लगाए बुझाए सों लगे, जो जगावत लाग ।
आपन घर को भूस कर, आप लगावत आग ।८६१।
भावार्थ : -- जो लगाई-बुझाई से आकर्षित होकर उससे निकटता रखता है, अपने घर को भूसा कर वह उसमें आप ही आग लगाता है ॥
काल कलुखित मलि मुख जब, बोलै साँची बोलि ।
कुंजर चढ़े लघुत नाउ,डगमग डगमग डोलि ।८६२।
भावार्थ : -- कलुषित कर्मों से युक्त, दोषों से परिपूर्ण, अपावन मुख से जब कोई सत्य बोलता है, तब यूं आभास होता है, मानो किसी लघु नौका में कोई हाथी चढ़ गया हो, और वह डगमग डगमग डोल रही है ॥
भया नउ द्यौस नउ द्यु , लिए उरझन नौ आँट ।
एक गाँठ के सुरझावत, दूजी देखे बाट ।८६३।
भावार्थ : -- नए से नभ में, नई उलझन लेकर नया दिवस उदयित हुवा । एक उलझन के सुलझी नहीं की दूसरी प्रतीक्षा में रहती है ॥
चुन चुनाउ चरन क्रिया, तिन्ह में नाहि कोइ ।
काटत रावन सीस सम, बार बार उपजोइ ।८६४।
भावार्थ : -- विद्यमान चुनाव प्रणाली में यदि 'इनमें से कोई नहीं, का चयन किया जाए । तो वह रावण के शीश के समान होंगा, जिसे जितनी बार काटा जाए, वह उतनी बार उग आएगा ॥
धनबन घन की मोटरी, मनियर रतन रखाए ।
अजहूँ धरा धान धरी, देन दसा मह दाए ।८६५।
भावार्थ : -- गगन ने मेघों की गठरी में चमकते हुवे सुन्दर रत्न रखे हैं । अभी तो धरनी ने धान स्वरूप धन धारण किए है । जब धरणी की दैन्य दशा हो, गगन को तब ये रत्न देऩे चाहिए ॥
गिरिपत के लिलार पर, लिखि सुरसरि की धार ।
हेरि हरि के द्वार पर, लिख वाका विस्तार ।८६६।
भावार्थ : -- हर के मस्तक पर सुर सरिता की धार लिखी गई । उन्होंने उसका विस्तार लिख कर उसे हरि द्वार पर उतारा ॥
सत त्रेता द्वापर कलि, चौकड़ जुग कुल चार ।
सहस चौकड़ी जोग के, दै एक कल्प अकार ।८६७।
भावार्थ : -- शास्त्रानुसार : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, और कलयुग ये चार युग मिला कर एक चौकड़ी निर्मित करते हैं । सहस्त्र चौकड़ी मिलकर एक कल्प की रचना करते हैं ॥
सेउ सुधि अर्चन बंदन, कीर्ति श्रुति सत्संग ।
दास सत स्वा निवेदन, जे भगतिहि नवांग ।८६८।
भावार्थ : --शास्त्रानुसार : "सत्संग,श्रवण,कीर्तन,स्मरण,चरणसेवा,अर्चन,वंदन,आत्मनिवेदन,दासत्व सत्य"
भक्ति के ये नौ अंग हैं ॥
अंडज उपजत अंड सन, स्वेदज सन स्वेद ।
पिंडज उपजे पिंड सन, उद्भिज भू उद्भेद ।८६९।
भावार्थ : -- शास्त्रानुसार : चौखनि अर्थात चार प्रकार की योनि हैं : -- अंडज जो अण्डों से उत्पन्न होते हैं जैसे : सरिसृप, पक्षी आदि, स्वेदज अथवा ऊष्मज, वे जीव जो उष्णता से उत्पन्न होते हैं जैसे झींगुर, खटमल आदि, पिंडज वे जीव जो देह लेकर उत्पन्न होते हैं जैसे : -- मानव, पशु उद्भिज वह जीव जो भूमि विदीर्ण कर उत्पन्न होते हैं जैसे : -- वृक्ष आदि ॥
को धातु दहुँ को पाहन, गढ़िया गहन पुकार ।
सार तत्व तब मौन रहे, जब मुखरिते अकार ।८७०।
भावार्थ : -- स्वर्ण हो अथवा कोई भी धातु हो रत्न हो अथवा कोई भी पत्थर हो गढ़िया उसे आभूषण ही कहता है ।
तत्व, सार, अर्थ, शब्द तब मौन अर्थात अप्रधान हो जाते हैं, जब भाव, आकृति मुखरित अर्थात प्रधान हो जाते हैं ॥
आपन घर को भूस कर, आप लगावत आग ।८६१।
भावार्थ : -- जो लगाई-बुझाई से आकर्षित होकर उससे निकटता रखता है, अपने घर को भूसा कर वह उसमें आप ही आग लगाता है ॥
काल कलुखित मलि मुख जब, बोलै साँची बोलि ।
कुंजर चढ़े लघुत नाउ,डगमग डगमग डोलि ।८६२।
भावार्थ : -- कलुषित कर्मों से युक्त, दोषों से परिपूर्ण, अपावन मुख से जब कोई सत्य बोलता है, तब यूं आभास होता है, मानो किसी लघु नौका में कोई हाथी चढ़ गया हो, और वह डगमग डगमग डोल रही है ॥
भया नउ द्यौस नउ द्यु , लिए उरझन नौ आँट ।
एक गाँठ के सुरझावत, दूजी देखे बाट ।८६३।
भावार्थ : -- नए से नभ में, नई उलझन लेकर नया दिवस उदयित हुवा । एक उलझन के सुलझी नहीं की दूसरी प्रतीक्षा में रहती है ॥
चुन चुनाउ चरन क्रिया, तिन्ह में नाहि कोइ ।
काटत रावन सीस सम, बार बार उपजोइ ।८६४।
भावार्थ : -- विद्यमान चुनाव प्रणाली में यदि 'इनमें से कोई नहीं, का चयन किया जाए । तो वह रावण के शीश के समान होंगा, जिसे जितनी बार काटा जाए, वह उतनी बार उग आएगा ॥
धनबन घन की मोटरी, मनियर रतन रखाए ।
अजहूँ धरा धान धरी, देन दसा मह दाए ।८६५।
भावार्थ : -- गगन ने मेघों की गठरी में चमकते हुवे सुन्दर रत्न रखे हैं । अभी तो धरनी ने धान स्वरूप धन धारण किए है । जब धरणी की दैन्य दशा हो, गगन को तब ये रत्न देऩे चाहिए ॥
गिरिपत के लिलार पर, लिखि सुरसरि की धार ।
हेरि हरि के द्वार पर, लिख वाका विस्तार ।८६६।
भावार्थ : -- हर के मस्तक पर सुर सरिता की धार लिखी गई । उन्होंने उसका विस्तार लिख कर उसे हरि द्वार पर उतारा ॥
सत त्रेता द्वापर कलि, चौकड़ जुग कुल चार ।
सहस चौकड़ी जोग के, दै एक कल्प अकार ।८६७।
भावार्थ : -- शास्त्रानुसार : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, और कलयुग ये चार युग मिला कर एक चौकड़ी निर्मित करते हैं । सहस्त्र चौकड़ी मिलकर एक कल्प की रचना करते हैं ॥
सेउ सुधि अर्चन बंदन, कीर्ति श्रुति सत्संग ।
दास सत स्वा निवेदन, जे भगतिहि नवांग ।८६८।
भावार्थ : --शास्त्रानुसार : "सत्संग,श्रवण,कीर्तन,स्मरण,चरणसेवा,अर्चन,वंदन,आत्मनिवेदन,दासत्व सत्य"
भक्ति के ये नौ अंग हैं ॥
अंडज उपजत अंड सन, स्वेदज सन स्वेद ।
पिंडज उपजे पिंड सन, उद्भिज भू उद्भेद ।८६९।
भावार्थ : -- शास्त्रानुसार : चौखनि अर्थात चार प्रकार की योनि हैं : -- अंडज जो अण्डों से उत्पन्न होते हैं जैसे : सरिसृप, पक्षी आदि, स्वेदज अथवा ऊष्मज, वे जीव जो उष्णता से उत्पन्न होते हैं जैसे झींगुर, खटमल आदि, पिंडज वे जीव जो देह लेकर उत्पन्न होते हैं जैसे : -- मानव, पशु उद्भिज वह जीव जो भूमि विदीर्ण कर उत्पन्न होते हैं जैसे : -- वृक्ष आदि ॥
को धातु दहुँ को पाहन, गढ़िया गहन पुकार ।
सार तत्व तब मौन रहे, जब मुखरिते अकार ।८७०।
भावार्थ : -- स्वर्ण हो अथवा कोई भी धातु हो रत्न हो अथवा कोई भी पत्थर हो गढ़िया उसे आभूषण ही कहता है ।
तत्व, सार, अर्थ, शब्द तब मौन अर्थात अप्रधान हो जाते हैं, जब भाव, आकृति मुखरित अर्थात प्रधान हो जाते हैं ॥
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