कर्मन मसि पथ की बिंदु, राखे दोइ सुभाए ।
उजरे मत जग उजराए, मलिने मत अँधराए ।७९१।
भावार्थ : -- कर्म लेखनी की मसि बिंदु दो प्रकृति की होती है । यदि वह निर्मल बुद्धि एवं स्वच्छ विचार लिए हुवे है, तो संसार ज्ञान से प्रकाशित हो जाता है, और यदि वह दूषित बुद्धि एवं कुविचारों से युक्त हो तो अज्ञान का अंधकार छा जाता है ॥
अहो रात बहु रंग ले, सुख दुःख दोइ तरंग ।
अहा सात सुर संग ले, नउ दिन नवल नयंग ।७९२।
भावार्थ : -- सुख और दुःख इन दो तरंगों के साथ दिवस और रात बहुंत सी अनुभूतियाँ लिए हुवे हैं । अहा सात स्वरों का प्रसंग किये नया दिन नए भाँति का है ॥
गए सयन भए निद्रा मगन , मूँदे नयनन रात ।
भासे चिद चेत तब जब, दरसे सूर प्रभात ।७९३।
भावार्थ : -- निद्रा मग्न हो कर रात जब सोने चले तो आँखें बंद हो गईं । प्रभात में जब सूर्य के दर्शन हुवे तभी जीवित होने का आभास हुवा ॥
जल लय लीन धरा तरी, ज्योतिर लय अगास ।
भाव प्रबाह तसहि थरी, आखर ऊपर बास ।७९४।
भावार्थ : -- जल के लय की लीनता धरातल में हैं ज्योत की लय आकाश की और है । उसी प्रकार से भाव के प्रवाह गति धरातल पर होती है और अक्षर का निवास आकाश की ओर होता है ॥
आखर कापर पोत है, शब्द है क़तर छाँट ।
बाक सलाका सूत है, भाख बसन को साँट ।७९५।
भावार्थ : -- अक्षर कपडा है । और शब्द की गई काट छाँट है । वाक्य सुई और सूत्र है जो भाषा रूपी वस्त्र को सिलता हैं ॥
भाखा भनिन बहिर बसन, अर्थ कलेबर कार ।
भाव गति अंग प्रत्यंग, अन्तरात्मन सार ।७९६।
भावार्थ : -- भाषाएँ,कहे गए कथन या वर्णन के बाहरी वस्त्र है और अर्थ कथन की शरीर आकृति है । भावों की गति अर्थात अनुभूतियाँ विचार आदि कथन के अंग प्रत्यंग हैं और ज्ञान रूपी सार,कथन की अंतरात्मा है ॥
अर्थात : -- "भाषाएँ अभिव्यक्ति का साधन मात्र हैं"
बर कुल सील काया जस, बिद्या बित्त सनाथ ।
जोइ सँजोइ अग जग लग, को नउ कोउ पुरान ।
तेइ जोइ सर्बतस बर, जे करि जग कल्यान ।799।
भावार्थ : -- संसार ने जीवन उपयोगार्थ समस्त सामग्रियाँ संग्रह कर रखी हैं, कोई प्राचीन है कोई नवीन है। वह सामग्री सभी प्रकार से श्रेष्ठ है, जो संसार का कल्याण करे ॥
बनिज कुसल के का मान, दाने धन तब मान ।
अघ अर्जन के का दान, करे तजन तब जान ।८००।
भावार्थ : -- व्यापारी का क्या सम्मान, जब वह धन दान करे तब उसे मान । दोष कर्मों से अर्जित धन का क्या दान, जब दूषित करम त्याग करे तब उसे जान ॥
उजरे मत जग उजराए, मलिने मत अँधराए ।७९१।
भावार्थ : -- कर्म लेखनी की मसि बिंदु दो प्रकृति की होती है । यदि वह निर्मल बुद्धि एवं स्वच्छ विचार लिए हुवे है, तो संसार ज्ञान से प्रकाशित हो जाता है, और यदि वह दूषित बुद्धि एवं कुविचारों से युक्त हो तो अज्ञान का अंधकार छा जाता है ॥
अहो रात बहु रंग ले, सुख दुःख दोइ तरंग ।
अहा सात सुर संग ले, नउ दिन नवल नयंग ।७९२।
भावार्थ : -- सुख और दुःख इन दो तरंगों के साथ दिवस और रात बहुंत सी अनुभूतियाँ लिए हुवे हैं । अहा सात स्वरों का प्रसंग किये नया दिन नए भाँति का है ॥
गए सयन भए निद्रा मगन , मूँदे नयनन रात ।
भासे चिद चेत तब जब, दरसे सूर प्रभात ।७९३।
भावार्थ : -- निद्रा मग्न हो कर रात जब सोने चले तो आँखें बंद हो गईं । प्रभात में जब सूर्य के दर्शन हुवे तभी जीवित होने का आभास हुवा ॥
जल लय लीन धरा तरी, ज्योतिर लय अगास ।
भाव प्रबाह तसहि थरी, आखर ऊपर बास ।७९४।
भावार्थ : -- जल के लय की लीनता धरातल में हैं ज्योत की लय आकाश की और है । उसी प्रकार से भाव के प्रवाह गति धरातल पर होती है और अक्षर का निवास आकाश की ओर होता है ॥
आखर कापर पोत है, शब्द है क़तर छाँट ।
बाक सलाका सूत है, भाख बसन को साँट ।७९५।
भावार्थ : -- अक्षर कपडा है । और शब्द की गई काट छाँट है । वाक्य सुई और सूत्र है जो भाषा रूपी वस्त्र को सिलता हैं ॥
भाखा भनिन बहिर बसन, अर्थ कलेबर कार ।
भाव गति अंग प्रत्यंग, अन्तरात्मन सार ।७९६।
भावार्थ : -- भाषाएँ,कहे गए कथन या वर्णन के बाहरी वस्त्र है और अर्थ कथन की शरीर आकृति है । भावों की गति अर्थात अनुभूतियाँ विचार आदि कथन के अंग प्रत्यंग हैं और ज्ञान रूपी सार,कथन की अंतरात्मा है ॥
अर्थात : -- "भाषाएँ अभिव्यक्ति का साधन मात्र हैं"
जब नैन पलक भइ नीच, पाए परम पद प्रेम ।
रयनइ जब बिरहन संग, राजत मंदिर हेम ।७९७।
भावार्थ : -- जब प्रेम लज्जा से आबद्ध होता है, तब वह परम पद को प्राप्त होता है । और जब वियोग से अनुरक्त होता है, तब वह अश्रुजल के मंदिर में विराजित हो जाता है ॥
भावार्थ : -- जब प्रेम लज्जा से आबद्ध होता है, तब वह परम पद को प्राप्त होता है । और जब वियोग से अनुरक्त होता है, तब वह अश्रुजल के मंदिर में विराजित हो जाता है ॥
बर कुल सील काया जस, बिद्या बित्त सनाथ ।
जे सात गुन परिखन पर, दानै कनिया हाथ ।७९८।
भावार्थ : -- शास्त्रानुसार, वर का कुल ,सद आचरण, स्वास्थ, यश, विद्या, आर्थिक स्थिति, और घर में बड़ों का सुभाशिर्वाद , इन सात गुणों के परिक्षण पश्चात ही मात-पिता अपनी कन्या को दान देवें ॥
तेइ जोइ सर्बतस बर, जे करि जग कल्यान ।799।
भावार्थ : -- संसार ने जीवन उपयोगार्थ समस्त सामग्रियाँ संग्रह कर रखी हैं, कोई प्राचीन है कोई नवीन है। वह सामग्री सभी प्रकार से श्रेष्ठ है, जो संसार का कल्याण करे ॥
बनिज कुसल के का मान, दाने धन तब मान ।
अघ अर्जन के का दान, करे तजन तब जान ।८००।
भावार्थ : -- व्यापारी का क्या सम्मान, जब वह धन दान करे तब उसे मान । दोष कर्मों से अर्जित धन का क्या दान, जब दूषित करम त्याग करे तब उसे जान ॥
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