असत से सत जिते सदा, रहि बिनु वाके बास ।
राम रावन प्रान हरे, किए बिनु लंक निबास ।७८१।
भावार्थ : -- असत्य के वास में वासित हुवे बिना उस पर सत्य की सदा ही जीत हुई है । भगवान राम ने बिना लंका में निवास किए रावन के प्राण बिना ही हरे थे ॥
चाहत हो तो ऐसोइ हो, जस चातक की चाह ।
दरसत ससि तरसत सुधा, अधर अँगारन आह ।७८२।
भावार्थ : -- लगन हो तो ऐसी ही हो जैसी चातक की लगी । शशी को देखते रहना और सुधा की तृष्णा करते हुवे अधरों पर अँगारे और आह लिए रहना ॥
रसै रसै रसना रसे, मधुरइ मुख रस तीत ।
तसहि दुःख दारुन रसनइ, जीवन जस जस बीत ।७८३।
भावार्थ : -- जैसे जिह्वा को शनै: शनै: तीखी मीर्च, मीठी लगने लगती है । वैसे ही जैसे जैसे जीवन बितता है तीखा दुःख भी मीठा लगने लगता है ॥
अग जग लग परचार किए, ब्रम्ह अंड दिए फोड़ ।
अगजग की जानै नहीं, अगम गगन की होड़ ।७८४।
भावार्थ : -- सारे संसार में प्रचार करते फिरे हमने ब्रम्ह अंडे को फोड़ दिया । चराचर का ज्ञान नहीं है और अथाह गगन को जानने की होड़ है ॥
लाल ललामिक लाइ की, बड़ी कसूती आँच ।
बैरागी मन राँच के, अनुरागी मन दे काँच ।७८५।
भावार्थ : -- सौन्दर्यता पूरित लगन की आंच बहुंत ही पीड़ा दायक है । वैराग्य ह्रदय को यह अनुरक्त करते हुवे अनुरागी ह्रदय को पटका देती है ॥
अंग दुआरी जीउ द्रव, रीसत बूँदइ बूँद ।
आई जामिन जामिके ,नयन सोच के मूँद ।७८६।
भावार्थ : -- अंगों के नौ द्वारों से जीवन रूपी द्रव बूंद बूंद कर रिसता जा रहा है । जब भी रात्रि आए तो इसकी रखवाली करते हुवे आँखों को सोच समझ कर बंद करनी चाहिए, कहीं ये सदैव के लिए ही बंद न हो जाएं ॥
सीपि सिंधु माहि समाए, सिंधु न सीप समाए ।
मानख मन सरूप सीप, ज्ञान सिन्धु तर जाए ।७८७।
भावार्थ : - सीपी समुद्र में समाती है, समुद्र सीप में नहीं समाता । मनुष्य का मन भी सीप के सदृश्य है, जो ज्ञान रूपी समुद्र में तैरता हुवा चला जाता है ॥
आपन साख आप चरे, जब राखत जग प्रेम ।
कुंभज चाख सीत करे, तब धारत जग हेम ।७८६।
भावार्थ : -- अपने विचारों पर स्वयं अनुगमन करने से ही, संसार उन विचारों से आकर्षित होता है । जैसे कुम्भ में भरा जल जब कुम्भ द्वारा स्वयं ग्रहण होने पर शीतलता को प्राप्त होता है, तब ही लोगों द्वारा वह ग्रहणीय होता है ॥
गुरु ज्ञान गुन बारि बवन, बनबारी उपजाए ।
को बनाबन को भोजन, को कन बहुरि बियाए ।७८९।
भावार्थ : -- गुरुवर की ज्ञान वर्षा और उनके गुणों के बोए गए बीज, वन वाटिका में उग गए हैं । अब इनमें से कोई कण खरपतवार स्वरूप किसी काम के नहीं होंगे, कुछ भोजन बनेंगे, कुछ एक बीज बनेंगे जो पुन:बोने के काम आएँगे ॥
ज्ञान सरूप अगन बसन,भए चित सन संजूत ।
सद गुन धातु सोधन कर, दुरगुन भस्मी भूत ।७९०।
भावार्थ : -- ज्ञान रूपी अग्नि वस्त्र जब चेतना से संयुक्त होते हैं, तब वह सद्गुण रूपी धातु को शोधित कर दुर्गुणों को जला कर राख कर देते हैं ॥
राम रावन प्रान हरे, किए बिनु लंक निबास ।७८१।
भावार्थ : -- असत्य के वास में वासित हुवे बिना उस पर सत्य की सदा ही जीत हुई है । भगवान राम ने बिना लंका में निवास किए रावन के प्राण बिना ही हरे थे ॥
चाहत हो तो ऐसोइ हो, जस चातक की चाह ।
दरसत ससि तरसत सुधा, अधर अँगारन आह ।७८२।
भावार्थ : -- लगन हो तो ऐसी ही हो जैसी चातक की लगी । शशी को देखते रहना और सुधा की तृष्णा करते हुवे अधरों पर अँगारे और आह लिए रहना ॥
रसै रसै रसना रसे, मधुरइ मुख रस तीत ।
तसहि दुःख दारुन रसनइ, जीवन जस जस बीत ।७८३।
भावार्थ : -- जैसे जिह्वा को शनै: शनै: तीखी मीर्च, मीठी लगने लगती है । वैसे ही जैसे जैसे जीवन बितता है तीखा दुःख भी मीठा लगने लगता है ॥
अग जग लग परचार किए, ब्रम्ह अंड दिए फोड़ ।
अगजग की जानै नहीं, अगम गगन की होड़ ।७८४।
भावार्थ : -- सारे संसार में प्रचार करते फिरे हमने ब्रम्ह अंडे को फोड़ दिया । चराचर का ज्ञान नहीं है और अथाह गगन को जानने की होड़ है ॥
लाल ललामिक लाइ की, बड़ी कसूती आँच ।
बैरागी मन राँच के, अनुरागी मन दे काँच ।७८५।
भावार्थ : -- सौन्दर्यता पूरित लगन की आंच बहुंत ही पीड़ा दायक है । वैराग्य ह्रदय को यह अनुरक्त करते हुवे अनुरागी ह्रदय को पटका देती है ॥
अंग दुआरी जीउ द्रव, रीसत बूँदइ बूँद ।
आई जामिन जामिके ,नयन सोच के मूँद ।७८६।
भावार्थ : -- अंगों के नौ द्वारों से जीवन रूपी द्रव बूंद बूंद कर रिसता जा रहा है । जब भी रात्रि आए तो इसकी रखवाली करते हुवे आँखों को सोच समझ कर बंद करनी चाहिए, कहीं ये सदैव के लिए ही बंद न हो जाएं ॥
सीपि सिंधु माहि समाए, सिंधु न सीप समाए ।
मानख मन सरूप सीप, ज्ञान सिन्धु तर जाए ।७८७।
भावार्थ : - सीपी समुद्र में समाती है, समुद्र सीप में नहीं समाता । मनुष्य का मन भी सीप के सदृश्य है, जो ज्ञान रूपी समुद्र में तैरता हुवा चला जाता है ॥
आपन साख आप चरे, जब राखत जग प्रेम ।
कुंभज चाख सीत करे, तब धारत जग हेम ।७८६।
भावार्थ : -- अपने विचारों पर स्वयं अनुगमन करने से ही, संसार उन विचारों से आकर्षित होता है । जैसे कुम्भ में भरा जल जब कुम्भ द्वारा स्वयं ग्रहण होने पर शीतलता को प्राप्त होता है, तब ही लोगों द्वारा वह ग्रहणीय होता है ॥
गुरु ज्ञान गुन बारि बवन, बनबारी उपजाए ।
को बनाबन को भोजन, को कन बहुरि बियाए ।७८९।
भावार्थ : -- गुरुवर की ज्ञान वर्षा और उनके गुणों के बोए गए बीज, वन वाटिका में उग गए हैं । अब इनमें से कोई कण खरपतवार स्वरूप किसी काम के नहीं होंगे, कुछ भोजन बनेंगे, कुछ एक बीज बनेंगे जो पुन:बोने के काम आएँगे ॥
ज्ञान सरूप अगन बसन,भए चित सन संजूत ।
सद गुन धातु सोधन कर, दुरगुन भस्मी भूत ।७९०।
भावार्थ : -- ज्ञान रूपी अग्नि वस्त्र जब चेतना से संयुक्त होते हैं, तब वह सद्गुण रूपी धातु को शोधित कर दुर्गुणों को जला कर राख कर देते हैं ॥
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