कर श्रम जुगत पाँउँ चरत, उदर अलपतर खाए ।
चेतत चित जागत चितब, मुख सोहत मुसुकाए ।९४१।
भावार्थ : -- हाथ श्रम करते हुवे, पाँव चलते हुवे और पेट थोड़े से थोड़ा खाते हुवे शोभित होता है, आँख में जागृति, चित्त में चेतना हो तभी मुख पर मुस्कान सुशोभित होती है ।।
मोती मानिक कनिक सों, हंस हिरन के तोल ।
आगिन आगिन धान कन, मिलहीं वाके मोल ।९४२।
भावार्थ : -- अल्प उत्पादन के कारण, आगे आगे अनाज मोती माणिक्य के कण और सोने चांदी के तोल जैसे उन्हीं के मूल्य में मिलने लगेगा (अभी जो मुद्रा में उपलब्ध है) ॥
पौर पंगत लगे रहे, करधन धरे पिरान ।
ले दे मंदर भीत भए, सोए मिले भगवान ।९४३।
भावार्थ : -- गोपुर में पंक्ति बद्ध रहे, करधन में पीरा होने लगी । फिर ले दे के मन्दिर भीतर हुवे तो देखा भगवान तो सो रहे रहे हैं ॥
अर्थात : -- ईश्वर के प्रति श्रद्धा ईश्वर की नियमावली में ही होने चाहिए, ले दे के नहीं.....
मूक हुँत बानी ब्यर्थ, अंधे दर्पन बान ।
बहरे हुँत सुर संगीत, मूढ़ हुँत ज्ञानवान ।९४४।
भावार्थ : -- गूंगे के लिए वाणी व्यर्थ है, अंधे दर्पण अर्थात दृष्टी हीन के लिए बनाव श्रृंगार व्यर्थ है । बधीर के लिए सुर और संगीत व्यर्थ है उसी प्रकार मूर्ख के लिए ग्यानी व्यर्थ है ॥
ऊँच अटारि कनक कलस, मनि मंजरी सँजोए।
मुँह माँगे मोल लेउ, कहीं अमरता होए ।९४५।
भावार्थ : -- भवन अट्टालिका तो बहुंत ऊंची गढ़ लिए, रत्नों की पंक्तियों से सजा ली । यदि अमरता कही पर मिलाती हो तो उसे मुंह मांगे मोल में ले लेना चाहिए क्योंकि मृत्योपरांत सब यहीं रह जाने वाला है ॥
मात-पिता सैम पूज नहि, गुरु सों नहि को देव ।
परहित सों को धर्म नहि, देइ सों को सेव ।९४६।
भावार्थ : -- माता पिटा के समान कोई पूज्य नहीं है, गुरु के समान कोई आदरणीय नहीं है । परहित के समान कोई पुण्य नहीं है, दान देने ( लेना नहीं) के समान कोई सेवा नहीं है ॥
गुरु कंचन गुरु पारसा, गुरु तोय तू प्यास ।
गुरु के गुन रत्नागार, गह गह मुकुत निकास ।९४७।
भावार्थ : -- गुरु ही कंचन है, गुरु ही पारस है, गुरु यदि जल है तो तू प्यास है । गुरु के गुण के सिंधु है तू उसमें ढूंड ढूंढ कर ज्ञान स्वरुप मुक्ता निकाल ॥
गुरु कंचन गुरु पारसा, गुरु भूषन गुरु गात ।
गुरु ज्ञान का रत्नाकर, जोइ गहे सो पात ।९४८।
भावार्थ : -- गुरु कंचन है,गुरु ही पारस है, गुरु आभूषण है, गुरु ही देह है । गुरु ज्ञान रूपी रत्नों का आकर है, जो ढूंढ़ता है वही पाता है ॥
नाहीं प्रीति भोज सोंह, नाहीं साज सँजोए ।
मीठी बोली बोल के, पाहुन आदर होए ।९४९।
भावार्थ : -- अतिथि का सत्कार सुरुचित भोजन अथवा साज सज्जा से नहीं अपितु मीठी वाणी से ही होता है ॥
संजम सन समरथ जुगे, समरथ सन संजोग ।
संजोग जोगाइ जुगुति, जुगुति जोगाइ जोग ।९५० ।
भावार्थ : -- संयम से ही सामर्थ्य बढ़ता है, सामर्थ्य से कार्य संयोजित होता है । कार्य-संयोजन से युक्तियाँ संकलित होती है, और युक्तियों के संकलन से योग्यता बढती हैं ॥
चेतत चित जागत चितब, मुख सोहत मुसुकाए ।९४१।
भावार्थ : -- हाथ श्रम करते हुवे, पाँव चलते हुवे और पेट थोड़े से थोड़ा खाते हुवे शोभित होता है, आँख में जागृति, चित्त में चेतना हो तभी मुख पर मुस्कान सुशोभित होती है ।।
मोती मानिक कनिक सों, हंस हिरन के तोल ।
आगिन आगिन धान कन, मिलहीं वाके मोल ।९४२।
भावार्थ : -- अल्प उत्पादन के कारण, आगे आगे अनाज मोती माणिक्य के कण और सोने चांदी के तोल जैसे उन्हीं के मूल्य में मिलने लगेगा (अभी जो मुद्रा में उपलब्ध है) ॥
पौर पंगत लगे रहे, करधन धरे पिरान ।
ले दे मंदर भीत भए, सोए मिले भगवान ।९४३।
भावार्थ : -- गोपुर में पंक्ति बद्ध रहे, करधन में पीरा होने लगी । फिर ले दे के मन्दिर भीतर हुवे तो देखा भगवान तो सो रहे रहे हैं ॥
अर्थात : -- ईश्वर के प्रति श्रद्धा ईश्वर की नियमावली में ही होने चाहिए, ले दे के नहीं.....
मूक हुँत बानी ब्यर्थ, अंधे दर्पन बान ।
बहरे हुँत सुर संगीत, मूढ़ हुँत ज्ञानवान ।९४४।
भावार्थ : -- गूंगे के लिए वाणी व्यर्थ है, अंधे दर्पण अर्थात दृष्टी हीन के लिए बनाव श्रृंगार व्यर्थ है । बधीर के लिए सुर और संगीत व्यर्थ है उसी प्रकार मूर्ख के लिए ग्यानी व्यर्थ है ॥
ऊँच अटारि कनक कलस, मनि मंजरी सँजोए।
मुँह माँगे मोल लेउ, कहीं अमरता होए ।९४५।
भावार्थ : -- भवन अट्टालिका तो बहुंत ऊंची गढ़ लिए, रत्नों की पंक्तियों से सजा ली । यदि अमरता कही पर मिलाती हो तो उसे मुंह मांगे मोल में ले लेना चाहिए क्योंकि मृत्योपरांत सब यहीं रह जाने वाला है ॥
मात-पिता सैम पूज नहि, गुरु सों नहि को देव ।
परहित सों को धर्म नहि, देइ सों को सेव ।९४६।
भावार्थ : -- माता पिटा के समान कोई पूज्य नहीं है, गुरु के समान कोई आदरणीय नहीं है । परहित के समान कोई पुण्य नहीं है, दान देने ( लेना नहीं) के समान कोई सेवा नहीं है ॥
गुरु कंचन गुरु पारसा, गुरु तोय तू प्यास ।
गुरु के गुन रत्नागार, गह गह मुकुत निकास ।९४७।
भावार्थ : -- गुरु ही कंचन है, गुरु ही पारस है, गुरु यदि जल है तो तू प्यास है । गुरु के गुण के सिंधु है तू उसमें ढूंड ढूंढ कर ज्ञान स्वरुप मुक्ता निकाल ॥
गुरु कंचन गुरु पारसा, गुरु भूषन गुरु गात ।
गुरु ज्ञान का रत्नाकर, जोइ गहे सो पात ।९४८।
भावार्थ : -- गुरु कंचन है,गुरु ही पारस है, गुरु आभूषण है, गुरु ही देह है । गुरु ज्ञान रूपी रत्नों का आकर है, जो ढूंढ़ता है वही पाता है ॥
नाहीं प्रीति भोज सोंह, नाहीं साज सँजोए ।
मीठी बोली बोल के, पाहुन आदर होए ।९४९।
भावार्थ : -- अतिथि का सत्कार सुरुचित भोजन अथवा साज सज्जा से नहीं अपितु मीठी वाणी से ही होता है ॥
संजम सन समरथ जुगे, समरथ सन संजोग ।
संजोग जोगाइ जुगुति, जुगुति जोगाइ जोग ।९५० ।
भावार्थ : -- संयम से ही सामर्थ्य बढ़ता है, सामर्थ्य से कार्य संयोजित होता है । कार्य-संयोजन से युक्तियाँ संकलित होती है, और युक्तियों के संकलन से योग्यता बढती हैं ॥
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