सोमवार, 2 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 67॥ -----

बरन बरन के बरन लै बर्तिक बट दै कास 
डार दीप पत ज्ञान कै तेर घारि कै चास |671|

भावार्थ: -- विभिन्न प्रकार के शब्द लेकर, बाती स्वरूप में कड़क बल दे । फिर उसे पत्र रूपी दीपक में डाल दे, तत पश्चात ज्ञान का तेल देकर उसे प्रदीप्त कर ॥ 

पड़ि पड़ि कै मनु मति मुरख पाथर मूरति कार । 
ज्ञान के मन मंदिर रख आखर दीपक बार |672| 

भावार्थ : -- हे मनुष्य,  पत्थर रूपी मंद मति को अध्ययन द्वारा मूर्ति आकार दे । उस मूर्ति को ज्ञान-मंदिर में रख कर अक्षरों के दीपक जला ॥ 

सुन्दरता सोहाग सरि सद चरित सोन सरूप । 
एक मूलहीन परे धरि त एक मूल मूलरूप |673| 

भावार्थ : -- सुन्दरता सुहागा के समान है, सुहागा सुन्दरता के समान है सदचरित्र स्वर्ण स्वरूप है स्वर्ण सद्चरित्र के रूप है । सुहागा, स्वर्ण से अलग होकर मूल्यहीन हो जाता है ।  सुन्दरता, सद्चरित्र से अलग होकर मूल्यहीन हो जाती है किन्तु स्वर्ण और सद्चरित्र का मूल्य अपने मूल रूप में ही स्थापित रहता है ॥  

पंथ पंथ में पत्र भरै पत्र पत्र में भर ग्रन्थ ।
धरा धरा हरियरि करै मत कर बट का अंत ।674। 

भावार्थ  -- रास्ते रास्ते पत्ते भरते हैं.., पत्ते पत्ते में ग्रन्थ रचते हैं.., धरती को हरी-भरी करते हैं.., पेड़ को मत काटो.....

भागी रे सरकार भागी धर पाँव सिर ऊपर | 
भागे भागे भूत के भाग लंगोटी धर |675| 
 
भावार्थ  -- ये सरकार अंत हुवा,  जो मिल रहा है वो ही ले लो.....

दाने दाने चून कै चून चून कै दान । 
छानी छाने घून कै तै दै चून पिसान |676| 

भावार्थ : -- (1 ) दाने दाने का चुनाव कर देखें कितने दाने है ।  छलनी से छान के घून देखें कितने हैं फिर आटा पिसवाएँ ॥ 
                 
( 2 )दाने दाने का चुनाव कर दानग्रहीता को छांट कर दान दे ।(छंटने पर भी नहीं मिले तो मत दें)  जो घून के जैसे हैं अर्थात दाने को खाने वाले हैं उन्हें देख परख कर कारावास की चक्की दें ॥ 

सठ के अवगुन कबि कहत लाज न ओटे अंग ।
निरख दूज जस कुंठ धरत उर पर लोट उरंग |677| 

भावार्थ : -- दुष्ट के अवगुणों को कवियों ने कहा है कि उनके तन पर लाज का आवरण नहीं होता । दूसरों का यश देख कर ये कुंठित होकर ईर्ष्या करते हैं ॥ 

काम   सनेहु   सब   जग   जन  चाम  चाँद   ना   कोए । 
जलधि जल घन, घन जलकन दिन कर दिनकर होए |678| 

भावार्थ  = काम को जगत में सभी जन सराहते हैं  चन्द्रमा  की सुन्दरता को नहीं । समुद्र के जलने से बादल एवं बादल से जल कण एवं दिन सूर्य के करने से होता है ॥ 

आँट साँट साठ जन कर गाँठ गाँठ दे काट ।
आँट आँट कर बुद्धिबर गाँठ गाँठ कर आठ  |679|

आँट साँट = षड़यंत्र
गाँठ = ग्रंथि
आँट = गूंथना

भावार्थ : --षड़यंत्र करने वाले व्यक्ति बहुंत है जो गठबंधन को षडयत्र पूर्वक काट देते हैं बुद्धिमान उसे गूँथकर आठ गाँठ करके रखता है...... 

'मत' लै मंडल माँडि कै बैठ सिंग सिस सिखर | 
कारे कार काण्ड कै भर कारा धनाकर |680| 

मत = वोट 
लै =  प्राप्त कर 
माँड कै = रचित कर 
सिंग = जैसे गधे के सिंग 
कारे = काले 
कार = किये 
काण्ड = प्रकरण, अध्याय 
कै = कितने 
धनाकर = धनकोष 

भावार्थ : -- मत को दान स्वरूप ग्रहण कर मंत्री मंडल मांड के शासक सर ऊपर बैठ गए हैं । काले काले अध्याय और प्रकरण करके केवल अपना ही धन कोष भरा है 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...