गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 87॥ -----

दिनकर दरसत दिवस में, सपने दरसैं रैन । 
देवन सदैव सुधि रहे, जे काहू के लैन ।८७१ । 
भावार्थ : -- दिन में सूर्य के दर्शन करते रहना चाहिए निद्रा नहीं लेनी चाहिए सपने रात्रि काल में देखने चाहिए ॥ यदी किसी का लागा हो, उसे देने के लिए सदैव ध्यानरत रहना चाहिए ॥

लेवन सदा ले डूबा, तारा सदैव देन । 
लेन देन परिहारते, पावै जी के चैन ।८७२। 
भावार्थ : -- लेना, सदैव ले डूबता है, दान ही उद्धार करता है । और ये लेन -देंन है ना उसे तो त्याग ही देना चाहिए, ऐसा करके जी को बहुंत ही चैन मिलता है ।

मुख हास रस रचाइ के, बोलैं मीठे बैन । 
लघु हो कि बृहत् सब सोंह, लाखे एक ही नैन।८७३। 
भावार्थ : -- मुख पर विहास रस की रचना कर सदैव मीठी बोली बोलनी चाहिए ।  कोई छोटा हो या बड़ा सभी के प्रति समान भाव रखना चाहिए ॥

जोरी खोरी जोर कै, जोरे जोरू जात |
जौंरे-भौंरे जमोगन, ते जिनगीहि सुहात ।८७४। 
भावार्थ : -- एक ठो जोरीदार एक ठो खोरी ढार । ऐसन  घर-बार जोर के एको दुइ ठो लइका लार, ऐसा जीवन ही सुशोभित होता है ॥

ज्ञान जगान सन सोहत, निद्रा सपन के संग । 
सपन जगत जथारथ जग, न राखे को प्रसंग ।८७५। 
भावार्थ : -- चैतन्य और ज्ञान की जोडी अच्छी लगती है, निद्रा और स्वपन की जोडी अच्छी लगती है । जागरण और स्वप्न की जोडी अच्छी नहीं लगती । स्वप्न जगत और यथार्थतस का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होता ॥

बाँधे भोजन ग्रहन कै, बँधे पयस जे पान । 
बाँधे बास मनन करे, पाए परम गुन ज्ञान ।८७६। 
भावार्थ : -- बंधा भोजन-पानी, बंधा वास अर्थात जो मूलभूत आवश्यकताओं का सिमित उपयोग कर विषय विकारों से रहित होकर चिंतन करता है, वह परम गुण एवं ज्ञान का अधिकारी होता है ॥

जोइ जोर बटोर धरे, जहाँ सो तहाँ दाएँ । 
काया अंत काल करे, जाने को ले जाए ।८७७। 
भावार्थ : -- जो भी माया रूपी धन संपदा जहां से जोड़ी बटोरी है वहीँ दे आना चाहिए । म्रत्यु द्वारा काया का अंत होते ही फिर न जाने इसे कौन ले जाएगा ॥ 

मायावंत कुलीन भए, धनी बनी भगवान् । 
माने न कहि बिधि केई,चलाए आप बिधान ।८७८। 
भावार्थ : -- काल ऐसा है कि मायावंत शुद्ध और सुचरित्र कहला रहे हैं ,व्यापारी, खलकारी,  धनधारी, भगवान् बने बैठे हैं । ये और किसी की तो क्या सृष्टि के रचनाकार की कही भी नहीं मानते  । और अपने विधान मनवाते फिर रहे हैं ॥ 

अपनी ढप अपना राग, औरन राखे गौन । 
माने ना तू कोउ की, तेरी माने कौन ।८८०।   
भावार्थ : -- अपनी ही ढपली रखा है अपना राग गा रहा है, दूसरे गए भाड़ में । तात्पर्य है कि : -- 

"जब तू किसी की नहीं मानता तो तेरी कौन मानेगा " 





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