रविवार, 15 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 76॥ -----

दुआ गो दरबारे-सर ,झूके सों सरताज । 
माँग रही सरकार पर,सरदर सर अफ़राज ।७६१। 
भावार्थ : -- दुआ माँगने वाले,  खुदा के दरबार में उसके सम्मुख सर झुका के दुआ माँगते है । और उंचे स्थान पर आसीन होकर, घमंड से भरी ये सरकार सामने सर उठाए पता नहीं क्या मांग रही है ॥

दीन दार जो मतलबी, सो तो बेईमान ।
इरादे-रहम पाक वो, सच्चा मूसलमान ।७६२। 
भावार्थ : -- जो अपनी गरज के लिए धर्म में यकीं रखता है, माने कि गरज पूरी हुई धर्म गया भाड़ में वह तो बेईमान है ।  जिसके इरादे नेक हो पाक हो जो मेहरबाँ हो रहमान हो,  वही सच्चा मूसलमान है ॥

सौ नाम धरे सरकार, सौ सौ हाथ जबान । 
तेरी फेरी फेर के, ले जावै मत दान |७६३ |  
सौ नाम होना = अनेक त्रुटियाँ होना 
सौ  हाथ जबाँ होना = चटोर होना, स्वाद लोलुप होना  
भावार्थ : -- सरकार किसी की हो, उसमें अनेक त्रुटियाँ हैं,  स्वाद की लालची भी है अर्थात खाने खिलाने में उस्ताद है । चतुर इतनी है कि जिसको तूने फिरा दिया उसको भी फेर के तेरा वोट निकाल लेगी। अत: अपना वोट रूपी हीरा संभाल के रख ॥ 

क्रोध अजान कटुक बचन, दंभ दर्प अभिमान । 
तिन्ह सों सकल अनाचरन, आसुरि सम्पद मान ।७६४। 
 ----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥ -----
भावार्थ : -- क्रोध, अज्ञानता, कड़वे वचन, दम्भ, दर्प एवं घमंड । ऐसी सभी संपत्ति उद्दंड एवं असभ्य व्यक्तियों की संपत्ति के सदृश्य होती है ॥ 

का भगती अरु का भजन, पूजन का उपवास । 
जे कहाबत तिनकी जो  , आप उदर के दास । ७६५। 
भावार्थ : -- क्या सेवा-भक्ति कैसा भजन, क्या पूजा क्या उपवास । यह कहावत उनकी है जो अपने पेट के दास हैं ।। 

अर्थात : -- "जो अपने पेट का दास है, वह जनार्दन की पूजा कभी नहीं कर सकता " 
                    ----- ॥ शेख सादी ॥ -----

जब लग तुम तम आपना, मेट हुँत न संजोए। 
तबलग तुम्हरे उद्धरन, कार सके ना कोए ।७६६। 
 ----- ॥ स्वामी रामतीर्थ ॥ -----
संजोए = तैयार 
भावार्थ : -- "जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने हेतु कटिबद्ध नहीं होते, तबतक तुम्हारा कोई उद्धार नहीं कर सकता "

कृत जग जोग बिग्यान, त्रेता जुग जग्यान । 
द्वापर जुग तपस चरन, कलि कल्यान प्रधान ।७६७। 
 ----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : --सतयुग में योग और विज्ञान  की प्रधानता है, त्रेता युग में यज्ञ की प्रधानता है । द्वापर में तपस्या प्रधानता की है एवं कलयुग में कल्यान की प्रधानता है ॥ 

गड़हा गड़े सिखर चढ़े, प्रभु दरसन ना होए । 
जाके मनो भाव बड़े, दरसन पावै सोइ ।७६८। 
  ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- गड्ढे में गड़ने से, शिखर पर चढाने से महत्तत्त्व स्वरूपी के दर्शन नहीं होते । जिसके मन की भक्ति विस्तृत परिणाम वाली हो उसे ही ईश्वरीय महत्तत्त्व का योग प्राप्त होता है ॥ 

 लोचन कन अहहै कबित  , ह्रदय कबित आधार । 
होई जन कबिताकार, जोई रोवन हार ।७६९। 
 ----- ॥ एंड्री ॥ -----
भावार्थ : -- आँसू  एक  काव्य है, हृदय उस काव्य का आधार है । रोने वाला प्रत्येक व्यक्ति कविताकार है ॥ 

सरीर अमले नीर सों, मन अमले सों साँच । 
अंतस अमले धर्म सों, मति ज्ञान सोंह राँच ।७७० । 
 ----- ॥ मनु स्मृति ॥ -----
भावार्थ : -- शरीर जल से पवित्र होता है, मन सत्य से, आत्मा धर्म से, बुद्धि ज्ञान से पवित्र होती है ॥ 










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