सोमवार, 11 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९६ ॥ -----

सून के नाहि मान को, सून के न को मोल  । 
पर जिन्ह अंक जा जुगे, वा सो ना को तोल ।९६१।
भावार्थ : -- शून्य/आकाश//ईश्वर का कोई मान नहीं होता, शून्य का कोई मूल्य भी नहीं होता । किन्तु जब यह किसी अंक के साथ संलग्न हो जाता है, तब फिर उस अंक का कोई तोल नही होता ॥  

जब लग बिटप लगी रहे, तब लग रसन समोए । 
काची काची इमराइ, मीठी ऐसे होए ।९६२ । 
भावार्थ : -- जब तक पेड़ में लगी रहती है,  तब तक वह रस ग्रहण करती है । कच्ची कच्ची इमली, पककर ऐसे मीठी होती है ॥ 

अर्थात : -- "जीवन सोपान सभी पथ तय करके ही परिपक्वता आती है" 

सोइ पुनि पुरुख कहाँ गए, कौन दिसा गहियाए । 
का तिन धरती लील गइ, समउ सकेरत खाए ।९६३। 
भावार्थ : -- जो संसार का कल्याण करने हेतु उत्पन्न हुवे थे वे पुण्यात्माएँ  कहाँ गई क्या उन्हें धरती लील गई या समय संकलित कर खा गया ॥ 

बुरे लोग के समुदाए, चारिन करत बढ़ाइ । 
आपस माह रन छेड़ के, लरत भिरत मरि जाइ ।९६४। 
भावार्थ : -- दुर्जनों के समुदाए में चार लोगों की प्रशंसा कर दो । फिर तो उनमें युद्ध छिड़ जाएगा और वे आपस में ही लड़ भीड़ के मर जाएंगें ॥ 

तीन लोक की सम्पदा चाहे लरत भिराए । 
लाभ लबध कीर्ति सोंह, लोभ न जीता जाए ।९६५। 
भावार्थ : --लाभ लब्ध कीर्ति के सह लोभ के साथ चाहे तीन लोक की सम्पदा क्यों न लड़ भिड़े वह उससे नहीं जित सकती ॥ 

पद पद जनता जनार्दन, भुगत बहु ब्यभिचार । 
सासन अरु प्रसासन को, देईं बहुसहि गार ।९६६। 
भावार्थ : -- प्रतयेक स्थान की जनता जो कि जनार्दन है बहुंत ही व्यभिचार भुगत ली । अब वह शासन और प्रशासन को दुर्वादन प्रेषित कर रही है ॥ 

तामस गुन के गान किए, बिरित गई तम रात । 
गगन उयत नउ भानु कहि, सीखौ नइ नइ बात ।९६७। 
भावार्थ : -- अज्ञान आलस्य क्रोध रूपी दुर्गुणों का गान कर, गहन अंधेरी यामिनी व्यतीत हो गई । गगन में उगता हुवा नया सूर्य कह रहा अब नई नई बातें सीखो ॥ 

रसरी रसन कबिजन दिए, भाँति भाँति के मान । 
एक कहें रसबत मिसरी, दूजे सर्प समान ।९६८। 
भावार्थ : -- श्रेष्ठ कवि जनों ने जिह्वा की रस्सी को विभिन्न प्रकार की उपमाओं से सुशोभित किया है । एक को रसवंत मिश्री के भीतर की रस्सी कहा, दूजी को सांप के समरूप ही कह दिया ॥

कंकन किंकिनि कनक कन, फूट कियारि कियारि । 
दरसत अवनि आभूषन, जस सम्पद उपकारि ।९६९। 
भावार्थ : -- कंगन और करधन के स्वर्ण के अन्न कण खेतों की क्यारियों में प्रस्फुटित हुवे । धरती के ये आभूषण ऐसे दर्श रहे हैं,  जैसे ये किसी उपकारी की संपत्ति हो ॥

अनजल सुमति बरधइँ अति, सही उन्नति  कहाहिं । 
जाकी रहि जन चरन रति, वा सोंह भगति नाहिं ।९७०। 
भावार्थ : -- अन्न,जल के कोष में अतिशय वृद्धि, सुभाषित एवं उसकी उत्कृष्ठता की वृद्धि ही वास्तविक प्रगती कहलाती है । प्राणी जनों के चरणों में अनुरक्ति (मंदीर-मूर्ति बनाने में नहीं) के सदृश्य भक्ति नहीं ।। 










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