रविवार, 20 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 88॥ -----

प्रभु के पूरन काम कर, पुरइ तिन्ही कहान । 
मानख मरते मरी गए, भइ न बाक़ी बखान ।८८१। 
भावार्थ : -- भगवान् श्री राम की मनोकामनाएं पूर्ण हुई उनकी कथा भी पूर्ण हुई । किन्तु ये मनुस जात है न  वो मरते मर गए न  उनकी अभिलाषाएं पूर्ण हुई न कथा ॥   

प्रीत प्रतीत सों बढ़के, नाही कोई रीति । 
मौनी मुद्रा सों बढ़के, ना कोउ रहस नीति ।८८२। 
भावार्थ : -- प्रेम-विश्वास, से बढ़कर कोई रीति नहीं है । "मौन-भाव से बढ़कर कोई गुप्त-नीति नहीं है " : -- श्रीमद्भागवद्गीता ॥ 

नैस अनैस दोइ सोह, मानस सरन बिचार । 
जाकी जैसी भावना , तैसे चरन प्रस्तार ।८८३। 
भावार्थ : -- मस्तिष्क के मार्ग में शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के विचार होते हैं । जिस व्यक्ति की जैसी भावना रहती है अर्थात जो हित-अहित जैसे कारक चाहता है,फिर ( समाज में) वैसे विचार ही प्रसारित होते हैं ॥ 

चंदन पीपर नीम बट, समरूप लाग जराए । 
राज हो की कोउ रंक,एक सों मेट मिटाए ।८८४। 
भावार्थ : -- लकड़ी चन्दन की हो, पीपल की हो नीम की हो , वट की हो, अथवा कोई भी क्यूँ न हो अग्नि सबको समान रूप से जलाती है । राजा हो, मंत्री हो, धनी हो, निर्धन हो, चाहे कोई भी क्यूँ न हो मिट्टी सबको समान रूप से मिटाती है ॥ 

लाया ना कछु संग मैं, फिर कैसा अभिमान । 
जिउहु पराई देन है, फिर काहे का दान ।८८५। 
भावार्थ : -- यह जगत विदित है , कि तू साथ कुछ भी नहीं लाया । फिर अभिमान किस बात का ? तेरा यह जीवन भी दूजे की दें है फिर इसका देना, दान कहाँ हुवा ॥ 

जे जग तेरो आपनौ, ते मन ज्ञान निधान । 
बिन बिन के तिन बावरे, बढ़ चढ़ के दे दान ।८८६। 
भावार्थ : -- इस संसार में तेरा कुछ अपना है तो वह तेरा चिद घन कोष है । अरे अबोध ! उसे तू चुग चुग के उत्साह पूर्वक दान कर, फिर देख ॥  

बिषय बतासे के रसन, मुख लागै अति रास । 
ऐसे रस कस परिहरै, चरत चरन उपबास ।८८७। 
भावार्थ : -- भोग विलास की वस्तुओं के बतासे मुख को में अति सुस्वादु लगते हैं । ऐसे रसों को किस विधि से छोड़ें ?उपवास का आचरण ग्रहण करके ( जैसे : -- एक स्त्री व्रत करके पराई स्त्री के आकर्षण का त्याग किया जा सकता है ) ॥  

दिवस जामि दुइ पखबार, जोगत आठों जाम । 
दोइ साँचे रूप धरे, सेष भरम के नाम ।८८८। 
भावार्थ : - दिन और रात, चौबीस घंटे के योग में यही दो पक्ष है । ये दो ही सत्य स्वरूप हैं, शेष सभी भ्रम का नाम हैं ॥

पदक परधान पाए कै, पाए पंच परिधान । 
सुरतें बिषय बिलासिता, भूरे धान किसान ।८८९। 

भावार्थ : -- जब उच्च स्थान प्राप्त हो जाता है न, तो बढ़िया बढ़िया खाना, बढ़िया बढ़िया पहनना, बढ़िया बढ़िया रहना, बढ़िया बढ़िया उड़ना, और जाके बढ़िया बढ़िया लोगो के साथ हाथ मिलाने को मिलता है ( केवल हाथ ही मिलाते हैं अन्यथा उनसे अधिक वार्तालाप और कार्य, अंतर जाल अर्थात नेट में हो जाती हैं ,ये इसी लिए बना है की आप व्यर्थ में न उड़ें ) और प्रत्येक क्षण भोग विलासिता का ही स्मरण रहता है , फिर गाँव, धान, खेत खलिहान, और किसान सब भूल जाते हैं ॥

कंटक कटु कोमल कुसुम, एकै डारी प्रफूर । 
जाके जैसे गुन धर्म, वाके वैसे मूल ।८९०। 
भावार्थ : -- कटुक कंटक और कोमल कुसुम एक ही दाल में फूलते हैं ।  प्राणी जैसे गुण धर्म लेकर पञ्च तत्व में विलीन होता है इस भव संसार फिर उसकी उत्पत्ति उसी स्वरूप में होती है ॥






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