बिय बोत क्यारि क्यारि, जब लग मिलै सिँचाइँ ।
फुरत फरत जे फुरबारि, तब लग फर फुर दाइँ ।९९१।
भावार्थ : -- क्यारियों में बीज बोई हुई इस फुलवारी को जब तक सिचाईं मिलेगी । यह तब तक ही फूलेगी फलेगी और फलफूल देगी ॥
एक गुनित एक फल एक ही, दो जग ओ फल चार ।
ऐसोइ अंरात्मनम , माने सब संसार ।९९२ ।
भावार्थ : -- एक गुणित एक = एक होता है, दो+दो =चार होता है, जैसे यह सर्वमान्य है । वैसे ही यह अंतरात्मा भी सर्वमान्य है ॥
जाने जनमन पाहिले, अरु मरि के पश्चात ।
सोइ करे न एतिकेत, न एतिक नीच निपात।९९३ ।
एतिक = इतना
एत = पाप
भावार्थ : -- जो अपने जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के पश्चात की गति जान ले । फिर वह न तो इतने पाप करे, न ही इतना नीचे गिरे ॥
मुखिया अगजग की गति, जानपन निज नियंत ।
मति भइ वाकी भाँवरी, अरु मान के न अंत ।९९४ ।
भावार्थ : -- यह मुखिया स्वयं को समस्त चराचर की गति का नियंता समझ रहा है । इसकी मति भ्रमित हो गई है, इसके घमंड का ठिकाना नहीं (ये सारे रावण के लक्षण हैं )।
बुढ़ताई अरु जुबता, केस रंगे न होइ ।
एक बयोगत हानि होत, दुजी बै संधि जोइ ।९९५ ।
भावार्थ : -- बुढ़ापा और युवता अर्थात अनुभव एवं ज्ञान , केस रंगने से प्राप्त नहीं होता ॥ एक समय व्यतीत करने से दुसरा बाल्य एवं तारुण्य काल के संग्रहण से अर्थात पठन -पाठन से प्राप्त होता है ॥
बिचार भया अंतरतम, काया भई कहाउ ।
भाव वाकी जाति भई, सार वाका सुभाउ ।९९६ ।
भावार्थ : -- यदि विचार आत्मा है तो शब्दोक्ति काया है । भाव उसका उत्पत्ति स्थान है, और सार उसका धर्म है ॥
अन महातम का जाने, जो ना देखा भूख ।
गहनी तमि के पीर को, भाने न प्रत्यूख ।९९७ ।
भावार्थ : -- जिस प्रकार गहरी रात्रि की पीड़ा को प्रभात नहीं जानता । उसी पकार जिसने भूख न देखी हो उसे अन्न के महात्मय का ज्ञान नहीं होता ॥
मानख निसदिन पंच बन , करता फिरै न्याय ।
तेरे कारे करम को , कहू कहाँ निर्नाएँ ।९९८।
भावार्थ : -- रे मनुष्य ! दूसरों का न्याय करते हुवे तू बड़ा न्यायाधीश बना फिरता है । ये बता जो तेरे पापकर्म हैं उसका निर्णय कहाँ हो ॥
अंतर सौर भँवर बहिर, दोइ बयस मैं जाए ।
बुद्धि बल सों आपनी, भा निज प्राण सिराए ।९९९।
भावार्थ : -- यह अंतरात्मा सौर मंडल की परिधि से दो ही अवस्था में बहिर्गमन करती है । या तो अपने बुद्धि के बल पर या फिर देहावसान होने पर ॥
तेरे चरन सौर भँवर, बहिर गमन किए जोह ।
रे मानव होहि जाने, कस कस सत तव सोंह ।१०००।
भावार्थ : -- हे मानव ! जब तेरे चरण, सौर मंडल की परिधि से बहिर्गमन करेंगे तब जाने कैसे कैसे सत्य तेरे सम्मुख होंगे ॥
फुरत फरत जे फुरबारि, तब लग फर फुर दाइँ ।९९१।
भावार्थ : -- क्यारियों में बीज बोई हुई इस फुलवारी को जब तक सिचाईं मिलेगी । यह तब तक ही फूलेगी फलेगी और फलफूल देगी ॥
एक गुनित एक फल एक ही, दो जग ओ फल चार ।
ऐसोइ अंरात्मनम , माने सब संसार ।९९२ ।
भावार्थ : -- एक गुणित एक = एक होता है, दो+दो =चार होता है, जैसे यह सर्वमान्य है । वैसे ही यह अंतरात्मा भी सर्वमान्य है ॥
जाने जनमन पाहिले, अरु मरि के पश्चात ।
सोइ करे न एतिकेत, न एतिक नीच निपात।९९३ ।
एतिक = इतना
एत = पाप
भावार्थ : -- जो अपने जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के पश्चात की गति जान ले । फिर वह न तो इतने पाप करे, न ही इतना नीचे गिरे ॥
मुखिया अगजग की गति, जानपन निज नियंत ।
मति भइ वाकी भाँवरी, अरु मान के न अंत ।९९४ ।
भावार्थ : -- यह मुखिया स्वयं को समस्त चराचर की गति का नियंता समझ रहा है । इसकी मति भ्रमित हो गई है, इसके घमंड का ठिकाना नहीं (ये सारे रावण के लक्षण हैं )।
बुढ़ताई अरु जुबता, केस रंगे न होइ ।
एक बयोगत हानि होत, दुजी बै संधि जोइ ।९९५ ।
भावार्थ : -- बुढ़ापा और युवता अर्थात अनुभव एवं ज्ञान , केस रंगने से प्राप्त नहीं होता ॥ एक समय व्यतीत करने से दुसरा बाल्य एवं तारुण्य काल के संग्रहण से अर्थात पठन -पाठन से प्राप्त होता है ॥
बिचार भया अंतरतम, काया भई कहाउ ।
भाव वाकी जाति भई, सार वाका सुभाउ ।९९६ ।
भावार्थ : -- यदि विचार आत्मा है तो शब्दोक्ति काया है । भाव उसका उत्पत्ति स्थान है, और सार उसका धर्म है ॥
अन महातम का जाने, जो ना देखा भूख ।
गहनी तमि के पीर को, भाने न प्रत्यूख ।९९७ ।
भावार्थ : -- जिस प्रकार गहरी रात्रि की पीड़ा को प्रभात नहीं जानता । उसी पकार जिसने भूख न देखी हो उसे अन्न के महात्मय का ज्ञान नहीं होता ॥
मानख निसदिन पंच बन , करता फिरै न्याय ।
तेरे कारे करम को , कहू कहाँ निर्नाएँ ।९९८।
भावार्थ : -- रे मनुष्य ! दूसरों का न्याय करते हुवे तू बड़ा न्यायाधीश बना फिरता है । ये बता जो तेरे पापकर्म हैं उसका निर्णय कहाँ हो ॥
अंतर सौर भँवर बहिर, दोइ बयस मैं जाए ।
बुद्धि बल सों आपनी, भा निज प्राण सिराए ।९९९।
भावार्थ : -- यह अंतरात्मा सौर मंडल की परिधि से दो ही अवस्था में बहिर्गमन करती है । या तो अपने बुद्धि के बल पर या फिर देहावसान होने पर ॥
तेरे चरन सौर भँवर, बहिर गमन किए जोह ।
रे मानव होहि जाने, कस कस सत तव सोंह ।१०००।
भावार्थ : -- हे मानव ! जब तेरे चरण, सौर मंडल की परिधि से बहिर्गमन करेंगे तब जाने कैसे कैसे सत्य तेरे सम्मुख होंगे ॥
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