शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९ ७ ॥ -----

कलजुगी कुटुंब कहान, जूँ पीपर के मूर । 
घर घर भित्ति फोरी के, निकसी गवनै दूर ।९७१।   
भावार्थ : -- कलयुगी कुटुंब की कहानी ऐसी है, जैसे की पीपल-जड़ की कथा हो ॥ जो घर घर के भित्तियों को फोड़ कर दूर फैली हुई है ॥

जीवन पंथ मरन पँवर, भयऊ साँच बिहान । 
जनमन सौ ओहार है, मरनी के न ओढ़ान ।९७२। 
भावार्थ : -- जीवन पंथ में मृत्यु की दहलीज अंतिम सत्य है । जन्म के सौ द्वारावरण हैं (अर्थात सौ झूठ हैं) , किन्तु मृत्यु का कोई आवरण नहीं है ॥

बरता सूरज साँच है, वासे पीठ फिराए । 
तामस गुण के गान किए, असत अँधेर घिराए ।९७३। 
भावार्थ : -- जलता हुवा सूर्य परम सत्य है । उससे पीठ फेर लेने से फिर अज्ञान और आलस्य रूपी दुर्गुणों का बखान करते हुवे असत्य का अंधेरा घेर लेता है ॥

एक दया अरु एक किरपा, दोनउ दिरिस समान । 
एक धर्म चरन संजुगी, दूजी जोगे दान ।९७४। 
भावार्थ : -- दया और कृपा एक समरूप दृष्टिगत होती है । दया धर्म के आचरणों से संयोजित है।जबकि कृपा, दान की प्रतीक्षा करती वियोजित है॥

तासु संजोइँ होइँ बर, जे भा मन प्रत्येक । 
जाकी जोइँ जोग जुगी, सोई भई प्रबेक।९७५। 
भावार्थ : -- प्रत्येक व्यक्ति का मन यह चाहता है कि, उसका सभी कुछ श्रेष्ठ हों । किन्तु जो कुछ उपयुक्त होते हुवे योग्य होता है, वही उत्तम है ॥

निसवारथ को बचन कह, सो तो भयऊ साँच । 
जब हितेच्छा हेतु लह, बहोरि सौचहु राँच ।९७६। 
भावार्थ : -- निस्वार्थ स्वरुप में कोई कथन किया जाए,  तब वह सत्य का रूप ले लेता है । जब उसका उद्देश्य मंगलाकांक्षी होकर परहितकारी हो फिर वह शुद्धता से भी अनुरक्त हो जाता है ॥

सीप मुख जल मुकुति भया, साँप मुख बिषकार । 
जाके जैसी भावना, तैसेहिं करि बिचार ।९७७। 
भावार्थ : -- सीप के मुख जल मुक्ता स्वरुप हो जाता है और सर्प के मुख में वही जल विष का रूप ले लेता है । जिसकी जैसी भावना होती है वह वैसे ही विचार करता है ॥ 

अर्थात : -- "शब्द एकरूप है, किन्तु स्वभाव की भिन्नता के कारण विचार भिन्न हो जाते हैं "

अस्थिहि माँस सोंह ढके, माँस ढकाईं चाम । 
मति ढके क्रोध मद लोभ,ज्ञान को मनोकाम ।९७८। 
भावार्थ : -- अस्थियाँ  माँस से ढकी है,माँस चर्म से ढँका है । बुद्धि को क्रोध मद और लोभ ढके हैं, ज्ञान मन की कामनाओं से ढका है ।। 

सत्ता के सुख साँस की, आँच लेख ना पाए । 
जाननी की बरती चिता, सोंह खिंच लिए जाए ।९७९ । 
भावार्थ : -- सत्ता के सुख कारी सांस की आंच का वर्णन नहीं हो सकता । यह ऐसी कसूती है कि सम्मुख माता की चिता जल रही और यह खिंच कर ले जाती है, अर्थात यह माँ जैसे पवित्र शब्द का भी लिहाज नहीं करती ॥ 

एक लगन को लाग कहें, एक लगन कहें लाग । 
एक जगाए जगती जोत, दूजी लगाए आग ।९८०। 
भावार्थ : -- एक लगन को प्रेमलगन कहते हैं एक लगन को वैराग्नी कहते हैं ॥ एक घर-संसार ज्योतिर्मय कर देती है, दूजी उसमें आग लगा देती है 

  

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