मित रिपु के बल बुद्धि को, सागर के सम लेख ।
वासे पारन पावनै, अपनी जुगता देख ।९८१।
भावार्थ : -- मित्र हो या शत्रु हो उसका बल एवं विद्वत्ता को लघुत्तम नहीं आंकना चाहिए, अपितु उसे समुद्र के सरिस विशाल समझ कर फिर उससे पार पावन हेतु अपनी योग्यता का आंकलन करना चाहिए । तैरना आए तो तैर कर उड़ना आए तो उड़ कर अन्यथा ? सेतु बाँध कर उससे पार पाया जा सकता है ॥
कोकिल एकै कू कूकिए , हेरत फिरै मुढ़ान ।
बारम्बार कू कू किए, लोग दिए ना ध्यान ।९८२।
भावार्थ : -- कोयल के एक कू कूकने से लोग उसे मुंडेरों पर ढूंडते फिरते हैं । किन्तु जब वह वारंवार कूकती फिरती है तो कोई ध्यान नहीं देता ॥
गुरुबर के परसन सीस, सोन भया ना जोह ।
भा गुरु नाहीं पारसा, भा सीस नहीं लोह ।९८३।
भावार्थ : -- गुरुवार के स्पर्श से यदि शिष्य स्वर्ण नहीं हुवा, तो इसका अर्थ यह है कि या तो वह गुरु पारस नहीं या शिष्य लोहा नहीं ॥
जेतक पातक जोग लिए, तिन गठरी दे आँट ।
पाए औसर नौ पुन कर, देखत देहरि बाट ।९८४।
भावार्थ : -- जितने भी पाप संचित किए सो किए, अब उन्हें एक गठरी में बाँधते हुवे प्रतीक्षारत होकर अवसर पाते ही नए पुण्य करने चाहिए, जिससे विश्व का कल्याण हो ॥
हरिन धरा हरियर करे, सूर करे उजियार ।
सकल जीव जगती के, मानख पालनहार ।९८५।
भावार्थ : -- जगत नियंता ने सभी को अपने अपने कर्त्तव्य सौप रखे हैं, जैसे हरियाली धरती को हरी-भरी करे, सूर्य उसमें उजाला भरे, और इस समस्त सृष्टी की मानव रक्षा करे, भक्षक बनकर इसका नाश न करे ॥
जीवन मैं जब आपदा, कंठ फांस हो जाए ।
कै तिन्ह कंठ लिए फिरौ, कै चलौ सुरीझाए ।९८६।
भावार्थ : -- जीवन के पथ पर संचरण करते हुवे विपत्तियां तो आएंगी ही, जब इतनी हो जाए कि गले की फांस लगने लगे फिर या तो उन्हें लिए फिरो, या उन्हें सुलझाते चलो ॥
मागु मागु परिहार कै, धरें मुख देहुँ देहुँ ।
जिनके दिए जग उद्धरे, तिनके सकल सनेहु ।९८७।
भावार्थ : -- भिक्षा वृत्ति का त्याग कर दानी की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए । जिनके दान से संसार का उद्धरण होता है उनके सभी स्नेही हो जाते हैं ॥
जेन केन प्रकार देन, तुलसी हो कल्यान ।
जब दिए जगत अहित करे, तब बर होत अदान ।९८८।
भावार्थ : -- गोस्वामी तुलसी दास ने कहा है : -- जिस किसी भी प्रकार से दिया जाए, दान कल्याण कारी होता है । किन्तु जब यह दान संसार हेतु का अहित कर हो, तब न देना ही उत्तम है ॥
गुरु के सदगुन गहे नहिं, लहे नहिं गुरु ग्यान ।
रंगे भेस केस रखे, सो तो भूत समान ।९८९ ।
भावार्थ : -- न तो गुरु के सगुन ग्रहण किये, न उनसे ज्ञान ही प्राप्त किया । कोई चुटिया रखे है, कोई एक धोतनी लपेट कर महात्मा बन गया है किसी ने कपडे भगवा कर लिए ये सारे कपट वेश धारी शिष्य न होकर भूत के समान हैं ॥
लम्मा धोता लम्मा पोथ, लम्मा तिलक लगाए ।
बिलास भवन बास करे, कपट भेस कहलाए ।९९०।
भावार्थ : -- लम्बी तो धोती पहन ली, लम्बी पोथी धर ली, लंबा सा एक तिलक लगा लिया । विलासिता के भवन में वास किये ऐसे लोग पाखंडी कहलाते हैं ॥
वासे पारन पावनै, अपनी जुगता देख ।९८१।
भावार्थ : -- मित्र हो या शत्रु हो उसका बल एवं विद्वत्ता को लघुत्तम नहीं आंकना चाहिए, अपितु उसे समुद्र के सरिस विशाल समझ कर फिर उससे पार पावन हेतु अपनी योग्यता का आंकलन करना चाहिए । तैरना आए तो तैर कर उड़ना आए तो उड़ कर अन्यथा ? सेतु बाँध कर उससे पार पाया जा सकता है ॥
कोकिल एकै कू कूकिए , हेरत फिरै मुढ़ान ।
बारम्बार कू कू किए, लोग दिए ना ध्यान ।९८२।
भावार्थ : -- कोयल के एक कू कूकने से लोग उसे मुंडेरों पर ढूंडते फिरते हैं । किन्तु जब वह वारंवार कूकती फिरती है तो कोई ध्यान नहीं देता ॥
गुरुबर के परसन सीस, सोन भया ना जोह ।
भा गुरु नाहीं पारसा, भा सीस नहीं लोह ।९८३।
भावार्थ : -- गुरुवार के स्पर्श से यदि शिष्य स्वर्ण नहीं हुवा, तो इसका अर्थ यह है कि या तो वह गुरु पारस नहीं या शिष्य लोहा नहीं ॥
जेतक पातक जोग लिए, तिन गठरी दे आँट ।
पाए औसर नौ पुन कर, देखत देहरि बाट ।९८४।
भावार्थ : -- जितने भी पाप संचित किए सो किए, अब उन्हें एक गठरी में बाँधते हुवे प्रतीक्षारत होकर अवसर पाते ही नए पुण्य करने चाहिए, जिससे विश्व का कल्याण हो ॥
हरिन धरा हरियर करे, सूर करे उजियार ।
सकल जीव जगती के, मानख पालनहार ।९८५।
भावार्थ : -- जगत नियंता ने सभी को अपने अपने कर्त्तव्य सौप रखे हैं, जैसे हरियाली धरती को हरी-भरी करे, सूर्य उसमें उजाला भरे, और इस समस्त सृष्टी की मानव रक्षा करे, भक्षक बनकर इसका नाश न करे ॥
जीवन मैं जब आपदा, कंठ फांस हो जाए ।
कै तिन्ह कंठ लिए फिरौ, कै चलौ सुरीझाए ।९८६।
भावार्थ : -- जीवन के पथ पर संचरण करते हुवे विपत्तियां तो आएंगी ही, जब इतनी हो जाए कि गले की फांस लगने लगे फिर या तो उन्हें लिए फिरो, या उन्हें सुलझाते चलो ॥
मागु मागु परिहार कै, धरें मुख देहुँ देहुँ ।
जिनके दिए जग उद्धरे, तिनके सकल सनेहु ।९८७।
भावार्थ : -- भिक्षा वृत्ति का त्याग कर दानी की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए । जिनके दान से संसार का उद्धरण होता है उनके सभी स्नेही हो जाते हैं ॥
जेन केन प्रकार देन, तुलसी हो कल्यान ।
जब दिए जगत अहित करे, तब बर होत अदान ।९८८।
भावार्थ : -- गोस्वामी तुलसी दास ने कहा है : -- जिस किसी भी प्रकार से दिया जाए, दान कल्याण कारी होता है । किन्तु जब यह दान संसार हेतु का अहित कर हो, तब न देना ही उत्तम है ॥
गुरु के सदगुन गहे नहिं, लहे नहिं गुरु ग्यान ।
रंगे भेस केस रखे, सो तो भूत समान ।९८९ ।
भावार्थ : -- न तो गुरु के सगुन ग्रहण किये, न उनसे ज्ञान ही प्राप्त किया । कोई चुटिया रखे है, कोई एक धोतनी लपेट कर महात्मा बन गया है किसी ने कपडे भगवा कर लिए ये सारे कपट वेश धारी शिष्य न होकर भूत के समान हैं ॥
लम्मा धोता लम्मा पोथ, लम्मा तिलक लगाए ।
बिलास भवन बास करे, कपट भेस कहलाए ।९९०।
भावार्थ : -- लम्बी तो धोती पहन ली, लम्बी पोथी धर ली, लंबा सा एक तिलक लगा लिया । विलासिता के भवन में वास किये ऐसे लोग पाखंडी कहलाते हैं ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें