जगलग जन जन के चाह, असं बसन बर बास ।
चितबन ज्ञान बिठारि कै, बाक़ी चाह निकास ।८५१।
भावार्थ : -- अखिल जगत में समस्त जनों की यही कामना है कि उत्तम भोजन हो, उत्तम वस्त्र हों, और उत्तम से उत्तम आवास हो । चित्त में ज्ञान को प्रतिष्ठित कर शेष सभी कामनाओं का निष्कासन करने में ही जग का कल्याण है ॥
नाम निरूपन नाम जतन, करत भलाई काम ।
सोन मनि धन धान रतन, जेइ बुराई नाम ।८५२।
भावार्थ : -- नाम के यथार्थ स्वरूप, नाम की महिमा, नाम का प्रभाव उत्पन्न करने, नाम की कीर्ति करनी हो तो नाम का रखरखाव करना चाहिए, कैसे? भलाई के कार्य करके । स्वर्ण, माणिक्य, रत्न, धन, संपदा आदि ये तो बुराई के नाम है, इनसे कीर्ति नहीं होती अपकीर्ति ही होती है ॥
कलुख करम परिहार कै, जथा जोग दै दान।
जे ज्ञान गहिता माने, जगत बृहद बिद्वान ।७५३।
भावार्थ : -- कलुषित कर्मों का त्याग कर यथा योग्य दान देना चाहिए । इस ज्ञान के ग्रहण कर्त्ता को अखिल विश्व वृहद् विद्वान मानता है ॥
असन बसन अन ज्ञान धन, देवें छिनु कर धार ।
कौनौ निज सम्मत देत, सोचें सौ सौ बार ।७५४।
भावार्थ : -- भोजन, वस्त्र, अन्न, ज्ञान, धनादि को तो क्षण में ही दे देवें । किन्तु किसी को अपना मत अपनी सम्मति देने से पूर्व सहस्त्रों बार सोंचें और योग्य को ही देवें, यदि योग्य न हो तो ना देवें, डाक्टर ने नहीं बता रखा देने को । क्योंकि यदि ऐसी सम्मति का दुरुपयोग हुवा तो वह सर्वप्रथम दाता के ही विरुद्ध होगा ॥
अपलक लख पथ जोगती, रयनय रयन प्रभात ।
जगत जोत जोइ जागता, सो जे दरसन पात ।७५५।
भावार्थ : -- निर्निमेष दृष्टी से रयनी प्रभात संग प्रेम मग्न होने की प्रतीक्षा कर रही है । जो कोई ज्योति जागृत रहते जागरण करता है वह ही ऐसे मधुर मिलन के दर्शन की अनुभूति प्राप्त करता है ॥
जानन लागे चारि जन, सोइ लोक प्रिय होइ ।
अगजग जानै रावना, कहे न प्रियकर सोइ ।७५६।
भावार्थ : -- चार जन जानने क्या लग गए वह लोकप्रिय हो गया ? रावण को तो सारा जग जानता है उसे कोई भी प्रिय नहीं कहता ॥
चढ़ चल झाड़ बुहारि दे, धोए पोंछ चमकार ।
येह ह्रदय भगवन भवन, दरिदर सकल निकार ।७५७।
भावार्थ : -- चलो झाडना बुहारना आरम्भ करें, धों, पोंछ के चमका दें । यह ह्रदय ईश्वर का भवन है, इसकी भी मलिनता का निष्कासन करें ॥
लोभहि जाके ओड़ना, लोभइ सयन बिछान ।
हानि वाकी रैन रही, लाभ जाके बिहान ।७५८।
भावार्थ : -- प्रकृति के क्रिया कलापों से लोभी का कोई सम्बन्ध नहीं होता, लोभ ही जिनका आच्छादन हैं, लोभ ही उनका बिछौना है । जिनके लिए लाभ ही दिवस हो, हानि उनके लिए रात्रि है ॥
आए चोरटे चौंक पर, फिरै दुवारि दुवार ।
अपना हीरा गाँठ कर, भगा भगा लठ मार ।७५९।
भावार्थ : -- चोरटे फिर आ गए, दुवार दुवार फिर रहे हैं । अरे ! घरवालों, अपने हीरे को गाँठ बाँध के उन चोरों को डंडे मार के भगा दो, वस्तुत: इसी में तुम्हारा कल्याण है ॥
सों सम्मत रावन सोंह, जे भइ लोक बिरुद्ध ।
सोइ मत रघु नाथ जोंह, घेर तिन्ह करि जुद्ध ।७६०।
भावार्थ : -- वे विचार रावण के सदृश्य हैं, जो लोक विरुद्ध होते हैं । वे विचार प्रभु श्री राम के स्वरुप हैं, जो इन्हें घेर कर इनसे युद्ध करते हैं ॥
चितबन ज्ञान बिठारि कै, बाक़ी चाह निकास ।८५१।
भावार्थ : -- अखिल जगत में समस्त जनों की यही कामना है कि उत्तम भोजन हो, उत्तम वस्त्र हों, और उत्तम से उत्तम आवास हो । चित्त में ज्ञान को प्रतिष्ठित कर शेष सभी कामनाओं का निष्कासन करने में ही जग का कल्याण है ॥
नाम निरूपन नाम जतन, करत भलाई काम ।
सोन मनि धन धान रतन, जेइ बुराई नाम ।८५२।
भावार्थ : -- नाम के यथार्थ स्वरूप, नाम की महिमा, नाम का प्रभाव उत्पन्न करने, नाम की कीर्ति करनी हो तो नाम का रखरखाव करना चाहिए, कैसे? भलाई के कार्य करके । स्वर्ण, माणिक्य, रत्न, धन, संपदा आदि ये तो बुराई के नाम है, इनसे कीर्ति नहीं होती अपकीर्ति ही होती है ॥
कलुख करम परिहार कै, जथा जोग दै दान।
जे ज्ञान गहिता माने, जगत बृहद बिद्वान ।७५३।
भावार्थ : -- कलुषित कर्मों का त्याग कर यथा योग्य दान देना चाहिए । इस ज्ञान के ग्रहण कर्त्ता को अखिल विश्व वृहद् विद्वान मानता है ॥
असन बसन अन ज्ञान धन, देवें छिनु कर धार ।
कौनौ निज सम्मत देत, सोचें सौ सौ बार ।७५४।
भावार्थ : -- भोजन, वस्त्र, अन्न, ज्ञान, धनादि को तो क्षण में ही दे देवें । किन्तु किसी को अपना मत अपनी सम्मति देने से पूर्व सहस्त्रों बार सोंचें और योग्य को ही देवें, यदि योग्य न हो तो ना देवें, डाक्टर ने नहीं बता रखा देने को । क्योंकि यदि ऐसी सम्मति का दुरुपयोग हुवा तो वह सर्वप्रथम दाता के ही विरुद्ध होगा ॥
अपलक लख पथ जोगती, रयनय रयन प्रभात ।
जगत जोत जोइ जागता, सो जे दरसन पात ।७५५।
भावार्थ : -- निर्निमेष दृष्टी से रयनी प्रभात संग प्रेम मग्न होने की प्रतीक्षा कर रही है । जो कोई ज्योति जागृत रहते जागरण करता है वह ही ऐसे मधुर मिलन के दर्शन की अनुभूति प्राप्त करता है ॥
जानन लागे चारि जन, सोइ लोक प्रिय होइ ।
अगजग जानै रावना, कहे न प्रियकर सोइ ।७५६।
भावार्थ : -- चार जन जानने क्या लग गए वह लोकप्रिय हो गया ? रावण को तो सारा जग जानता है उसे कोई भी प्रिय नहीं कहता ॥
चढ़ चल झाड़ बुहारि दे, धोए पोंछ चमकार ।
येह ह्रदय भगवन भवन, दरिदर सकल निकार ।७५७।
भावार्थ : -- चलो झाडना बुहारना आरम्भ करें, धों, पोंछ के चमका दें । यह ह्रदय ईश्वर का भवन है, इसकी भी मलिनता का निष्कासन करें ॥
लोभहि जाके ओड़ना, लोभइ सयन बिछान ।
हानि वाकी रैन रही, लाभ जाके बिहान ।७५८।
भावार्थ : -- प्रकृति के क्रिया कलापों से लोभी का कोई सम्बन्ध नहीं होता, लोभ ही जिनका आच्छादन हैं, लोभ ही उनका बिछौना है । जिनके लिए लाभ ही दिवस हो, हानि उनके लिए रात्रि है ॥
आए चोरटे चौंक पर, फिरै दुवारि दुवार ।
अपना हीरा गाँठ कर, भगा भगा लठ मार ।७५९।
भावार्थ : -- चोरटे फिर आ गए, दुवार दुवार फिर रहे हैं । अरे ! घरवालों, अपने हीरे को गाँठ बाँध के उन चोरों को डंडे मार के भगा दो, वस्तुत: इसी में तुम्हारा कल्याण है ॥
सों सम्मत रावन सोंह, जे भइ लोक बिरुद्ध ।
सोइ मत रघु नाथ जोंह, घेर तिन्ह करि जुद्ध ।७६०।
भावार्थ : -- वे विचार रावण के सदृश्य हैं, जो लोक विरुद्ध होते हैं । वे विचार प्रभु श्री राम के स्वरुप हैं, जो इन्हें घेर कर इनसे युद्ध करते हैं ॥
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