सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 92॥ -----

लोक चरन बिपरीत जब, सासन नीति रचाएँ । 
बरजत बिरोध जता तब, तिन पालन बिसराएँ ।९२०। 
भावार्थ : -- जब शासन की नीतियां लोक व्यवहार के विरुद्ध हों । तब पालनकर्त्ता द्वारा उन  नीतियों का पालन न करते हुवे उनके परिरोधन हेतु उनपर विरोध व्यक्त करना चाहिए (और जब पूरा शासन ही कुनीतिज्ञ हो तो व्यवस्था परिवर्तन हेतु अग्रसर होना चाहिए)॥ 

दान दिया जल तिसित पान, काम लिया अन्हान । 
दिए दुरुपजोग हो जहाँ, तहाँ न कीजिए दान ।९२१। 
भावार्थ : --   जल का दान तो इस हेतु किया कि प्यासे की प्यास बूझे, पर वह स्नान के काम लिया गया ॥ तात्पर्य है कि, सुबुद्धि जन को वहाँ दान नहीं करना चाहिए जहां इसका दुरुपयोग हो ॥ 

घटे काज न किजीए चहे, बढ़े घटे दिन मान । 
हरिचंद मरत मरी गए, छुटी न सत की कान ।९२३।  
भावार्थ : -- बुरा समय हो चाहे अच्छा किन्तु कभी घटिया कार्य नहीं करने चाहिए ।  राजा हरिश्चंद्र मरते मर गए किन्तु उन्होंने सत्य का नियम नहीं छोड़ा ॥ 

सीस दस अरु बीस भुजा, रावन पद रहि दोउ । 
रीस तस तीस रुजा पर , झूठ के पद न होइ ।९२४। 
भावार्थ : -- सिर दस ठो और भुजा बीस ठो किन्तु रावण के पैर दुइ ठो थे ॥ उसी की प्रतिलिपि स्वरुप, झूठ की तलहटी में तीस ठो रोग होते हैं, किन्तु उसके पैर नहीं होते ॥ 

कलंकित के काल चढ़त चोखा आपन काल । 
जूँ जमुना के जल छाइ, रंजन रहे तमाल ।९२५। 
भावार्थ : -- कलंकित व्यक्ति पर अपना दोष भी भली प्रकार से मढ़ा जा सकता है । जैसे जमुना के काले जल में तमाल वृक्ष की काली छाया प्रदर्शित नहीं होती ॥ 

धुनी द्युति गति धीर धरि, चित की तेजसबान । 
बिपल मह गगन भंवर लै, बैसत पलक बिमान ।९२६। 
भावार्थ : -- ध्वनी और प्रकाश की गति मंद है, किन्तु मन की गति अति तीव्र है । यह पलक के विमान में विराजित होकर बिपल के अंतर्गत ही पूरा ब्रम्हांड घूम आता है ॥ 

टीका : -- विपल = समय का अबतक का सबसे लघु मान । १ सेकंड = २.५ विपल , २४ सेकण्ड के बराबर एक पल होता है, ६० विपल =१ पल 

सोवत सोइ खोवत है, जागे जोई पाए । 
सोवन अंक जड़ती के, जागे चित चेताए ।९२७। 
भावार्थ : -- सुप्तावस्था में बहुंत कुछ छुट जाता है, जागृत अवस्था में अप्राप्य भी प्राप्य है ॥ सुषुप्तावस्था जड़त्व के लक्षण है, जागृति चैतन्यता का चिन्ह है ॥ 

ब्यतीत ब्यत गत समय , जो हो मसि मलिनाए । 
बीतत पल निर्मल करे, होनिहार उजराए ।९२८। 
भावार्थ : -- इतिहास की मलिनता को वर्तमान से धोया जाए, तो कल का इतिहास अवश्य ही उज्जवल होगा ॥ 

जिनके कँधे सकल उठे, भए जग जिउता सोइ । 
आपइ उठान उठौना , सो तो सव सम होइ ।९२९। 

भावार्थ : -- जिसके कंधे उठा कर सभी गए संसार में वही जीवित स्वरुप है । जो केवल स्वयं को ही  उठाने में प्रवृत्त रहा वह शव के समान है ।। 

बिलासिता रस भोग मह, रहे सदा रत आप । 
अब पथ जोगत को तरे, करन जगत उद्धाप ।९३०। 
भावार्थ : -- हम स्वयं सदैव विलासिता,रस एवं भोगों में आसक्त रहे । अब बैठे प्रतीक्षा कर रहें हैं कि, कोई प्रभु अवतार लें और सब कुछ ठीक कर दें ॥ 

अर्थात : - "जब विकार हम से उत्पन्न हुवे हैं, सुधारना भी हमें ही होगा"


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