रविवार, 27 अक्टूबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 109 -----

राजू : -- मास्टर जी ! यदि लोकतंत्र एक धर्मशाला है, चुनाव वैवाहिक उत्सव है, यदि जीत दुलहन है, चुनावी दल दुलहे हैं, नेता-मंत्री के प्रलाप बेसुरे बाजे हैं तो ये समाचार माध्यम माने की मीडिया क्या है? 

 राजू ! ये किराया भण्डार है माने की टेंट हाउस, यहाँ चँवर-चांदनी, मंडप-शामियाने, फोटो-एलबम, बीडियो-कैसेट आदि सेवाएं दलों को किराए पर दी जाती है.…. और जहां पत्रकारिता कहीं दूर बैठी सिसक रही है"

राजू : -- चोखा धंधा है, सीजन में बिक्री बट्टे की क्या रौनक है । किन्तु  मास्टर जी ! फिर हम क्या हैं?

 " मूर्ख !"
"जो अद्यावधि इस स्वयंवर वाली चुनावी वैवाहिक पद्धती को नहीं बदल पाए । यहाँ प्रत्यासी को दुल्हा होना चाहिए और दुल्हे बने हैं दल, यानी वर माला किसी के गले में और दुल्हा कोई । और यह वर माला प्रत्यासी के नियोक्ता माने  की बॉस की पारिवारिक विरदावली यानी की फेमिली स्टेटस देख कर अर्पित की जाती है प्रत्यासी की नहीं । प्रत्यासी हमारे ही बीच का होना चाहिए, और उसे बहुंत देखभाल थोक बजा कर हमें प्रस्तुत करना चाहिए जैसे हम वर को बजाते हैं । जिसके पालक हम ही हों उसका बॉस नहीं और वो हमारी सेवा-सुश्रुता करे अपने बॉस की नहीं ॥"  

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