बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९३ ॥ -----

दारिदर कभु खाए लिये, धनिक रहे बिनु खाए । 
मधुरन तिनते दूर रहि, जो सौ रूज लगाए ।९३१। 
भावार्थ : -- दरिद्र तो कभी कभार खा भी लिए किन्तु, धनवान उसे बिना खाए ही रहे । ये मीठाई है न मिठाई जो मीठी मीठी होती है, वह उनसे दूर ही रही जो सौ ठो रोग लगा के बैठे हैं ॥ 

देखे साहन के साह, देखे दासन दास । 
दीन दसा तसहि रहि अब, गवने को उरास ।९३२। 
उड़ास = निवास, दासनिवास 

भावार्थ : -- सम्राटों का युग भी देखा । और ये दासों के दास का युग भी देख लिया ।  अर्थहीन, अर्थ हिन् ही रहे दुखी, दुखी ही रहे अब कौन से दास के घर जाएं ?

चरन सरन तिन कठिन है, जिन भरि कंकर काँट । 
तब औरै दुसह रहि जब, मानस धरि सौ आँट ।९३३। 
भावार्थ : -- उस मार्ग में चलना कठिन है जिस मार्ग में कंकड़ काँटे भरे हो । तब चलना और भी दुसाध्य हो जाता है जब मन संदेह से घिरा हो॥ 

रहिमन बर साहन साह, कबीर डासन दास । 
दोनौ के एक उपदेस, बन तू तल की घास ।९३४। 
भावार्थ : -- अब्दुर्र रहीम खानखाना  के लिए शाहों के शाह श्रेष्ठ है (रहीम अकबर के नौ रत्नों में से एक थे) , संत कबीर ( अति दरिद्र थे)  के लिए दासों का दास श्रेष्ठ है । दोनों का एक ही उपदेश है कि जब तुम्हारे जन संचालन तंत्र का मुखिया खजूर का पेड़ न होकर घास होगा तब ही तुम सुखी रहोगे ॥ 

करुवी बेलि नीम चढ़े, अतिसय करुबर कार । 

बंधे पत सुरभित रहे, गंध राज के सार ।९३५। 
भावार्थ : - करेले की बेल यदि नीम पर चढ़ जाए तो वो उसे और अधिक कड़वा कर देती है । गंध राज : -- चन्दन,अगरु आदि की सार धूप, यदि किसी पत्र से बंधी हो तो वह पत्र भी सुगन्धित हो जाता है । 

अर्थात : -- दुर्गुणी यदि दुर्जन की संगती करे तो उसके दुर्गुणों में वृद्धि होती है । गुणहीन यदि गुणवान की संगती करे तो वह भी उसी गुणवान का स्वरुप धारण कर लेता है ॥ 

जाके संग निकट रहे, वाके संग सुहाए । 
छाई छत पर चाँद छबि, नखत दूरे लखाए ।९३६। 
भावार्थ :  -- साथ उसका ही सुहावना होता है जो निकट हो । छत पर चाँद की छवि छाई रहती है, तारे दूर से ही निहारते रहते हैं ॥ 

 जहाँ धान की संपदा, धनी धन्य सो देस । 
काट कूट कर कोष किए, सो तो कपटी भेस ।९३७ । 
भावार्थ : -- जहां अन्न की सम्पदा है, वही देश वास्तव में धनी है और वही साधू स्वरुप पुण्यात्मा है । जहां आकड़ों में कलाकारी करके कोष भरपूर दर्शाया जाता हो वह देश कपटी और पाखंडी साधू है ॥ 

टीका : -- ऐसे देश के शासक यदि पड़ना जानते हों तो  एक बार मांग पूर्ति का नियम अवश्य पढ़े वास्तु का मूल्य में तब वृद्धि होती है, जब उसकी पूर्ति सतत स्वरुप में नहीं होती ॥ 

खेत खदान भए खनि अन, करषक बँध बनिहारि । 
भूखे मरे तँह जन जन, फुर फरे ब्यापारि ।९३८। 
भावार्थ : -- खेत जहां खदान हो गए और अन्न जहां खनिज हो गया, जहां के किसान बंधवा श्रमिक बन गए । और जन साधारण भूखा मर रहा है, वहाँ के व्यापारी बहुंत फूल फल रहे हैं ॥ (कारण क्या है ?) 

खनि खदान खनन कारन , भूमि भई कल्हार । 
खाद न खादन अन न पसु, खाएं आप को फार ।९३९ । 
भावार्थ : -- खनिज खदानों के खुदने से कृषि भूमि फट पड़ी और बंजर हो गई  है । अब न खाद्य है न खाद्यान है न अन्न बचा न पशु बचे, पेट है खाने को मांगता है तो स्वयं को फाड़ के खा क्यों ? क्योंकि दुसरा तुझसे अधिक हिंसक है तू उसको क्या खाएगा , तो पहले अपना हाथ खा फिर पैर खा ॥ 

बिनइ मुखी नम आचरन, जीउति के पहचान । 
अकड़ी देह गरब मुख, जे तो मरे समान ।९४० । 
भावार्थ : -- विनीत मुख और विनम्र आचरण, जीवितों की पहचान है । अकड़ी हुई देह और मुख पर घमंड यह मरे मुर्दा के समान है ॥   







सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 92॥ -----

लोक चरन बिपरीत जब, सासन नीति रचाएँ । 
बरजत बिरोध जता तब, तिन पालन बिसराएँ ।९२०। 
भावार्थ : -- जब शासन की नीतियां लोक व्यवहार के विरुद्ध हों । तब पालनकर्त्ता द्वारा उन  नीतियों का पालन न करते हुवे उनके परिरोधन हेतु उनपर विरोध व्यक्त करना चाहिए (और जब पूरा शासन ही कुनीतिज्ञ हो तो व्यवस्था परिवर्तन हेतु अग्रसर होना चाहिए)॥ 

दान दिया जल तिसित पान, काम लिया अन्हान । 
दिए दुरुपजोग हो जहाँ, तहाँ न कीजिए दान ।९२१। 
भावार्थ : --   जल का दान तो इस हेतु किया कि प्यासे की प्यास बूझे, पर वह स्नान के काम लिया गया ॥ तात्पर्य है कि, सुबुद्धि जन को वहाँ दान नहीं करना चाहिए जहां इसका दुरुपयोग हो ॥ 

घटे काज न किजीए चहे, बढ़े घटे दिन मान । 
हरिचंद मरत मरी गए, छुटी न सत की कान ।९२३।  
भावार्थ : -- बुरा समय हो चाहे अच्छा किन्तु कभी घटिया कार्य नहीं करने चाहिए ।  राजा हरिश्चंद्र मरते मर गए किन्तु उन्होंने सत्य का नियम नहीं छोड़ा ॥ 

सीस दस अरु बीस भुजा, रावन पद रहि दोउ । 
रीस तस तीस रुजा पर , झूठ के पद न होइ ।९२४। 
भावार्थ : -- सिर दस ठो और भुजा बीस ठो किन्तु रावण के पैर दुइ ठो थे ॥ उसी की प्रतिलिपि स्वरुप, झूठ की तलहटी में तीस ठो रोग होते हैं, किन्तु उसके पैर नहीं होते ॥ 

कलंकित के काल चढ़त चोखा आपन काल । 
जूँ जमुना के जल छाइ, रंजन रहे तमाल ।९२५। 
भावार्थ : -- कलंकित व्यक्ति पर अपना दोष भी भली प्रकार से मढ़ा जा सकता है । जैसे जमुना के काले जल में तमाल वृक्ष की काली छाया प्रदर्शित नहीं होती ॥ 

धुनी द्युति गति धीर धरि, चित की तेजसबान । 
बिपल मह गगन भंवर लै, बैसत पलक बिमान ।९२६। 
भावार्थ : -- ध्वनी और प्रकाश की गति मंद है, किन्तु मन की गति अति तीव्र है । यह पलक के विमान में विराजित होकर बिपल के अंतर्गत ही पूरा ब्रम्हांड घूम आता है ॥ 

टीका : -- विपल = समय का अबतक का सबसे लघु मान । १ सेकंड = २.५ विपल , २४ सेकण्ड के बराबर एक पल होता है, ६० विपल =१ पल 

सोवत सोइ खोवत है, जागे जोई पाए । 
सोवन अंक जड़ती के, जागे चित चेताए ।९२७। 
भावार्थ : -- सुप्तावस्था में बहुंत कुछ छुट जाता है, जागृत अवस्था में अप्राप्य भी प्राप्य है ॥ सुषुप्तावस्था जड़त्व के लक्षण है, जागृति चैतन्यता का चिन्ह है ॥ 

ब्यतीत ब्यत गत समय , जो हो मसि मलिनाए । 
बीतत पल निर्मल करे, होनिहार उजराए ।९२८। 
भावार्थ : -- इतिहास की मलिनता को वर्तमान से धोया जाए, तो कल का इतिहास अवश्य ही उज्जवल होगा ॥ 

जिनके कँधे सकल उठे, भए जग जिउता सोइ । 
आपइ उठान उठौना , सो तो सव सम होइ ।९२९। 

भावार्थ : -- जिसके कंधे उठा कर सभी गए संसार में वही जीवित स्वरुप है । जो केवल स्वयं को ही  उठाने में प्रवृत्त रहा वह शव के समान है ।। 

बिलासिता रस भोग मह, रहे सदा रत आप । 
अब पथ जोगत को तरे, करन जगत उद्धाप ।९३०। 
भावार्थ : -- हम स्वयं सदैव विलासिता,रस एवं भोगों में आसक्त रहे । अब बैठे प्रतीक्षा कर रहें हैं कि, कोई प्रभु अवतार लें और सब कुछ ठीक कर दें ॥ 

अर्थात : - "जब विकार हम से उत्पन्न हुवे हैं, सुधारना भी हमें ही होगा"


रविवार, 27 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 91॥ -----

दोष धरे दृष्टी द्रोन, किये भिषक उपचार । 
दोष बरे दृष्टि कोन, वाके कौन सुधार।९११।  
  ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- यदि दृष्टी की कठौती में दोष हो तो उसका उपचार नेत्र चिकित्सक कर देगा । किन्तु जब दृष्टी कोण में दोष हो तो उसका सुधारक कौन हो ॥

संस्कार अरु संस्कृति, जीवन की एक बानि । 
जामे सदियाँ जुगी रहि, बन समाज के छानि ।९१२ । 
  ----- ॥ राम धारी सिंह दिनकर ॥ -----
भावार्थ : -- सस्कार एवं संस्कृति जीवन की रीतियाँ हैं,जिसमें सदियाँ संचयित होकर समाज पर छाई रहती हैं ॥

बिंदु में जो सिंधु लिखे, कहत बाग्मय सोइ । 
सिंधु में जो बिंदु लिखे, सो तो प्रलाप होइ ।९१३।
 ----- ॥ नीति द्विषाष्टिका॥ -----
भावार्थ : -- जो थोड़े शब्दों में सुन्दर बात कहता है, वह वाग्मी है । बहुंत से वचनो द्वारा किंचित सार कहने वाला विप्रलापी ही है ॥

जाके पहि न्यूनाधिक, निर्धन नाहीं सोइ । 
जोइ लहे अधिकाधिक, सोई निर्धन होइ ।९१४। 
 ----- ॥ सैनेका ॥ -----
भावार्थ : -- "वह व्यक्ति निर्धन नहीं है, जिसके पास थोड़ा-बहुंत है । निर्धन तो वह है जो अधिकाधिक के लिए लालायित रहता है "

सिंह गुहा बाघ घनबन, हंस कमलिन प्रसंग । 
कुजन चाहे कुजन साथ, सदजन सद्जन संग ।९१५। 
                ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- "सिंह गुफा का, बाघ गहन वन का, हंस सुन्दर कलिनियों का प्रसंग चाहते है । उसी प्रकार कदाचारी, कदाचारियों का एवं सदाचारी सदाचारियों का संग चाहता है"

रुखा हारे प्रेम सोंह, पाप सोंह सदाचार । 
लाह हारे दान सोंह, मिथक बचन सत सार ।९१६। 
 ----- ॥ गौतम बुद्ध ॥ -----
भावार्थ : -- "रोष, प्रेम से हारता है, पाप सदाचार से हारता है । लोभ दान देने से हारता है, मिथ्या वचन सत्य के सार वचनों से हारता है"

टीका : -- ओभ में संशय है, लोभ संयम से हारता है ।

सुहंगम ह्रदय मुकुति सों, देह भवन सों सीप । 
सुहंगम मह लावन श्री, सुहँगा साँच समीप ।९१७। 
                ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- सरल ह्रदय मुक्ता सरिस है देह-भवन सीप सरिस है । सरलता में महान सौन्दर्य बसता है जो सरल है वह सत्य अर्थात ईश्वर के निकट है ॥ 

जेइ जगत मैं मलिनतम, सुवारथ सम न कोइ । 
अगजग के अवगुन गहे, जो सुवारथी होइ ।९१८। 
 ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- इस संसार में स्वार्थ के सदृश्य मलिनतम कोई नहीं है । स्वार्थी जन समस्त चराचर के अवगुण ग्रहण किये होते हैं ॥ 

भगवन कहीं नाहीं है, सोइ कथन सर्बग्य । 
भगवन है कि नाहीं है, सोइ बचन अल्पग्य ।९१९। 
 ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- 'ईश्वर कहीं नहीं है' यह कथन सर्वज्ञ है अर्थात जो यह कहता है वह सर्व ज्ञानी स्वरुप में गुरु है । 'ईश्वर है कि नहीं है' यह वचन अल्पज्ञ है अर्थात जो यह कहता है वह अल्पज्ञानी रूप में जिज्ञासु है ॥ 

मनु जोनि बर देश काल, मिलै बहस कठनाए । 
जेइ जोग जब जोगिते, भव सागर तर जाएँ ।920। 
                    ----- || अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य योनि और उत्तम देश, काल एवं परिस्थिति का एक साथ मिलना अति दुर्लभ है ॥ यदि मनुष्य योनि का योग प्राप्त हो, उत्तम देश काल एवं परिस्थितियां का संयोग मिले तो कल्याण करते हुवे इस संसार के बंधन से मुक्त हो जाना चाहिए  ॥ 

----- मिनिस्टर राजू 109 -----

राजू : -- मास्टर जी ! यदि लोकतंत्र एक धर्मशाला है, चुनाव वैवाहिक उत्सव है, यदि जीत दुलहन है, चुनावी दल दुलहे हैं, नेता-मंत्री के प्रलाप बेसुरे बाजे हैं तो ये समाचार माध्यम माने की मीडिया क्या है? 

 राजू ! ये किराया भण्डार है माने की टेंट हाउस, यहाँ चँवर-चांदनी, मंडप-शामियाने, फोटो-एलबम, बीडियो-कैसेट आदि सेवाएं दलों को किराए पर दी जाती है.…. और जहां पत्रकारिता कहीं दूर बैठी सिसक रही है"

राजू : -- चोखा धंधा है, सीजन में बिक्री बट्टे की क्या रौनक है । किन्तु  मास्टर जी ! फिर हम क्या हैं?

 " मूर्ख !"
"जो अद्यावधि इस स्वयंवर वाली चुनावी वैवाहिक पद्धती को नहीं बदल पाए । यहाँ प्रत्यासी को दुल्हा होना चाहिए और दुल्हे बने हैं दल, यानी वर माला किसी के गले में और दुल्हा कोई । और यह वर माला प्रत्यासी के नियोक्ता माने  की बॉस की पारिवारिक विरदावली यानी की फेमिली स्टेटस देख कर अर्पित की जाती है प्रत्यासी की नहीं । प्रत्यासी हमारे ही बीच का होना चाहिए, और उसे बहुंत देखभाल थोक बजा कर हमें प्रस्तुत करना चाहिए जैसे हम वर को बजाते हैं । जिसके पालक हम ही हों उसका बॉस नहीं और वो हमारी सेवा-सुश्रुता करे अपने बॉस की नहीं ॥"  

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९ ० ॥ -----

कलाकार को कला की, पी को प्रेम पिपास । 
ब्यौपारी लाह लोभ, किए माया की आस । ९०१। 
भावार्थ : -- कलाकार को कला की प्यास रहती है पपीहे को प्रेम की प्यास रहती है । लाभ के लोभी व्यापारी, सदा, विलासिता की साधन स्वरूपा के आस में रहता है  ॥ 

दुजन देइ सो पाहिले, अपना भार उतार । 
कलुखित कारज परिहरत, फेर बने दातार ।९०२। 
भावार्थ : -- दूसरों को ऋण देने से पहले स्वयं को ऋण से मुक्त करना चाहिए । और कुकर्मों का परित्याग करके ही दातार बनना चाहिए । ऋणी और कुकर्मी हों तो कैसी महाजनी और काहे का दातारी ॥  

चैल चैल अभरन भला, गुरु गरुबर परिधान । 
हेर हेर हेला मिला, फेर मिलाओ तान ।९०३। 
भावार्थ : -- शिष्य का चोला ही तन को सुख देता है, गुरु का चोला बोझ सा लगता है ॥ शिष्य का चोला पहन कर अन्य शिष्यों को  ढूंढ ढूंढ कर मेल मिलाप करते हुवे  फिर उनसे ज्ञान-गोष्ठी करने में आनंद है ॥ 

भाव भरे तो भाव है, अर्थ धरे सो अर्थ । 
सार वरें सो सार है, बाक़ी सबै ब्यर्थ ।९०४। 
भावार्थ : -- जो भाव विभोर करे तो ही उसका मोल है, शब्द अर्थ उत्पन्न करे तो वह शब्द है । सार ग्रहण करने से ही कथन का उद्देश्य है अन्यथा जो कहा वो सब व्यर्थ है केवल पन्ने रंगना है ॥

तूर तुरग गामिन पंथ, रचे खचे का लाह । 
तापर चरन न भए कोउ, तूर गामिनी बाह ।९०५। 
भावार्थ : -- चित्त के जैसे तीव्र गामी पथ का निर्माण करने से लाभ क्या है ? जबकि उस पथ पर संचालित करने को कोई तीव्र गामी वाहन ही न हो ॥  

आप बड़ाई आप मुख, करे सो चाएँ चाएँ । 
मुख कहि पिहु पयस मयूख, वाके रूप सुहाए ।९०६। 
भावार्थ : -- अपनी बड़ाई अपने मुख से करने से वह प्रलाप अर्थात व्यर्थ की बातें हो जाती हैं ॥ जैसे कि कौंवा ।
चन्द्रमा की प्रशंसा पपीहे का मुख करता है तभी वह इतना सुन्दर प्रतीत होता है ॥

काम क्रोध मद अरु लोभ, अभरे बैरी रूप । 
चहुँ पुर जो अंग रच्छक, तव भय धरे सरूप ।९०७। 
भावार्थ : - काम, क्रोध, मद और लोभ इन चरों ने ही शत्रुओं का रूप धरा हुवा है । और यदि चारों और अंग रक्षक है तो वह तुम्हारे भय के ही स्वरूप हैं ॥

अर्थात : -- "यदि शत्रु ही न हो तो अंग रक्षकों की क्या आवश्यकता"

खादन छादन राखिये, राखत दान ध्यान । 
तिनको बैरी भाखिये, कलुख करम अरु मान ।९०८। 
भावार्थ : -- खाद्यान रखिये ओड़न-बिछान रखिये और साथ में दान का ध्यान रखिये । पर कलुषित कर्म और अभिमान को शत्रु स्वरूप में परिभाषित कर उनसे दूर ही रहिए ॥

प्रभु जी हमरे जीउ के, ऐसो किजौ प्रबंध । 
चन्दन काटे मर मिटे, बिखरी रहे सुगंध ।९१०। 
भावार्थ : -- हे ! जगत नियंता तुम हमारे जीवन का कुछ ऐसा प्रबन्ध करना, कि यह चन्दन स्वरूप में  जब कट कर मर मिटे तब भी उसकी सुगंध रूपी सद्गुण जगत में व्याप्त रहें ॥ 
 







मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ८९ ॥ -----

मानख के चारन चरन, मानस की पहचान । 
नहीं तो का मनु का पसु, दोउ एकै समान। ८९१। 
भावार्थ : -- मनुष्य के के जप, तप, व्रत, नियमादि शुभ धर्म आचार उसके मनुष्य होने का परिचय है अन्यथा क्या मनुष्य और क्या पशु दोनों एक ही स्वरूप हैं ॥  

भरी भावना बहुस ही, भई कोउ साकार । 
देखे सुपने सहस ही, पर लिए न एक अकार ।८९२। 
भावार्थ : -- मनुष्य के चित्त में बहुंत प्रकार की कल्पनाएँ समाई रहती हैं, जिनमें कोई साकार भी हो जाती है । अमन सहस्त्रों स्वप्न भी देखता है (चूँकि यह जीवन की चार अवस्थाओं : -- जागृत, स्वप्न,सुषुप्ति, तुरीय में से एक अवस्था है) किन्तु आकृत एक भी नहीं होते ॥  

पढ़े बिना पोथी पोट , जोगवना तस होत । 
जस उपजोग जाने बिन, गर्दभ चन्दन ढोत ।८९३। 
भावार्थ : --  बिना पढ़े पुस्तकों का संग्रहण उस गधे के आचरण के समान प्रतीत होता है । जो चन्दन के भार को ढोता हुवा उसके उपयोग को नहीं जानता ॥ 

जगत दिवाकर चाहिते, करन चहुँत अँजोर । 
चिद घन ज्ञान जोत जगा, ध्यान द्रव कर जोर ।८९४। 
भावार्थ : --  अज्ञान का अन्धकार व्याप्त है, संसार इस अंधरे को दूर करने हेतु ज्ञान के सूर्य की कामना कर रहा है । तू अंतस स्वरूप में ध्यान और ज्ञान के साधनों को संयुक्त करके ज्ञान की ज्योति जागृत कर ॥ 

बार बार जौ फार देइँ, भूमि तिन्ह तरु सोइ । 
जे जलावनु जोर लेइँ,  बार मह भसम होइ ।८९५। 
भावार्थ : -- डोली (खेत) ऐसे गाछ के समान है जो बार बार फल देती है । गाछ को काट पिट के ईंधन बना दिया और डोली को बेच-खेच के धन बना दिया, फिर दोनों एके बार में भस्म हो जाएंगे ॥ 

एसो धन्य भयऊ सबै, जैसो मैं धनबान । 
एसो दरिद न कोउ लहैं, जैसो मैं दरिदान ।८९६। 
भावार्थ :-- ऐसे धनी सब हों, जैसा में धनवान हूँ । ऐसी दरिद्रता किसी को प्राप्त न हो, जैसी मुझे प्राप्त है ॥  

मधु कारी संचइ कोष, दोनौ एक सों होइ । 
उपजोग कारै कोई, बूँद बूँद को जोइ ।८९७ । 
भावार्थ : -- पोथी, धन, और मधु के संचय कर्त्ता का कोष एक समान होता है । बूंद बूंद कर संग्रह कोई करता है, और उपयोग कोई ॥ 

तीर तमाल को गाछ, चरे गाय अरु बाछ । 
जँह जमुना उच्छरित तँह, मीठी लागे छाछ ।८९८ । 
भावार्थ : -- जिसके तट पर तमाल वृक्ष हों, गाँय और बछड़े विचर रहे हों ।  जहाँ यमुना तरंगित हो रही हो, वहाँ खट्टी छाछ भी मीठी लगती है ॥ 

आजुध बिलगन  न चाहिए, रन कारिन निज काइ । 
सत्रु कार निवहरन हुँते , एक पलकहु अधिकाइ ।८९९। 
भावार्थ : -- योद्धा के शरीर से उसके अस्त्र-शस्त्र वियुक्त नहीं होने चाहिए । क्योंकि शत्रु को  अंत करने के लिए एक क्षण का समय भी अधिक होता है ॥ 

कन उपजे धर्म उपजे , धन उपजे अभिसाप । 
जे भूमिहि रन जगियाए, प्राण जाए सो पाप ।९००। 
भावार्थ : -- अन्न  की व्युत्पत्ति  से धर्म अर्थात दया उत्पन्न होती है, क्योंकि अन्न जीवों के प्राणों की रक्षा करता है । धन की उत्पत्ति से  अभिशाप उत्पन्न होता है , यदि भूमि में युद्ध उत्पन्न हो जाए तो वह प्राणों की आहुति लेता है, और फिर पाप उत्पन्न होता है ॥     



सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 108 -----

" राजू ! ये बता तूने विपक्ष का शासन देख लिया ?

राजू : -- हाँ ! मास्टर जी! देख लिया..,

" अच्छा ! अब ये बता तूने पक्ष का शासन देख लिया"

राजू : - मास्टर जी ! उसको तो एख देख के एक आँख के अंधे हो गए..,

" अच्छा ! अच्छा !! ये बता अब और क्या देखना बाक़ी रह गया..,

राजू : -- मास्टर जी ! एक बात हमको भी बताइए जब देश का बच्चा बच्चा राम है तो आप क्या हैं ?

"हाइ हाइ  हा हा हा"  

रविवार, 20 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 88॥ -----

प्रभु के पूरन काम कर, पुरइ तिन्ही कहान । 
मानख मरते मरी गए, भइ न बाक़ी बखान ।८८१। 
भावार्थ : -- भगवान् श्री राम की मनोकामनाएं पूर्ण हुई उनकी कथा भी पूर्ण हुई । किन्तु ये मनुस जात है न  वो मरते मर गए न  उनकी अभिलाषाएं पूर्ण हुई न कथा ॥   

प्रीत प्रतीत सों बढ़के, नाही कोई रीति । 
मौनी मुद्रा सों बढ़के, ना कोउ रहस नीति ।८८२। 
भावार्थ : -- प्रेम-विश्वास, से बढ़कर कोई रीति नहीं है । "मौन-भाव से बढ़कर कोई गुप्त-नीति नहीं है " : -- श्रीमद्भागवद्गीता ॥ 

नैस अनैस दोइ सोह, मानस सरन बिचार । 
जाकी जैसी भावना , तैसे चरन प्रस्तार ।८८३। 
भावार्थ : -- मस्तिष्क के मार्ग में शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के विचार होते हैं । जिस व्यक्ति की जैसी भावना रहती है अर्थात जो हित-अहित जैसे कारक चाहता है,फिर ( समाज में) वैसे विचार ही प्रसारित होते हैं ॥ 

चंदन पीपर नीम बट, समरूप लाग जराए । 
राज हो की कोउ रंक,एक सों मेट मिटाए ।८८४। 
भावार्थ : -- लकड़ी चन्दन की हो, पीपल की हो नीम की हो , वट की हो, अथवा कोई भी क्यूँ न हो अग्नि सबको समान रूप से जलाती है । राजा हो, मंत्री हो, धनी हो, निर्धन हो, चाहे कोई भी क्यूँ न हो मिट्टी सबको समान रूप से मिटाती है ॥ 

लाया ना कछु संग मैं, फिर कैसा अभिमान । 
जिउहु पराई देन है, फिर काहे का दान ।८८५। 
भावार्थ : -- यह जगत विदित है , कि तू साथ कुछ भी नहीं लाया । फिर अभिमान किस बात का ? तेरा यह जीवन भी दूजे की दें है फिर इसका देना, दान कहाँ हुवा ॥ 

जे जग तेरो आपनौ, ते मन ज्ञान निधान । 
बिन बिन के तिन बावरे, बढ़ चढ़ के दे दान ।८८६। 
भावार्थ : -- इस संसार में तेरा कुछ अपना है तो वह तेरा चिद घन कोष है । अरे अबोध ! उसे तू चुग चुग के उत्साह पूर्वक दान कर, फिर देख ॥  

बिषय बतासे के रसन, मुख लागै अति रास । 
ऐसे रस कस परिहरै, चरत चरन उपबास ।८८७। 
भावार्थ : -- भोग विलास की वस्तुओं के बतासे मुख को में अति सुस्वादु लगते हैं । ऐसे रसों को किस विधि से छोड़ें ?उपवास का आचरण ग्रहण करके ( जैसे : -- एक स्त्री व्रत करके पराई स्त्री के आकर्षण का त्याग किया जा सकता है ) ॥  

दिवस जामि दुइ पखबार, जोगत आठों जाम । 
दोइ साँचे रूप धरे, सेष भरम के नाम ।८८८। 
भावार्थ : - दिन और रात, चौबीस घंटे के योग में यही दो पक्ष है । ये दो ही सत्य स्वरूप हैं, शेष सभी भ्रम का नाम हैं ॥

पदक परधान पाए कै, पाए पंच परिधान । 
सुरतें बिषय बिलासिता, भूरे धान किसान ।८८९। 

भावार्थ : -- जब उच्च स्थान प्राप्त हो जाता है न, तो बढ़िया बढ़िया खाना, बढ़िया बढ़िया पहनना, बढ़िया बढ़िया रहना, बढ़िया बढ़िया उड़ना, और जाके बढ़िया बढ़िया लोगो के साथ हाथ मिलाने को मिलता है ( केवल हाथ ही मिलाते हैं अन्यथा उनसे अधिक वार्तालाप और कार्य, अंतर जाल अर्थात नेट में हो जाती हैं ,ये इसी लिए बना है की आप व्यर्थ में न उड़ें ) और प्रत्येक क्षण भोग विलासिता का ही स्मरण रहता है , फिर गाँव, धान, खेत खलिहान, और किसान सब भूल जाते हैं ॥

कंटक कटु कोमल कुसुम, एकै डारी प्रफूर । 
जाके जैसे गुन धर्म, वाके वैसे मूल ।८९०। 
भावार्थ : -- कटुक कंटक और कोमल कुसुम एक ही दाल में फूलते हैं ।  प्राणी जैसे गुण धर्म लेकर पञ्च तत्व में विलीन होता है इस भव संसार फिर उसकी उत्पत्ति उसी स्वरूप में होती है ॥






गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 87॥ -----

दिनकर दरसत दिवस में, सपने दरसैं रैन । 
देवन सदैव सुधि रहे, जे काहू के लैन ।८७१ । 
भावार्थ : -- दिन में सूर्य के दर्शन करते रहना चाहिए निद्रा नहीं लेनी चाहिए सपने रात्रि काल में देखने चाहिए ॥ यदी किसी का लागा हो, उसे देने के लिए सदैव ध्यानरत रहना चाहिए ॥

लेवन सदा ले डूबा, तारा सदैव देन । 
लेन देन परिहारते, पावै जी के चैन ।८७२। 
भावार्थ : -- लेना, सदैव ले डूबता है, दान ही उद्धार करता है । और ये लेन -देंन है ना उसे तो त्याग ही देना चाहिए, ऐसा करके जी को बहुंत ही चैन मिलता है ।

मुख हास रस रचाइ के, बोलैं मीठे बैन । 
लघु हो कि बृहत् सब सोंह, लाखे एक ही नैन।८७३। 
भावार्थ : -- मुख पर विहास रस की रचना कर सदैव मीठी बोली बोलनी चाहिए ।  कोई छोटा हो या बड़ा सभी के प्रति समान भाव रखना चाहिए ॥

जोरी खोरी जोर कै, जोरे जोरू जात |
जौंरे-भौंरे जमोगन, ते जिनगीहि सुहात ।८७४। 
भावार्थ : -- एक ठो जोरीदार एक ठो खोरी ढार । ऐसन  घर-बार जोर के एको दुइ ठो लइका लार, ऐसा जीवन ही सुशोभित होता है ॥

ज्ञान जगान सन सोहत, निद्रा सपन के संग । 
सपन जगत जथारथ जग, न राखे को प्रसंग ।८७५। 
भावार्थ : -- चैतन्य और ज्ञान की जोडी अच्छी लगती है, निद्रा और स्वपन की जोडी अच्छी लगती है । जागरण और स्वप्न की जोडी अच्छी नहीं लगती । स्वप्न जगत और यथार्थतस का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं होता ॥

बाँधे भोजन ग्रहन कै, बँधे पयस जे पान । 
बाँधे बास मनन करे, पाए परम गुन ज्ञान ।८७६। 
भावार्थ : -- बंधा भोजन-पानी, बंधा वास अर्थात जो मूलभूत आवश्यकताओं का सिमित उपयोग कर विषय विकारों से रहित होकर चिंतन करता है, वह परम गुण एवं ज्ञान का अधिकारी होता है ॥

जोइ जोर बटोर धरे, जहाँ सो तहाँ दाएँ । 
काया अंत काल करे, जाने को ले जाए ।८७७। 
भावार्थ : -- जो भी माया रूपी धन संपदा जहां से जोड़ी बटोरी है वहीँ दे आना चाहिए । म्रत्यु द्वारा काया का अंत होते ही फिर न जाने इसे कौन ले जाएगा ॥ 

मायावंत कुलीन भए, धनी बनी भगवान् । 
माने न कहि बिधि केई,चलाए आप बिधान ।८७८। 
भावार्थ : -- काल ऐसा है कि मायावंत शुद्ध और सुचरित्र कहला रहे हैं ,व्यापारी, खलकारी,  धनधारी, भगवान् बने बैठे हैं । ये और किसी की तो क्या सृष्टि के रचनाकार की कही भी नहीं मानते  । और अपने विधान मनवाते फिर रहे हैं ॥ 

अपनी ढप अपना राग, औरन राखे गौन । 
माने ना तू कोउ की, तेरी माने कौन ।८८०।   
भावार्थ : -- अपनी ही ढपली रखा है अपना राग गा रहा है, दूसरे गए भाड़ में । तात्पर्य है कि : -- 

"जब तू किसी की नहीं मानता तो तेरी कौन मानेगा " 





रविवार, 13 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 86॥ -----

लगाए बुझाए सों लगे, जो जगावत लाग । 
आपन घर को भूस कर, आप लगावत आग ।८६१। 
भावार्थ : -- जो लगाई-बुझाई से आकर्षित होकर उससे निकटता रखता है, अपने घर को भूसा कर वह उसमें आप ही आग लगाता है ॥

काल कलुखित मलि मुख जब, बोलै साँची बोलि । 
कुंजर चढ़े लघुत नाउ,डगमग डगमग डोलि ।८६२। 
भावार्थ : -- कलुषित कर्मों से युक्त, दोषों से परिपूर्ण, अपावन मुख से जब कोई सत्य बोलता है, तब यूं आभास होता है, मानो किसी लघु नौका में कोई हाथी चढ़ गया हो, और वह डगमग डगमग डोल रही है ॥

भया नउ द्यौस नउ द्यु ,  लिए उरझन नौ आँट । 
एक गाँठ के सुरझावत,  दूजी देखे बाट ।८६३। 
भावार्थ : -- नए से नभ में, नई उलझन लेकर नया दिवस उदयित हुवा । एक उलझन के सुलझी नहीं की दूसरी प्रतीक्षा में रहती है ॥

चुन चुनाउ चरन क्रिया, तिन्ह में नाहि कोइ । 
काटत रावन सीस सम, बार बार उपजोइ ।८६४। 
भावार्थ : -- विद्यमान चुनाव प्रणाली में यदि 'इनमें से कोई नहीं, का चयन किया जाए । तो वह रावण के शीश के समान होंगा, जिसे जितनी बार काटा जाए, वह उतनी बार उग आएगा ॥

धनबन घन की मोटरी, मनियर रतन रखाए । 
अजहूँ धरा धान धरी, देन दसा मह दाए ।८६५। 
भावार्थ : -- गगन ने मेघों की गठरी में चमकते हुवे सुन्दर रत्न रखे हैं । अभी तो धरनी ने धान स्वरूप धन धारण किए है । जब धरणी की दैन्य दशा हो, गगन को तब ये रत्न देऩे चाहिए ॥

गिरिपत के लिलार पर, लिखि सुरसरि की धार । 
हेरि हरि के द्वार पर, लिख वाका विस्तार ।८६६। 
भावार्थ : -- हर के मस्तक पर सुर सरिता की धार लिखी गई । उन्होंने उसका विस्तार लिख कर उसे हरि द्वार पर उतारा ॥

सत त्रेता द्वापर कलि, चौकड़ जुग कुल चार । 
सहस चौकड़ी जोग के, दै एक कल्प अकार ।८६७। 
भावार्थ : -- शास्त्रानुसार : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, और कलयुग ये चार युग मिला कर एक चौकड़ी निर्मित करते हैं । सहस्त्र चौकड़ी मिलकर एक कल्प की रचना करते हैं ॥

सेउ सुधि अर्चन बंदन, कीर्ति श्रुति सत्संग ।
दास सत स्वा निवेदन, जे भगतिहि नवांग ।८६८।
भावार्थ : --शास्त्रानुसार : "सत्संग,श्रवण,कीर्तन,स्मरण,चरणसेवा,अर्चन,वंदन,आत्मनिवेदन,दासत्व सत्य"
 भक्ति के ये नौ अंग हैं ॥

अंडज उपजत अंड सन, स्वेदज सन स्वेद । 
पिंडज उपजे पिंड सन, उद्भिज भू उद्भेद ।८६९। 
भावार्थ : -- शास्त्रानुसार : चौखनि अर्थात चार प्रकार की योनि हैं : -- अंडज  जो अण्डों से उत्पन्न होते हैं जैसे : सरिसृप, पक्षी आदि, स्वेदज अथवा ऊष्मज, वे जीव जो उष्णता से उत्पन्न होते हैं जैसे झींगुर, खटमल आदि, पिंडज वे जीव जो देह लेकर उत्पन्न होते हैं जैसे : -- मानव, पशु उद्भिज वह जीव जो भूमि विदीर्ण कर उत्पन्न होते हैं जैसे : -- वृक्ष आदि ॥

को धातु दहुँ को पाहन, गढ़िया गहन पुकार ।  
सार तत्व तब मौन रहे, जब मुखरिते अकार ।८७०। 
भावार्थ : -- स्वर्ण हो अथवा कोई भी धातु हो रत्न हो अथवा कोई भी पत्थर हो गढ़िया उसे आभूषण ही कहता है ।
तत्व, सार, अर्थ, शब्द  तब मौन अर्थात अप्रधान हो जाते हैं, जब भाव, आकृति मुखरित अर्थात प्रधान हो जाते हैं ॥

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 107 -----

राजू : -- मास्टर जी! आप क्या देख रहे हो ?

  "दूरदर्शन"

राजू : -- मास्टर जी! दूरबीन से ?

"हाँ"

राजू : -- मास्टर जी! दिखा ?

"नहीं"..... तुम सूक्ष्मदर्शी से क्या ढूंड रहे हो ?

राजू : -- मास्टर जी ! 'देशबंधु' ढूंड रहा हूँ, मिल ही नहीं रहा.…. 

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 85॥ -----

जगलग जन जन के चाह, असं बसन बर बास । 
चितबन ज्ञान बिठारि कै, बाक़ी चाह निकास ।८५१। 
भावार्थ : -- अखिल जगत में समस्त जनों की यही कामना है कि उत्तम भोजन हो, उत्तम वस्त्र हों, और उत्तम से उत्तम आवास हो ।  चित्त में ज्ञान को प्रतिष्ठित कर शेष सभी कामनाओं का निष्कासन करने में ही जग का कल्याण है ॥

नाम निरूपन नाम जतन, करत भलाई काम । 
सोन मनि धन धान रतन, जेइ बुराई नाम ।८५२। 
भावार्थ : -- नाम के यथार्थ स्वरूप, नाम की महिमा, नाम का प्रभाव उत्पन्न करने, नाम की कीर्ति करनी हो तो   नाम का रखरखाव करना चाहिए,  कैसे? भलाई के कार्य करके । स्वर्ण, माणिक्य, रत्न, धन, संपदा आदि ये तो बुराई के नाम है, इनसे कीर्ति नहीं होती अपकीर्ति ही होती है ॥

कलुख करम परिहार कै, जथा जोग दै दान। 
जे ज्ञान गहिता माने, जगत बृहद बिद्वान ।७५३। 
भावार्थ : -- कलुषित कर्मों का त्याग कर यथा योग्य दान देना चाहिए । इस ज्ञान के ग्रहण कर्त्ता को अखिल विश्व वृहद् विद्वान मानता है ॥

असन बसन अन ज्ञान धन, देवें छिनु कर धार । 
कौनौ निज सम्मत देत, सोचें सौ सौ बार ।७५४। 
भावार्थ : -- भोजन, वस्त्र, अन्न, ज्ञान, धनादि को तो क्षण में ही दे देवें । किन्तु किसी को अपना मत अपनी सम्मति देने से पूर्व सहस्त्रों बार सोंचें और योग्य को ही देवें, यदि योग्य न हो तो ना देवें, डाक्टर ने नहीं बता रखा देने को । क्योंकि यदि ऐसी सम्मति का दुरुपयोग हुवा तो वह सर्वप्रथम दाता के ही विरुद्ध होगा ॥

अपलक लख पथ जोगती, रयनय रयन प्रभात । 
जगत जोत जोइ जागता, सो जे दरसन पात ।७५५। 
भावार्थ : --  निर्निमेष दृष्टी से रयनी प्रभात संग प्रेम मग्न होने की प्रतीक्षा कर रही है । जो कोई ज्योति जागृत रहते जागरण करता है वह ही ऐसे मधुर मिलन के दर्शन की अनुभूति प्राप्त करता है ॥

जानन लागे चारि जन, सोइ लोक प्रिय होइ । 
अगजग जानै रावना, कहे न प्रियकर सोइ ।७५६। 
भावार्थ : -- चार जन जानने क्या लग गए वह लोकप्रिय हो गया ? रावण को तो सारा जग जानता है उसे कोई भी प्रिय नहीं कहता ॥

चढ़ चल झाड़ बुहारि दे, धोए पोंछ चमकार । 
येह ह्रदय भगवन भवन, दरिदर सकल निकार ।७५७। 
भावार्थ : --   चलो झाडना बुहारना आरम्भ करें, धों, पोंछ के चमका दें  । यह ह्रदय ईश्वर का भवन है, इसकी भी मलिनता का निष्कासन करें ॥

लोभहि जाके ओड़ना, लोभइ सयन बिछान । 
हानि वाकी रैन रही, लाभ जाके बिहान ।७५८। 
भावार्थ : -- प्रकृति के क्रिया कलापों से लोभी का कोई सम्बन्ध नहीं होता, लोभ ही जिनका आच्छादन हैं, लोभ ही उनका बिछौना है । जिनके लिए लाभ ही दिवस हो, हानि उनके लिए रात्रि है ॥

आए चोरटे चौंक पर, फिरै दुवारि दुवार । 
अपना हीरा गाँठ कर, भगा भगा लठ मार ।७५९। 
भावार्थ : -- चोरटे फिर आ गए, दुवार दुवार फिर रहे हैं । अरे ! घरवालों,  अपने हीरे को गाँठ बाँध के उन चोरों को डंडे मार के भगा दो, वस्तुत: इसी में तुम्हारा कल्याण है ॥

सों सम्मत रावन सोंह, जे भइ लोक बिरुद्ध । 
सोइ मत रघु नाथ जोंह, घेर तिन्ह करि जुद्ध ।७६०। 
भावार्थ : -- वे विचार रावण के सदृश्य हैं, जो लोक विरुद्ध होते हैं । वे विचार प्रभु श्री राम के स्वरुप हैं, जो इन्हें घेर कर इनसे युद्ध करते हैं ॥   







मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 106 -----

 " राजू! या देख" 

राजू : -- मास्टर जी ! थोडी बड़ी ह,,,

" इब या देख" 

राजू : -- मास्टर जी ! या बी थोडी बड़ी ह..,

" अच्छा, इब या देख 

राजू : -- मास्टर जी ! या बी.....

" यो बता थाणे गोद लेणी ह, कि फेरो लेणी ह"

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 84॥ -----

कारज तत्पर कीजिये, कार उसार सुहाए ।  
साँस पर साँस लीजिये, भूल परे पछिताए ।८४१। 
भावार्थ : -- कार्यों को तत्परता से करना चाहिए क्योंकि कार्य पूर्ण किये हुवे ही अच्छे लगते हैं, आधे अधूरे नहीं ।सांस के ऊपर सांस लेना चाहिए यदि यह भूल गए फिर पछतावा रह जाएगा ॥

ना काया नाहि कंचन, नाहि रतन धन धाम । 
ना प्रियजन नाहि परिजन, मर पर गए सद काम ।८४२। 
भावार्थ : -- न शरीर, न स्वर्ण न कोई रत्न न धन-संपत्ति न प्रियजन ना ही परिजन जाते हैं मृत्यु  के पश्चात केवल सद्कार्य ही साथ जाते हैं ॥

तन से सेवा कीजिये, मन से कीजै नेह । 
मुख रसन सन प्रियंवदन, जे बिन धन के देह ।८४३। 
भावार्थ : -- तन से लोकोपकार कीजिए, मन से सनेह कीजिए, जिह्वा से मधुर वचन कहिये, ये बिना धन के दान हैं ॥

जिन हूँते लोहन कंचन, रतन काँच सों होइ । 
जिन हूँटी प्रभूत रति मान, साधु संत कह सोइ ।८४४। 
भावार्थ : -- जिनके लिए सोना भी सामान्य धातु के समान हो, रत्न कांच के मान हो, जिनके लिए प्रचुरता रत्ती भर हो वही व्यक्ति सदाचारी एवं विद्वान कहलाता है ॥

कन कन मैं भगवन बसे, जान तिन रे अजान । 
तनिक छन अभिज्ञान करत, तनिक छन अभिध्यान ।८४५। 
भावार्थ : -- ईश्वर का वास कण कण में है । अरे मूर्ख अज्ञानी तू इसका संज्ञान लेकर, कुछ क्षण उस ईश्वर की स्मरण करते हुवे कुछ क्षण उसकी वर्ण-व्याख्या का चिंतन कर ॥

पहिले पिता दूजा पुत, फिर जावेगा पोत । 
केतै जोग जुगबन कर, केतै कतर ब्योंत।८४६। 
भावार्थ : -- पलां बाउजी, दूसरियो पुत, फेर जाओगो पोतो ।बिका  कितणों राखणों राखो, जोड़ो तोड़ो पण जाणों तो पड़सी ॥

भाखा कौनौ भाखिये, चाहे रँह को देस । 
सद गुन गन मन राखिये, धारे तन को भेस ।८४७। 
भावार्थ : -- भाषा कोई भी भाषें, चाहे किसी भी स्थान में निवास करें । किसी भी वेश को धारण करें किन्तु चित्त में सदा सदगुण एवं लक्षणों का वास हो ॥

जाके चित चारारि बस, वाके ऊंचे बास । 
दरसत तिन कृत कौतुकी, भँरमत नीच निबास ।८४८। 
भावार्थ : -- देश, काल, और परिस्थिति ऐसी है कि जिसका चित्त चार शत्रु (  काम,क्रोध,मद,लोभ ) के वश में है उसी का ऊंचा स्थान है । और उसकी बनावटी कौतुहल  (तमाशा) को  देख नीचे बैठे लोग भ्रमित हैं॥

बिना घृत का जोत जरी, मिली उपज बिनु बोइ । 
बिना भाव भगति के जोग सेवा सुफल न होइ ।८४९। 
भावार्थ : -- बिना घृत के कहीं ज्योति प्रज्वलित होती है,  बिना वपन के कहीं उपज प्राप्त होती है ।  भाव और श्रम साधना से रहित सेवा भी सफल नहीं होती ॥

धन न धान न अधर्म ना, छूटे हठ अभिमान । 
छूटे सब क्रिया कलाप,छूटेंगे जब प्रान ।८५०। 
भावार्थ : -- धन न छूटा, संपत्ति न छूटी, दूषित कर्म नही छूटे, हठ छूटा न अहंकार छूटा । जब प्राण छूटेंगे तभी ये सारे क्रिया, कार्यक्रम छूटे ।












बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 83॥ -----

सदकरम के सोहन सौं, मलिन अवध लवनाइ । 
कलुख करम मलिन लंका, सुबरन दीप कहाइ ।८३१। 
भावार्थ : -- सद करमों की शोभा के सम्मुख अवध देस की लावण्यता भी मलिन हो गई । और दुष्टता भरे कर्मों के सम्मुख मलिन लंका भी स्वर्ण द्वीप कहलाई ॥

करतब भाउ सदाचरन सेवा साँच सनेह । 
सोइ सिंगार साधनक, सुठि सिंगारत देह ।८३२।
भावार्थ : -- कर्त्तव्य का भाव, सदाचरण, सेवा, सत्य, स्नेह आदि ऐसे श्रृगार साधन है जो शरीर को सुरुचि पूर्वक सुसज्जित करते हैं ॥

चाहे साधै सरासन , सागन सूल सलाख । 
जब लग ना पँवरै पंथ, तब लग भेद न लाख ।८३३। 
भावार्थ : -- सरासन में चाहे अग्नि के समान शूल,भाले,त्रिशूल,बरछी संधान कर लें । जब तक मार्ग निश्चित न हो तब तक ये अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं होते ॥

सिन्धु सुत संचित गहन, घनबर घन मलिनाए । 
तज धरनी सिंचित करे, धूल धवल धवलाए ।८३४। 
भावार्थ : -- सिन्धु के मोतियों को संचित करते मेघ का मुख और अधिक मलिन होता जाता है । किन्तु जब यह इं मोतियों का त्याग कर धरणी को सिंचित करता है तो धूल कर स्वच्छ एवं निर्मल हो जाता है ॥

धन सन को न बड़ा भया, औरु न होही कोइ। 
सद गुन धर्म सत बिचार  बरे बडप्पन होइ ।८३५। 
भावार्थ : -- धन से न तो कोई बड़ा हुवा, और न कोई होगा । उत्तम गुण, उत्तम आचरण, एवं उत्तम  विचारों को वरण करने ही से बड़प्पन सिद्ध होता है ॥

मुख रसना मनके धुनी, रोर रोर ररियाए । 
भाव आचरन अवतरे , तबहि जग सत सुहाए ।८३६। 
भावार्थ : -- मुख की डोरी में शब्दों के मनके फेर कर सत्य का जाप हो रहा है । वह सत्य संसार को तब समझ में आता है जब उसके भाव को आचरण में उतारा जाए ॥

देसीय देसाबर तब,  भए को बिषय बिसेस । 
अंत सन लै अंतर लग, जब हो तेहि प्रबेस ।८३७। 
भावार्थ : -- कोई विषय तब राष्ट्रीय अथवा अन्तर्राष्ट्रीय श्रेणी का होता है, जब उसका प्रवेश अंत से लेकर अंतर तक अर्थात केंद्र से लेकर परिधि तक हो ॥

छन छन करत काल घोष,छन सन रैन बिहान ॥ 
छन सन धरत सरूप कोष, छन सन बरस निधान।८३८। 
भावार्थ : -- समय, प्रत्येक क्षण घोषणा कर रहा है, क्षणों ही से रात्रि और दिवस का अस्तित्व हुवा ।  क्षणों ही ने महीनों का स्वरूप धारण किया, क्षणों ही से वर्षों का भंडार भरा ।

अर्थात : -- "लघुता ही में ही प्रभूता है"

बलिहाई सन बीर है, तरलाई सन तीर । 
हरियाई सन हीर है, सरलाई सन सीर ।८३९। 
भावार्थ : -- वीर गति से ही वीरता है, तरलता है तो तट है । हरियाली से ही लक्ष्मी है, सरलता ही से प्रारब्ध है ॥

हेतुक होत हतक हतन, दे छम प्रभुत कहाए । 
अहेतुक हतक दै छम, सोइ कहि सेवाकाए ।८४०। 
भावार्थ : -- कारण के होते प्रताड़ित करने वाले को प्रताड़ित होना वाला क्षमा करे तो वह प्रभुता कहलाती है । किन्तु अकारण प्रताड़ित करने वाले को, प्रताड़ित होने वाला क्षमा करे तो वह लोकोपकार कहलाता है ॥


----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...