दुआ गो दरबारे-सर ,झूके सों सरताज ।
माँग रही सरकार पर,सरदर सर अफ़राज ।७६१।
भावार्थ : -- दुआ माँगने वाले, खुदा के दरबार में उसके सम्मुख सर झुका के दुआ माँगते है । और उंचे स्थान पर आसीन होकर, घमंड से भरी ये सरकार सामने सर उठाए पता नहीं क्या मांग रही है ॥
दीन दार जो मतलबी, सो तो बेईमान ।
इरादे-रहम पाक वो, सच्चा मूसलमान ।७६२।
भावार्थ : -- जो अपनी गरज के लिए धर्म में यकीं रखता है, माने कि गरज पूरी हुई धर्म गया भाड़ में वह तो बेईमान है । जिसके इरादे नेक हो पाक हो जो मेहरबाँ हो रहमान हो, वही सच्चा मूसलमान है ॥
सौ नाम धरे सरकार, सौ सौ हाथ जबान ।
तेरी फेरी फेर के, ले जावै मत दान |७६३ |
सौ नाम होना = अनेक त्रुटियाँ होना
सौ हाथ जबाँ होना = चटोर होना, स्वाद लोलुप होना
भावार्थ : -- सरकार किसी की हो, उसमें अनेक त्रुटियाँ हैं, स्वाद की लालची भी है अर्थात खाने खिलाने में उस्ताद है । चतुर इतनी है कि जिसको तूने फिरा दिया उसको भी फेर के तेरा वोट निकाल लेगी। अत: अपना वोट रूपी हीरा संभाल के रख ॥
क्रोध अजान कटुक बचन, दंभ दर्प अभिमान ।
तिन्ह सों सकल अनाचरन, आसुरि सम्पद मान ।७६४।
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥ -----
भावार्थ : -- क्रोध, अज्ञानता, कड़वे वचन, दम्भ, दर्प एवं घमंड । ऐसी सभी संपत्ति उद्दंड एवं असभ्य व्यक्तियों की संपत्ति के सदृश्य होती है ॥
का भगती अरु का भजन, पूजन का उपवास ।
जे कहाबत तिनकी जो , आप उदर के दास । ७६५।
भावार्थ : -- क्या सेवा-भक्ति कैसा भजन, क्या पूजा क्या उपवास । यह कहावत उनकी है जो अपने पेट के दास हैं ।।
अर्थात : -- "जो अपने पेट का दास है, वह जनार्दन की पूजा कभी नहीं कर सकता "
----- ॥ शेख सादी ॥ -----
जब लग तुम तम आपना, मेट हुँत न संजोए।
तबलग तुम्हरे उद्धरन, कार सके ना कोए ।७६६।
----- ॥ स्वामी रामतीर्थ ॥ -----
संजोए = तैयार
भावार्थ : -- "जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने हेतु कटिबद्ध नहीं होते, तबतक तुम्हारा कोई उद्धार नहीं कर सकता "
कृत जग जोग बिग्यान, त्रेता जुग जग्यान ।
द्वापर जुग तपस चरन, कलि कल्यान प्रधान ।७६७।
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : --सतयुग में योग और विज्ञान की प्रधानता है, त्रेता युग में यज्ञ की प्रधानता है । द्वापर में तपस्या प्रधानता की है एवं कलयुग में कल्यान की प्रधानता है ॥
गड़हा गड़े सिखर चढ़े, प्रभु दरसन ना होए ।
जाके मनो भाव बड़े, दरसन पावै सोइ ।७६८।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- गड्ढे में गड़ने से, शिखर पर चढाने से महत्तत्त्व स्वरूपी के दर्शन नहीं होते । जिसके मन की भक्ति विस्तृत परिणाम वाली हो उसे ही ईश्वरीय महत्तत्त्व का योग प्राप्त होता है ॥
लोचन कन अहहै कबित , ह्रदय कबित आधार ।
होई जन कबिताकार, जोई रोवन हार ।७६९।
----- ॥ एंड्री ॥ -----
भावार्थ : -- आँसू एक काव्य है, हृदय उस काव्य का आधार है । रोने वाला प्रत्येक व्यक्ति कविताकार है ॥
सरीर अमले नीर सों, मन अमले सों साँच ।
अंतस अमले धर्म सों, मति ज्ञान सोंह राँच ।७७० ।
----- ॥ मनु स्मृति ॥ -----
भावार्थ : -- शरीर जल से पवित्र होता है, मन सत्य से, आत्मा धर्म से, बुद्धि ज्ञान से पवित्र होती है ॥
माँग रही सरकार पर,सरदर सर अफ़राज ।७६१।
भावार्थ : -- दुआ माँगने वाले, खुदा के दरबार में उसके सम्मुख सर झुका के दुआ माँगते है । और उंचे स्थान पर आसीन होकर, घमंड से भरी ये सरकार सामने सर उठाए पता नहीं क्या मांग रही है ॥
दीन दार जो मतलबी, सो तो बेईमान ।
इरादे-रहम पाक वो, सच्चा मूसलमान ।७६२।
भावार्थ : -- जो अपनी गरज के लिए धर्म में यकीं रखता है, माने कि गरज पूरी हुई धर्म गया भाड़ में वह तो बेईमान है । जिसके इरादे नेक हो पाक हो जो मेहरबाँ हो रहमान हो, वही सच्चा मूसलमान है ॥
सौ नाम धरे सरकार, सौ सौ हाथ जबान ।
तेरी फेरी फेर के, ले जावै मत दान |७६३ |
सौ नाम होना = अनेक त्रुटियाँ होना
सौ हाथ जबाँ होना = चटोर होना, स्वाद लोलुप होना
भावार्थ : -- सरकार किसी की हो, उसमें अनेक त्रुटियाँ हैं, स्वाद की लालची भी है अर्थात खाने खिलाने में उस्ताद है । चतुर इतनी है कि जिसको तूने फिरा दिया उसको भी फेर के तेरा वोट निकाल लेगी। अत: अपना वोट रूपी हीरा संभाल के रख ॥
क्रोध अजान कटुक बचन, दंभ दर्प अभिमान ।
तिन्ह सों सकल अनाचरन, आसुरि सम्पद मान ।७६४।
----- ॥ श्रीमद्भगवद्गीता ॥ -----
भावार्थ : -- क्रोध, अज्ञानता, कड़वे वचन, दम्भ, दर्प एवं घमंड । ऐसी सभी संपत्ति उद्दंड एवं असभ्य व्यक्तियों की संपत्ति के सदृश्य होती है ॥
का भगती अरु का भजन, पूजन का उपवास ।
जे कहाबत तिनकी जो , आप उदर के दास । ७६५।
भावार्थ : -- क्या सेवा-भक्ति कैसा भजन, क्या पूजा क्या उपवास । यह कहावत उनकी है जो अपने पेट के दास हैं ।।
अर्थात : -- "जो अपने पेट का दास है, वह जनार्दन की पूजा कभी नहीं कर सकता "
----- ॥ शेख सादी ॥ -----
जब लग तुम तम आपना, मेट हुँत न संजोए।
तबलग तुम्हरे उद्धरन, कार सके ना कोए ।७६६।
----- ॥ स्वामी रामतीर्थ ॥ -----
संजोए = तैयार
भावार्थ : -- "जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने हेतु कटिबद्ध नहीं होते, तबतक तुम्हारा कोई उद्धार नहीं कर सकता "
कृत जग जोग बिग्यान, त्रेता जुग जग्यान ।
द्वापर जुग तपस चरन, कलि कल्यान प्रधान ।७६७।
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
भावार्थ : --सतयुग में योग और विज्ञान की प्रधानता है, त्रेता युग में यज्ञ की प्रधानता है । द्वापर में तपस्या प्रधानता की है एवं कलयुग में कल्यान की प्रधानता है ॥
गड़हा गड़े सिखर चढ़े, प्रभु दरसन ना होए ।
जाके मनो भाव बड़े, दरसन पावै सोइ ।७६८।
----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- गड्ढे में गड़ने से, शिखर पर चढाने से महत्तत्त्व स्वरूपी के दर्शन नहीं होते । जिसके मन की भक्ति विस्तृत परिणाम वाली हो उसे ही ईश्वरीय महत्तत्त्व का योग प्राप्त होता है ॥
लोचन कन अहहै कबित , ह्रदय कबित आधार ।
होई जन कबिताकार, जोई रोवन हार ।७६९।
----- ॥ एंड्री ॥ -----
भावार्थ : -- आँसू एक काव्य है, हृदय उस काव्य का आधार है । रोने वाला प्रत्येक व्यक्ति कविताकार है ॥
सरीर अमले नीर सों, मन अमले सों साँच ।
अंतस अमले धर्म सों, मति ज्ञान सोंह राँच ।७७० ।
----- ॥ मनु स्मृति ॥ -----
भावार्थ : -- शरीर जल से पवित्र होता है, मन सत्य से, आत्मा धर्म से, बुद्धि ज्ञान से पवित्र होती है ॥
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