बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९३ ॥ -----

दारिदर कभु खाए लिये, धनिक रहे बिनु खाए । 
मधुरन तिनते दूर रहि, जो सौ रूज लगाए ।९३१। 
भावार्थ : -- दरिद्र तो कभी कभार खा भी लिए किन्तु, धनवान उसे बिना खाए ही रहे । ये मीठाई है न मिठाई जो मीठी मीठी होती है, वह उनसे दूर ही रही जो सौ ठो रोग लगा के बैठे हैं ॥ 

देखे साहन के साह, देखे दासन दास । 
दीन दसा तसहि रहि अब, गवने को उरास ।९३२। 
उड़ास = निवास, दासनिवास 

भावार्थ : -- सम्राटों का युग भी देखा । और ये दासों के दास का युग भी देख लिया ।  अर्थहीन, अर्थ हिन् ही रहे दुखी, दुखी ही रहे अब कौन से दास के घर जाएं ?

चरन सरन तिन कठिन है, जिन भरि कंकर काँट । 
तब औरै दुसह रहि जब, मानस धरि सौ आँट ।९३३। 
भावार्थ : -- उस मार्ग में चलना कठिन है जिस मार्ग में कंकड़ काँटे भरे हो । तब चलना और भी दुसाध्य हो जाता है जब मन संदेह से घिरा हो॥ 

रहिमन बर साहन साह, कबीर डासन दास । 
दोनौ के एक उपदेस, बन तू तल की घास ।९३४। 
भावार्थ : -- अब्दुर्र रहीम खानखाना  के लिए शाहों के शाह श्रेष्ठ है (रहीम अकबर के नौ रत्नों में से एक थे) , संत कबीर ( अति दरिद्र थे)  के लिए दासों का दास श्रेष्ठ है । दोनों का एक ही उपदेश है कि जब तुम्हारे जन संचालन तंत्र का मुखिया खजूर का पेड़ न होकर घास होगा तब ही तुम सुखी रहोगे ॥ 

करुवी बेलि नीम चढ़े, अतिसय करुबर कार । 

बंधे पत सुरभित रहे, गंध राज के सार ।९३५। 
भावार्थ : - करेले की बेल यदि नीम पर चढ़ जाए तो वो उसे और अधिक कड़वा कर देती है । गंध राज : -- चन्दन,अगरु आदि की सार धूप, यदि किसी पत्र से बंधी हो तो वह पत्र भी सुगन्धित हो जाता है । 

अर्थात : -- दुर्गुणी यदि दुर्जन की संगती करे तो उसके दुर्गुणों में वृद्धि होती है । गुणहीन यदि गुणवान की संगती करे तो वह भी उसी गुणवान का स्वरुप धारण कर लेता है ॥ 

जाके संग निकट रहे, वाके संग सुहाए । 
छाई छत पर चाँद छबि, नखत दूरे लखाए ।९३६। 
भावार्थ :  -- साथ उसका ही सुहावना होता है जो निकट हो । छत पर चाँद की छवि छाई रहती है, तारे दूर से ही निहारते रहते हैं ॥ 

 जहाँ धान की संपदा, धनी धन्य सो देस । 
काट कूट कर कोष किए, सो तो कपटी भेस ।९३७ । 
भावार्थ : -- जहां अन्न की सम्पदा है, वही देश वास्तव में धनी है और वही साधू स्वरुप पुण्यात्मा है । जहां आकड़ों में कलाकारी करके कोष भरपूर दर्शाया जाता हो वह देश कपटी और पाखंडी साधू है ॥ 

टीका : -- ऐसे देश के शासक यदि पड़ना जानते हों तो  एक बार मांग पूर्ति का नियम अवश्य पढ़े वास्तु का मूल्य में तब वृद्धि होती है, जब उसकी पूर्ति सतत स्वरुप में नहीं होती ॥ 

खेत खदान भए खनि अन, करषक बँध बनिहारि । 
भूखे मरे तँह जन जन, फुर फरे ब्यापारि ।९३८। 
भावार्थ : -- खेत जहां खदान हो गए और अन्न जहां खनिज हो गया, जहां के किसान बंधवा श्रमिक बन गए । और जन साधारण भूखा मर रहा है, वहाँ के व्यापारी बहुंत फूल फल रहे हैं ॥ (कारण क्या है ?) 

खनि खदान खनन कारन , भूमि भई कल्हार । 
खाद न खादन अन न पसु, खाएं आप को फार ।९३९ । 
भावार्थ : -- खनिज खदानों के खुदने से कृषि भूमि फट पड़ी और बंजर हो गई  है । अब न खाद्य है न खाद्यान है न अन्न बचा न पशु बचे, पेट है खाने को मांगता है तो स्वयं को फाड़ के खा क्यों ? क्योंकि दुसरा तुझसे अधिक हिंसक है तू उसको क्या खाएगा , तो पहले अपना हाथ खा फिर पैर खा ॥ 

बिनइ मुखी नम आचरन, जीउति के पहचान । 
अकड़ी देह गरब मुख, जे तो मरे समान ।९४० । 
भावार्थ : -- विनीत मुख और विनम्र आचरण, जीवितों की पहचान है । अकड़ी हुई देह और मुख पर घमंड यह मरे मुर्दा के समान है ॥   







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