शनिवार, 28 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 82॥ -----

बार बार अभ्यास कर, मछरी निकसइ चाह । 
पुन उद्धारे अघ धरे, भव सिन्धु छुटे नाह ।८२१। 
भावार्थ : -- यह मछली जल से निकलने हेतु बारम्बार प्रयास करती है । इसके पुण्य जब इसे ऊपर उठाते है, इसके पाप इसे नीचे खिंच लेते हैं, यह संसार रूपी समुद्र इससे छुटता नहीं ॥

जनमन पूरब का भया, मरनी पर का होइ । 
ए जान न समझ आपने , न जान का मनु सोइ ।८२२। 
भावार्थ : -- जन्म से पूर्व क्या था, मृत्यु पश्चात क्या होगा । यह ज्ञात नहीं, और मनुष्य स्वयं को जाने क्या समझता है ।।

जँह जस जिस बयस सरूप, मिले धार कर ज्ञान । 
पार्थ सारथि रनाँगन, दिए ज्ञान आख्यान ।८२३।
भावार्थ : -- ज्ञान जहां भी मिले, जेसे भी मिले, जिस अवस्था मिले, जिस रूप में मिले धारण कर लेना चाहिए । भगवान कृष्ण ने रणांगण में ज्ञान का आख्यान दिया था ।।

खाए पिये अरु पहन लिए, सो तन लागे आप ।
संचारि चर संचय किए, सोइ पराई धाप ।८२४। 
भावार्थ : -- खाया-पिया, पाहन लिया वह तो अपनी देह लगा । घूम घूम कर जो संचय किया, वह दौड धूप दुसरे के लिए की गई ।।

सुबुध बुराई दाहिनी, कुबुध बडाईहु बाएँ  । 
तिनके प्रसंग परिगहत, तिन्ह संग परिहाएँ | 825|  

भावार्थ : -- विद्वानों की निंदा अनुकूल प्रभाव उत्पन्न करती है, मूर्खों की प्रसंशा भी प्रतिकूल होती है । अत: मूर्खों का संग त्याग कर विद्वानों का प्रसंग ग्रहण करना चाहिए ॥ 

जाति-धर्म पोषित करें, करें न तिनके सोष । 
जे कल कूरी कुंजिका, ज्ञानांजन धन कोष ।826|

भावार्थ : -- जाति-धर्म का पोषण करें, शोषण ना करें ।  ब्रम्ह ज्ञान के धन कोष की यही कल कुंजियाँ हैं ॥ 

अन गन कुबुध नख सौं भल, एकै सुबोधित सूर । 
जिनके कासि अज्ञान के, केरि अँधेरी दूर | 827|

भावार्थ : -- अनगिनत मुर्ख स्वरूप तारों से अच्छा एक विद्वान सूर्य है । क्योंकि एक विद्वान सूर्य की ज्ञान रूपी ज्योति अज्ञान के अंधेरों को दूर कर देती है ॥ 

कारन होत जीव हते, सो तो पशुत सुभाइ । 
बिनु कारन जब हत्बते, सोइ कहत जड़ताइ |828|

 भावार्थ : - कारण के होते यदि कोई जीवों को घायल करता है या प्रताड़ित करता है अथवा उनकी ह्त्या करता है तो वह पाश्विक प्रवृत्ति है । किन्तु यदि कोई अकारण ही उक्त कार्य करता है तो वह जड़ता कहलाती है ॥  


जड़ता ते पसुताइ भल, पसुता ते मनुसाइ । 
मनुता ते प्रभुताइ भल, प्रभुत भल सेउकाइ ।८२९। 
न्भावार्थ : -- जड़ता से उत्तम पशुता है, पशुता से उत्तम मानवता है । मानवता से उत्तम प्रभुता है और सेवा, प्रभुता से भी उत्तम है ॥ 

गुड्डा गुरिया रचित कै, रचइत हेले हेल । 
को हिय हेरे हेर दै, को हेरन कर मेल ।८३०। 
भावार्थ : --  नर-नारी स्वरूप गुड्डे गुडिया की रचना कर रचयिता खेल खिलवाड़ कर रहा है। किसी के ह्रदय को पुकार दे कर वापस बुला लेता है, और किसी के ह्रदय में स्वयं हिलमिल जाता है ॥ 




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