कारज तत्पर कीजिये, कार उसार सुहाए ।
साँस पर साँस लीजिये, भूल परे पछिताए ।८४१।
भावार्थ : -- कार्यों को तत्परता से करना चाहिए क्योंकि कार्य पूर्ण किये हुवे ही अच्छे लगते हैं, आधे अधूरे नहीं ।सांस के ऊपर सांस लेना चाहिए यदि यह भूल गए फिर पछतावा रह जाएगा ॥
ना काया नाहि कंचन, नाहि रतन धन धाम ।
ना प्रियजन नाहि परिजन, मर पर गए सद काम ।८४२।
भावार्थ : -- न शरीर, न स्वर्ण न कोई रत्न न धन-संपत्ति न प्रियजन ना ही परिजन जाते हैं मृत्यु के पश्चात केवल सद्कार्य ही साथ जाते हैं ॥
तन से सेवा कीजिये, मन से कीजै नेह ।
मुख रसन सन प्रियंवदन, जे बिन धन के देह ।८४३।
भावार्थ : -- तन से लोकोपकार कीजिए, मन से सनेह कीजिए, जिह्वा से मधुर वचन कहिये, ये बिना धन के दान हैं ॥
जिन हूँते लोहन कंचन, रतन काँच सों होइ ।
जिन हूँटी प्रभूत रति मान, साधु संत कह सोइ ।८४४।
भावार्थ : -- जिनके लिए सोना भी सामान्य धातु के समान हो, रत्न कांच के मान हो, जिनके लिए प्रचुरता रत्ती भर हो वही व्यक्ति सदाचारी एवं विद्वान कहलाता है ॥
कन कन मैं भगवन बसे, जान तिन रे अजान ।
तनिक छन अभिज्ञान करत, तनिक छन अभिध्यान ।८४५।
भावार्थ : -- ईश्वर का वास कण कण में है । अरे मूर्ख अज्ञानी तू इसका संज्ञान लेकर, कुछ क्षण उस ईश्वर की स्मरण करते हुवे कुछ क्षण उसकी वर्ण-व्याख्या का चिंतन कर ॥
पहिले पिता दूजा पुत, फिर जावेगा पोत ।
केतै जोग जुगबन कर, केतै कतर ब्योंत।८४६।
भावार्थ : -- पलां बाउजी, दूसरियो पुत, फेर जाओगो पोतो ।बिका कितणों राखणों राखो, जोड़ो तोड़ो पण जाणों तो पड़सी ॥
भाखा कौनौ भाखिये, चाहे रँह को देस ।
सद गुन गन मन राखिये, धारे तन को भेस ।८४७।
भावार्थ : -- भाषा कोई भी भाषें, चाहे किसी भी स्थान में निवास करें । किसी भी वेश को धारण करें किन्तु चित्त में सदा सदगुण एवं लक्षणों का वास हो ॥
जाके चित चारारि बस, वाके ऊंचे बास ।
दरसत तिन कृत कौतुकी, भँरमत नीच निबास ।८४८।
भावार्थ : -- देश, काल, और परिस्थिति ऐसी है कि जिसका चित्त चार शत्रु ( काम,क्रोध,मद,लोभ ) के वश में है उसी का ऊंचा स्थान है । और उसकी बनावटी कौतुहल (तमाशा) को देख नीचे बैठे लोग भ्रमित हैं॥
बिना घृत का जोत जरी, मिली उपज बिनु बोइ ।
बिना भाव भगति के जोग सेवा सुफल न होइ ।८४९।
भावार्थ : -- बिना घृत के कहीं ज्योति प्रज्वलित होती है, बिना वपन के कहीं उपज प्राप्त होती है । भाव और श्रम साधना से रहित सेवा भी सफल नहीं होती ॥
धन न धान न अधर्म ना, छूटे हठ अभिमान ।
छूटे सब क्रिया कलाप,छूटेंगे जब प्रान ।८५०।
भावार्थ : -- धन न छूटा, संपत्ति न छूटी, दूषित कर्म नही छूटे, हठ छूटा न अहंकार छूटा । जब प्राण छूटेंगे तभी ये सारे क्रिया, कार्यक्रम छूटे ।
साँस पर साँस लीजिये, भूल परे पछिताए ।८४१।
भावार्थ : -- कार्यों को तत्परता से करना चाहिए क्योंकि कार्य पूर्ण किये हुवे ही अच्छे लगते हैं, आधे अधूरे नहीं ।सांस के ऊपर सांस लेना चाहिए यदि यह भूल गए फिर पछतावा रह जाएगा ॥
ना काया नाहि कंचन, नाहि रतन धन धाम ।
ना प्रियजन नाहि परिजन, मर पर गए सद काम ।८४२।
भावार्थ : -- न शरीर, न स्वर्ण न कोई रत्न न धन-संपत्ति न प्रियजन ना ही परिजन जाते हैं मृत्यु के पश्चात केवल सद्कार्य ही साथ जाते हैं ॥
तन से सेवा कीजिये, मन से कीजै नेह ।
मुख रसन सन प्रियंवदन, जे बिन धन के देह ।८४३।
भावार्थ : -- तन से लोकोपकार कीजिए, मन से सनेह कीजिए, जिह्वा से मधुर वचन कहिये, ये बिना धन के दान हैं ॥
जिन हूँते लोहन कंचन, रतन काँच सों होइ ।
जिन हूँटी प्रभूत रति मान, साधु संत कह सोइ ।८४४।
भावार्थ : -- जिनके लिए सोना भी सामान्य धातु के समान हो, रत्न कांच के मान हो, जिनके लिए प्रचुरता रत्ती भर हो वही व्यक्ति सदाचारी एवं विद्वान कहलाता है ॥
कन कन मैं भगवन बसे, जान तिन रे अजान ।
तनिक छन अभिज्ञान करत, तनिक छन अभिध्यान ।८४५।
भावार्थ : -- ईश्वर का वास कण कण में है । अरे मूर्ख अज्ञानी तू इसका संज्ञान लेकर, कुछ क्षण उस ईश्वर की स्मरण करते हुवे कुछ क्षण उसकी वर्ण-व्याख्या का चिंतन कर ॥
पहिले पिता दूजा पुत, फिर जावेगा पोत ।
केतै जोग जुगबन कर, केतै कतर ब्योंत।८४६।
भावार्थ : -- पलां बाउजी, दूसरियो पुत, फेर जाओगो पोतो ।बिका कितणों राखणों राखो, जोड़ो तोड़ो पण जाणों तो पड़सी ॥
भाखा कौनौ भाखिये, चाहे रँह को देस ।
सद गुन गन मन राखिये, धारे तन को भेस ।८४७।
भावार्थ : -- भाषा कोई भी भाषें, चाहे किसी भी स्थान में निवास करें । किसी भी वेश को धारण करें किन्तु चित्त में सदा सदगुण एवं लक्षणों का वास हो ॥
जाके चित चारारि बस, वाके ऊंचे बास ।
दरसत तिन कृत कौतुकी, भँरमत नीच निबास ।८४८।
भावार्थ : -- देश, काल, और परिस्थिति ऐसी है कि जिसका चित्त चार शत्रु ( काम,क्रोध,मद,लोभ ) के वश में है उसी का ऊंचा स्थान है । और उसकी बनावटी कौतुहल (तमाशा) को देख नीचे बैठे लोग भ्रमित हैं॥
बिना घृत का जोत जरी, मिली उपज बिनु बोइ ।
बिना भाव भगति के जोग सेवा सुफल न होइ ।८४९।
भावार्थ : -- बिना घृत के कहीं ज्योति प्रज्वलित होती है, बिना वपन के कहीं उपज प्राप्त होती है । भाव और श्रम साधना से रहित सेवा भी सफल नहीं होती ॥
धन न धान न अधर्म ना, छूटे हठ अभिमान ।
छूटे सब क्रिया कलाप,छूटेंगे जब प्रान ।८५०।
भावार्थ : -- धन न छूटा, संपत्ति न छूटी, दूषित कर्म नही छूटे, हठ छूटा न अहंकार छूटा । जब प्राण छूटेंगे तभी ये सारे क्रिया, कार्यक्रम छूटे ।
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