शनिवार, 30 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १००॥ -----

दिन मह सांती ना परे, राते नीँद न आए । 
सुख वासे भागा फिरै, जो पिय लाग लगाए ।१००१। 
भावार्थ : -- दिन में तो शान्ति नहीं मिलती रात को नींद नहीं आती । उससे सुख दूर दूर भागता है जो प्रीतम से झगड़ा/अनुराग करते हैं ॥

तापस गुन बरनन चली, लिख लिख थकि मसि बिंदु । 
तापस बिनु नहि सोधिते, मानस सुबरन सिंधु  ।१००२।   
भावार्थ : -- तापस एक बहु अर्थी शब्द है वर्णिका इसके गुण-प्रसंशा करते थक गई पर इसके  गुणों का वर्णन न हो सका । तपस्या के बिना मनुष्य, अग्नि के बिना स्वर्ण एवं सूर्य के बिना समुद्र शोधित नहीं होते ॥

जो धन धाम को ललसे, बाजें आठों जाम । 
बैठे चित सांती धरे, जोई पूरन काम ।१००३। 
भावार्थ : -- जो विलासिता की साधन स्वरूपा , सत्ता के लालची हैं, वे चौबीस घंटे लड़ते रहते हैं । जो पूर्णकामी होते हैं वह शान्ति से बैठ कर कथा-कोबिता लिखते हैं ॥

जग जन्में जेतक जीउ, सबहि नाथ के अंस ।  
फरत निज निज चरित बिटप, सब भव कौनौ बंस ।१००४। 
भावार्थ : -- इस संसार में जितने भी प्राणी है सभी उस ईश्वरीय महत्तत्त्व के युग्म हैं ॥ सबका कोई वंश वृक्ष है,अपना अपना वंश इतिहास है, किसी का ज्ञात है किसी का अज्ञात ॥

अर्थात : -- "जाति और धर्म वह कुंजी है जिससे जीवों के उत्पत्ति मूल का अन्वेषण किया जा सकता है" ।

रजस तमस भए सात्विक, पाए जोग गुन ग्राम । 
तपो भूमि बल भयउ निधि, बालमीकि श्रीराम ।१००५ । 
भावार्थ : -- उत्तम वातावरण का प्रसंग प्राप्त कर तामस या राजस भी सात्विक प्रकृति के हो जाते हैं । तपोवन का पवित्र वातावरण प्राप्त कर उसके  बल से राजस प्रकृति के राम,  तपस्वी श्री राम भगवान हो गए  एवं तामस प्रकृति के रत्नाकर, तपस्वी महर्षि वाल्मीकि हो गए ।

अर्थात : -- " वातावरण उत्तम होने से डाकू भी संत हो जाते हैं । और दूषित वातावरण में संत भी डाकू हो जाता है"

दिन के पहरी दिवाकर, रात के पै मयूख । 
जग जगती पहरे काल, नारि पहरे पुरूख ।१००६। 
भावार्थ : -- दिन का प्रहरी दिनकर है, रात का चंद्रमा है । घर-संसार का प्रहरी समय है, नारी का प्रहरी पुरुष है ; प्रश्न यह है कि पुरूष किसके पहरे में है ? 

भासित बचन निसुबारथ, कहत करन कल्यान । 
तिनके हेतु जग तारन , न कि सहमती अदान ।१००७। 
भावार्थ : -- सुभाषित वचन संसार का कल्याण करने के लिए निस्वार्थ स्वरुप कहे जाते हैं । इनका मूल उद्देश्य उद्धार करना होता है, न कि सहमती प्राप्त  करना ॥ 

अर्थात : -- सुभाषित वचन संसार का सत्य दिखाते हैं , सत्य आचरण का विषय है, भाषण का नहीं ॥ यदि किसी सुभाषित वचन से जग का कल्याण होता हो तो वह वचन सोना है,यदि उस वचन से संसार के सह स्वयं  का भी कल्याण होता हो तो वह सोने पे सुहागा है । निकृष्ट व्यक्ति केवल स्वयं के कल्याण के लिए जीवित रहता है ॥ 

बछल नै सुख संपद के, भरे जगत भण्डार । 
भगत का कछु भाग नहीं, घटबइ सेवनहार ।१००८। 
भावार्थ : -- ईश्वर ने जगत में सुख कि सम्पदा के भण्डार भर दिए हैं । अब भगत अभागा ही रहा , अवश्य ही सेवा करने वालों ने घटाया है, उन्होंने तेरे भाग्य में डंडी मारी है ॥   

अजहुँ तेरे भाग जुगे, सब साधन कल्यान । 
कृत कारज कर जोग ले, पलक होत अवसान ।१००९। 
भावार्थ : -- अभी तो तेरे सौभाग्य में कल्याण के सारे साधन जुड़े हैं यह शरीर है, कल्याण करने योग्य युग है, योग्य देश है, काल है, परस्थितियाँ अनुकूल हैं । अत: तू  कल्याण कारी कार्य करके पुण्यों का जुगाड़ कर ले अन्यथा यह काया क्षण भर में ही मर जानी है ॥ 

कह पिय प्रिया लाल बदन, बरती छन छबि जोह । 
छन मैं चमक चमक उठे, छन मैं घन पिछु सोह ।१०१० । 
भावार्थ : -- प्रियतम का कहना है : -- प्रिया के मुख का क्रोध और लज्जा दोनों मेघप्रभा के सदृश्य हैं । जो क्षण में चमक चमक के दर्शित होती है, क्षण में मेघों के पीछे शोभा देती है ॥ 



गुरुवार, 28 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 117 -----

राजू : -- मास्टर जी ! ई हमरे देस के मूर्खाधिस टेक्स तो इतना लेते हैं, की देस हाईबे बन जाए.....अब एक ठो टुबलाइट, एक ठो सीएफल , औउर एक ठो फ्यूज बलब लगा के, एक ठो तोरण बना के, बैठे हैं दूकान सजा के.....अब आप ही बताइये इस पगडण्डी का कोई टोल टेक्स देगा का ?

" राजू ! इनको तो लोगों को ठगना भी नहीं आता, एक ठो मर्करी लगा देते तो एकदम हाईबे लगता.....

शनिवार, 23 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम९९ ॥ -----

बिय बोत क्यारि क्यारि, जब लग मिलै सिँचाइँ । 
फुरत फरत जे फुरबारि, तब लग फर फुर दाइँ ।९९१। 
भावार्थ : -- क्यारियों में बीज बोई हुई इस फुलवारी को जब तक सिचाईं मिलेगी । यह तब तक ही फूलेगी फलेगी और फलफूल देगी ॥ 

एक गुनित एक फल एक ही, दो जग ओ फल चार । 
ऐसोइ अंरात्मनम , माने सब संसार ।९९२ । 
भावार्थ : -- एक गुणित एक = एक होता है, दो+दो =चार होता है,  जैसे यह सर्वमान्य है । वैसे ही यह अंतरात्मा भी सर्वमान्य है ॥ 

जाने जनमन पाहिले, अरु मरि के पश्चात । 
सोइ करे न एतिकेत, न एतिक नीच निपात।९९३ । 
एतिक = इतना 
एत = पाप 
भावार्थ : -- जो अपने जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के पश्चात की गति जान ले । फिर वह न तो इतने पाप करे, न ही इतना नीचे गिरे ॥ 

मुखिया अगजग की गति, जानपन निज नियंत । 
मति भइ वाकी भाँवरी, अरु मान के न अंत ।९९४ ।  
भावार्थ : -- यह मुखिया स्वयं को समस्त चराचर की गति का नियंता समझ रहा है । इसकी मति भ्रमित हो गई है, इसके घमंड का ठिकाना नहीं (ये सारे रावण के लक्षण हैं )। 

बुढ़ताई अरु जुबता, केस रंगे न होइ । 
एक बयोगत हानि होत, दुजी बै संधि जोइ ।९९५ । 
भावार्थ : -- बुढ़ापा और युवता अर्थात अनुभव एवं ज्ञान , केस रंगने से प्राप्त नहीं होता ॥ एक समय व्यतीत करने से दुसरा बाल्य एवं तारुण्य काल के संग्रहण से अर्थात पठन -पाठन से प्राप्त होता है ॥ 

बिचार भया अंतरतम, काया भई कहाउ । 
भाव वाकी जाति भई, सार वाका सुभाउ ।९९६ । 
भावार्थ : -- यदि विचार आत्मा है तो शब्दोक्ति काया है । भाव उसका उत्पत्ति स्थान है, और सार उसका धर्म है ॥

अन महातम का जाने, जो ना देखा भूख । 
गहनी तमि के पीर को, भाने न प्रत्यूख ।९९७ । 
भावार्थ : -- जिस प्रकार गहरी रात्रि की पीड़ा को प्रभात नहीं जानता । उसी पकार जिसने भूख न देखी हो उसे अन्न के महात्मय का ज्ञान नहीं होता ॥ 

मानख निसदिन पंच बन , करता फिरै न्याय । 
तेरे कारे करम को  , कहू कहाँ निर्नाएँ ।९९८। 
भावार्थ : -- रे मनुष्य ! दूसरों का न्याय करते हुवे तू बड़ा न्यायाधीश बना फिरता है । ये बता जो तेरे पापकर्म हैं उसका निर्णय कहाँ हो ॥

अंतर सौर भँवर बहिर, दोइ बयस मैं जाए । 
बुद्धि बल सों आपनी, भा निज प्राण सिराए ।९९९। 
भावार्थ : -- यह अंतरात्मा सौर मंडल की परिधि से दो ही अवस्था में बहिर्गमन करती है । या तो अपने बुद्धि के बल पर या फिर देहावसान होने पर ॥ 

तेरे चरन सौर भँवर, बहिर गमन किए जोह । 
रे मानव होहि जाने, कस कस सत तव सोंह ।१०००। 
भावार्थ : -- हे मानव ! जब तेरे चरण, सौर मंडल की परिधि से बहिर्गमन करेंगे तब जाने कैसे कैसे सत्य तेरे सम्मुख होंगे ॥ 




बुधवार, 20 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 116 -----

राजू : -- मास्टर जी ! हमारी सरकार इस नए नवेले रतन को पीपर की पत्ती पकड़ाए इससे पहले इसे तनिक सऊर सिखाना होगा.....काहे की इसके बाद जदि बो तेल-कंघी बेचेगा तो पड़ोसी हँसेंगे । और जब पड़ोसी हँसेंगे तो कितना बुरा लगेगा नई.....

" हम्म ! मैने तुम्हे अमरीकी लोकतंत्र पर निबंध लिख के लाने को कहा था, लाए ?"

राजू : -- नहीं मास्टर जी ! काहे की वहाँ लोकतंत्र जैसी कोई बात नहीं लगी । उनका दरबार किसी मुग़ल दरबार से कम नहीं है, और वो महल कौनों निशानी लगता है, और राष्ट्र प्रमुख? वो तो शाहजहां से थोड़े ही कम तर थोड़े ही हैं ।  बाज़ार में वही रौनक, वही शाहे हजरत, हाय ! कम्बख्त वही पाक मोहब्बत,

" सादा खोरी भीत करिया भूत' तुमको वो शाहजहां दिखाई देता? अरे शाहजहा ऐसे ऐसे महल में अपनी मारी बेगम को गड़िया के, फिर दुसरा महल बना के उसे दूरबीन से देखते थे.....कहीं ज़िंदा तो नहीं है ऐसे तहकीकात के लिए,

राजू : -- हाँ तो का हुवा मास्टर जी ! उनकी भी मोहबबत का इंतकाल कहाँ हुवा है.….उ करिया खोरी बाला प्रोजक्ट उन्हें दे देते हैं, फिर वो भी देखा करेंगे..... 

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९ ८॥ -----

मित रिपु के बल बुद्धि को, सागर के सम लेख । 
वासे पारन पावनै, अपनी जुगता देख ।९८१। 
भावार्थ : -- मित्र हो या शत्रु हो उसका बल एवं विद्वत्ता को लघुत्तम नहीं आंकना चाहिए, अपितु उसे समुद्र के सरिस विशाल समझ कर फिर उससे पार पावन हेतु अपनी योग्यता का आंकलन करना चाहिए । तैरना आए तो तैर कर उड़ना आए तो उड़ कर अन्यथा ? सेतु बाँध कर उससे पार पाया जा सकता है ॥

कोकिल एकै कू कूकिए , हेरत फिरै मुढ़ान । 
बारम्बार कू कू किए, लोग दिए ना ध्यान ।९८२। 
भावार्थ : -- कोयल के एक कू कूकने से लोग उसे मुंडेरों पर ढूंडते फिरते हैं । किन्तु जब वह वारंवार कूकती फिरती है तो कोई ध्यान नहीं देता ॥

गुरुबर के परसन सीस, सोन भया ना जोह । 
भा गुरु नाहीं पारसा, भा सीस नहीं लोह ।९८३। 
भावार्थ : -- गुरुवार के स्पर्श से यदि शिष्य स्वर्ण नहीं हुवा, तो इसका अर्थ यह है कि या तो वह गुरु पारस नहीं या शिष्य लोहा नहीं ॥

जेतक पातक जोग लिए, तिन गठरी दे आँट । 
पाए औसर नौ पुन कर, देखत देहरि बाट ।९८४। 
भावार्थ : -- जितने भी पाप संचित किए सो किए, अब उन्हें एक गठरी में बाँधते हुवे प्रतीक्षारत होकर अवसर पाते ही नए पुण्य करने चाहिए, जिससे विश्व का कल्याण हो ॥

हरिन धरा हरियर करे, सूर करे उजियार । 
सकल जीव जगती के, मानख पालनहार ।९८५।
भावार्थ : -- जगत नियंता ने सभी को अपने अपने कर्त्तव्य सौप रखे हैं, जैसे हरियाली धरती को हरी-भरी करे, सूर्य उसमें उजाला भरे, और इस समस्त सृष्टी की मानव रक्षा करे, भक्षक बनकर इसका नाश न करे ॥

जीवन मैं जब आपदा, कंठ फांस हो जाए । 
कै तिन्ह कंठ लिए फिरौ, कै चलौ सुरीझाए ।९८६। 
भावार्थ : -- जीवन के पथ पर संचरण करते हुवे विपत्तियां तो आएंगी ही, जब इतनी हो जाए कि गले की फांस लगने लगे फिर या तो उन्हें लिए फिरो, या  उन्हें सुलझाते चलो ॥

मागु मागु परिहार कै, धरें मुख देहुँ देहुँ । 
जिनके दिए जग उद्धरे, तिनके सकल सनेहु ।९८७। 
भावार्थ : -- भिक्षा वृत्ति का त्याग कर दानी की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए । जिनके दान से संसार का उद्धरण होता है उनके सभी स्नेही हो जाते हैं ॥ 

जेन केन प्रकार देन, तुलसी हो कल्यान । 
जब दिए जगत अहित करे, तब बर होत अदान ।९८८। 
भावार्थ : -- गोस्वामी तुलसी दास ने कहा है  : -- जिस किसी भी प्रकार से दिया जाए, दान कल्याण कारी होता है । किन्तु जब यह दान संसार हेतु का अहित कर हो,  तब न देना ही उत्तम है ॥  

गुरु के सदगुन गहे नहिं, लहे नहिं गुरु ग्यान । 
रंगे भेस केस रखे, सो तो भूत समान ।९८९ । 
भावार्थ : -- न तो गुरु के सगुन ग्रहण किये, न उनसे ज्ञान ही प्राप्त किया । कोई चुटिया रखे है, कोई एक धोतनी लपेट कर महात्मा बन गया है किसी ने कपडे भगवा कर लिए ये सारे कपट वेश धारी शिष्य न होकर भूत के समान हैं ॥ 

लम्मा धोता लम्मा पोथ, लम्मा तिलक लगाए । 
बिलास भवन बास करे, कपट भेस कहलाए ।९९०। 
भावार्थ : -- लम्बी तो धोती पहन ली, लम्बी पोथी धर ली, लंबा सा एक तिलक लगा लिया । विलासिता के भवन में वास किये ऐसे लोग पाखंडी कहलाते हैं ॥ 


----- मिनिस्टर राजू 115 -----

" राजू ! आज तू मुझे ये बता, कि यदि ये इक्यालिस,बयालीस, तिरालिस भारत के रतन हैं  तो वे महा आत्मा गांधी क्या थे 'पत्थर?'

राजू : -- अरे नई रे ! मास्टर जी! ये भी पत्थर हैं और वे भी पत्थर हैं । अंतर ये है कि वे  बिड़ला हाउस के हैं, ये टाटा हाउस के हैं

" अच्छा ! अच्छा !! मैने तुम्हे कल पत्रकारिता प् निबंध लिख के लाने को बोला था चलो बोल के दिखाओ ?

राजू : -- जी मास्टर जी ! .....अब ये दल मैदान में उतरे.....कमल कमल कमल कमल.....पंजा पंजा पंजा पंजा.....झाड़ू..... बस आज के समाचार समाप्त हुवे.....मास्टर जी ! हो गई जर्नलिज्म.....

" मैंने तुझे निबंध लिख के लाने को बोला था कि हलाकू" 

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९ ७ ॥ -----

कलजुगी कुटुंब कहान, जूँ पीपर के मूर । 
घर घर भित्ति फोरी के, निकसी गवनै दूर ।९७१।   
भावार्थ : -- कलयुगी कुटुंब की कहानी ऐसी है, जैसे की पीपल-जड़ की कथा हो ॥ जो घर घर के भित्तियों को फोड़ कर दूर फैली हुई है ॥

जीवन पंथ मरन पँवर, भयऊ साँच बिहान । 
जनमन सौ ओहार है, मरनी के न ओढ़ान ।९७२। 
भावार्थ : -- जीवन पंथ में मृत्यु की दहलीज अंतिम सत्य है । जन्म के सौ द्वारावरण हैं (अर्थात सौ झूठ हैं) , किन्तु मृत्यु का कोई आवरण नहीं है ॥

बरता सूरज साँच है, वासे पीठ फिराए । 
तामस गुण के गान किए, असत अँधेर घिराए ।९७३। 
भावार्थ : -- जलता हुवा सूर्य परम सत्य है । उससे पीठ फेर लेने से फिर अज्ञान और आलस्य रूपी दुर्गुणों का बखान करते हुवे असत्य का अंधेरा घेर लेता है ॥

एक दया अरु एक किरपा, दोनउ दिरिस समान । 
एक धर्म चरन संजुगी, दूजी जोगे दान ।९७४। 
भावार्थ : -- दया और कृपा एक समरूप दृष्टिगत होती है । दया धर्म के आचरणों से संयोजित है।जबकि कृपा, दान की प्रतीक्षा करती वियोजित है॥

तासु संजोइँ होइँ बर, जे भा मन प्रत्येक । 
जाकी जोइँ जोग जुगी, सोई भई प्रबेक।९७५। 
भावार्थ : -- प्रत्येक व्यक्ति का मन यह चाहता है कि, उसका सभी कुछ श्रेष्ठ हों । किन्तु जो कुछ उपयुक्त होते हुवे योग्य होता है, वही उत्तम है ॥

निसवारथ को बचन कह, सो तो भयऊ साँच । 
जब हितेच्छा हेतु लह, बहोरि सौचहु राँच ।९७६। 
भावार्थ : -- निस्वार्थ स्वरुप में कोई कथन किया जाए,  तब वह सत्य का रूप ले लेता है । जब उसका उद्देश्य मंगलाकांक्षी होकर परहितकारी हो फिर वह शुद्धता से भी अनुरक्त हो जाता है ॥

सीप मुख जल मुकुति भया, साँप मुख बिषकार । 
जाके जैसी भावना, तैसेहिं करि बिचार ।९७७। 
भावार्थ : -- सीप के मुख जल मुक्ता स्वरुप हो जाता है और सर्प के मुख में वही जल विष का रूप ले लेता है । जिसकी जैसी भावना होती है वह वैसे ही विचार करता है ॥ 

अर्थात : -- "शब्द एकरूप है, किन्तु स्वभाव की भिन्नता के कारण विचार भिन्न हो जाते हैं "

अस्थिहि माँस सोंह ढके, माँस ढकाईं चाम । 
मति ढके क्रोध मद लोभ,ज्ञान को मनोकाम ।९७८। 
भावार्थ : -- अस्थियाँ  माँस से ढकी है,माँस चर्म से ढँका है । बुद्धि को क्रोध मद और लोभ ढके हैं, ज्ञान मन की कामनाओं से ढका है ।। 

सत्ता के सुख साँस की, आँच लेख ना पाए । 
जाननी की बरती चिता, सोंह खिंच लिए जाए ।९७९ । 
भावार्थ : -- सत्ता के सुख कारी सांस की आंच का वर्णन नहीं हो सकता । यह ऐसी कसूती है कि सम्मुख माता की चिता जल रही और यह खिंच कर ले जाती है, अर्थात यह माँ जैसे पवित्र शब्द का भी लिहाज नहीं करती ॥ 

एक लगन को लाग कहें, एक लगन कहें लाग । 
एक जगाए जगती जोत, दूजी लगाए आग ।९८०। 
भावार्थ : -- एक लगन को प्रेमलगन कहते हैं एक लगन को वैराग्नी कहते हैं ॥ एक घर-संसार ज्योतिर्मय कर देती है, दूजी उसमें आग लगा देती है 

  

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 115 -----

" राजू ! तुमने इच्छा धारी नागिन के बारे में तो सूना होगा, कभी इच्छा धारी आदमी को देखा है ? " 

राजू : -- नहीं मास्टर जी ! क्या आपने देखा है ? 

 हाँ.....! दूरदर्शन में.....बड़ा ही दुर्लभ प्राणी है.....सारे संसार में एक ही है और वो भी अपने भारत में.....उसकी इच्छा करते ही केवल संकेत मात्र से राष्ट्र पति की चलती कलम रुक जाती है.....उस की इच्छा करे तो वो अब्बी के अब्बी देस का प्रधान मंत्री बन जाए.....बता है कहीं ऐसा और कोई.....

बुधवार, 13 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 114 -----

" राज्जू ! मन्न यो बता कि जवाहर,इंद्रा ओर राजीव मैं के समरूपता है ? 

राजू : -- मास्टर जी ! तीन्नोई रतन हैं, दो न तो रतन ओर महामात्य जामे, तीसरा न मधुमेह का रोगी जाम दिया.....जाँच कराओ इसकी" 

" मैने अंतर बूझ्झा ? " 

राजू : -- ना मास्टर जी !

" इब जितना बुझ्झूँ उतना बताइयों.....यो बता राजीव , कमल और अरविन्द के समरूपता है" 

राजू : -- मास्टर जी ! तीन्नोई 'फूल' हैं 

 " अच्छा ! तै के है" 

राजू : -- मास्टर जी ! ब्यूटीफूल,

" अच्छा! अच्छा !! वा मिठाई के थी फूल्लन देबी ? 

राजू : -- मास्टर जी ! उसका के बेरा, वा मैने थोड़े ही खाई थी, के तो वो जाणे, जिसने खाई थी के हलवाई जाणे 


सोमवार, 11 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९६ ॥ -----

सून के नाहि मान को, सून के न को मोल  । 
पर जिन्ह अंक जा जुगे, वा सो ना को तोल ।९६१।
भावार्थ : -- शून्य/आकाश//ईश्वर का कोई मान नहीं होता, शून्य का कोई मूल्य भी नहीं होता । किन्तु जब यह किसी अंक के साथ संलग्न हो जाता है, तब फिर उस अंक का कोई तोल नही होता ॥  

जब लग बिटप लगी रहे, तब लग रसन समोए । 
काची काची इमराइ, मीठी ऐसे होए ।९६२ । 
भावार्थ : -- जब तक पेड़ में लगी रहती है,  तब तक वह रस ग्रहण करती है । कच्ची कच्ची इमली, पककर ऐसे मीठी होती है ॥ 

अर्थात : -- "जीवन सोपान सभी पथ तय करके ही परिपक्वता आती है" 

सोइ पुनि पुरुख कहाँ गए, कौन दिसा गहियाए । 
का तिन धरती लील गइ, समउ सकेरत खाए ।९६३। 
भावार्थ : -- जो संसार का कल्याण करने हेतु उत्पन्न हुवे थे वे पुण्यात्माएँ  कहाँ गई क्या उन्हें धरती लील गई या समय संकलित कर खा गया ॥ 

बुरे लोग के समुदाए, चारिन करत बढ़ाइ । 
आपस माह रन छेड़ के, लरत भिरत मरि जाइ ।९६४। 
भावार्थ : -- दुर्जनों के समुदाए में चार लोगों की प्रशंसा कर दो । फिर तो उनमें युद्ध छिड़ जाएगा और वे आपस में ही लड़ भीड़ के मर जाएंगें ॥ 

तीन लोक की सम्पदा चाहे लरत भिराए । 
लाभ लबध कीर्ति सोंह, लोभ न जीता जाए ।९६५। 
भावार्थ : --लाभ लब्ध कीर्ति के सह लोभ के साथ चाहे तीन लोक की सम्पदा क्यों न लड़ भिड़े वह उससे नहीं जित सकती ॥ 

पद पद जनता जनार्दन, भुगत बहु ब्यभिचार । 
सासन अरु प्रसासन को, देईं बहुसहि गार ।९६६। 
भावार्थ : -- प्रतयेक स्थान की जनता जो कि जनार्दन है बहुंत ही व्यभिचार भुगत ली । अब वह शासन और प्रशासन को दुर्वादन प्रेषित कर रही है ॥ 

तामस गुन के गान किए, बिरित गई तम रात । 
गगन उयत नउ भानु कहि, सीखौ नइ नइ बात ।९६७। 
भावार्थ : -- अज्ञान आलस्य क्रोध रूपी दुर्गुणों का गान कर, गहन अंधेरी यामिनी व्यतीत हो गई । गगन में उगता हुवा नया सूर्य कह रहा अब नई नई बातें सीखो ॥ 

रसरी रसन कबिजन दिए, भाँति भाँति के मान । 
एक कहें रसबत मिसरी, दूजे सर्प समान ।९६८। 
भावार्थ : -- श्रेष्ठ कवि जनों ने जिह्वा की रस्सी को विभिन्न प्रकार की उपमाओं से सुशोभित किया है । एक को रसवंत मिश्री के भीतर की रस्सी कहा, दूजी को सांप के समरूप ही कह दिया ॥

कंकन किंकिनि कनक कन, फूट कियारि कियारि । 
दरसत अवनि आभूषन, जस सम्पद उपकारि ।९६९। 
भावार्थ : -- कंगन और करधन के स्वर्ण के अन्न कण खेतों की क्यारियों में प्रस्फुटित हुवे । धरती के ये आभूषण ऐसे दर्श रहे हैं,  जैसे ये किसी उपकारी की संपत्ति हो ॥

अनजल सुमति बरधइँ अति, सही उन्नति  कहाहिं । 
जाकी रहि जन चरन रति, वा सोंह भगति नाहिं ।९७०। 
भावार्थ : -- अन्न,जल के कोष में अतिशय वृद्धि, सुभाषित एवं उसकी उत्कृष्ठता की वृद्धि ही वास्तविक प्रगती कहलाती है । प्राणी जनों के चरणों में अनुरक्ति (मंदीर-मूर्ति बनाने में नहीं) के सदृश्य भक्ति नहीं ।। 










शनिवार, 9 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 113 -----

राजू : -- मास्टर जी ! मास्टर जी !! 

"क्या राजू ! क्या राजू !! 

राजू : -- मास्टर जी ! आपको 'भारत रत्न' के लिए चुना गया है,

" धूत ! धूत धूत !! गरीबहा गधूस..... मुझमें और जवाहर लाल नेहरु में कुछ तो अंतर होगा"

राजू : -- मास्टर जी ! चाहते क्या है आप.....नहीं मुझे बताओ मैं जानना चाहता हूँ.....चाहते क्या है आप 

 " हसीनो के दर सर झुका चाहता हूँ.., 
    मोहब्बत में हूँ और वफ़ा चाहता हूँ.., 
    कहीं मर न जाऊँ अहदे सिकन से.., 
    इस बीमारे-गम की दवा चाहता हूँ.....  

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 112 -----

राजू : -- मास्टर जी ! ये बिकास कौन है ? 

  "अरे वही ! जो काला धन बन के बिदेसी अधिकोषों माने की बैंकों में बंद है"  

बुधवार, 6 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९५ ॥ -----

एक प्रिया  एक प्रियतम ब्रत, जोगे एकै निबास । 
अलपह असन कछुक बसन, अस घर श्री के बास ।९५१। 
भावार्थ : -- एक प्रिया और एक ही प्रियतम का व्रत हो, एक ही निवास योजित करने का नियम हो । अल्पतस भोजन और कुछेक आभरण हो उस घर में सैदव लक्ष्मी का वास होता है, बाक़ी घरों में माया नाचती है ॥

देखु एक नगर धनी की, बड़ी अनोखी दीख । 
भरा पेट बहुरि माँगे, हाथ पसारे भीख ।९५२। 
भावार्थ : -- एक नगर के धन्ना सेठ की विचित्र से चरित्र का वित्तचित्र देखो । पेट भरा है, गला भरा है, मुंह भी भरा है,उल्टियाँ हो रही है फिर भी हाथ पसार के भीख मांग रहा है ( भारत को ऐसे ही भिखारियों का देश नहीं कहते) ॥

जोउ जनित जनिते जहाँ, तहाँ मान ना पाए । 
बाहिर सुरसरि बह रही, भीतर घर अन्हाए ।९५३।
भावार्थ : -- जो उत्पाद जहां उत्पन्न होता है, वहाँ उसका सम्मान नहीं होता । गंगा बाहर बहती रही, गंगातट वासी घर के भीतर ही नहाएँ ॥

खाली खाली अन कोष, भरा भरा दिखलाए । 
तिनते राम बचाए जो, धरा खोद के खाए ।९५४। 
भावार्थ : -- देश का अन्न कोष रिक्त है और उसे भरा पूरा दिखा रहें है  । ऐसे दुर्जनों से तो राम ही बचाए जो धरती खोद के खा रहे हैं ॥ 

कोइली के खदान जों, निकसे हिरनइ हीर । 
रैन बिहान निकसा तों, दिनमनि धीरहि धीर ।९५५। 
भावार्थ : - कोयले की खदान से जैसे बहुमूल्य हीरा निकलता है । रात व्यतीत होते ही वैसे ही धीरे धीरे सूर्य का उदय हुवा ॥ 

पंगति पंगति डारि कर, पत पत कार कियारि । 
आखर आखर फुर फुरे,पोथी भइ फुरबारि ।९५६। 
भावार्थ : -- सारी पंक्तियाँ शाखाएं कारित कर पृष्ठों को क्यारी स्वरुप दिया । जब अक्षर पुष्प स्वरुप में प्रफुल्लित हुवे तब पोथी फुलवारी बन गई ॥ 

बाती प्यासी ही रहि , लहि न प्रीत का तेल । 
दीप बिजोगित ही रहा, भया न जोतिर मेल । ९५७ । 
भावार्थ : -- बाती प्यासी ही रही उसे प्रीत का सार प्राप्त न हुवा । दीपक भी वियोजित रहा, उनका वह ज्योतिर्मय मिलन दुर्लभ ही हो गया ॥ 

तहाँ खान पय पान का, जहाँ जान अनजान । 
भए ऐसो जजमान का, किये न आदर मान ।९५८ । 
भावार्थ : -- वहाँ खाना और पीना क्या जहां कोई जान कर भी अनजान बना रहे । फिर ऐसा आतिथ्य किस काम का जहां आपका सम्मान न हो ॥ 

अर्थात : -- वहाँ का आतिथ्य स्वीकार नहीं करना चाहिए जहां जहां आपको जान कर कोई अनजान बना रहे वहाँ यदि कोई आपका आतिथ्य स्वीकार न करे तो अपना मुग़ल बागीचा उसके भवन में नहीं सजाते । 
                             औरों के सजे चमन में जश्न नहीं मनाते..,  
                            जब आजाद हिन्द है तो क्यूँ नहीं सजाते..... 

मुखिया चित सों चाहिए, होत पीर को अंग । 
बिना भेद भाव किए जो,  उपचारे प्रत्यंग ।९५९ । 
भावार्थ : -- मुखिया को चित्त के समान होना चाहिए यदि किसी अंग में पीरा हो तो बिना भे भाव किये जो सभी का का समान उपचार करता है उसी प्रकार मुखिया को राष्ट्र के सभी क्षेत्रों का समान स्वरुप में रखरखाव करना चाहिए ॥ 

न माँगे भगति सन मान, ना माँगे धनधान । 
तेओ तापस आचरन, माँग रहा भगवान ।९६०। 
भावार्थ : -- न भक्ति माँग रहा, न कोई सम्मान माँग रहा, न तेरी धन सम्पदा माँग रहा, न तेरा धान माँग रहा । ये जनता रूपी भगवान तुझसे तेरा तपस् आचरण  (  व्रत, नियम, उपासनादि का आचरण और इंद्रियों का निग्रह ) माँग रहा है ॥ 

              "यदि तू किसी को नहीं देगा, तो तेरे को कौन देगा " 









----- मिनिस्टर राजू 111 -----

 " राजू ! इस बारी दिवाली में तुमने बहुंत मिठाई खाई होंगी ? "

राजू : -- नहीं मास्टर जी ! :(

 "क्यों ?"
राजू : -- मास्टर जी ! उस मिठाई ने इतना बनाव सिंगार माने की इतना मेकअप किया हुवा था कि मुझे समझ ही नहीं आया उसे देखूँ , उससे शादी करूँ कि उसे खाऊँ..,

"धूत ! धूत धूत !! तेरे जैसे गरीबहा गधे से कौन शादी करेगा"

सोमवार, 4 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९४ ॥ -----

कर श्रम जुगत पाँउँ चरत, उदर अलपतर खाए  । 
चेतत चित जागत चितब, मुख सोहत मुसुकाए ।९४१।  
भावार्थ : --  हाथ श्रम करते हुवे, पाँव चलते हुवे और पेट थोड़े से थोड़ा खाते हुवे शोभित होता है, आँख में जागृति, चित्त में चेतना हो तभी मुख पर मुस्कान सुशोभित होती है ।।

मोती मानिक कनिक सों, हंस हिरन के तोल । 
आगिन आगिन धान कन, मिलहीं वाके मोल ।९४२। 
भावार्थ : -- अल्प उत्पादन के कारण, आगे आगे अनाज मोती माणिक्य के कण और सोने चांदी के तोल जैसे  उन्हीं के मूल्य में मिलने लगेगा (अभी जो मुद्रा में उपलब्ध है) ॥  

पौर पंगत लगे रहे, करधन धरे पिरान । 
ले दे मंदर भीत भए, सोए मिले भगवान ।९४३। 
भावार्थ : -- गोपुर में पंक्ति बद्ध रहे, करधन में पीरा होने लगी । फिर ले दे के मन्दिर भीतर हुवे तो देखा भगवान तो सो रहे रहे हैं ॥

अर्थात : -- ईश्वर के प्रति श्रद्धा ईश्वर की नियमावली में ही होने चाहिए, ले दे के नहीं.....

मूक हुँत बानी ब्यर्थ, अंधे दर्पन बान ।  
बहरे हुँत सुर संगीत, मूढ़ हुँत ज्ञानवान ।९४४। 
भावार्थ : -- गूंगे के लिए वाणी व्यर्थ है, अंधे दर्पण अर्थात दृष्टी हीन के लिए बनाव श्रृंगार व्यर्थ है । बधीर के लिए सुर और संगीत व्यर्थ है उसी प्रकार मूर्ख के लिए ग्यानी व्यर्थ है ॥

ऊँच अटारि कनक कलस, मनि मंजरी सँजोए।
मुँह माँगे मोल लेउ, कहीं अमरता होए ।९४५।
भावार्थ : -- भवन अट्टालिका तो बहुंत ऊंची गढ़ लिए, रत्नों की पंक्तियों से सजा ली । यदि अमरता कही पर मिलाती हो तो उसे मुंह मांगे मोल में ले लेना चाहिए क्योंकि मृत्योपरांत सब यहीं रह जाने वाला है ॥

मात-पिता सैम पूज नहि, गुरु सों नहि को देव । 
परहित सों को धर्म नहि, देइ सों को सेव ।९४६। 
भावार्थ : -- माता पिटा के समान कोई पूज्य नहीं है, गुरु के समान कोई आदरणीय नहीं है । परहित के समान कोई पुण्य नहीं है, दान देने ( लेना नहीं) के समान कोई सेवा नहीं है ॥

गुरु कंचन गुरु पारसा, गुरु तोय तू प्यास । 
गुरु के गुन रत्नागार, गह गह मुकुत निकास ।९४७। 
भावार्थ : -- गुरु ही कंचन है, गुरु ही पारस है, गुरु यदि जल है तो तू प्यास है । गुरु के गुण के सिंधु है तू उसमें ढूंड ढूंढ  कर ज्ञान स्वरुप मुक्ता निकाल ॥

गुरु कंचन गुरु पारसा, गुरु भूषन गुरु गात । 
गुरु ज्ञान का रत्नाकर, जोइ गहे सो पात ।९४८। 
भावार्थ : -- गुरु कंचन है,गुरु ही पारस है, गुरु आभूषण है, गुरु ही देह है । गुरु ज्ञान रूपी रत्नों का आकर है, जो ढूंढ़ता है वही पाता है ॥ 

नाहीं प्रीति भोज सोंह, नाहीं साज सँजोए । 
मीठी बोली बोल के, पाहुन आदर होए ।९४९। 
भावार्थ : -- अतिथि का सत्कार सुरुचित भोजन अथवा साज सज्जा से नहीं अपितु मीठी वाणी से ही होता है ॥ 

संजम सन समरथ जुगे, समरथ सन संजोग । 
संजोग जोगाइ जुगुति, जुगुति जोगाइ जोग ।९५० । 
भावार्थ : -- संयम से ही सामर्थ्य बढ़ता है, सामर्थ्य से कार्य संयोजित होता है । कार्य-संयोजन से युक्तियाँ संकलित होती है, और युक्तियों के संकलन से योग्यता बढती हैं ॥ 
               




शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 110 -----

  विलासिता की साधन स्वरूपा को सजाना मना है.., 
आज पूजा गृहाधार कर उसकी आरती गाना मना है..... 

राजू : -- मास्टर जी! ये क्या लिख रहें हैं ?

" राजू ! कोट बना रहा हूँ "

राजू : -- मास्टर जी ! आप तो हमारे मास्टर जी थे, ये कपड़ों के कारखाने के मास्टर जी कब से हो गए, अच्छा वो छोड़िये तनिक ये तो बताइये ये सेठ लोगों के जनम दिनों में गरीब गरीब लोग काहे आमंत्रित हैं, इनको देख के तो ऐसा गता है जैसे मुग़ल बागीचे में झोपड़े खड़े हों.....राष्ट्र प्रमुखों को आमंत्रित करते तो उत्सव की कुछ शोभा होती....दुइ चार राष्ट्र पति भवन खड़े करते,

" राजू ! राजू !! राजू !!! जदि इनको एतनी बुद्धि होती तो असली सेठ न होते, नकली काहे होते" 

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...