बुधवार, 20 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 116 -----

राजू : -- मास्टर जी ! हमारी सरकार इस नए नवेले रतन को पीपर की पत्ती पकड़ाए इससे पहले इसे तनिक सऊर सिखाना होगा.....काहे की इसके बाद जदि बो तेल-कंघी बेचेगा तो पड़ोसी हँसेंगे । और जब पड़ोसी हँसेंगे तो कितना बुरा लगेगा नई.....

" हम्म ! मैने तुम्हे अमरीकी लोकतंत्र पर निबंध लिख के लाने को कहा था, लाए ?"

राजू : -- नहीं मास्टर जी ! काहे की वहाँ लोकतंत्र जैसी कोई बात नहीं लगी । उनका दरबार किसी मुग़ल दरबार से कम नहीं है, और वो महल कौनों निशानी लगता है, और राष्ट्र प्रमुख? वो तो शाहजहां से थोड़े ही कम तर थोड़े ही हैं ।  बाज़ार में वही रौनक, वही शाहे हजरत, हाय ! कम्बख्त वही पाक मोहब्बत,

" सादा खोरी भीत करिया भूत' तुमको वो शाहजहां दिखाई देता? अरे शाहजहा ऐसे ऐसे महल में अपनी मारी बेगम को गड़िया के, फिर दुसरा महल बना के उसे दूरबीन से देखते थे.....कहीं ज़िंदा तो नहीं है ऐसे तहकीकात के लिए,

राजू : -- हाँ तो का हुवा मास्टर जी ! उनकी भी मोहबबत का इंतकाल कहाँ हुवा है.….उ करिया खोरी बाला प्रोजक्ट उन्हें दे देते हैं, फिर वो भी देखा करेंगे..... 

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