लगा दी । जब तक हांडी नहीं चढ़ती तब तक मरो भूखे ॥
अर्थात :- दल बन गया, मत भी मिल गए, अब सत्ता की हांडी नहीं चढ़ी तो स्वाद कहाँ से आए सो मरो भूखे ॥
बैठे नभ सिहासन जब,चन्दा चरन पसार ।
सरोबर के सुठि सुन्दर, कमलिन कुंचित कार ।१०५२।
भावार्थ : -- जब नभ -सिंहासन पर चंद्रमा पैर पसार कर विराजित होता है तब वह सरोवरों में खिले सुन्दर कमलों को मुरझा देता है ॥
अर्थात : -- जब शासन अत्याचारी हो जाता है, तब वह समाज के सुन्दर गुण रूपी कमल पुष्पों को संकुचित कर देता है ॥
जब एक विधान किसी दूसरे विधान का अतिक्रमण करता है तब न केवल न्यायकर्त्ता को न्याय प्रदान करने में कठिनाई होती है, अपितु समाज सुधारक का कार्य भी संघर्षपूर्ण हो जाता है ॥
नारी सोहे नर सोंह, स्वान सोंह स्वान ।
जे नेम बिधि के तेरे, जगत न्यारे कान ।१०५३।
भावार्थ : -- नारी, नर के संग ही शोभा देती है, कुकरा कुकरी के साथ सुशोभित होता है । गांय एवं बैल का संग ही सुहाता है । यह विधाता ने नियम बनाए हैं । ई हमरी सरकार के तो जगत से न्यारे ही नियम हैं ।
मानौ चाहे न मानौ, बिधि नै किये बिधान ।
जो जग जनम जराए लिए, सो फिर होंहि बिहान ।१०५४।
भावार्थ : - मानो चाहे न मानो यह विधाता ने विधान बनाया है जो शाश्वत सत्य है । जिसने संसार में जीवन से बंधन जोड़ लिया उसका अंत होना निश्चित है ॥
मुख सोंह जापे हरि हरि, हरिअर ना हरियाए ।
हर जुताई भुइँ हरिहरि, हरिअरना हरिआए ।१०५५।
भावार्थ : -- मुख में हरि हरि का जाप करने भर से सब कुछ हरा भरा नहीं होता ॥ जब भूमि में हल जुताई होती है तब फिर धीरे धीरे वह हरी-भरी होती है
अर्थात : --विधान लिख देने भर से अपराध नहीं रुकते, उसको पालन करना / करवाना पड़ता है । बने हैं ना...... कितने नियम.....कोई अंदर है...... नहीं......नए कौन सा चिमत्कार करेंगे"। पहले हल जोतो, फिर उत्पादन देखो, फिर यह देखो कि उसमें कितनी उर्वरा और लगेगी.....
सौहरिदै के भंडार, जन जन क कर दाए ।
जूँ मन मेल मिलित रहे , मिले न दौड़ लगाए ।१०५६।
भावार्थ : -- अपनी सद्भावना की, मित्रता की सम्पति के भण्डार को जन जन के हाथों में दान देकर फिर चित्त एकात्म होते हैं । मन के घोड़े दौड़ाने से नहीं ॥
अर्थात : --"देवालयों की दौड़ लगाने से प्रभु का जोड़ नहीं मिलता,प्रभु का जोड़ भाव से मिलता है"
आगत सुवागत कर पत, पूज मान बहु दाए ।
आगत के जे करनीय, सोइ गह न मलिनाए ।१०५७।
भावार्थ : -- आतिथेय का यह कर्त्तव्य है कि वह अतिथि का अतिशय मान सम्मान करे । अतिथि का भी कर्त्तव्य है कि वह अपने आचरणों से अतिथिगृह को गंदा न करे ॥
काल का रंग काल है, काल न देइ दिखाए ।
बिषय भोग के चाँदना, काल कहाँ दरसाए ।१०५८।
भावार्थ : -- काल का रंग काला होता है, वह दिखाई नहीं देता । कारण कि भोग विषयों का चमकारा इतना होता है कि वह कालापन दर्शाने में असमर्थ रहता है ॥
पर्बत मुख उन्मुख रहे, चरन धरा के भीत ।
बदरा गगन उड़त फिरी, ते कर भइ पौ जीत ।१०५९।
भावार्थ : - पर्वत का मुख-मस्तक ऊँचा रहता है, किन्तु उसके चरण धरती में ही धंसे रहते हैं, अत:वायु उसका अहित नहीं कर सकता । बदली आकाश में उड़ती फिरती है, इस कारण वह वायु से जीती जाती है ॥
भव सागर ग्रह नख देस, धरती कारावास ।
काटि सकै जोइ बंधन, पावै सोइ निकास ।१०६०।
भावार्थ : -- इस संसार के ग्रह एवं नक्षत्र राष्ट्र स्वरुप हैं, एवं यह धरती कारावास है । जो इस जीवन-मरण के चक्र को काटने का सामर्थ्यता रखता है, वही यहाँ से छूट सकता है ॥
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