मंगलवार, 17 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 77॥ -----

विधात धरा सकल जोए, धराऊ रुप सँजोए । 
जीवन दीपक जारनै, संजुत जूत लेँ सोए ।७७३। 
भावार्थ : -- विधाता ने धरती की समस्त वस्तुएँ धरोहर स्वरूप में संचित की हैं । जीवन रूपी दीपक प्रदीप्त रहे, इस हेतु इन वस्तुओं को मिलजुल कर सावधानी पूर्वक ग्रहण करना चाहिए ॥

काल करम कर लेखनी, मस्तक किए पट लेख। 
लखित तस जस कारिते, बढ़ पढ़ आँखिन देख । ७७२। 
भावार्थ : -- समय ने कर्मों को लेखनी करते हुवे मस्तक को लेखन पट बनाया है । जैसे कार्य किये हैं वैसा ही उल्लेख है बढ़ो पढो और अपनी करनी अपनी  आँखों से देखो ॥

सुरता कारत अजहुँते, सुमिरन कारत काल । 
जगत खेत करमन जोत, गुनकन लखन पयाल।७७३। 
भावार्थ : -- वर्तमान का ध्यान कर; भूत,भविष्य,मृत्यु, पातक, दोष जैसे हानि कारकों का स्मरण करते हुवे इस संसार क्षेत्र में अपने कर्मों की जोताई करनी चाहिए क्योंकि मनुष्य के सद्गुण,अवगुण ही अन्न कण होंगे और उसके शुभ-अशुभ लक्षण पयाल(अन्न कण निकालने के पश्चात बची डंठल) होंगे ॥

सँजोउ करम बर रछका ,राखे लाखन लाख। 
करत कारज करम अंत ,राखे लाखन राख ।७७४। 
भावार्थ : -- सावधानी कर्मों की उत्तम प्रहरी है, जो बहुंत सी विशेषताओं से युक्त है ।  यह कार्य के सम्पादन होने तक उसकी अत्यधिक सुरक्षा करती है ॥


प्रानाधारे प्रनिधान, प्रानी करम अधार । 
जगत अधार धरे धरा, धरा सेष सिरु धार ।७७५। 
भावार्थ : -- प्राणी कर्मों पर आधारित है, प्राण कर्मफल के त्याग व्यवहार पर आधारित है । प्राणी जगत को पृथ्वी धारण किए हुवे है और सेष रह गया उस पर पृथ्वी आधारित है ॥

कारना के कारक करि, पातक करम निपात । 
जे धारना धारे ते, पतिते न धर्म जात ।७७६। 
भावार्थ ; -- दोषपूर्ण पाप कर्म, वेदनाकारक होते हुवे विनाश का कारण बनते हैं ।यदि  ऐसी धारणा धारण की जाए तो धर्म-जाति व्युत नहीं होता और विचारों का पतन नहीं होता ॥

करम कार कल्यान कृत, अकरम परिहर कार । 
तेइ कारक  निषेधाधृत,जे करि बिषय बिकार ।७७७। 
भावार्थ : --कल्याण कारित करने वाले कार्य ही कर्म हैं, त्याग कार्य अकर्म है । वे कारक निषिद्ध कर्म को धारण करते हैं जो विषयों में दोष-विकार उत्पन्न करते हैं ॥


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