शनिवार, 23 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम९९ ॥ -----

बिय बोत क्यारि क्यारि, जब लग मिलै सिँचाइँ । 
फुरत फरत जे फुरबारि, तब लग फर फुर दाइँ ।९९१। 
भावार्थ : -- क्यारियों में बीज बोई हुई इस फुलवारी को जब तक सिचाईं मिलेगी । यह तब तक ही फूलेगी फलेगी और फलफूल देगी ॥ 

एक गुनित एक फल एक ही, दो जग ओ फल चार । 
ऐसोइ अंरात्मनम , माने सब संसार ।९९२ । 
भावार्थ : -- एक गुणित एक = एक होता है, दो+दो =चार होता है,  जैसे यह सर्वमान्य है । वैसे ही यह अंतरात्मा भी सर्वमान्य है ॥ 

जाने जनमन पाहिले, अरु मरि के पश्चात । 
सोइ करे न एतिकेत, न एतिक नीच निपात।९९३ । 
एतिक = इतना 
एत = पाप 
भावार्थ : -- जो अपने जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के पश्चात की गति जान ले । फिर वह न तो इतने पाप करे, न ही इतना नीचे गिरे ॥ 

मुखिया अगजग की गति, जानपन निज नियंत । 
मति भइ वाकी भाँवरी, अरु मान के न अंत ।९९४ ।  
भावार्थ : -- यह मुखिया स्वयं को समस्त चराचर की गति का नियंता समझ रहा है । इसकी मति भ्रमित हो गई है, इसके घमंड का ठिकाना नहीं (ये सारे रावण के लक्षण हैं )। 

बुढ़ताई अरु जुबता, केस रंगे न होइ । 
एक बयोगत हानि होत, दुजी बै संधि जोइ ।९९५ । 
भावार्थ : -- बुढ़ापा और युवता अर्थात अनुभव एवं ज्ञान , केस रंगने से प्राप्त नहीं होता ॥ एक समय व्यतीत करने से दुसरा बाल्य एवं तारुण्य काल के संग्रहण से अर्थात पठन -पाठन से प्राप्त होता है ॥ 

बिचार भया अंतरतम, काया भई कहाउ । 
भाव वाकी जाति भई, सार वाका सुभाउ ।९९६ । 
भावार्थ : -- यदि विचार आत्मा है तो शब्दोक्ति काया है । भाव उसका उत्पत्ति स्थान है, और सार उसका धर्म है ॥

अन महातम का जाने, जो ना देखा भूख । 
गहनी तमि के पीर को, भाने न प्रत्यूख ।९९७ । 
भावार्थ : -- जिस प्रकार गहरी रात्रि की पीड़ा को प्रभात नहीं जानता । उसी पकार जिसने भूख न देखी हो उसे अन्न के महात्मय का ज्ञान नहीं होता ॥ 

मानख निसदिन पंच बन , करता फिरै न्याय । 
तेरे कारे करम को  , कहू कहाँ निर्नाएँ ।९९८। 
भावार्थ : -- रे मनुष्य ! दूसरों का न्याय करते हुवे तू बड़ा न्यायाधीश बना फिरता है । ये बता जो तेरे पापकर्म हैं उसका निर्णय कहाँ हो ॥

अंतर सौर भँवर बहिर, दोइ बयस मैं जाए । 
बुद्धि बल सों आपनी, भा निज प्राण सिराए ।९९९। 
भावार्थ : -- यह अंतरात्मा सौर मंडल की परिधि से दो ही अवस्था में बहिर्गमन करती है । या तो अपने बुद्धि के बल पर या फिर देहावसान होने पर ॥ 

तेरे चरन सौर भँवर, बहिर गमन किए जोह । 
रे मानव होहि जाने, कस कस सत तव सोंह ।१०००। 
भावार्थ : -- हे मानव ! जब तेरे चरण, सौर मंडल की परिधि से बहिर्गमन करेंगे तब जाने कैसे कैसे सत्य तेरे सम्मुख होंगे ॥ 




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