दोष धरे दृष्टी द्रोन, किये भिषक उपचार ।
दोष बरे दृष्टि कोन, वाके कौन सुधार।९११।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- यदि दृष्टी की कठौती में दोष हो तो उसका उपचार नेत्र चिकित्सक कर देगा । किन्तु जब दृष्टी कोण में दोष हो तो उसका सुधारक कौन हो ॥
संस्कार अरु संस्कृति, जीवन की एक बानि ।
जामे सदियाँ जुगी रहि, बन समाज के छानि ।९१२ ।
----- ॥ राम धारी सिंह दिनकर ॥ -----
भावार्थ : -- सस्कार एवं संस्कृति जीवन की रीतियाँ हैं,जिसमें सदियाँ संचयित होकर समाज पर छाई रहती हैं ॥
बिंदु में जो सिंधु लिखे, कहत बाग्मय सोइ ।
सिंधु में जो बिंदु लिखे, सो तो प्रलाप होइ ।९१३।
----- ॥ नीति द्विषाष्टिका॥ -----
भावार्थ : -- जो थोड़े शब्दों में सुन्दर बात कहता है, वह वाग्मी है । बहुंत से वचनो द्वारा किंचित सार कहने वाला विप्रलापी ही है ॥
जाके पहि न्यूनाधिक, निर्धन नाहीं सोइ ।
जोइ लहे अधिकाधिक, सोई निर्धन होइ ।९१४।
----- ॥ सैनेका ॥ -----
भावार्थ : -- "वह व्यक्ति निर्धन नहीं है, जिसके पास थोड़ा-बहुंत है । निर्धन तो वह है जो अधिकाधिक के लिए लालायित रहता है "
सिंह गुहा बाघ घनबन, हंस कमलिन प्रसंग ।
कुजन चाहे कुजन साथ, सदजन सद्जन संग ।९१५।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- "सिंह गुफा का, बाघ गहन वन का, हंस सुन्दर कलिनियों का प्रसंग चाहते है । उसी प्रकार कदाचारी, कदाचारियों का एवं सदाचारी सदाचारियों का संग चाहता है"
रुखा हारे प्रेम सोंह, पाप सोंह सदाचार ।
लाह हारे दान सोंह, मिथक बचन सत सार ।९१६।
----- ॥ गौतम बुद्ध ॥ -----
भावार्थ : -- "रोष, प्रेम से हारता है, पाप सदाचार से हारता है । लोभ दान देने से हारता है, मिथ्या वचन सत्य के सार वचनों से हारता है"
टीका : -- ओभ में संशय है, लोभ संयम से हारता है ।
सुहंगम ह्रदय मुकुति सों, देह भवन सों सीप ।
सुहंगम मह लावन श्री, सुहँगा साँच समीप ।९१७।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- सरल ह्रदय मुक्ता सरिस है देह-भवन सीप सरिस है । सरलता में महान सौन्दर्य बसता है जो सरल है वह सत्य अर्थात ईश्वर के निकट है ॥
जेइ जगत मैं मलिनतम, सुवारथ सम न कोइ ।
अगजग के अवगुन गहे, जो सुवारथी होइ ।९१८।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- इस संसार में स्वार्थ के सदृश्य मलिनतम कोई नहीं है । स्वार्थी जन समस्त चराचर के अवगुण ग्रहण किये होते हैं ॥
भगवन कहीं नाहीं है, सोइ कथन सर्बग्य ।
भगवन है कि नाहीं है, सोइ बचन अल्पग्य ।९१९।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- 'ईश्वर कहीं नहीं है' यह कथन सर्वज्ञ है अर्थात जो यह कहता है वह सर्व ज्ञानी स्वरुप में गुरु है । 'ईश्वर है कि नहीं है' यह वचन अल्पज्ञ है अर्थात जो यह कहता है वह अल्पज्ञानी रूप में जिज्ञासु है ॥
मनु जोनि बर देश काल, मिलै बहस कठनाए ।
जेइ जोग जब जोगिते, भव सागर तर जाएँ ।920।
----- || अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य योनि और उत्तम देश, काल एवं परिस्थिति का एक साथ मिलना अति दुर्लभ है ॥ यदि मनुष्य योनि का योग प्राप्त हो, उत्तम देश काल एवं परिस्थितियां का संयोग मिले तो कल्याण करते हुवे इस संसार के बंधन से मुक्त हो जाना चाहिए ॥
दोष बरे दृष्टि कोन, वाके कौन सुधार।९११।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- यदि दृष्टी की कठौती में दोष हो तो उसका उपचार नेत्र चिकित्सक कर देगा । किन्तु जब दृष्टी कोण में दोष हो तो उसका सुधारक कौन हो ॥
संस्कार अरु संस्कृति, जीवन की एक बानि ।
जामे सदियाँ जुगी रहि, बन समाज के छानि ।९१२ ।
----- ॥ राम धारी सिंह दिनकर ॥ -----
भावार्थ : -- सस्कार एवं संस्कृति जीवन की रीतियाँ हैं,जिसमें सदियाँ संचयित होकर समाज पर छाई रहती हैं ॥
बिंदु में जो सिंधु लिखे, कहत बाग्मय सोइ ।
सिंधु में जो बिंदु लिखे, सो तो प्रलाप होइ ।९१३।
----- ॥ नीति द्विषाष्टिका॥ -----
भावार्थ : -- जो थोड़े शब्दों में सुन्दर बात कहता है, वह वाग्मी है । बहुंत से वचनो द्वारा किंचित सार कहने वाला विप्रलापी ही है ॥
जाके पहि न्यूनाधिक, निर्धन नाहीं सोइ ।
जोइ लहे अधिकाधिक, सोई निर्धन होइ ।९१४।
----- ॥ सैनेका ॥ -----
भावार्थ : -- "वह व्यक्ति निर्धन नहीं है, जिसके पास थोड़ा-बहुंत है । निर्धन तो वह है जो अधिकाधिक के लिए लालायित रहता है "
सिंह गुहा बाघ घनबन, हंस कमलिन प्रसंग ।
कुजन चाहे कुजन साथ, सदजन सद्जन संग ।९१५।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- "सिंह गुफा का, बाघ गहन वन का, हंस सुन्दर कलिनियों का प्रसंग चाहते है । उसी प्रकार कदाचारी, कदाचारियों का एवं सदाचारी सदाचारियों का संग चाहता है"
रुखा हारे प्रेम सोंह, पाप सोंह सदाचार ।
लाह हारे दान सोंह, मिथक बचन सत सार ।९१६।
----- ॥ गौतम बुद्ध ॥ -----
भावार्थ : -- "रोष, प्रेम से हारता है, पाप सदाचार से हारता है । लोभ दान देने से हारता है, मिथ्या वचन सत्य के सार वचनों से हारता है"
टीका : -- ओभ में संशय है, लोभ संयम से हारता है ।
सुहंगम ह्रदय मुकुति सों, देह भवन सों सीप ।
सुहंगम मह लावन श्री, सुहँगा साँच समीप ।९१७।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- सरल ह्रदय मुक्ता सरिस है देह-भवन सीप सरिस है । सरलता में महान सौन्दर्य बसता है जो सरल है वह सत्य अर्थात ईश्वर के निकट है ॥
जेइ जगत मैं मलिनतम, सुवारथ सम न कोइ ।
अगजग के अवगुन गहे, जो सुवारथी होइ ।९१८।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- इस संसार में स्वार्थ के सदृश्य मलिनतम कोई नहीं है । स्वार्थी जन समस्त चराचर के अवगुण ग्रहण किये होते हैं ॥
भगवन कहीं नाहीं है, सोइ कथन सर्बग्य ।
भगवन है कि नाहीं है, सोइ बचन अल्पग्य ।९१९।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- 'ईश्वर कहीं नहीं है' यह कथन सर्वज्ञ है अर्थात जो यह कहता है वह सर्व ज्ञानी स्वरुप में गुरु है । 'ईश्वर है कि नहीं है' यह वचन अल्पज्ञ है अर्थात जो यह कहता है वह अल्पज्ञानी रूप में जिज्ञासु है ॥
मनु जोनि बर देश काल, मिलै बहस कठनाए ।
जेइ जोग जब जोगिते, भव सागर तर जाएँ ।920।
----- || अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य योनि और उत्तम देश, काल एवं परिस्थिति का एक साथ मिलना अति दुर्लभ है ॥ यदि मनुष्य योनि का योग प्राप्त हो, उत्तम देश काल एवं परिस्थितियां का संयोग मिले तो कल्याण करते हुवे इस संसार के बंधन से मुक्त हो जाना चाहिए ॥
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