सोमवार, 2 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०१॥ -----

एक लगन लगे बिनु लगन, एक लगन लग्नाए । 
दुनहु लगे जनिमन जने, सो वो गृहस कहाए ।१०११। 

भावार्थ : -- स्त्री-पुरुष चाहे विवाह बंधन बाँध के साथ रहें चाहे बिना बंधे साथ रहे । बच्चे तो होंगे ही, जनसंख्या तो बढ़ेगी ही । प्राचीन समय में स्त्री पुरुष का परस्पर सम्बंध स्थापित होते ही उसे विवाहित घोषित कर दिया जाता था और वह गृहस्थ कहलाते थे विवाह की रीतियाँ औपचारिकता मात्र है यह स्त्री पुरुष में परस्पर सुसंबंध स्थापित कर सृष्टि को निर्बाध स्वरुप में संचालन करने का अनुज्ञा पत्र है माने कि लाइसेंस है अब कोई गाडी कैसे भी चला ले दुर्घटना तो होबेच करेगी । तो एकल विवाह पद्धति माने : -  एक स्त्री का एक ही पुरुष से एवं एक पुरुष का एक ही स्त्री से सुसंबंध ॥

पालनौ घर घारी कै, बैठा डोरि दुलाए । 
पाए जनमन गोद धरे, कै जननी जन्माए।१०१२। 
भावार्थ : -- ढुंड मैं पालणो घाल कै बैट्ठे डोरी दुलाणो स पुत( संतान)  होवोगो के । घर में संतान या तो गोद लेने से या फिर माता के जन्म देने से होती हैं ॥

अर्थात : --  "कल्पना मात्र से कोई कार्य सिद्ध नहों हो होता, उस हेतु प्रयास भी आवश्यका है"

काम क्रोध मद लोभ मह, कभु न लगन बिलगाउ । 
जे तौ घन छबि छन सौंह, दै गत जा पछिताउ ।१०१३। 
भावार्थ : --  'काम, क्रोध, मान, लोभ जैसे धन का लोभ' के कारण अपने सम्बन्ध न बिगाड़ें । ये सब कारक अज्ञान स्वरुप मेघ की ज्योत सदृश्य है, जो पछतावे के आँसू देकर लौट जाते हैं ॥

जों हरिदै हरि हिय मिले, होत हरित हरियार । 
गहनइ गाँठी मारि कै, दैं सकल न्यौछार ।१०१४। 
भावार्थ : -- अपने ह्रदय से ज्यों ही हरि का ह्रदय मिल जाए फिर हरि के ही रंग में रंगते हुवे पहले एक गहरी गाँठबांधे फिर उनपर अपनी सारी भक्ती न्यौछावर कर दें ॥

सजनी सों ससुराल मैं, साली की अस राछ ।
जस पेम दधि बिलोइ कै, मिलि सनेह सह छाछ ।१०१५ । 
भावार्थ : -- ससुराल में सजनी के साथ साली का मिलना ऐसा है,  जैसे मुहब्बत की मीठी दही बिलोने पर मख्खन के साथ खट्टी छाछ मिलती है किसी किसी को छाछ वेस्ट ( बिशिष्ट,बेस्ट नहीं रे बाबा ) प्रोडक्ट माने की अवशिष्ट उत्पाद लगती  लगती है, बड़ी साली को डेढ़ छाछ भी कहते हैं ॥ 

सृजन सन जे प्रान जोग, जुगे परस्पर बाँध । 
बाँध रहे ना कछु लहे, बरे अगन चढ़ काँध ।१०१६। 
भावार्थ : -- सृष्टि के साथ यह जीवन-योग ( पृथ्वी, अग्नि, वायु , जल, आकाश )  एक आकर्षण के अंतर्गत योगित है । यह आकर्षण जब विकीर्णित हो जाता है  तब कुछ नहीं बचता, कंधे पर चढ़ कर जलना ही शेष रह जाता है ॥ 

मुखिया भगत सरूप है, जन जन भगवन पाँव । 
वाकी सेवा भाव है, मंदिर वाका गाँव ।१०१७ । 
भावार्थ : -- लोकतंत्र का मुखिया भक्त स्वरुपम है, प्रत्येक व्यक्ति भगवान के चरणों के सदृश्य है । उसकी सेवा ही से सत्ता है, भक्ति है, प्रेम है, उसका वास स्थान ही मंदिर है ॥  

जगत जोत,जूँ चंद्रमा, जातक चाव  चकोर । 
आठों जाम मगन रहे, आहोर भूरि बहोर ।१०१८। 
भावार्थ : -- यह जगत की जोत चमकते हुवे चंद्रमा के समान है । जीवों का इसके प्रति आकर्षण चकोर के सदृश्य है । ये चौबीस घंटे इसी में मग्न रहते हैं,यह भूल जाते हैं कि इस जगत में आए हैं तो जाना भी है ॥ 

फिरकी के सोंह फिरत, चित जौंह फेरि फिराए । 
मति खन खूँटे बाँधि कै , फेर धिआन लगाए ।१०१९। 
भावार्थ : -- फिरकी के जैसे फिर कर यह चित्त यदि फेरी फिराता हो , तो इसे मस्तिष्क खंड के खूँटे से बाँध दें तदोपरांत  किसी विषय में ध्यान केंद्रित करें ॥ 

बातन की ओढ़ान लै, चढ़ा बचन के रंग । 
बने सचिव छाँड़ेसि जूँ, केंचुरि तजे भुजंग ।१०२०। 
भावार्थ : -- बातों का आवरण लेके, उसपर वादों का रंग चढ़ा के, लोग जब नेता-मंत्री बनते हैं, तो वह उसे ऐसे छोड़ते हैं जैसे सांप केचुली त्याग रहा हो ॥






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