दिन मह सांती ना परे, राते नीँद न आए ।
सुख वासे भागा फिरै, जो पिय लाग लगाए ।१००१।
भावार्थ : -- दिन में तो शान्ति नहीं मिलती रात को नींद नहीं आती । उससे सुख दूर दूर भागता है जो प्रीतम से झगड़ा/अनुराग करते हैं ॥
तापस गुन बरनन चली, लिख लिख थकि मसि बिंदु ।
तापस बिनु नहि सोधिते, मानस सुबरन सिंधु ।१००२।
भावार्थ : -- तापस एक बहु अर्थी शब्द है वर्णिका इसके गुण-प्रसंशा करते थक गई पर इसके गुणों का वर्णन न हो सका । तपस्या के बिना मनुष्य, अग्नि के बिना स्वर्ण एवं सूर्य के बिना समुद्र शोधित नहीं होते ॥
जो धन धाम को ललसे, बाजें आठों जाम ।
बैठे चित सांती धरे, जोई पूरन काम ।१००३।
भावार्थ : -- जो विलासिता की साधन स्वरूपा , सत्ता के लालची हैं, वे चौबीस घंटे लड़ते रहते हैं । जो पूर्णकामी होते हैं वह शान्ति से बैठ कर कथा-कोबिता लिखते हैं ॥
जग जन्में जेतक जीउ, सबहि नाथ के अंस ।
फरत निज निज चरित बिटप, सब भव कौनौ बंस ।१००४।
भावार्थ : -- इस संसार में जितने भी प्राणी है सभी उस ईश्वरीय महत्तत्त्व के युग्म हैं ॥ सबका कोई वंश वृक्ष है,अपना अपना वंश इतिहास है, किसी का ज्ञात है किसी का अज्ञात ॥
अर्थात : -- "जाति और धर्म वह कुंजी है जिससे जीवों के उत्पत्ति मूल का अन्वेषण किया जा सकता है" ।
रजस तमस भए सात्विक, पाए जोग गुन ग्राम ।
तपो भूमि बल भयउ निधि, बालमीकि श्रीराम ।१००५ ।
भावार्थ : -- उत्तम वातावरण का प्रसंग प्राप्त कर तामस या राजस भी सात्विक प्रकृति के हो जाते हैं । तपोवन का पवित्र वातावरण प्राप्त कर उसके बल से राजस प्रकृति के राम, तपस्वी श्री राम भगवान हो गए एवं तामस प्रकृति के रत्नाकर, तपस्वी महर्षि वाल्मीकि हो गए ।
अर्थात : -- " वातावरण उत्तम होने से डाकू भी संत हो जाते हैं । और दूषित वातावरण में संत भी डाकू हो जाता है"
दिन के पहरी दिवाकर, रात के पै मयूख ।
जग जगती पहरे काल, नारि पहरे पुरूख ।१००६।
भावार्थ : -- दिन का प्रहरी दिनकर है, रात का चंद्रमा है । घर-संसार का प्रहरी समय है, नारी का प्रहरी पुरुष है ; प्रश्न यह है कि पुरूष किसके पहरे में है ?
भासित बचन निसुबारथ, कहत करन कल्यान ।
तिनके हेतु जग तारन , न कि सहमती अदान ।१००७।
भावार्थ : -- सुभाषित वचन संसार का कल्याण करने के लिए निस्वार्थ स्वरुप कहे जाते हैं । इनका मूल उद्देश्य उद्धार करना होता है, न कि सहमती प्राप्त करना ॥
अर्थात : -- सुभाषित वचन संसार का सत्य दिखाते हैं , सत्य आचरण का विषय है, भाषण का नहीं ॥ यदि किसी सुभाषित वचन से जग का कल्याण होता हो तो वह वचन सोना है,यदि उस वचन से संसार के सह स्वयं का भी कल्याण होता हो तो वह सोने पे सुहागा है । निकृष्ट व्यक्ति केवल स्वयं के कल्याण के लिए जीवित रहता है ॥
बछल नै सुख संपद के, भरे जगत भण्डार ।
भगत का कछु भाग नहीं, घटबइ सेवनहार ।१००८।
भावार्थ : -- ईश्वर ने जगत में सुख कि सम्पदा के भण्डार भर दिए हैं । अब भगत अभागा ही रहा , अवश्य ही सेवा करने वालों ने घटाया है, उन्होंने तेरे भाग्य में डंडी मारी है ॥
अजहुँ तेरे भाग जुगे, सब साधन कल्यान ।
कृत कारज कर जोग ले, पलक होत अवसान ।१००९।
भावार्थ : -- अभी तो तेरे सौभाग्य में कल्याण के सारे साधन जुड़े हैं यह शरीर है, कल्याण करने योग्य युग है, योग्य देश है, काल है, परस्थितियाँ अनुकूल हैं । अत: तू कल्याण कारी कार्य करके पुण्यों का जुगाड़ कर ले अन्यथा यह काया क्षण भर में ही मर जानी है ॥
कह पिय प्रिया लाल बदन, बरती छन छबि जोह ।
छन मैं चमक चमक उठे, छन मैं घन पिछु सोह ।१०१० ।
भावार्थ : -- प्रियतम का कहना है : -- प्रिया के मुख का क्रोध और लज्जा दोनों मेघप्रभा के सदृश्य हैं । जो क्षण में चमक चमक के दर्शित होती है, क्षण में मेघों के पीछे शोभा देती है ॥
सुख वासे भागा फिरै, जो पिय लाग लगाए ।१००१।
भावार्थ : -- दिन में तो शान्ति नहीं मिलती रात को नींद नहीं आती । उससे सुख दूर दूर भागता है जो प्रीतम से झगड़ा/अनुराग करते हैं ॥
तापस गुन बरनन चली, लिख लिख थकि मसि बिंदु ।
तापस बिनु नहि सोधिते, मानस सुबरन सिंधु ।१००२।
भावार्थ : -- तापस एक बहु अर्थी शब्द है वर्णिका इसके गुण-प्रसंशा करते थक गई पर इसके गुणों का वर्णन न हो सका । तपस्या के बिना मनुष्य, अग्नि के बिना स्वर्ण एवं सूर्य के बिना समुद्र शोधित नहीं होते ॥
जो धन धाम को ललसे, बाजें आठों जाम ।
बैठे चित सांती धरे, जोई पूरन काम ।१००३।
भावार्थ : -- जो विलासिता की साधन स्वरूपा , सत्ता के लालची हैं, वे चौबीस घंटे लड़ते रहते हैं । जो पूर्णकामी होते हैं वह शान्ति से बैठ कर कथा-कोबिता लिखते हैं ॥
जग जन्में जेतक जीउ, सबहि नाथ के अंस ।
फरत निज निज चरित बिटप, सब भव कौनौ बंस ।१००४।
भावार्थ : -- इस संसार में जितने भी प्राणी है सभी उस ईश्वरीय महत्तत्त्व के युग्म हैं ॥ सबका कोई वंश वृक्ष है,अपना अपना वंश इतिहास है, किसी का ज्ञात है किसी का अज्ञात ॥
अर्थात : -- "जाति और धर्म वह कुंजी है जिससे जीवों के उत्पत्ति मूल का अन्वेषण किया जा सकता है" ।
रजस तमस भए सात्विक, पाए जोग गुन ग्राम ।
तपो भूमि बल भयउ निधि, बालमीकि श्रीराम ।१००५ ।
भावार्थ : -- उत्तम वातावरण का प्रसंग प्राप्त कर तामस या राजस भी सात्विक प्रकृति के हो जाते हैं । तपोवन का पवित्र वातावरण प्राप्त कर उसके बल से राजस प्रकृति के राम, तपस्वी श्री राम भगवान हो गए एवं तामस प्रकृति के रत्नाकर, तपस्वी महर्षि वाल्मीकि हो गए ।
अर्थात : -- " वातावरण उत्तम होने से डाकू भी संत हो जाते हैं । और दूषित वातावरण में संत भी डाकू हो जाता है"
दिन के पहरी दिवाकर, रात के पै मयूख ।
जग जगती पहरे काल, नारि पहरे पुरूख ।१००६।
भावार्थ : -- दिन का प्रहरी दिनकर है, रात का चंद्रमा है । घर-संसार का प्रहरी समय है, नारी का प्रहरी पुरुष है ; प्रश्न यह है कि पुरूष किसके पहरे में है ?
भासित बचन निसुबारथ, कहत करन कल्यान ।
तिनके हेतु जग तारन , न कि सहमती अदान ।१००७।
भावार्थ : -- सुभाषित वचन संसार का कल्याण करने के लिए निस्वार्थ स्वरुप कहे जाते हैं । इनका मूल उद्देश्य उद्धार करना होता है, न कि सहमती प्राप्त करना ॥
अर्थात : -- सुभाषित वचन संसार का सत्य दिखाते हैं , सत्य आचरण का विषय है, भाषण का नहीं ॥ यदि किसी सुभाषित वचन से जग का कल्याण होता हो तो वह वचन सोना है,यदि उस वचन से संसार के सह स्वयं का भी कल्याण होता हो तो वह सोने पे सुहागा है । निकृष्ट व्यक्ति केवल स्वयं के कल्याण के लिए जीवित रहता है ॥
बछल नै सुख संपद के, भरे जगत भण्डार ।
भगत का कछु भाग नहीं, घटबइ सेवनहार ।१००८।
भावार्थ : -- ईश्वर ने जगत में सुख कि सम्पदा के भण्डार भर दिए हैं । अब भगत अभागा ही रहा , अवश्य ही सेवा करने वालों ने घटाया है, उन्होंने तेरे भाग्य में डंडी मारी है ॥
अजहुँ तेरे भाग जुगे, सब साधन कल्यान ।
कृत कारज कर जोग ले, पलक होत अवसान ।१००९।
भावार्थ : -- अभी तो तेरे सौभाग्य में कल्याण के सारे साधन जुड़े हैं यह शरीर है, कल्याण करने योग्य युग है, योग्य देश है, काल है, परस्थितियाँ अनुकूल हैं । अत: तू कल्याण कारी कार्य करके पुण्यों का जुगाड़ कर ले अन्यथा यह काया क्षण भर में ही मर जानी है ॥
कह पिय प्रिया लाल बदन, बरती छन छबि जोह ।
छन मैं चमक चमक उठे, छन मैं घन पिछु सोह ।१०१० ।
भावार्थ : -- प्रियतम का कहना है : -- प्रिया के मुख का क्रोध और लज्जा दोनों मेघप्रभा के सदृश्य हैं । जो क्षण में चमक चमक के दर्शित होती है, क्षण में मेघों के पीछे शोभा देती है ॥
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