विलासिता की साधन स्वरूपा को सजाना मना है..,
आज पूजा गृहाधार कर उसकी आरती गाना मना है.....
राजू : -- मास्टर जी! ये क्या लिख रहें हैं ?
" राजू ! कोट बना रहा हूँ "
राजू : -- मास्टर जी ! आप तो हमारे मास्टर जी थे, ये कपड़ों के कारखाने के मास्टर जी कब से हो गए, अच्छा वो छोड़िये तनिक ये तो बताइये ये सेठ लोगों के जनम दिनों में गरीब गरीब लोग काहे आमंत्रित हैं, इनको देख के तो ऐसा गता है जैसे मुग़ल बागीचे में झोपड़े खड़े हों.....राष्ट्र प्रमुखों को आमंत्रित करते तो उत्सव की कुछ शोभा होती....दुइ चार राष्ट्र पति भवन खड़े करते,
" राजू ! राजू !! राजू !!! जदि इनको एतनी बुद्धि होती तो असली सेठ न होते, नकली काहे होते"
आज पूजा गृहाधार कर उसकी आरती गाना मना है.....
राजू : -- मास्टर जी! ये क्या लिख रहें हैं ?
" राजू ! कोट बना रहा हूँ "
राजू : -- मास्टर जी ! आप तो हमारे मास्टर जी थे, ये कपड़ों के कारखाने के मास्टर जी कब से हो गए, अच्छा वो छोड़िये तनिक ये तो बताइये ये सेठ लोगों के जनम दिनों में गरीब गरीब लोग काहे आमंत्रित हैं, इनको देख के तो ऐसा गता है जैसे मुग़ल बागीचे में झोपड़े खड़े हों.....राष्ट्र प्रमुखों को आमंत्रित करते तो उत्सव की कुछ शोभा होती....दुइ चार राष्ट्र पति भवन खड़े करते,
" राजू ! राजू !! राजू !!! जदि इनको एतनी बुद्धि होती तो असली सेठ न होते, नकली काहे होते"
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