"अपराधी कौन नहिं" कहत, बाल्मीकि कविराज ।
जे जन करत पश्चाताप, ते जन जोग समाज ।७५१।
भावार्थ : -- " न कश्चिन्नापराध्यति" ( युद्धकाण्ड ११३/४५) कविराज वाल्मीकि कहते हैं : -- अपराधी कौन नहीं है ?अर्थात सभी अपराधी हैं, जो व्यक्ति पश्चाताप करते हैं, वही व्यक्ति समाज के योग्य हैं ॥
देइ दान भगत समान, लेइ दान भगवान ।
जेइ कार किए आपनै, तेइ धार पद मान ।७५२।
भावार्त्थ : -- दान दिया सो भक्त हुवे, दान लिया सो भगवान । जैसा आपने कार्य किया वैसा आपका पद उद्धृत हुवा, अर्थात यदी 'लेन-देन' किया, सो तो आप व्यापारी हुवे ॥
कुंज कलित लोचन ललित, रह चाहे को बास ।
भाव भीत जँह ना बसे, सो तो उजड़ निबास ।७५३।
भावार्थ : -- उद्यानों से विभूषित सुन्दर झरोखों वाला घर हो, चाहे ऐसे किसी भी वास में वासित हों । यदि उसके भीतर प्रेम का वास नहीं है तो वह उजड़ा निवास है ॥
एक पुर दरसत हरि हीर, एक पुर दिरिस पहार ।
जे कलित भगति हार करुँ ,कारुँ कौन जे कार । ७५४।
भावार्थ : -- एक ओर भगवान स्वरूप हीरा दर्शित हो रहा हैं, दूसरी ओर पहाड़ का दृश्य । हीरे को भक्ति की माला में विभूषित कर लूँ किन्तु इस पहाड़ का क्या करूं ॥
नारी के अंतर थाह, पुरुख बहिर बिस्तार ।
जस धरनी गहनइ गाह, अम्बर महिमापार।७५५।
भावार्थ : -- नारी के अंतस की थाह एवं पुरुष के बाहर का विस्तार, ऐसे हैं जैसे धरती की गहराई की गाथा और आकाश की अनंत महिमा ॥
ठाढ़े एकै थरी थंभ, जे पथ जोख निहार ।
आपै पंथ कलित लंब जे एक चरन पसार ।७५६।
भावार्थ :-- यदि प्रतीक्षा करते रहे तो एक ही स्थान पर खड़े रहते हुवे जड़ हो जाओगे । जो एक पैर बढाया, पंथ लंबित होकर स्वत:विभूषित हो जाएंगे ॥
विभूषित भाव भाँवरे, करत कबित कल भाख ।
लगन लगाईं लेखनी, लाहत लावन लाख ।७५७।
भावार्थ : -- भाषा सुन्दर कविता कर रही है, अलंकृत किया हुवा भावफरे ले रहा है, लेखनी लगन बांधे अत्यधिक सुशोभित हो रही है ॥
मति गति सोई संचरै, जापे जपनी जेइ ।
हरिदै भाव गहन करे, जे दृग दरसन देइ।७५८।
भावार्थ : - जो ध्वनि निरंतर मुखरित होती रहती है, मस्तिष्क के मार्ग में तत् सम्बंधित विचार संचारित होते हैं, ह्रदय वही भाव ग्रहण करता है, जो द्रष्टि में दृश्यमान होता है ॥
जोइ जे कला कौशला, सिद्ध भै सोइ नेम ।
तिन कला सबहिं कर सकै, भगति सेव सुभ प्रेम ।७५९।
भावार्थ : -- जो जिस कला का कालाकार होता है वह उसी के अनुसार ही कृतार्थ होती है । किन्तु इन कलाओं के सभी कारूक हो सकते हैं भक्ति, सेवा, कल्याण, और प्रेम ॥
धाराधर में अमृत है, धाराधर मैं धार ।
जे एक बारी सार दे, धारइ धार निकार ।७६० ।
धाराधर = बादल, तलवार
निकार = बाहर निकालना, बंधन आदि से मुक्त करना, रकम जिम्मे करना
भावार्थ : -- बादल में अमृत है, तलवार में धार है, यदि इसे एक बारी सार दें तो यह रक्त की धाराएं बहा देगी, महा वृष्टि का स्वरूप लेते हुवे घर की सारी जमा पूंजी निकाल देगी, उधार देने वालों को धक्का देते हुवे बहार निकाल देगी, और ली हुई उधारी को चुकता भी कर देगी ॥
देइ दान भगत समान, लेइ दान भगवान ।
जेइ कार किए आपनै, तेइ धार पद मान ।७५२।
भावार्त्थ : -- दान दिया सो भक्त हुवे, दान लिया सो भगवान । जैसा आपने कार्य किया वैसा आपका पद उद्धृत हुवा, अर्थात यदी 'लेन-देन' किया, सो तो आप व्यापारी हुवे ॥
कुंज कलित लोचन ललित, रह चाहे को बास ।
भाव भीत जँह ना बसे, सो तो उजड़ निबास ।७५३।
भावार्थ : -- उद्यानों से विभूषित सुन्दर झरोखों वाला घर हो, चाहे ऐसे किसी भी वास में वासित हों । यदि उसके भीतर प्रेम का वास नहीं है तो वह उजड़ा निवास है ॥
एक पुर दरसत हरि हीर, एक पुर दिरिस पहार ।
जे कलित भगति हार करुँ ,कारुँ कौन जे कार । ७५४।
भावार्थ : -- एक ओर भगवान स्वरूप हीरा दर्शित हो रहा हैं, दूसरी ओर पहाड़ का दृश्य । हीरे को भक्ति की माला में विभूषित कर लूँ किन्तु इस पहाड़ का क्या करूं ॥
नारी के अंतर थाह, पुरुख बहिर बिस्तार ।
जस धरनी गहनइ गाह, अम्बर महिमापार।७५५।
भावार्थ : -- नारी के अंतस की थाह एवं पुरुष के बाहर का विस्तार, ऐसे हैं जैसे धरती की गहराई की गाथा और आकाश की अनंत महिमा ॥
ठाढ़े एकै थरी थंभ, जे पथ जोख निहार ।
आपै पंथ कलित लंब जे एक चरन पसार ।७५६।
भावार्थ :-- यदि प्रतीक्षा करते रहे तो एक ही स्थान पर खड़े रहते हुवे जड़ हो जाओगे । जो एक पैर बढाया, पंथ लंबित होकर स्वत:विभूषित हो जाएंगे ॥
विभूषित भाव भाँवरे, करत कबित कल भाख ।
लगन लगाईं लेखनी, लाहत लावन लाख ।७५७।
भावार्थ : -- भाषा सुन्दर कविता कर रही है, अलंकृत किया हुवा भावफरे ले रहा है, लेखनी लगन बांधे अत्यधिक सुशोभित हो रही है ॥
मति गति सोई संचरै, जापे जपनी जेइ ।
हरिदै भाव गहन करे, जे दृग दरसन देइ।७५८।
भावार्थ : - जो ध्वनि निरंतर मुखरित होती रहती है, मस्तिष्क के मार्ग में तत् सम्बंधित विचार संचारित होते हैं, ह्रदय वही भाव ग्रहण करता है, जो द्रष्टि में दृश्यमान होता है ॥
जोइ जे कला कौशला, सिद्ध भै सोइ नेम ।
तिन कला सबहिं कर सकै, भगति सेव सुभ प्रेम ।७५९।
भावार्थ : -- जो जिस कला का कालाकार होता है वह उसी के अनुसार ही कृतार्थ होती है । किन्तु इन कलाओं के सभी कारूक हो सकते हैं भक्ति, सेवा, कल्याण, और प्रेम ॥
धाराधर में अमृत है, धाराधर मैं धार ।
जे एक बारी सार दे, धारइ धार निकार ।७६० ।
धाराधर = बादल, तलवार
निकार = बाहर निकालना, बंधन आदि से मुक्त करना, रकम जिम्मे करना
भावार्थ : -- बादल में अमृत है, तलवार में धार है, यदि इसे एक बारी सार दें तो यह रक्त की धाराएं बहा देगी, महा वृष्टि का स्वरूप लेते हुवे घर की सारी जमा पूंजी निकाल देगी, उधार देने वालों को धक्का देते हुवे बहार निकाल देगी, और ली हुई उधारी को चुकता भी कर देगी ॥
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