दिनकर दरसत दिवस में, सपने दरसैं रैन ।
देवन सदैव सुधि रहे, जे काहू के लैन ।८७१ ।
भावार्थ : -- दिन में सूर्य के दर्शन करते रहना चाहिए निद्रा नहीं लेनी चाहिए सपने रात्रि काल में देखने चाहिए ॥ यदी किसी का लागा हो, उसे देने के लिए सदैव ध्यानरत रहना चाहिए ॥
लेवन सदा ले डूबा, तारा सदैव देन ।
लेन देन परिहारते, पावै जी के चैन ।८७२।
भावार्थ : -- लेना, सदैव ले डूबता है, दान ही उद्धार करता है । और ये लेन -देंन है ना उसे तो त्याग ही देना चाहिए, ऐसा करके जी को बहुंत ही चैन मिलता है ।
मुख हास रस रचाइ के, बोलैं मीठे बैन ।
लघु हो कि बृहत् सब सोंह, लाखे एक ही नैन।८७३।
भावार्थ : -- मुख पर विहास रस की रचना कर सदैव मीठी बोली बोलनी चाहिए । कोई छोटा हो या बड़ा सभी के प्रति समान भाव रखना चाहिए ॥
जोरी खोरी जोर कै, जोरे जोरू जात |
जौंरे-भौंरे जमोगन, ते जिनगीहि सुहात ।८७४।
भावार्थ : -- एक ठो जोरीदार एक ठो खोरी ढार । ऐसन घर-बार जोर के एको दुइ ठो लइका लार, ऐसा जीवन ही सुशोभित होता है ॥
ज्ञान जगान सन सोहत, निद्रा सपन के संग ।
सपन जगत जथारथ जग, न राखे को प्रसंग ।८७५।
भावार्थ : -- चैतन्य और ज्ञान की जोडी अच्छी लगती है, निद्रा और स्वपन की जोडी अच्छी लगती है । जागरण और स्वप्न की जोडी अच्छी नहीं लगती । स्वप्न जगत और यथार्थतस का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होता ॥
बाँधे भोजन ग्रहन कै, बँधे पयस जे पान ।
बाँधे बास मनन करे, पाए परम गुन ज्ञान ।८७६।
भावार्थ : -- बंधा भोजन-पानी, बंधा वास अर्थात जो मूलभूत आवश्यकताओं का सिमित उपयोग कर विषय विकारों से रहित होकर चिंतन करता है, वह परम गुण एवं ज्ञान का अधिकारी होता है ॥
जोइ जोर बटोर धरे, जहाँ सो तहाँ दाएँ ।
काया अंत काल करे, जाने को ले जाए ।८७७।
भावार्थ : -- जो भी माया रूपी धन संपदा जहां से जोड़ी बटोरी है वहीँ दे आना चाहिए । म्रत्यु द्वारा काया का अंत होते ही फिर न जाने इसे कौन ले जाएगा ॥
मायावंत कुलीन भए, धनी बनी भगवान् ।
माने न कहि बिधि केई,चलाए आप बिधान ।८७८।
भावार्थ : -- काल ऐसा है कि मायावंत शुद्ध और सुचरित्र कहला रहे हैं ,व्यापारी, खलकारी, धनधारी, भगवान् बने बैठे हैं । ये और किसी की तो क्या सृष्टि के रचनाकार की कही भी नहीं मानते । और अपने विधान मनवाते फिर रहे हैं ॥
अपनी ढप अपना राग, औरन राखे गौन ।
माने ना तू कोउ की, तेरी माने कौन ।८८०।
भावार्थ : -- अपनी ही ढपली रखा है अपना राग गा रहा है, दूसरे गए भाड़ में । तात्पर्य है कि : --
"जब तू किसी की नहीं मानता तो तेरी कौन मानेगा "
देवन सदैव सुधि रहे, जे काहू के लैन ।८७१ ।
भावार्थ : -- दिन में सूर्य के दर्शन करते रहना चाहिए निद्रा नहीं लेनी चाहिए सपने रात्रि काल में देखने चाहिए ॥ यदी किसी का लागा हो, उसे देने के लिए सदैव ध्यानरत रहना चाहिए ॥
लेवन सदा ले डूबा, तारा सदैव देन ।
लेन देन परिहारते, पावै जी के चैन ।८७२।
भावार्थ : -- लेना, सदैव ले डूबता है, दान ही उद्धार करता है । और ये लेन -देंन है ना उसे तो त्याग ही देना चाहिए, ऐसा करके जी को बहुंत ही चैन मिलता है ।
मुख हास रस रचाइ के, बोलैं मीठे बैन ।
लघु हो कि बृहत् सब सोंह, लाखे एक ही नैन।८७३।
भावार्थ : -- मुख पर विहास रस की रचना कर सदैव मीठी बोली बोलनी चाहिए । कोई छोटा हो या बड़ा सभी के प्रति समान भाव रखना चाहिए ॥
जोरी खोरी जोर कै, जोरे जोरू जात |
जौंरे-भौंरे जमोगन, ते जिनगीहि सुहात ।८७४।
भावार्थ : -- एक ठो जोरीदार एक ठो खोरी ढार । ऐसन घर-बार जोर के एको दुइ ठो लइका लार, ऐसा जीवन ही सुशोभित होता है ॥
ज्ञान जगान सन सोहत, निद्रा सपन के संग ।
सपन जगत जथारथ जग, न राखे को प्रसंग ।८७५।
भावार्थ : -- चैतन्य और ज्ञान की जोडी अच्छी लगती है, निद्रा और स्वपन की जोडी अच्छी लगती है । जागरण और स्वप्न की जोडी अच्छी नहीं लगती । स्वप्न जगत और यथार्थतस का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होता ॥
बाँधे भोजन ग्रहन कै, बँधे पयस जे पान ।
बाँधे बास मनन करे, पाए परम गुन ज्ञान ।८७६।
भावार्थ : -- बंधा भोजन-पानी, बंधा वास अर्थात जो मूलभूत आवश्यकताओं का सिमित उपयोग कर विषय विकारों से रहित होकर चिंतन करता है, वह परम गुण एवं ज्ञान का अधिकारी होता है ॥
जोइ जोर बटोर धरे, जहाँ सो तहाँ दाएँ ।
काया अंत काल करे, जाने को ले जाए ।८७७।
भावार्थ : -- जो भी माया रूपी धन संपदा जहां से जोड़ी बटोरी है वहीँ दे आना चाहिए । म्रत्यु द्वारा काया का अंत होते ही फिर न जाने इसे कौन ले जाएगा ॥
मायावंत कुलीन भए, धनी बनी भगवान् ।
माने न कहि बिधि केई,चलाए आप बिधान ।८७८।
भावार्थ : -- काल ऐसा है कि मायावंत शुद्ध और सुचरित्र कहला रहे हैं ,व्यापारी, खलकारी, धनधारी, भगवान् बने बैठे हैं । ये और किसी की तो क्या सृष्टि के रचनाकार की कही भी नहीं मानते । और अपने विधान मनवाते फिर रहे हैं ॥
अपनी ढप अपना राग, औरन राखे गौन ।
माने ना तू कोउ की, तेरी माने कौन ।८८०।
भावार्थ : -- अपनी ही ढपली रखा है अपना राग गा रहा है, दूसरे गए भाड़ में । तात्पर्य है कि : --
"जब तू किसी की नहीं मानता तो तेरी कौन मानेगा "
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