कलाकार को कला की, पी को प्रेम पिपास ।
ब्यौपारी लाह लोभ, किए माया की आस । ९०१।
भावार्थ : -- कलाकार को कला की प्यास रहती है पपीहे को प्रेम की प्यास रहती है । लाभ के लोभी व्यापारी, सदा, विलासिता की साधन स्वरूपा के आस में रहता है ॥
दुजन देइ सो पाहिले, अपना भार उतार ।
कलुखित कारज परिहरत, फेर बने दातार ।९०२।
भावार्थ : -- दूसरों को ऋण देने से पहले स्वयं को ऋण से मुक्त करना चाहिए । और कुकर्मों का परित्याग करके ही दातार बनना चाहिए । ऋणी और कुकर्मी हों तो कैसी महाजनी और काहे का दातारी ॥
चैल चैल अभरन भला, गुरु गरुबर परिधान ।
हेर हेर हेला मिला, फेर मिलाओ तान ।९०३।
भावार्थ : -- शिष्य का चोला ही तन को सुख देता है, गुरु का चोला बोझ सा लगता है ॥ शिष्य का चोला पहन कर अन्य शिष्यों को ढूंढ ढूंढ कर मेल मिलाप करते हुवे फिर उनसे ज्ञान-गोष्ठी करने में आनंद है ॥
भाव भरे तो भाव है, अर्थ धरे सो अर्थ ।
सार वरें सो सार है, बाक़ी सबै ब्यर्थ ।९०४।
भावार्थ : -- जो भाव विभोर करे तो ही उसका मोल है, शब्द अर्थ उत्पन्न करे तो वह शब्द है । सार ग्रहण करने से ही कथन का उद्देश्य है अन्यथा जो कहा वो सब व्यर्थ है केवल पन्ने रंगना है ॥
तूर तुरग गामिन पंथ, रचे खचे का लाह ।
तापर चरन न भए कोउ, तूर गामिनी बाह ।९०५।
भावार्थ : -- चित्त के जैसे तीव्र गामी पथ का निर्माण करने से लाभ क्या है ? जबकि उस पथ पर संचालित करने को कोई तीव्र गामी वाहन ही न हो ॥
आप बड़ाई आप मुख, करे सो चाएँ चाएँ ।
मुख कहि पिहु पयस मयूख, वाके रूप सुहाए ।९०६।
भावार्थ : -- अपनी बड़ाई अपने मुख से करने से वह प्रलाप अर्थात व्यर्थ की बातें हो जाती हैं ॥ जैसे कि कौंवा ।
चन्द्रमा की प्रशंसा पपीहे का मुख करता है तभी वह इतना सुन्दर प्रतीत होता है ॥
काम क्रोध मद अरु लोभ, अभरे बैरी रूप ।
चहुँ पुर जो अंग रच्छक, तव भय धरे सरूप ।९०७।
भावार्थ : - काम, क्रोध, मद और लोभ इन चरों ने ही शत्रुओं का रूप धरा हुवा है । और यदि चारों और अंग रक्षक है तो वह तुम्हारे भय के ही स्वरूप हैं ॥
अर्थात : -- "यदि शत्रु ही न हो तो अंग रक्षकों की क्या आवश्यकता"
खादन छादन राखिये, राखत दान ध्यान ।
तिनको बैरी भाखिये, कलुख करम अरु मान ।९०८।
भावार्थ : -- खाद्यान रखिये ओड़न-बिछान रखिये और साथ में दान का ध्यान रखिये । पर कलुषित कर्म और अभिमान को शत्रु स्वरूप में परिभाषित कर उनसे दूर ही रहिए ॥
प्रभु जी हमरे जीउ के, ऐसो किजौ प्रबंध ।
चन्दन काटे मर मिटे, बिखरी रहे सुगंध ।९१०।
भावार्थ : -- हे ! जगत नियंता तुम हमारे जीवन का कुछ ऐसा प्रबन्ध करना, कि यह चन्दन स्वरूप में जब कट कर मर मिटे तब भी उसकी सुगंध रूपी सद्गुण जगत में व्याप्त रहें ॥
ब्यौपारी लाह लोभ, किए माया की आस । ९०१।
भावार्थ : -- कलाकार को कला की प्यास रहती है पपीहे को प्रेम की प्यास रहती है । लाभ के लोभी व्यापारी, सदा, विलासिता की साधन स्वरूपा के आस में रहता है ॥
दुजन देइ सो पाहिले, अपना भार उतार ।
कलुखित कारज परिहरत, फेर बने दातार ।९०२।
भावार्थ : -- दूसरों को ऋण देने से पहले स्वयं को ऋण से मुक्त करना चाहिए । और कुकर्मों का परित्याग करके ही दातार बनना चाहिए । ऋणी और कुकर्मी हों तो कैसी महाजनी और काहे का दातारी ॥
चैल चैल अभरन भला, गुरु गरुबर परिधान ।
हेर हेर हेला मिला, फेर मिलाओ तान ।९०३।
भावार्थ : -- शिष्य का चोला ही तन को सुख देता है, गुरु का चोला बोझ सा लगता है ॥ शिष्य का चोला पहन कर अन्य शिष्यों को ढूंढ ढूंढ कर मेल मिलाप करते हुवे फिर उनसे ज्ञान-गोष्ठी करने में आनंद है ॥
भाव भरे तो भाव है, अर्थ धरे सो अर्थ ।
सार वरें सो सार है, बाक़ी सबै ब्यर्थ ।९०४।
भावार्थ : -- जो भाव विभोर करे तो ही उसका मोल है, शब्द अर्थ उत्पन्न करे तो वह शब्द है । सार ग्रहण करने से ही कथन का उद्देश्य है अन्यथा जो कहा वो सब व्यर्थ है केवल पन्ने रंगना है ॥
तूर तुरग गामिन पंथ, रचे खचे का लाह ।
तापर चरन न भए कोउ, तूर गामिनी बाह ।९०५।
भावार्थ : -- चित्त के जैसे तीव्र गामी पथ का निर्माण करने से लाभ क्या है ? जबकि उस पथ पर संचालित करने को कोई तीव्र गामी वाहन ही न हो ॥
आप बड़ाई आप मुख, करे सो चाएँ चाएँ ।
मुख कहि पिहु पयस मयूख, वाके रूप सुहाए ।९०६।
भावार्थ : -- अपनी बड़ाई अपने मुख से करने से वह प्रलाप अर्थात व्यर्थ की बातें हो जाती हैं ॥ जैसे कि कौंवा ।
चन्द्रमा की प्रशंसा पपीहे का मुख करता है तभी वह इतना सुन्दर प्रतीत होता है ॥
काम क्रोध मद अरु लोभ, अभरे बैरी रूप ।
चहुँ पुर जो अंग रच्छक, तव भय धरे सरूप ।९०७।
भावार्थ : - काम, क्रोध, मद और लोभ इन चरों ने ही शत्रुओं का रूप धरा हुवा है । और यदि चारों और अंग रक्षक है तो वह तुम्हारे भय के ही स्वरूप हैं ॥
अर्थात : -- "यदि शत्रु ही न हो तो अंग रक्षकों की क्या आवश्यकता"
खादन छादन राखिये, राखत दान ध्यान ।
तिनको बैरी भाखिये, कलुख करम अरु मान ।९०८।
भावार्थ : -- खाद्यान रखिये ओड़न-बिछान रखिये और साथ में दान का ध्यान रखिये । पर कलुषित कर्म और अभिमान को शत्रु स्वरूप में परिभाषित कर उनसे दूर ही रहिए ॥
प्रभु जी हमरे जीउ के, ऐसो किजौ प्रबंध ।
चन्दन काटे मर मिटे, बिखरी रहे सुगंध ।९१०।
भावार्थ : -- हे ! जगत नियंता तुम हमारे जीवन का कुछ ऐसा प्रबन्ध करना, कि यह चन्दन स्वरूप में जब कट कर मर मिटे तब भी उसकी सुगंध रूपी सद्गुण जगत में व्याप्त रहें ॥
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