रविवार, 27 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 91॥ -----

दोष धरे दृष्टी द्रोन, किये भिषक उपचार । 
दोष बरे दृष्टि कोन, वाके कौन सुधार।९११।  
  ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- यदि दृष्टी की कठौती में दोष हो तो उसका उपचार नेत्र चिकित्सक कर देगा । किन्तु जब दृष्टी कोण में दोष हो तो उसका सुधारक कौन हो ॥

संस्कार अरु संस्कृति, जीवन की एक बानि । 
जामे सदियाँ जुगी रहि, बन समाज के छानि ।९१२ । 
  ----- ॥ राम धारी सिंह दिनकर ॥ -----
भावार्थ : -- सस्कार एवं संस्कृति जीवन की रीतियाँ हैं,जिसमें सदियाँ संचयित होकर समाज पर छाई रहती हैं ॥

बिंदु में जो सिंधु लिखे, कहत बाग्मय सोइ । 
सिंधु में जो बिंदु लिखे, सो तो प्रलाप होइ ।९१३।
 ----- ॥ नीति द्विषाष्टिका॥ -----
भावार्थ : -- जो थोड़े शब्दों में सुन्दर बात कहता है, वह वाग्मी है । बहुंत से वचनो द्वारा किंचित सार कहने वाला विप्रलापी ही है ॥

जाके पहि न्यूनाधिक, निर्धन नाहीं सोइ । 
जोइ लहे अधिकाधिक, सोई निर्धन होइ ।९१४। 
 ----- ॥ सैनेका ॥ -----
भावार्थ : -- "वह व्यक्ति निर्धन नहीं है, जिसके पास थोड़ा-बहुंत है । निर्धन तो वह है जो अधिकाधिक के लिए लालायित रहता है "

सिंह गुहा बाघ घनबन, हंस कमलिन प्रसंग । 
कुजन चाहे कुजन साथ, सदजन सद्जन संग ।९१५। 
                ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- "सिंह गुफा का, बाघ गहन वन का, हंस सुन्दर कलिनियों का प्रसंग चाहते है । उसी प्रकार कदाचारी, कदाचारियों का एवं सदाचारी सदाचारियों का संग चाहता है"

रुखा हारे प्रेम सोंह, पाप सोंह सदाचार । 
लाह हारे दान सोंह, मिथक बचन सत सार ।९१६। 
 ----- ॥ गौतम बुद्ध ॥ -----
भावार्थ : -- "रोष, प्रेम से हारता है, पाप सदाचार से हारता है । लोभ दान देने से हारता है, मिथ्या वचन सत्य के सार वचनों से हारता है"

टीका : -- ओभ में संशय है, लोभ संयम से हारता है ।

सुहंगम ह्रदय मुकुति सों, देह भवन सों सीप । 
सुहंगम मह लावन श्री, सुहँगा साँच समीप ।९१७। 
                ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- सरल ह्रदय मुक्ता सरिस है देह-भवन सीप सरिस है । सरलता में महान सौन्दर्य बसता है जो सरल है वह सत्य अर्थात ईश्वर के निकट है ॥ 

जेइ जगत मैं मलिनतम, सुवारथ सम न कोइ । 
अगजग के अवगुन गहे, जो सुवारथी होइ ।९१८। 
 ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- इस संसार में स्वार्थ के सदृश्य मलिनतम कोई नहीं है । स्वार्थी जन समस्त चराचर के अवगुण ग्रहण किये होते हैं ॥ 

भगवन कहीं नाहीं है, सोइ कथन सर्बग्य । 
भगवन है कि नाहीं है, सोइ बचन अल्पग्य ।९१९। 
 ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- 'ईश्वर कहीं नहीं है' यह कथन सर्वज्ञ है अर्थात जो यह कहता है वह सर्व ज्ञानी स्वरुप में गुरु है । 'ईश्वर है कि नहीं है' यह वचन अल्पज्ञ है अर्थात जो यह कहता है वह अल्पज्ञानी रूप में जिज्ञासु है ॥ 

मनु जोनि बर देश काल, मिलै बहस कठनाए । 
जेइ जोग जब जोगिते, भव सागर तर जाएँ ।920। 
                    ----- || अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य योनि और उत्तम देश, काल एवं परिस्थिति का एक साथ मिलना अति दुर्लभ है ॥ यदि मनुष्य योनि का योग प्राप्त हो, उत्तम देश काल एवं परिस्थितियां का संयोग मिले तो कल्याण करते हुवे इस संसार के बंधन से मुक्त हो जाना चाहिए  ॥ 

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