कुबचनी दुर्बादिन के, मुख पर मौन सुहाए ।
मोरी जेतक मुख खुरे, तेतक बाँस उठाए ।१०९१।
भावार्थ : -- कुवचन और बुरा बुरा कहने वालों के मुख पर मौन ही अच्छा लगता है । मोरी का मुख जितना खुला होता है वह उतनी ही दुर्गंध देती है ॥
जीव धारन तन चाहिए, तन को चाहिए साँस।
साँससो जल चाहिए जो, भया हिरन संकास ।१०९२।
भावार्थ : -- जीवन की धारणा हेतु देह की आवश्यकता होती है, देह को साँस की आवश्यकता होती है । साँस को उस जल की आवश्यकता होती है जो स्वर्ण के मूल्य का हो गया ॥
खल की साज समाज मैं, ताल मैं ज्यूँ मीन ।
मल सन जल दुबरो कियो, आप भई बहु पीन ।१०९३।
भावार्थ : -- दुष्टों की साज-सज्जा, पवित्रता, सच्चापन समाज में ऐसा है जैसे जल में मीन का होना ॥ वह अपने मल से जल को तो मैला कर दुर्बल अर्थात अयोग्य कर देती है, और स्वयं हट्टीकट्टी होकर सुपोषित रहती है ॥
पारसमनि सोइ भलि जो, लोहन कंचन कारि ।
वा सौंह अंतर धारिए, जो जल अनहु न छाँरि।१०९४।
भावार्थ : -- स्पर्शमणि वाही अच्छी है, जो केवल लोहे को स्वर्ण करे । उस मनि के स्पर्श से दूर ही रहना चाहिए, जो दाना-पानी को भी स्वर्ण कर दे ॥
जिन कहत पयोधि जग तँह, मुकतइँ मुकुत समाए ।
जो तप चरन चिन्ह चरे, चुनि चुनि झोर धराए ।१०९५।
भावार्थ : -- संसार जिस जलाकर को पयोधि कहता है, वहाँ मोती ही मोती बिखरे हैं । जो तपन के चरण चिन्हों का अनुशरण करता है, वही उन्हें चुनता है और अपनी झोली सजाता है ॥
नभ पटल नौ बत्सल के, लिख आगम संदेस ।
प्रथम किरन जोग रहि भर नौ नौ भूषन भेस ।१०९६।
भावार्थ : -- नभ के पटल पर नववर्ष के आगमन का सन्देश लिख प्रथम किरण नए नए आभूषण एवं वस्त्रों से आभारित होकर प्रतीक्षारत है ॥
जग के जीव जन तरु बन, सुन ले सासन कार ।
निज रछ्न मैं माँग रहे, जीवन के अधिकार ।१०९७ ।
भावार्थ : --ऐ शासन कार सुन, न केवल मनुष्य अपितु प्राणिजगत के सभी जीव जंतु, पेड़-पादप, सभी बन-उपवन अपनी रक्षा में जीवन का अधिकार मांग रहे हैं ॥
'इनकी ह्त्या बंद करो'
साँच बचन सोइ भित जो, दोष चरन किए रोध ।
पछ्ताउ अगन हिरन सम , कारे चित परिसोध ।१०९८।
भावार्थ : -- सत्य वचन वह भित्ति है, जो दूषित आचरण को अवरोधित करती है । पश्चाताप की अग्नि स्वर्ण के सरिस उन आचरणों को परिशोधित करती हैं ॥
नौ पाप करम रोध के, सुरतत किये पुरान ।
पछ्ताउ अगन दहन ते, जीवन के उत्थान ।१०९९ ।
भावार्थ : -- नए पातक कर्मों को अवरोधित करते हुवे, पुराने पाप कर्म का स्मरण कर पश्चाताप की अग्नि में जलने से ही जीवन का उत्थान हैं ॥
भलधन धरे तो पुन किए, खल धारे तौ पाप ।
भलकरनी दारिद हरए, खल करनी दिए ताप ।११०० ।
भावार्थ : -- यदि भलामानुष विभूति धारण करे तो वह उसका प्रयोग पुण्य कार्यों में करता है । खोटा मानुष उस विभूति का प्रयोग दूषण कार्यों में करता है । भले मनुष्य की करनी दरिद्रता को हरती है, खोटे मनुष्य की करनी संताप ही देती है ॥
मोरी जेतक मुख खुरे, तेतक बाँस उठाए ।१०९१।
भावार्थ : -- कुवचन और बुरा बुरा कहने वालों के मुख पर मौन ही अच्छा लगता है । मोरी का मुख जितना खुला होता है वह उतनी ही दुर्गंध देती है ॥
जीव धारन तन चाहिए, तन को चाहिए साँस।
साँससो जल चाहिए जो, भया हिरन संकास ।१०९२।
भावार्थ : -- जीवन की धारणा हेतु देह की आवश्यकता होती है, देह को साँस की आवश्यकता होती है । साँस को उस जल की आवश्यकता होती है जो स्वर्ण के मूल्य का हो गया ॥
खल की साज समाज मैं, ताल मैं ज्यूँ मीन ।
मल सन जल दुबरो कियो, आप भई बहु पीन ।१०९३।
भावार्थ : -- दुष्टों की साज-सज्जा, पवित्रता, सच्चापन समाज में ऐसा है जैसे जल में मीन का होना ॥ वह अपने मल से जल को तो मैला कर दुर्बल अर्थात अयोग्य कर देती है, और स्वयं हट्टीकट्टी होकर सुपोषित रहती है ॥
पारसमनि सोइ भलि जो, लोहन कंचन कारि ।
वा सौंह अंतर धारिए, जो जल अनहु न छाँरि।१०९४।
भावार्थ : -- स्पर्शमणि वाही अच्छी है, जो केवल लोहे को स्वर्ण करे । उस मनि के स्पर्श से दूर ही रहना चाहिए, जो दाना-पानी को भी स्वर्ण कर दे ॥
जिन कहत पयोधि जग तँह, मुकतइँ मुकुत समाए ।
जो तप चरन चिन्ह चरे, चुनि चुनि झोर धराए ।१०९५।
भावार्थ : -- संसार जिस जलाकर को पयोधि कहता है, वहाँ मोती ही मोती बिखरे हैं । जो तपन के चरण चिन्हों का अनुशरण करता है, वही उन्हें चुनता है और अपनी झोली सजाता है ॥
नभ पटल नौ बत्सल के, लिख आगम संदेस ।
प्रथम किरन जोग रहि भर नौ नौ भूषन भेस ।१०९६।
भावार्थ : -- नभ के पटल पर नववर्ष के आगमन का सन्देश लिख प्रथम किरण नए नए आभूषण एवं वस्त्रों से आभारित होकर प्रतीक्षारत है ॥
जग के जीव जन तरु बन, सुन ले सासन कार ।
निज रछ्न मैं माँग रहे, जीवन के अधिकार ।१०९७ ।
भावार्थ : --ऐ शासन कार सुन, न केवल मनुष्य अपितु प्राणिजगत के सभी जीव जंतु, पेड़-पादप, सभी बन-उपवन अपनी रक्षा में जीवन का अधिकार मांग रहे हैं ॥
'इनकी ह्त्या बंद करो'
साँच बचन सोइ भित जो, दोष चरन किए रोध ।
पछ्ताउ अगन हिरन सम , कारे चित परिसोध ।१०९८।
भावार्थ : -- सत्य वचन वह भित्ति है, जो दूषित आचरण को अवरोधित करती है । पश्चाताप की अग्नि स्वर्ण के सरिस उन आचरणों को परिशोधित करती हैं ॥
नौ पाप करम रोध के, सुरतत किये पुरान ।
पछ्ताउ अगन दहन ते, जीवन के उत्थान ।१०९९ ।
भावार्थ : -- नए पातक कर्मों को अवरोधित करते हुवे, पुराने पाप कर्म का स्मरण कर पश्चाताप की अग्नि में जलने से ही जीवन का उत्थान हैं ॥
भलधन धरे तो पुन किए, खल धारे तौ पाप ।
भलकरनी दारिद हरए, खल करनी दिए ताप ।११०० ।
भावार्थ : -- यदि भलामानुष विभूति धारण करे तो वह उसका प्रयोग पुण्य कार्यों में करता है । खोटा मानुष उस विभूति का प्रयोग दूषण कार्यों में करता है । भले मनुष्य की करनी दरिद्रता को हरती है, खोटे मनुष्य की करनी संताप ही देती है ॥