एक प्रिया एक प्रियतम ब्रत, जोगे एकै निबास ।
अलपह असन कछुक बसन, अस घर श्री के बास ।९५१।
भावार्थ : -- एक प्रिया और एक ही प्रियतम का व्रत हो, एक ही निवास योजित करने का नियम हो । अल्पतस भोजन और कुछेक आभरण हो उस घर में सैदव लक्ष्मी का वास होता है, बाक़ी घरों में माया नाचती है ॥
देखु एक नगर धनी की, बड़ी अनोखी दीख ।
भरा पेट बहुरि माँगे, हाथ पसारे भीख ।९५२।
भावार्थ : -- एक नगर के धन्ना सेठ की विचित्र से चरित्र का वित्तचित्र देखो । पेट भरा है, गला भरा है, मुंह भी भरा है,उल्टियाँ हो रही है फिर भी हाथ पसार के भीख मांग रहा है ( भारत को ऐसे ही भिखारियों का देश नहीं कहते) ॥
जोउ जनित जनिते जहाँ, तहाँ मान ना पाए ।
बाहिर सुरसरि बह रही, भीतर घर अन्हाए ।९५३।
भावार्थ : -- जो उत्पाद जहां उत्पन्न होता है, वहाँ उसका सम्मान नहीं होता । गंगा बाहर बहती रही, गंगातट वासी घर के भीतर ही नहाएँ ॥
खाली खाली अन कोष, भरा भरा दिखलाए ।
तिनते राम बचाए जो, धरा खोद के खाए ।९५४।
भावार्थ : -- देश का अन्न कोष रिक्त है और उसे भरा पूरा दिखा रहें है । ऐसे दुर्जनों से तो राम ही बचाए जो धरती खोद के खा रहे हैं ॥
कोइली के खदान जों, निकसे हिरनइ हीर ।
रैन बिहान निकसा तों, दिनमनि धीरहि धीर ।९५५।
भावार्थ : - कोयले की खदान से जैसे बहुमूल्य हीरा निकलता है । रात व्यतीत होते ही वैसे ही धीरे धीरे सूर्य का उदय हुवा ॥
पंगति पंगति डारि कर, पत पत कार कियारि ।
आखर आखर फुर फुरे,पोथी भइ फुरबारि ।९५६।
भावार्थ : -- सारी पंक्तियाँ शाखाएं कारित कर पृष्ठों को क्यारी स्वरुप दिया । जब अक्षर पुष्प स्वरुप में प्रफुल्लित हुवे तब पोथी फुलवारी बन गई ॥
बाती प्यासी ही रहि , लहि न प्रीत का तेल ।
दीप बिजोगित ही रहा, भया न जोतिर मेल । ९५७ ।
भावार्थ : -- बाती प्यासी ही रही उसे प्रीत का सार प्राप्त न हुवा । दीपक भी वियोजित रहा, उनका वह ज्योतिर्मय मिलन दुर्लभ ही हो गया ॥
तहाँ खान पय पान का, जहाँ जान अनजान ।
भए ऐसो जजमान का, किये न आदर मान ।९५८ ।
भावार्थ : -- वहाँ खाना और पीना क्या जहां कोई जान कर भी अनजान बना रहे । फिर ऐसा आतिथ्य किस काम का जहां आपका सम्मान न हो ॥
अर्थात : -- वहाँ का आतिथ्य स्वीकार नहीं करना चाहिए जहां जहां आपको जान कर कोई अनजान बना रहे वहाँ यदि कोई आपका आतिथ्य स्वीकार न करे तो अपना मुग़ल बागीचा उसके भवन में नहीं सजाते ।
औरों के सजे चमन में जश्न नहीं मनाते..,
जब आजाद हिन्द है तो क्यूँ नहीं सजाते.....
मुखिया चित सों चाहिए, होत पीर को अंग ।
बिना भेद भाव किए जो, उपचारे प्रत्यंग ।९५९ ।
भावार्थ : -- मुखिया को चित्त के समान होना चाहिए यदि किसी अंग में पीरा हो तो बिना भे भाव किये जो सभी का का समान उपचार करता है उसी प्रकार मुखिया को राष्ट्र के सभी क्षेत्रों का समान स्वरुप में रखरखाव करना चाहिए ॥
न माँगे भगति सन मान, ना माँगे धनधान ।
तेओ तापस आचरन, माँग रहा भगवान ।९६०।
भावार्थ : -- न भक्ति माँग रहा, न कोई सम्मान माँग रहा, न तेरी धन सम्पदा माँग रहा, न तेरा धान माँग रहा । ये जनता रूपी भगवान तुझसे तेरा तपस् आचरण ( व्रत, नियम, उपासनादि का आचरण और इंद्रियों का निग्रह ) माँग रहा है ॥
"यदि तू किसी को नहीं देगा, तो तेरे को कौन देगा "
अलपह असन कछुक बसन, अस घर श्री के बास ।९५१।
भावार्थ : -- एक प्रिया और एक ही प्रियतम का व्रत हो, एक ही निवास योजित करने का नियम हो । अल्पतस भोजन और कुछेक आभरण हो उस घर में सैदव लक्ष्मी का वास होता है, बाक़ी घरों में माया नाचती है ॥
देखु एक नगर धनी की, बड़ी अनोखी दीख ।
भरा पेट बहुरि माँगे, हाथ पसारे भीख ।९५२।
भावार्थ : -- एक नगर के धन्ना सेठ की विचित्र से चरित्र का वित्तचित्र देखो । पेट भरा है, गला भरा है, मुंह भी भरा है,उल्टियाँ हो रही है फिर भी हाथ पसार के भीख मांग रहा है ( भारत को ऐसे ही भिखारियों का देश नहीं कहते) ॥
जोउ जनित जनिते जहाँ, तहाँ मान ना पाए ।
बाहिर सुरसरि बह रही, भीतर घर अन्हाए ।९५३।
भावार्थ : -- जो उत्पाद जहां उत्पन्न होता है, वहाँ उसका सम्मान नहीं होता । गंगा बाहर बहती रही, गंगातट वासी घर के भीतर ही नहाएँ ॥
खाली खाली अन कोष, भरा भरा दिखलाए ।
तिनते राम बचाए जो, धरा खोद के खाए ।९५४।
भावार्थ : -- देश का अन्न कोष रिक्त है और उसे भरा पूरा दिखा रहें है । ऐसे दुर्जनों से तो राम ही बचाए जो धरती खोद के खा रहे हैं ॥
कोइली के खदान जों, निकसे हिरनइ हीर ।
रैन बिहान निकसा तों, दिनमनि धीरहि धीर ।९५५।
भावार्थ : - कोयले की खदान से जैसे बहुमूल्य हीरा निकलता है । रात व्यतीत होते ही वैसे ही धीरे धीरे सूर्य का उदय हुवा ॥
पंगति पंगति डारि कर, पत पत कार कियारि ।
आखर आखर फुर फुरे,पोथी भइ फुरबारि ।९५६।
भावार्थ : -- सारी पंक्तियाँ शाखाएं कारित कर पृष्ठों को क्यारी स्वरुप दिया । जब अक्षर पुष्प स्वरुप में प्रफुल्लित हुवे तब पोथी फुलवारी बन गई ॥
बाती प्यासी ही रहि , लहि न प्रीत का तेल ।
दीप बिजोगित ही रहा, भया न जोतिर मेल । ९५७ ।
भावार्थ : -- बाती प्यासी ही रही उसे प्रीत का सार प्राप्त न हुवा । दीपक भी वियोजित रहा, उनका वह ज्योतिर्मय मिलन दुर्लभ ही हो गया ॥
तहाँ खान पय पान का, जहाँ जान अनजान ।
भए ऐसो जजमान का, किये न आदर मान ।९५८ ।
भावार्थ : -- वहाँ खाना और पीना क्या जहां कोई जान कर भी अनजान बना रहे । फिर ऐसा आतिथ्य किस काम का जहां आपका सम्मान न हो ॥
अर्थात : -- वहाँ का आतिथ्य स्वीकार नहीं करना चाहिए जहां जहां आपको जान कर कोई अनजान बना रहे वहाँ यदि कोई आपका आतिथ्य स्वीकार न करे तो अपना मुग़ल बागीचा उसके भवन में नहीं सजाते ।
औरों के सजे चमन में जश्न नहीं मनाते..,
जब आजाद हिन्द है तो क्यूँ नहीं सजाते.....
मुखिया चित सों चाहिए, होत पीर को अंग ।
बिना भेद भाव किए जो, उपचारे प्रत्यंग ।९५९ ।
भावार्थ : -- मुखिया को चित्त के समान होना चाहिए यदि किसी अंग में पीरा हो तो बिना भे भाव किये जो सभी का का समान उपचार करता है उसी प्रकार मुखिया को राष्ट्र के सभी क्षेत्रों का समान स्वरुप में रखरखाव करना चाहिए ॥
न माँगे भगति सन मान, ना माँगे धनधान ।
तेओ तापस आचरन, माँग रहा भगवान ।९६०।
भावार्थ : -- न भक्ति माँग रहा, न कोई सम्मान माँग रहा, न तेरी धन सम्पदा माँग रहा, न तेरा धान माँग रहा । ये जनता रूपी भगवान तुझसे तेरा तपस् आचरण ( व्रत, नियम, उपासनादि का आचरण और इंद्रियों का निग्रह ) माँग रहा है ॥
"यदि तू किसी को नहीं देगा, तो तेरे को कौन देगा "
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