रविवार, 22 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 80॥ -----

राम नाम के नहिं अंत, राम त एक पतंग । 
आपन सूत जोरें जे, दरसत सकल बिहंग ।८०१|
भावार्थ : -- राम के नाम का अंत नहीं है, अर्थात वह तो अनंत स्वरूप में एक पतंग हैं । इस नाम को जिसने अपने सूत्र  में जोड़ लिया, उसने सारे ब्रम्हांड के दर्शन किये ॥  

राम नाम में है राम, भाव भीत भगवान । 
वंदन पाहन पूज है, नहि त खनिज की खान ।802| 
भावार्थ : -- राम नाम में तो केवल राम है (कोई भी राम जैसे : --माया राम, गंगाराम आदि) शब्द के भाव में ही भगवान हैं । भावनापूर्ण वंदना करने से पत्थर भी पूज्यनीय है, नहीं तो वही पत्थर खनिज की खान है ॥

राम नाम एक आखरी, आखरी भित विचार । 
आखर सह उर जोग धर, भव सागर कर पार |803|
भावार्थ : -- राम का नाम एक मार्ग है, और इस मार्ग के अंतर में एक विचार है |  इस विचार को पुर्ण स्वरूप में ह्रदय से योजन करने पर, भव सागर पार करना सरल होता है ॥

राम नाम आँठी किये, गाँठी कस के कास । 
सब धन सुबरन सुन्य है, राम अंक के पास ।८०४। 

भावार्थ : -- भगवान का नाम आँट के अपनी गठरी कास के बाँध ली । क्योंकि समस्त जोड़ जुगाड़ स्वर्ण सम्पति आदि का मान ईश्वर अर्थात शुन्य से गुणित करने पर उसका भाग फल शुन्य ही आएगा ॥

अंक पाश = गणित की एक क्रिया

को बिषय कोउ बस्तु के, कोउ भाउ के भूख । 
जीव जगत अस दरस जस, चातक पयस मयूख ।८०५। 
भावार्थ : -- कोई विषयों का भूखा है, कोई वस्तुओं का भूखा है, कोई श्रद्धा, भक्ति राग, प्रेम, व्युत्पत्ति का भूखा है । संसार और संसार के जीव ऐसे दर्शित हो रहे हैं जैसे चातक और चन्द्रमा दर्शित होते हैं ॥

जग में मानव रुप रचे, पञ्च भूत संजूत । 
मरघटी पर जब बिघटे, बिरचे बहुरे भूत ।८०६।
भावार्थ : -- इस संसार में मानव की रचना पञ्च महा भूत ( धरती,आकाश, जल, वायु, अग्नि)  के संयोग से हुई है । जब यह शमशान में विघटित होता है, तब पुन: पांच भूतों में परिवर्तित हो जाता है, और हमें डराता है ॥

नहाए धोए भेस भरे, करत भूयस बिश्राम । 
आप अचार सौधें नहिं,  हेरैं सुध पर काम |807|  
भावार्थ : -- नहाए धोए उत्तम वेश धारण कर लिया, और अतिशय विराम किया, काम कुछ नहीं किया अर्थात केवल  अपने शरीर को शुद्ध किया । अपने आचरण, चाल-चरित्र, जाति -धर्म को शुद्ध नहीं किया, और बैठे बैठे पराए कामों में शुद्धता टोह रहे हैं ॥

बिसारै अनमोल बचन, बिसराए न मन गार । 
अबके उलट सीध करत, दे मन गार बिसार ।८०८। 
भावार्थ : -- यह मन अनमोल वचनों को तो भूल जाता है, दुर्वादन को नहीं भुलाता । अब की बार उलटे को सीधा करते हुवे दुर्वादन को मन से भुला दे ॥

पहिले बिघटे देस पुनि, बिघटे घर संजूत । 
रहत बिघटन क्रिया सतत, बनहि सकल जन भूत ।८०९। 

भावार्थ : -- पहिले तो यह देश विघटित हवा फिर संयुक्त परिवार विघटित हुवे यदि विघटन की क्रिया ऐसे ही चलती रही तो अंत सारे लोग भूत बन जाएंगे । 

कैसे: -- परिवार का विघटन, संतान का विघटन, दम्पति का विघटन, फिर मनुष्य का जाति-समाज से विघटन, फिर मनुष्य जाति का विघटन, फिर स्तनधारी का विघटन, फिर सरीसर्प में परिवर्तित होना और शनै: शनै: कोशिका स्वरूप होना, और जड़ता प्राप्त करना  अर्थात सकल श्रृष्टि का विघटन ॥ 

मनु जात जुगत कुटुम किए, कुटुम समुह समुदाए । 
समुदाए समाज रुप लिए, समाज धर्म प्रदाए ।८१०। 

भावार्थ : --मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई, नारी-पुरुष के परस्पर सुसंगति से कुटुंब बना, इन कुटुम्बों से समुच्चय बने, समुच्चयों ने फिर समुदाय बनाया । समुदायों ने मिलकर समाज का निर्माण किया,फिर संसार का कल्याण करने के लिए समाज से ही धर्म की व्युत्पत्ति हुई, और  राष्ट्र का निर्माण हुवा ॥ 

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