शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 81॥ -----

साँस साँस के साथ है, हरिदै के कल अंग । 
हरिदै के कल हाथ है,देह सकल प्रत्यंग । ८११ ॥ 
भावार्थ : -- ह्रदय के यांत्रिक अवयव, सांसों के नियंत्रण में हैं । और देह के प्रत्येक अंगों की नकेल ह्रदय के हाथ में है ॥

जीवन चारन चाहिये, सैन नैन मुख भोग । 
जीउ जगत ते जीव बर, धरे जे जथा जोग ।८१२। 
भावार्थ : -- जीवन को संचालित करने हेतु, निद्रा और भोजन की आवश्यक हैं । प्राणी जगत में वही प्राणि श्रेष्ठ है, जो इनका यथा योग्य उपयोग करे ॥

परिहर पावन आचरन, केरे निर्मल काए । 
भूला जग बाताबरन, बैठा बात बनाए ।८१३। 
भावार्थ : -- चरित्र, व्यवहार, जाति-धर्म और कुल की शुद्धता को त्याग कर सांसारिक जन केवल काया के शुद्धिकरण में अभिरत हैं ।  चारों और की परिस्थतियों को विस्मृत किये हुवे, बैठे बैठे केवल शुद्धता पर भाषण देते हैं करते कुछ नहीं ॥

किए सत कारज करम फल , भयऊ दुःख के नास । 
एक कार के कारत पर, कीजै दूजन आस ।८१४। 
भावार्थ : -- सद्कार्यों के परिणाम स्वरूप ही दुखों का नाश होता है । एक सद कार्य करते ही दुसरा करने के लिए  उत्कंठित रहना चाहिए ॥

सीवाँ संग बँध जैसे, सौहें नदी नदीस । 
मरजाद में बँध तैसे, सौंहें प्रेम पचीस ।८१५।  
भावार्थ : -- जिस प्रकार नदी और समुद्र अपनी सीमाओं में बंधे सुशोभित होते हैं । उसी प्रकार प्रेम की पचीसी भी मर्यादाओं में सिमित हो तो ही सुशोभित होती है, मर्यादा व्यतिक्रम होने से वह अपने पीछे विनाश के चिन्ह छोड़ जाती है ॥

जिउ जनित भर भाव भीत, चितब काम उपजाए । 
काम भाव सन चर अचर, सकल जगत जनमाए ।८१६। 
भावार्थ : -- हृदय में भाव और चित्त में काम उपजाने से जीवों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार काम एवं भाव के संयोंग से चराचर के सह समस्त संसार उत्पत्ति हुई होगी ।

ले साँस एक जीउ लिये, कारे दूजन आस । 
एक दिन बैठा ओगरे, बरे काल ले फाँस ।८१७। 
भावार्थ : -- एक सांस लेकर जी उठे और दूजी सांस की आस है । एक दिन  बैठा प्रतीक्षा करता रह गया, और मरनी ने आ के तुझे वर लिया ॥

मुल्ला ले किलकारियाँ, पंडित झुल दे झेल । 
पेयुष पिलाए पादरी, बड़ा बिचित्र जे मेल ।८१८। 
भावार्थ : --  मुल्ला किलकारियां ले रहा है और पंडित हिलोरे दे रहा है । पादरी स्नेहरस पिला रहा है, यह मेल तो बड़ा ही विचित्र है ॥

नद नदीस प्रेम पचीस, सोंह मरजाद संग । 
जब मरजादा लाँघ दें, परिहति नास नयंग ।८१९। 
भावार्थ : -- नदी, समुद्र और प्रेम पचीसी,मर्यादा के साथ ही सुशोभित होते हैं । मर्यादा व्यतिक्रम होने से ये अपने पीछे विनाश के चिन्ह छोड जाते हैं ॥

दिनभर मन सौ रुप रचे, बदले सौ सौ रंग । 
सकल सकल कर कलश कर, दरसे रयन  नयंग  ।८२०।
भावार्थ : -- दिन भर में यह चित्त सौ स्थितियों में परिवर्तित होकर सौ रूप रचता है । और समस्त रूपों एवं दशाओं को एकत्र करने से वह रजनी के जैसा दिखाई देने लगता है ॥    

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