सदकरम के सोहन सौं, मलिन अवध लवनाइ ।
कलुख करम मलिन लंका, सुबरन दीप कहाइ ।८३१।
भावार्थ : -- सद करमों की शोभा के सम्मुख अवध देस की लावण्यता भी मलिन हो गई । और दुष्टता भरे कर्मों के सम्मुख मलिन लंका भी स्वर्ण द्वीप कहलाई ॥
करतब भाउ सदाचरन सेवा साँच सनेह ।
सोइ सिंगार साधनक, सुठि सिंगारत देह ।८३२।
भावार्थ : -- कर्त्तव्य का भाव, सदाचरण, सेवा, सत्य, स्नेह आदि ऐसे श्रृगार साधन है जो शरीर को सुरुचि पूर्वक सुसज्जित करते हैं ॥
चाहे साधै सरासन , सागन सूल सलाख ।
जब लग ना पँवरै पंथ, तब लग भेद न लाख ।८३३।
भावार्थ : -- सरासन में चाहे अग्नि के समान शूल,भाले,त्रिशूल,बरछी संधान कर लें । जब तक मार्ग निश्चित न हो तब तक ये अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं होते ॥
सिन्धु सुत संचित गहन, घनबर घन मलिनाए ।
तज धरनी सिंचित करे, धूल धवल धवलाए ।८३४।
भावार्थ : -- सिन्धु के मोतियों को संचित करते मेघ का मुख और अधिक मलिन होता जाता है । किन्तु जब यह इं मोतियों का त्याग कर धरणी को सिंचित करता है तो धूल कर स्वच्छ एवं निर्मल हो जाता है ॥
धन सन को न बड़ा भया, औरु न होही कोइ।
सद गुन धर्म सत बिचार बरे बडप्पन होइ ।८३५।
भावार्थ : -- धन से न तो कोई बड़ा हुवा, और न कोई होगा । उत्तम गुण, उत्तम आचरण, एवं उत्तम विचारों को वरण करने ही से बड़प्पन सिद्ध होता है ॥
मुख रसना मनके धुनी, रोर रोर ररियाए ।
भाव आचरन अवतरे , तबहि जग सत सुहाए ।८३६।
भावार्थ : -- मुख की डोरी में शब्दों के मनके फेर कर सत्य का जाप हो रहा है । वह सत्य संसार को तब समझ में आता है जब उसके भाव को आचरण में उतारा जाए ॥
देसीय देसाबर तब, भए को बिषय बिसेस ।
अंत सन लै अंतर लग, जब हो तेहि प्रबेस ।८३७।
भावार्थ : -- कोई विषय तब राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय श्रेणी का होता है, जब उसका प्रवेश अंत से लेकर अंतर तक अर्थात केंद्र से लेकर परिधि तक हो ॥
छन छन करत काल घोष,छन सन रैन बिहान ॥
छन सन धरत सरूप कोष, छन सन बरस निधान।८३८।
भावार्थ : -- समय, प्रत्येक क्षण घोषणा कर रहा है, क्षणों ही से रात्रि और दिवस का अस्तित्व हुवा । क्षणों ही ने महीनों का स्वरूप धारण किया, क्षणों ही से वर्षों का भंडार भरा ।
अर्थात : -- "लघुता ही में ही प्रभूता है"
बलिहाई सन बीर है, तरलाई सन तीर ।
हरियाई सन हीर है, सरलाई सन सीर ।८३९।
भावार्थ : -- वीर गति से ही वीरता है, तरलता है तो तट है । हरियाली से ही लक्ष्मी है, सरलता ही से प्रारब्ध है ॥
हेतुक होत हतक हतन, दे छम प्रभुत कहाए ।
अहेतुक हतक दै छम, सोइ कहि सेवाकाए ।८४०।
भावार्थ : -- कारण के होते प्रताड़ित करने वाले को प्रताड़ित होना वाला क्षमा करे तो वह प्रभुता कहलाती है । किन्तु अकारण प्रताड़ित करने वाले को, प्रताड़ित होने वाला क्षमा करे तो वह लोकोपकार कहलाता है ॥
कलुख करम मलिन लंका, सुबरन दीप कहाइ ।८३१।
भावार्थ : -- सद करमों की शोभा के सम्मुख अवध देस की लावण्यता भी मलिन हो गई । और दुष्टता भरे कर्मों के सम्मुख मलिन लंका भी स्वर्ण द्वीप कहलाई ॥
करतब भाउ सदाचरन सेवा साँच सनेह ।
सोइ सिंगार साधनक, सुठि सिंगारत देह ।८३२।
भावार्थ : -- कर्त्तव्य का भाव, सदाचरण, सेवा, सत्य, स्नेह आदि ऐसे श्रृगार साधन है जो शरीर को सुरुचि पूर्वक सुसज्जित करते हैं ॥
चाहे साधै सरासन , सागन सूल सलाख ।
जब लग ना पँवरै पंथ, तब लग भेद न लाख ।८३३।
भावार्थ : -- सरासन में चाहे अग्नि के समान शूल,भाले,त्रिशूल,बरछी संधान कर लें । जब तक मार्ग निश्चित न हो तब तक ये अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं होते ॥
सिन्धु सुत संचित गहन, घनबर घन मलिनाए ।
तज धरनी सिंचित करे, धूल धवल धवलाए ।८३४।
भावार्थ : -- सिन्धु के मोतियों को संचित करते मेघ का मुख और अधिक मलिन होता जाता है । किन्तु जब यह इं मोतियों का त्याग कर धरणी को सिंचित करता है तो धूल कर स्वच्छ एवं निर्मल हो जाता है ॥
धन सन को न बड़ा भया, औरु न होही कोइ।
सद गुन धर्म सत बिचार बरे बडप्पन होइ ।८३५।
भावार्थ : -- धन से न तो कोई बड़ा हुवा, और न कोई होगा । उत्तम गुण, उत्तम आचरण, एवं उत्तम विचारों को वरण करने ही से बड़प्पन सिद्ध होता है ॥
मुख रसना मनके धुनी, रोर रोर ररियाए ।
भाव आचरन अवतरे , तबहि जग सत सुहाए ।८३६।
भावार्थ : -- मुख की डोरी में शब्दों के मनके फेर कर सत्य का जाप हो रहा है । वह सत्य संसार को तब समझ में आता है जब उसके भाव को आचरण में उतारा जाए ॥
देसीय देसाबर तब, भए को बिषय बिसेस ।
अंत सन लै अंतर लग, जब हो तेहि प्रबेस ।८३७।
भावार्थ : -- कोई विषय तब राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय श्रेणी का होता है, जब उसका प्रवेश अंत से लेकर अंतर तक अर्थात केंद्र से लेकर परिधि तक हो ॥
छन छन करत काल घोष,छन सन रैन बिहान ॥
छन सन धरत सरूप कोष, छन सन बरस निधान।८३८।
भावार्थ : -- समय, प्रत्येक क्षण घोषणा कर रहा है, क्षणों ही से रात्रि और दिवस का अस्तित्व हुवा । क्षणों ही ने महीनों का स्वरूप धारण किया, क्षणों ही से वर्षों का भंडार भरा ।
अर्थात : -- "लघुता ही में ही प्रभूता है"
बलिहाई सन बीर है, तरलाई सन तीर ।
हरियाई सन हीर है, सरलाई सन सीर ।८३९।
भावार्थ : -- वीर गति से ही वीरता है, तरलता है तो तट है । हरियाली से ही लक्ष्मी है, सरलता ही से प्रारब्ध है ॥
हेतुक होत हतक हतन, दे छम प्रभुत कहाए ।
अहेतुक हतक दै छम, सोइ कहि सेवाकाए ।८४०।
भावार्थ : -- कारण के होते प्रताड़ित करने वाले को प्रताड़ित होना वाला क्षमा करे तो वह प्रभुता कहलाती है । किन्तु अकारण प्रताड़ित करने वाले को, प्रताड़ित होने वाला क्षमा करे तो वह लोकोपकार कहलाता है ॥
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