मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ८९ ॥ -----

मानख के चारन चरन, मानस की पहचान । 
नहीं तो का मनु का पसु, दोउ एकै समान। ८९१। 
भावार्थ : -- मनुष्य के के जप, तप, व्रत, नियमादि शुभ धर्म आचार उसके मनुष्य होने का परिचय है अन्यथा क्या मनुष्य और क्या पशु दोनों एक ही स्वरूप हैं ॥  

भरी भावना बहुस ही, भई कोउ साकार । 
देखे सुपने सहस ही, पर लिए न एक अकार ।८९२। 
भावार्थ : -- मनुष्य के चित्त में बहुंत प्रकार की कल्पनाएँ समाई रहती हैं, जिनमें कोई साकार भी हो जाती है । अमन सहस्त्रों स्वप्न भी देखता है (चूँकि यह जीवन की चार अवस्थाओं : -- जागृत, स्वप्न,सुषुप्ति, तुरीय में से एक अवस्था है) किन्तु आकृत एक भी नहीं होते ॥  

पढ़े बिना पोथी पोट , जोगवना तस होत । 
जस उपजोग जाने बिन, गर्दभ चन्दन ढोत ।८९३। 
भावार्थ : --  बिना पढ़े पुस्तकों का संग्रहण उस गधे के आचरण के समान प्रतीत होता है । जो चन्दन के भार को ढोता हुवा उसके उपयोग को नहीं जानता ॥ 

जगत दिवाकर चाहिते, करन चहुँत अँजोर । 
चिद घन ज्ञान जोत जगा, ध्यान द्रव कर जोर ।८९४। 
भावार्थ : --  अज्ञान का अन्धकार व्याप्त है, संसार इस अंधरे को दूर करने हेतु ज्ञान के सूर्य की कामना कर रहा है । तू अंतस स्वरूप में ध्यान और ज्ञान के साधनों को संयुक्त करके ज्ञान की ज्योति जागृत कर ॥ 

बार बार जौ फार देइँ, भूमि तिन्ह तरु सोइ । 
जे जलावनु जोर लेइँ,  बार मह भसम होइ ।८९५। 
भावार्थ : -- डोली (खेत) ऐसे गाछ के समान है जो बार बार फल देती है । गाछ को काट पिट के ईंधन बना दिया और डोली को बेच-खेच के धन बना दिया, फिर दोनों एके बार में भस्म हो जाएंगे ॥ 

एसो धन्य भयऊ सबै, जैसो मैं धनबान । 
एसो दरिद न कोउ लहैं, जैसो मैं दरिदान ।८९६। 
भावार्थ :-- ऐसे धनी सब हों, जैसा में धनवान हूँ । ऐसी दरिद्रता किसी को प्राप्त न हो, जैसी मुझे प्राप्त है ॥  

मधु कारी संचइ कोष, दोनौ एक सों होइ । 
उपजोग कारै कोई, बूँद बूँद को जोइ ।८९७ । 
भावार्थ : -- पोथी, धन, और मधु के संचय कर्त्ता का कोष एक समान होता है । बूंद बूंद कर संग्रह कोई करता है, और उपयोग कोई ॥ 

तीर तमाल को गाछ, चरे गाय अरु बाछ । 
जँह जमुना उच्छरित तँह, मीठी लागे छाछ ।८९८ । 
भावार्थ : -- जिसके तट पर तमाल वृक्ष हों, गाँय और बछड़े विचर रहे हों ।  जहाँ यमुना तरंगित हो रही हो, वहाँ खट्टी छाछ भी मीठी लगती है ॥ 

आजुध बिलगन  न चाहिए, रन कारिन निज काइ । 
सत्रु कार निवहरन हुँते , एक पलकहु अधिकाइ ।८९९। 
भावार्थ : -- योद्धा के शरीर से उसके अस्त्र-शस्त्र वियुक्त नहीं होने चाहिए । क्योंकि शत्रु को  अंत करने के लिए एक क्षण का समय भी अधिक होता है ॥ 

कन उपजे धर्म उपजे , धन उपजे अभिसाप । 
जे भूमिहि रन जगियाए, प्राण जाए सो पाप ।९००। 
भावार्थ : -- अन्न  की व्युत्पत्ति  से धर्म अर्थात दया उत्पन्न होती है, क्योंकि अन्न जीवों के प्राणों की रक्षा करता है । धन की उत्पत्ति से  अभिशाप उत्पन्न होता है , यदि भूमि में युद्ध उत्पन्न हो जाए तो वह प्राणों की आहुति लेता है, और फिर पाप उत्पन्न होता है ॥     



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