रविवार, 29 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०९ ॥ -----

कुबचनी दुर्बादिन के, मुख पर मौन सुहाए । 
मोरी जेतक मुख खुरे, तेतक बाँस उठाए ।१०९१।
भावार्थ : -- कुवचन और बुरा बुरा कहने वालों के मुख पर मौन ही अच्छा लगता है ।  मोरी का मुख जितना खुला होता है वह उतनी ही दुर्गंध देती है ॥

जीव धारन तन चाहिए, तन को चाहिए साँस। 
साँससो जल चाहिए जो, भया हिरन संकास ।१०९२। 
भावार्थ : -- जीवन की धारणा हेतु देह की आवश्यकता होती है, देह को साँस की आवश्यकता होती है । साँस को उस जल की आवश्यकता होती है जो स्वर्ण के मूल्य का हो गया ॥

खल की साज समाज मैं, ताल मैं ज्यूँ मीन । 
मल सन जल दुबरो कियो, आप भई बहु पीन ।१०९३। 
भावार्थ : --  दुष्टों की साज-सज्जा, पवित्रता, सच्चापन समाज में ऐसा है जैसे जल में मीन का होना ॥ वह अपने मल से जल को तो मैला कर दुर्बल अर्थात अयोग्य कर देती है, और स्वयं हट्टीकट्टी होकर सुपोषित रहती है ॥

पारसमनि सोइ भलि जो, लोहन कंचन कारि । 
वा सौंह अंतर धारिए, जो जल अनहु न छाँरि।१०९४। 
भावार्थ : -- स्पर्शमणि वाही अच्छी है, जो केवल लोहे को स्वर्ण करे । उस मनि के स्पर्श से दूर ही रहना चाहिए, जो दाना-पानी को भी स्वर्ण कर दे ॥

जिन कहत पयोधि जग  तँह, मुकतइँ मुकुत समाए । 
जो तप चरन चिन्ह चरे, चुनि चुनि झोर धराए ।१०९५। 
भावार्थ : -- संसार जिस जलाकर को पयोधि कहता है, वहाँ मोती ही मोती बिखरे हैं । जो तपन के चरण चिन्हों का अनुशरण करता है, वही उन्हें चुनता है और अपनी झोली सजाता है ॥

नभ पटल नौ बत्सल के, लिख आगम संदेस ।
प्रथम किरन जोग रहि भर नौ नौ भूषन भेस ।१०९६।  
भावार्थ : -- नभ के पटल पर नववर्ष के आगमन का सन्देश लिख प्रथम किरण नए नए आभूषण एवं वस्त्रों से आभारित होकर प्रतीक्षारत है ॥

जग के जीव जन तरु बन, सुन ले सासन कार । 
निज रछ्न मैं माँग रहे, जीवन के अधिकार ।१०९७ । 
भावार्थ : --ऐ शासन कार सुन, न केवल मनुष्य अपितु प्राणिजगत के सभी जीव जंतु, पेड़-पादप, सभी बन-उपवन अपनी रक्षा में जीवन का अधिकार मांग रहे हैं ॥ 

'इनकी ह्त्या बंद करो'

साँच बचन सोइ भित जो, दोष चरन किए रोध । 
पछ्ताउ अगन हिरन सम , कारे चित परिसोध ।१०९८। 
भावार्थ : -- सत्य वचन वह भित्ति है, जो दूषित आचरण को अवरोधित करती है । पश्चाताप की अग्नि स्वर्ण के सरिस उन आचरणों को परिशोधित करती हैं ॥ 

नौ पाप करम रोध के, सुरतत किये पुरान । 
पछ्ताउ अगन दहन ते, जीवन के उत्थान ।१०९९ । 
भावार्थ : -- नए पातक कर्मों को अवरोधित करते हुवे, पुराने पाप कर्म का स्मरण कर पश्चाताप की अग्नि में जलने से ही जीवन का उत्थान हैं ॥ 

भलधन धरे तो पुन किए, खल धारे तौ पाप । 
भलकरनी दारिद हरए, खल करनी दिए ताप ।११०० ।  
भावार्थ : -- यदि भलामानुष विभूति धारण करे तो वह उसका प्रयोग पुण्य कार्यों में करता है । खोटा मानुष उस विभूति का प्रयोग दूषण कार्यों में करता है । भले मनुष्य की करनी दरिद्रता को हरती है, खोटे मनुष्य की करनी संताप ही देती है ॥ 



गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०८ ॥ -----

भगवन बरदाई गाँठ, सोच समझ बरताएँ । 
बरतत भोग बिलास मैं, मानख मूढ़ कहाए ।१०८१। 
भावार्थ : -- ईश्वर द्वारा वरदान दी हुई संचय स्वरुप प्राकृतिक सम्पदा को सोच समझ कर व्यय करनी चाहिए । यदि इसे भोग-विलास में व्यय किया तो  ( आने वाले समय में ) मनुष्य मूर्ख ही कहलाएगा ॥ 

अर्थात : --'क्या हमें अपने निवेश को विषय-विलास में व्यय करना चाहिए' ? 

पाहन लिए मंदर रचे, पानी ते दिए सीच । 
अंतर भाउ ना उपजै, सो तो मचाइ कीच ।१०८२। 
भावार्थ : -- पत्थर लिया एक मंदिर रच दिया फिर जा जा कर पानी से उसे सींच रहे हैं । यदि अंतस में भाव नहीं है, प्रेम नहीं है, श्रद्धा नहीं है, फिर तो वहाँ कीचड़ ही मचाना है ॥  

सद्कर्म आतसी लड़ी, अहम् पलीता गोए । 
एक बारी लगाइ लगे, भस्म भूत छन होए ।१०८३। 
भावार्थ : -- सद्कार्य वह आतिशी लड़ी है जिसमें यदि अहंकार का पलीता हो, फिर तो एक लाग लगाने की देर है वह क्षण भर में भस्मीभूत हो जाएंगे ॥ 

कुल दीपक तो कारता, बस निज कुल उजियार । 
जग नयन जग उजारता, दूर करत अँधियार ।१०८४। 
भावार्थ : -- कुल का दीपक तो केवल अपने कुल को उज्जवल करता है । जो सूर्य स्वरुप होता है वह अन्धकार हरण कर समूचे जगत को उज्जवलित करता है ॥ 

जे ऋतु ऋति जे दिनु रात, पाख पहर के मंच । 
जे अम्बर के अडंबर, सब बिधि रचे प्रपंच ।१०८५। 
भावार्थ : -- यह ऋतुओं की गति ये दिन-रात ,ये पहर, पक्षों का मंच । यह अम्बर का आडम्बर यह सब विधाता का ही रचा हुवा भवजाल है ॥ 

केतिक लोग मरि मरि गए, केतक अरु मरि जाहिं । 
जोइ मरत जिवाई लए, सोइ जगत उपराहिं ।१०८६ । 
भावार्थ : -- जाने कितने ही लोग मर मर कर चले गए जाने और कितने अभी मरेंगे । जो मरते को जीवा ले गए वे ही जगत का उद्धार करते गए ॥ 

जो जन हो सेवक रूप, कारत बिपद निदान । 
प्रजा चरण गह राखिये, राखे सहसै कान ।१०८७। 
भावार्थ : -- यदि कोई जन सेवक स्वरूप हो, तो वह विपत्तियों का निदान करते हुवे जनता जनार्दन के चरण पकड़े रहे और सहस्रों ऐसे कान रखे जिससे जनता जनार्दन के दुखों को सुन सके ॥ 

बिनई तुहिन तिन सरूप, अहम् कलेवर ताड़ । 
ताड़ पहिलै टूट गिरै, जब आवै को बाड़ । १०८८। 
भावार्थ : -- विनम्र तुच्छ तृण के सदृश्य होता है अहम् ताड़ आकृति का होता है । जब कहीं कोई बाड़ आती है तब सर्वप्रथम ताड़ टूट कर गिरता है ॥ 

सुबरन के एकै सरूप, आभूषन बिलगाए । 
बिलग धर्म अस जग अहै, भगवन एकै एकाए ।१०८९। 
भावार्थ : -- स्वर्ण का स्वरुप एक ही होता है,किन्तु आभूषण विभिन्न रूपों में गढ़े जाते हैं । ऐसे ही संसार में विभिन्न धर्म हैं, किन्तु ईश्वर का स्वरुप एक ही है ॥  

दिनकर भया किरन किरन, अंतर गगन समाए । 
वाके परस पावत जल ,हिरनइ होया जाए ।१०९० । 
भावार्थ : -- सूर्य किरणों से युक्त होकर गगन के अंतर में समाता जा रहा है । उसका स्पर्श प्राप्त कर जल भी स्वर्णमयी होता जा रहा है ॥ 

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०७ ॥ -----

सिन्हासन की लाह किए, करे बाँदरा नाच । 
पहिले कितनो बांच लिए, अब मत पत्र दे आँच ।१०७१। 
भावार्थ : -- सिंहासन की लालच में बन्दर घर घर नाच करते हैं ।  पहले कितने ही मत पत्रों को बाँच लिया न.....तेरा कुछ हुवा.....नहीं, अब आग लगा दे इन मत पत्रों को ॥ 

धरे उठौआ चूल्हा, जँह तँह देइ बराए । 
पाके पाक आप खाए, बाकि धुँआ मलिनाइ ।१०७२ । 
भावार्थ : -- बिना अर्थं के इधर-उधर उड़ने वाले जहां पाते हैं वहाँ आग लगा देते हैं । पके पकवान तो आप खाते हैं, बाकियों को काले धुँएँ से मैला कर आते हैं ॥ 

उजरी समझ उपार कै, बोवएँ मलिन बिचार । 
उजरी सारी बाटिका, अब दे कौन सँवार ।१०७३। 
भावार्थ : -- शुद्ध एवं निर्मल विचारों को उखाड़ कर वहाँ कुत्सित विचारों को बोया जा रहा है । ऐसा करके सारी वाटिका ही उजाड़ दी, अब इस उजड़े को कौन सँवारे ॥ 

नयन पटल घन स्याम, लेख लिखाई लाख । 
यह पत्र सो पढ़ सके जो ,जाने तिनकी भाख ।१०७४। 
भावार्थ : -- नयनों की श्याम पट में लाखों लेख लिखे रहते हैं । यह पत्र वही पढ़ सकता है जो उसकी भाषा जानता हो ॥ 

खाए प्रीति पकवान जो, भूरे नाहि सुवाद । 
दरसन टोटे जिन नैन, कहत ह है बकबाद ।१०७५। 
भावार्थ : --जिसने एक बारी प्रीति का पकवान खा लिया फिर वह उसका स्वाद नहीं भूलता । जिन नैनों के इसके दर्शनों के भी टोटे हैं वह तो कहेगा ही ह बकवास है ॥  

भूखी भोजन जोग रहि, जब वाकी संतान । 
खाए कवन तेरे भोग, बैस भवन भगवान ।१०७६। 
भावार्थ : -- जब उनकी संतान भूखी है और भोजन की प्रतीक्षा कर रही है । तब मंदिर में बैठे भगवान तेरे छप्पन भोग कैसे खा सकते हैं ॥ 

पुरइन बच्छर पुरनियाँ, नए बच्छर नइ बात । 
नवनै सोंह मीच जुगी, पुरइन पीछ उद्गात ।१०७७। 
भावार्थ : -- पुराने वर्ष में पुरानी बात, नव वर्ष की नई बात । नई बात यह है कि नए के साथ मृत्यु का एवं पुराने के साथ जन्म का संयोग है ॥ 

जोइ उपजे मुख तिस्ना, बुझे कंठ जल घाल । 
कै नदी नल कूप घड़े,के सरबर कै ताल । १०७८।  
भावार्थ : -- यदि मुख में तृष्णा जन्म लेती है वह जल ग्रहण करने से ही बुझती है । या तो नदी के या नल के या कुँवें के या घड़े के या सरोवर के या तालाब के ॥ 

पुरइन जन असिखित रहि, रहहिं पर ज्ञान बान । 
अजहूँ के  तौ सिखित हैं, है निपट मूरखान ।१०७९। 
भावार्थ : -- बड़े बूढ़े लोग यद्यपि अशिक्षित थे, किन्तु वे ज्ञानी ध्यानी थे । अद्यावधि में लोग शिक्षित अवश्य हैं,किन्तु हैं निपट मूर्ख ॥ 

हाथी घोड़ा पालकी, को चढ़ि गगन बिमान । 
चाव रहे न भाव रहे, वाका कवन उठान  ।१०८०। 
भावार्थ : -- कोई हाथी घोड़ों पर चढ़ा हुवा है कोई पालकी पर चढ़ा हुवा है कोई विमान लेकर गगन में चढ़ा फिर रहा है । ऐसे लोगों में किसी प्रकार पञ्च भूत में परस्पर आकर्षण नहीं होता और उनमें कोई भाव भी नहीं होता है । फिर ऐसे व्यक्तियों का उठावना क्या कारण कि वो तो पहले से ही उठे हुवे हैं ॥ 







गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 119 -----

राजू : -- मास्टर जी! जनार्दन  की काम वाली बाई की तो वाट लगने वाली है, काहे की ये नई बाली दुल्हनिया तो झाड़ू धर के आ रही है..,

" मुगालते में मत रह, पहले भी बहुंत पीट चुका है वो  "

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०६ ॥ -----

जह जगती अरु कोउ नहि, तेरे अरि कुल चार । 
मरनी से जो भय लगे, तौ तिन भय को मार ।१०६१। 
भावार्थ : -- इस संसार में तेरा शत्रु कोई नहीं यदि कोई है तो केवल काम,क्रोध,मद और लोभ ही हैं । यदि मरने से भय लगता हो तो सर्वप्रथम उस भय के जनितो को मार ॥

निहचिन्त हो सोए रहे, लोचन पलक ढकाए । 
काल उपर भरोसा का , ऐसेउ लेइ जाए ।१०६२। 
भावार्थ : -- नयनों में पलकों का पर्दा दिए बड़ा निश्चिन्त होकर सो रहा है, रै माणूस काल पे भरोसा मत कर, ऐसी-वैसी जाने कैसी अवस्था में ले जाए ॥

कोउ आपनी मनवाए, कोउ आपनी मान ।  
तिनकी कहि तबहिं माने, जब हो जग कल्यान ।१०६३। 
भावार्थ : -- कोई अपनी मान मनवाता है और किसी की नहीं मानता, कोई अपनी ही मानता है और किसी की नहीं मानता । इनकी कहनी तभी मानना चाहिए, जब वह संसार के लिए कल्याणकारी हो ॥

दीपक चूल्हा अँगीठि, बरत करें घर काल । 
किए कज्जल कुल जगत जूँ, बुराई की ज्वाल।१०६४। 
भावार्थ : -- दीपक, चूल्हा, अंगीठी जैसे साधन जलाते ही घर को काला कर देते हैं । वैसे ही बुराई की ज्वाला है, जो न केवल कुल एवं समाज को अपितु समूचे जगत को कलंकित कर देती है ॥

दाता निसदिन भूर बिनु, टूक दिए जो स्वान । 
वाके नयन पथ जोगे, तेरे देयन दान ।१०६५। 
भावार्थ : -- हे दाता ! तू जब प्रत्येक दिवस भूले बिना स्वान को रोटी के टूक देता है ।  उसके नयन, तेरे दिए दान की प्रतीक्षा में रहते हैं ॥

पुरइन पावन लाह किए, चरन धरे जो कीच । 
हरिअरु उदरु कंठ गहे, लेवत निजपुर खीँच ।१०५६। 
भावार्थ : -- पद्म प्राप्ति की लालच कर यदि कीचड़ में पाँव रखे तो उस कीचड़ का आकर्षण ऐसा है कि वह धीरे धीरे तुम्हारे चरण पकड़ते हुवे उदर तक पहुँच कर गला पकड़ते हुवे अपनी और खैच लेती है ॥

पुंडरीक कीच उपजै, कीचर माहि बिहाए । 
सोइ पावै मुकुति जोइ, भगवन चरन चढ़ाए ।१०५७। 
भावार्थ : -- पुण्डरीक  कीचड़ में उत्पन्न होता है और कीचड़ में ही विलीन हो जाता है । वह पुण्डरीक मुक्ति प्राप्त करता है जो प्रभु के चरणों में चढ़ता है ॥

दिया पतंग कुसुम बरन, जस जल संग तरंग । 
जग मैं तसहि सुसोहिते, नर नारी के संग ।१०५८। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार दिया के साथ पतंगा, कुसुम के साथ वर्ण, जल क साथ तरंग सुशोभित होती है संसार मन उसी प्रकार नर एवं नारी का संग ही सुशोभित होता है ॥

चाहे केतक पीट लो , खर तुरग नाहि होत । 
बोलै पागत पेम सन, जरे ज्ञान के जोत ।१०५९। 

भावार्थ : --  पीटाई करने से मूर्ख बुद्धिमान नहीं हो जाता ।  प्रेम रस युक्त वाणी से समझाने पर बुझी हुई ज्ञान की ज्योत भी प्रज्वलित हो जाती है॥ 

मत मति सरनि चरत जोइ, भाव भीत गहियाए । 
अटकल आनी चाहिये, बानी सबहि बताए ।१०६०।
भावार्थ : -- मस्तिष्क के मार्ग में संचारित विचारों को एवं अंतस के भावों को वाणी व्यक्त कर देती है । इसे समझने की कला आनी चाहिए ॥




शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०५॥ -----

चूल्हा माटी लिपाए, लकरी अगन धराए । 
कब लग हाँड़ी ना चढ़े, तबलग रहे भुखाए ।१०५१। 

भावार्थ : -- चूल्हा लीप के तैयार कर दिया, लकड़ी में आग भी लगा दी । जब तक हांडी  नहीं चढ़ती तब तक मरो भूखे ॥ 

अर्थात :- दल बन गया, मत भी मिल गए, अब सत्ता की हांडी नहीं चढ़ी तो स्वाद कहाँ से आए सो मरो भूखे ॥ 

बैठे नभ सिहासन जब,चन्दा चरन पसार । 
सरोबर के सुठि सुन्दर, कमलिन कुंचित कार ।१०५२। 

भावार्थ : --  जब नभ -सिंहासन पर चंद्रमा पैर पसार कर विराजित होता है तब वह सरोवरों में खिले सुन्दर कमलों को मुरझा देता है ॥ 

अर्थात : -- जब शासन अत्याचारी हो जाता है, तब वह समाज के सुन्दर गुण रूपी कमल पुष्पों को संकुचित कर देता है ॥ 

जब एक विधान किसी दूसरे विधान का अतिक्रमण करता है तब न केवल  न्यायकर्त्ता को न्याय प्रदान करने में कठिनाई होती है, अपितु समाज सुधारक का कार्य भी संघर्षपूर्ण हो जाता है ॥ 

नारी सोहे नर सोंह, स्वान सोंह स्वान । 
जे नेम बिधि के तेरे, जगत न्यारे कान ।१०५३। 
भावार्थ : -- नारी, नर के संग ही शोभा देती है, कुकरा कुकरी के साथ सुशोभित होता है । गांय एवं बैल का संग ही सुहाता है । यह विधाता ने नियम बनाए हैं । ई हमरी सरकार के तो जगत से न्यारे ही नियम हैं । 

मानौ चाहे न मानौ, बिधि नै किये बिधान । 
जो जग जनम जराए लिए, सो फिर होंहि बिहान ।१०५४। 
भावार्थ : - मानो चाहे न मानो यह विधाता ने विधान बनाया है जो शाश्वत सत्य है । जिसने संसार में जीवन से बंधन जोड़ लिया उसका अंत होना निश्चित है ॥ 

मुख सोंह जापे हरि हरि, हरिअर ना हरियाए । 
हर जुताई भुइँ हरिहरि, हरिअरना हरिआए ।१०५५। 
भावार्थ : -- मुख में हरि हरि का जाप करने भर से सब कुछ हरा भरा नहीं होता ॥ जब भूमि में हल जुताई होती है तब फिर धीरे धीरे वह हरी-भरी होती है 

अर्थात : --विधान लिख देने भर से अपराध नहीं रुकते, उसको पालन करना / करवाना पड़ता है । बने हैं ना...... कितने नियम.....कोई अंदर है...... नहीं......नए कौन सा चिमत्कार करेंगे"। पहले हल जोतो, फिर उत्पादन देखो, फिर यह देखो कि उसमें कितनी उर्वरा और लगेगी..... 

सौहरिदै के भंडार, जन जन क कर दाए । 
जूँ मन मेल मिलित रहे , मिले न दौड़ लगाए ।१०५६। 
भावार्थ : -- अपनी सद्भावना की, मित्रता की सम्पति के भण्डार को जन जन के हाथों में दान देकर फिर चित्त एकात्म होते हैं । मन के घोड़े दौड़ाने से नहीं ॥ 

अर्थात : --"देवालयों की दौड़ लगाने से प्रभु का जोड़ नहीं मिलता,प्रभु का जोड़ भाव से मिलता है" 

आगत सुवागत कर पत, पूज मान बहु दाए । 
आगत के जे करनीय, सोइ गह न मलिनाए ।१०५७। 
भावार्थ : -- आतिथेय का यह कर्त्तव्य है कि वह अतिथि का अतिशय मान सम्मान करे । अतिथि का भी कर्त्तव्य है कि वह अपने आचरणों से अतिथिगृह को गंदा न करे ॥ 

काल का रंग काल है, काल न देइ दिखाए । 
बिषय भोग के चाँदना, काल कहाँ दरसाए ।१०५८। 
भावार्थ : -- काल का रंग काला होता है, वह दिखाई नहीं देता । कारण कि भोग विषयों का चमकारा इतना होता है कि वह कालापन दर्शाने में असमर्थ रहता है ॥ 

पर्बत मुख उन्मुख रहे, चरन धरा के भीत । 
बदरा गगन उड़त फिरी, ते कर भइ पौ जीत ।१०५९। 
भावार्थ : - पर्वत का मुख-मस्तक ऊँचा रहता है, किन्तु उसके चरण धरती में ही धंसे रहते हैं, अत:वायु उसका अहित नहीं कर सकता । बदली आकाश में उड़ती फिरती है, इस कारण वह वायु से जीती जाती है ॥ 

भव सागर ग्रह नख देस, धरती कारावास । 
काटि सकै जोइ बंधन, पावै सोइ निकास ।१०६०। 
भावार्थ : -- इस संसार के ग्रह एवं नक्षत्र राष्ट्र स्वरुप हैं, एवं यह धरती कारावास है । जो इस जीवन-मरण के चक्र को काटने का सामर्थ्यता रखता है, वही यहाँ से छूट सकता है ॥ 




सोमवार, 9 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०३ ॥ -----

तेतक ही मैं निबाहिए, जेतैक सुख प्रभु दाए । 
आपन नीचे देख कै, आगे सोइ अधिकाए ।१०३१। 
भावार्थ : -- जितना ईश्वर ने दिया है उतने सुख में ही निर्वहन कर लेना चाहिए । यदि अपने से नीचे को देखा जाए तो वह सुख भी अधिक लगेगा ॥ 

तासु कौनो खाहीं जौ, कोइ काहु के खाइ । 
ताहि कौनौ खाहीं जौ, कोइ कोउ खा जाइ ।१०३२। 
भावार्थ : -- उसका कोई खाएगा, जो कोई किसी का खाएगा । उसको कोई खाएगा, जो कोई किसी को खाएगा ॥ 

कबीर रहिमन रसखान, फिर तुलसी की बोलि । 
सुर सरित थिरकी अस जस, धरा मेरु धर डोलि ।१०३३। 
भावार्थ : -- कबीर, रहीम, रसखान, फिर तुलसी की अवधी बोली । उसके साथ सुरसरिता ऐसे थिरकी जैसे धरती करधनी धारण किये नृत्य कर रही हो ॥  

पर्बत निचोड़ नदि तरी , छाइ धूप के कोर  । 
रयन निचोड़ ओस ढरी, नयन पलक पट नोर।१०३४। 
भावार्थ : -- उफनती नदियाँ पर्वतों का निचोड़ हैं;छाया, धूप के कोरों(किनारों) का निचोड़ है । ढुलकती ओस, रयनी का निचोड़ है;अश्रु,,नयनों के पलक पट का निचोड़ हैं ॥ 

कलिंद नंदिनि कंज धर, बही चली इतराइ । 
जोई बिंदु कूल लगे, सोई तीस बुझाइ ।१०३५। 
भावार्थ : -- कलिंद नंदिनी यमुना अमृत लेकर इतराती हुई बही चली । जो जल कण तट पर जा लगे केवल उन्होंने ही तृष्णा को शांत किया ॥  

नेम नियामक रचित किए, रुचिकर बारहि बार । 
आगिन पालन कारहीं, तिनहि  होनिहार ।१०३६। 
भावार्थ : -- नियम बनाने वाले, रूचि ले लेकर बार बार नियम तो गढ़े जा रहे है । यह भी ध्यान देने योग्य विषय है कि भविष्य में इन नियमों की पालनकर्त्ता इनकी ही संताने होंगी ॥ 

रघुबर सोंह तापस जुगे,यदूबर सोंह हेम । 
दुहु जग मंगल मूरतें, दुहु सोंह जुगे पेम ।१०३७। 
भावार्थ : -- रघुवर श्री रामचन्द्र  तपस्या /सूर्य से संयोजित हैं यदूवर श्री कृष्ण शीतलता /चंद्रमा से संयोजित हैं अर्थात एक सूर्यवंशी हैं, एक चंद्रवंशी है । दोनों ही संसार का कल्याण करने वाली प्रतिमाएँ हैं, दोनों ही के सह अनुराग संयोजित है ॥ 

साँचे जन जीउते जी, परमम पदवी पाएँ । 
झूठा मरनोपरांत, नीचे ही रहि जाएँ ।१०३८। 
भावार्थ : -- सत्यवादी जीते जी ही परम पद को प्राप्त हो जाते हैं । असत्यवादी मरने के पश्चात भी संसार से नहीं उठते, वे यहीं रह जाते हैं ॥ 

बिरधन के असीर बचन, जूँ बरगद की छाँह । 

वाकी घटनी तब खले, जब बरगद रहि नाह ।१०३९। 
भावार्थ : -- बड़ों के आशीर्वचन,वटवृक्ष की छाया जैसे होते हैं । इनकी न्यूनता तब चुभती है, जब यह वृक्ष नहीं रहते  ॥ 

कुकरम कै सुकरम जौइ, तूरे जगजन भाव । 
जितो धारे ऊँच पीठ, तितौ डारे प्रभाउ ।१०४०। 
भावार्थ : -- कुकर्म हो अथवा सुकर्म हों उन्हें यदि सांसारिक सत्ता से तोला जाए तो जो जितना उच्च पद धारण करता है उसका उतना ही प्रभाव पड़ता है ॥ 

अर्थात : -- यदि आप राष्ट्र प्रमुख होकर कोई कुकर्म या सुकर्म करते हैं, तो उससे न केवल एक राष्ट्र अपितु समूचा विश्व प्रभावित होगा ॥ 

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०२॥ -----

मोहन माखन ना देइ, तो सों लेइ चुराए । 
ऐसी छींकी ना बनी, जँह जा दिए लुकियाए ।१०२१। 
भावार्थ : -- मोहन को अपना मख्खन नहीं दोगे या अपना क्रोध नहीं दोगे.....तो वो चुरा लेगा । ऐसी कोई छींकी बनी ही नहीं है जहां उस मख्खन को छिपाया जा सकता है ॥ 

नभ मैं चमकत चन्द्रमा, बैठा निज अस्थान । 
तमस मैं दिरिस मान रहे , अदरस  रहे बिहान ।१०२२। 
भावार्थ : --  दैदीप्यमान चंद्रमा तो नभ में अपने स्थान पर ही विराजित है । जो अँधेरे में तो दृश्यमान है उजाले में अदृश्य है ॥ 

अर्थात : -- १ )चंद्रमा के सदृश्य ही हमारी त्रुटियां भी हैं जो विलासिता की साधन स्वरूपा के चकाचौंध से अदृश्य रहती हैं । साधनहिन् होने पर ये त्रुटियां दृश्यमान हो जाती हैं ॥ 

२)भारतीय वेद-शास्त्रों एवं पुराणों ने ग्रहों एवं नक्षत्रों की सटीक गणना की हैं, किस साधन से की, यह तो सत्य है कि वर्त्तमान की तुलना में उस समय भाषा अत्यधिक सुसंस्कृत थी तो क्या शब्द साधन से, ध्वनी से, किसी यन्त्र से, किससे ? क्या उस समय की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वे शुद्ध नेत्रों से ही दिखाई देते थे ?क्या रात और भी अधिक श्यामल थी ? फिर क्या हुवा ?रयनी न होती तो हमें चाँद-तारे दिखाई नहीं देते.....

कहत सचिव मैं दास हूँ, बसा जा राउ बास । 
नैनन धूरहि झौंक के, चढ़त फिरै आकास ।१०२३। 
भावार्थ : -- लोकतंत्र का मंत्री-प्रधान मंत्री यह कहता हुवा कि मैं तो जनता का दास हूँ, राजा के निवास में जा बैठा और आँखों में धूल झोकते हुवे अब आकाश में उड़ता फिर रहा है, एतना तो राजा लोग भी नहीं उड़ते थे ई कौन सा तंत्र है भाई ॥ 

काम कलिंजि भाउ चढ़े, सो तो काचा रंग । 
काम घटाए भाउ घटे, जूँ जल घटा प्रसंग ।१०२४। 
भावार्थ : -- काम के आवरण चढ़ा प्रीत का रंग कच्चा होता है । काम के घटते ही यह भी ऐसे घटता है, जैसे जल के घटते ही घटा का रंग घटता है ॥ 

कथन किये बन बाटिका, भाव किये बनराइ । 
सूक्ति ऐसो देस जँह, ज्ञान गंग बहि आइ ।१०२५। 
भावार्थ : -- कथन जहां वन वाटिका है, भाव जहां पेड़-पौध हैं ॥ सूक्ति ऐसा देश है, जहाँ ज्ञान की सुरसरिता प्रवाहित होती है ॥ 

रट्टु तोता रटत रहे, देवत जपनी राम । 
भाव लहे न ज्ञान गहे, सोइ नाम किस काम ।१०२६। 
भावार्थ : -- रट्टू तोते को राम नाम की जपनी दे दो वह उसे ही जपता रहेगा ।  न तो वह उसके भाव समझेगा न ही उस भाव से ज्ञान ग्रहण करेगा ऐसा रटा रटाया राम का नाम किस काम का ॥ 

पुजारी की भगतिहि का, रहत गहत का दान । 
अघहाए की बिरक्ति का, जग माने का मान ।१०२७।  
भावार्थ : -- पुजारी कि केसी भक्ति प्रभु सेवा तो उसका कार्य है, भरे पूरे का दान क्या, देने के पश्चात वह फिर भर लेगा अर्थात भरेपूरे का दान त्याग में है। तृप्त मानस की विरक्ति क्या, जो जग में जानामाना हो उसका मान क्या ॥ 

जनमन तबहि मान रहे, समउ पर मरनि होए । 
बिरधा बढ़नी बैस के, पूछ रहे ना कोए ।१०२८। 
भावार्थ : -- उचित समय पर मृत्यु हो तभी लोगों के मन में सम्मान रहता है । वृद्ध की बढ़ती आयु को फिर पूछने वाला कोई नहीं होता ॥ 

नाउ समंदर डारि दिए, बही बहि जेहिं ओर । 
सारे पंथ भूरी गए, मिला न वाकू छोर ।१०२९। 
भावार्थ : -- नाव तो समुद्र में उतार दी, वह उधर ही बही जिधर की हवा थी ॥ सारे मार्ग फिर भूल पड़े उसे तट नहीं मिला ॥ 

अर्थात : -- नाव उधर जानी चाहिए  जिधर किनारा हो, न की जिधर की हवा हो"

एक दीपक के बारते, सकल भवन उजराए । 
एकै माछरी के होत  , सकल ताल मलिनाए ।१०३०। 
भावार्थ : -- एक दीपक प्रज्वलित होते ही सारे घर में उजाला हो जाता है । एक मछली के होते सारा तालाब मैला हो जाता है ॥ 

अर्थात : -- एक सुसंतान सारे कुल का नाम उज्जवल कर देती है, एक कुसंतान सारे कुल को कलंकित कर देती है ॥ 



मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 118 -----

" राजू ! कल तुम एक 'अंतरतम प्रसंग' लघु रूप में लिख कर लाना ठीक "

राजू : -- मास्टर जी ! अंतरतम प्रसंग किसे कहते हैं ?

" अंतरतम प्रसंग.....हाँ, सुनो : -- हमारी एक भोजाई है उनके पिताजी बड़े पहुंचे हुवे महात्मा हैं । बड़े एवं पहुंचे हुवे इस लिए कि उन्होंने बड़ी बड़ी शल्य क्रियाएँ असफल कर दीं माने की बड़े बड़े आपरेसन फेल कर दिय़े । और इनके इस फेलवर आपरेसन से जो फूल सी मूंगफली हुई उसे खाने के लिए उसके साइज के हमारे सारे काजू तैयार बैठे थे । किन्तु वह बोली मैं दो छिलके वाली( डबल स्टेटस) तुम बिना छिलके वाले( स्टेटस लैस)  छि छि तुम्हारे पेट में कौन जाएगा"

राजू : -- फिर का हुवा.....मास्टर जी !

" फिर का होना है वो चली गई एक छिलके वाले बादाम के साथ"

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०१॥ -----

एक लगन लगे बिनु लगन, एक लगन लग्नाए । 
दुनहु लगे जनिमन जने, सो वो गृहस कहाए ।१०११। 

भावार्थ : -- स्त्री-पुरुष चाहे विवाह बंधन बाँध के साथ रहें चाहे बिना बंधे साथ रहे । बच्चे तो होंगे ही, जनसंख्या तो बढ़ेगी ही । प्राचीन समय में स्त्री पुरुष का परस्पर सम्बंध स्थापित होते ही उसे विवाहित घोषित कर दिया जाता था और वह गृहस्थ कहलाते थे विवाह की रीतियाँ औपचारिकता मात्र है यह स्त्री पुरुष में परस्पर सुसंबंध स्थापित कर सृष्टि को निर्बाध स्वरुप में संचालन करने का अनुज्ञा पत्र है माने कि लाइसेंस है अब कोई गाडी कैसे भी चला ले दुर्घटना तो होबेच करेगी । तो एकल विवाह पद्धति माने : -  एक स्त्री का एक ही पुरुष से एवं एक पुरुष का एक ही स्त्री से सुसंबंध ॥

पालनौ घर घारी कै, बैठा डोरि दुलाए । 
पाए जनमन गोद धरे, कै जननी जन्माए।१०१२। 
भावार्थ : -- ढुंड मैं पालणो घाल कै बैट्ठे डोरी दुलाणो स पुत( संतान)  होवोगो के । घर में संतान या तो गोद लेने से या फिर माता के जन्म देने से होती हैं ॥

अर्थात : --  "कल्पना मात्र से कोई कार्य सिद्ध नहों हो होता, उस हेतु प्रयास भी आवश्यका है"

काम क्रोध मद लोभ मह, कभु न लगन बिलगाउ । 
जे तौ घन छबि छन सौंह, दै गत जा पछिताउ ।१०१३। 
भावार्थ : --  'काम, क्रोध, मान, लोभ जैसे धन का लोभ' के कारण अपने सम्बन्ध न बिगाड़ें । ये सब कारक अज्ञान स्वरुप मेघ की ज्योत सदृश्य है, जो पछतावे के आँसू देकर लौट जाते हैं ॥

जों हरिदै हरि हिय मिले, होत हरित हरियार । 
गहनइ गाँठी मारि कै, दैं सकल न्यौछार ।१०१४। 
भावार्थ : -- अपने ह्रदय से ज्यों ही हरि का ह्रदय मिल जाए फिर हरि के ही रंग में रंगते हुवे पहले एक गहरी गाँठबांधे फिर उनपर अपनी सारी भक्ती न्यौछावर कर दें ॥

सजनी सों ससुराल मैं, साली की अस राछ ।
जस पेम दधि बिलोइ कै, मिलि सनेह सह छाछ ।१०१५ । 
भावार्थ : -- ससुराल में सजनी के साथ साली का मिलना ऐसा है,  जैसे मुहब्बत की मीठी दही बिलोने पर मख्खन के साथ खट्टी छाछ मिलती है किसी किसी को छाछ वेस्ट ( बिशिष्ट,बेस्ट नहीं रे बाबा ) प्रोडक्ट माने की अवशिष्ट उत्पाद लगती  लगती है, बड़ी साली को डेढ़ छाछ भी कहते हैं ॥ 

सृजन सन जे प्रान जोग, जुगे परस्पर बाँध । 
बाँध रहे ना कछु लहे, बरे अगन चढ़ काँध ।१०१६। 
भावार्थ : -- सृष्टि के साथ यह जीवन-योग ( पृथ्वी, अग्नि, वायु , जल, आकाश )  एक आकर्षण के अंतर्गत योगित है । यह आकर्षण जब विकीर्णित हो जाता है  तब कुछ नहीं बचता, कंधे पर चढ़ कर जलना ही शेष रह जाता है ॥ 

मुखिया भगत सरूप है, जन जन भगवन पाँव । 
वाकी सेवा भाव है, मंदिर वाका गाँव ।१०१७ । 
भावार्थ : -- लोकतंत्र का मुखिया भक्त स्वरुपम है, प्रत्येक व्यक्ति भगवान के चरणों के सदृश्य है । उसकी सेवा ही से सत्ता है, भक्ति है, प्रेम है, उसका वास स्थान ही मंदिर है ॥  

जगत जोत,जूँ चंद्रमा, जातक चाव  चकोर । 
आठों जाम मगन रहे, आहोर भूरि बहोर ।१०१८। 
भावार्थ : -- यह जगत की जोत चमकते हुवे चंद्रमा के समान है । जीवों का इसके प्रति आकर्षण चकोर के सदृश्य है । ये चौबीस घंटे इसी में मग्न रहते हैं,यह भूल जाते हैं कि इस जगत में आए हैं तो जाना भी है ॥ 

फिरकी के सोंह फिरत, चित जौंह फेरि फिराए । 
मति खन खूँटे बाँधि कै , फेर धिआन लगाए ।१०१९। 
भावार्थ : -- फिरकी के जैसे फिर कर यह चित्त यदि फेरी फिराता हो , तो इसे मस्तिष्क खंड के खूँटे से बाँध दें तदोपरांत  किसी विषय में ध्यान केंद्रित करें ॥ 

बातन की ओढ़ान लै, चढ़ा बचन के रंग । 
बने सचिव छाँड़ेसि जूँ, केंचुरि तजे भुजंग ।१०२०। 
भावार्थ : -- बातों का आवरण लेके, उसपर वादों का रंग चढ़ा के, लोग जब नेता-मंत्री बनते हैं, तो वह उसे ऐसे छोड़ते हैं जैसे सांप केचुली त्याग रहा हो ॥






----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...