रविवार, 8 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 73॥ -----

दोष दूषित मत विचार, कारन  कुल के नास । 
कुल नास सन धर्म नसे, तँह भए अघ के पाश ।७३१-क ।  

पातक कुल जन दूषिते,पातक करत बितान । 
जाति धर्म नस नय पतन, भए संकर संतान ।७३२-ख।  
भावार्थ : -- दोष युक्त विकृत मत एवं विचार  कुल के विनाश का कारण होते हैं । कुल नाश के होते ही कुल
धर्म का नाश हो जाता है । ऐसी नश्वर प्रक्रिया से मनुष्य पातक कर्म से बंधता जाता है ॥

यह पाप विस्तारित होता है तो कुल के स्त्री पुरुष दूषित हो जाती हैं परिणाम उत्तम गुण लक्षणों एवं विचार समूह से रहित पतन की ओर ले जाने वाली, संकर संताने ( दो या दो से अधिक जाति वर्ण अथवा धर्म के प्रसंग से उत्पन्न सन्तति ) उत्पन्न होती हैं, यही गीता के प्रथम अध्याय का सार है ॥

दोषन दूषित भावना,, जेतक धारे भाव । 
कारित दुजन अहित करे, तेतक कार प्रभाव । ७३२-क।

गुण ग्राम धर्म भावना , जेतक धारे भाउ । 
दूजन कारत भलाई ,तेतक कार प्रभाव ।७३२-ख। 
भावार्थ : -- दोष-विकारों से युक्त भावना, जीतने अधिक भाव गरहन करेगी । जब वह कार्य रूप में परिणत होगी प्रभावशील होकर दूसरों का उतना ही अहित करेगी ॥

उसी प्रकार, सद्गुणों का स्वभाव समूह जितने अधिक भाव ग्रहण करेगा, वह उतना अधिक प्रभाव शील होकर दूसरों का उतना ही हितकारी होगा ॥

नर राउ नारी सैन, गेह सदन भए राज । 
तब संचारित जन तंत्र,  जब दोउ केरि काज ।७३३-क । 

नर राउ नारी सैन, गेह सदन भए राज । 
नारि कर्मन सैन तंत्र  राज तंत्र नर काज ।७३३-ख । 


भावार्थ : -- गृह सदन रूपी राष्ट्र में नर राष्ट्र प्रमुख है और नारी सेना है । जब राष्ट्र में दोनों कार्य ( नारी के सन्दर्भ में गृह कार्य भी)करते हैं तो समझो की घर में लोक तंत्र है ॥

यदि केवल नारी कार्य करे तो समझो सैन्य तंत्र है, यदि केवल पुरुष कार्य करे, और नारी  नौकर चाकर से कार्य करवाए तो समझो घर में  राजतंत्र है ॥

मानख माने काल क्रम, धरनी गति आधार  । 
गगन सिन्धु सौर मंडल, बरे बहुस बिस्तार  ।७३४-क।  
भावार्थ  -- मानव काल गति की गणना पृथ्वी की घूर्णन गति के आधार पर करता है ॥ (पृथ्वी के अपने अक्ष पर की एक पूर्ण परिक्रमा करने पर एक दिवस होता है एवं सूर्य के एक परिक्रमा पूर्ण करने पर एक वर्ष होता है ) किन्तु सौर मंडल का भी एक वृत्तव्यास ग्रहण किये हुवे है जो गति शील है, उसकी एक पूर्ण परिक्रमा का मान क्या होगा ? यदि सौर मंडल गति शील है, तो फिर आकाश गंगा भी अवश्य ही गति शील होगी, उसकी एक पूर्ण परिक्रमा का मान क्या होगा ?

सौर मंडल के परिकर, जदि सत काल कहाए । 
गगन सिन्धु के परिकरन, को कहु का कहि जाए ।७३४-ख। 
भावार्थ : - यदि सौर मंडल की एक पूर्ण परिक्रमा को एक शताब्दी ( मान निकालने पर यदि वह सौ वर्ष के बराबर हो )   कहा जाए । तो फिर आकाश गंगा की एक पूर्ण परिक्रमा को क्या कहा जाए एक युग ?

धरनी सहित नौग्रह इब, भँवर भरे का तार । 
तब कौन भए मझधार, कौन खड़े प्रस्तार ।७३५ -क। 

सून मध प्रस्तार में हैं, ॐ नाम के संत । 
सून ॐ के भाग दे, भए फल भूत अनंत ।७३५-ख 
भावार्थ : -- पृथ्वी सहित नौ ग्रहों के जैसे क्या तारे भी परिक्रमा कृते हैं ? यदि करते हैं तो केंद्र में कौन है, और वृत्त की परिधि में कौन है ?

 यदि ( आकाश गंगा के) शुन्य केंद्र में है और माना कि वृत्त की परिधि में ॐ है फिर उसका भाग फल अनंत आएगा ॥

किंकनि नथ मुँदरि कंगन, चूरी बिरिया हार । 
घुँघची घुँघरु भुज बंधन, टीका कंठी घार ।७३६-क। 

भव बिभूति के आभरन जुगत बारह प्रकार । 
पावन भेष विभूषिते, कर सोलह सिंगार ।७३६-ख। 

भावार्थ : -- १०) नूपुर २) किंकिणी ३) हार ४) चूड़ी ५) मुद्रिका ६) कंगन ७) बाहु बंद ८) कंठ श्री ९) बेसर ( नासिका के आभूषण ) १०) बिरिया ( कर्ण आभूषण) ११) टीका (मांग टीका) १२) घुंघची (चूड़ा मणि, शीशफूल)

माता श्री लक्ष्मी को निर्मल वस्त्रों से विभूषित  करते हुवे, इन बारह प्रकार के आभूषण से युक्त कर उनका सोलह श्रृंगार करें

टीका : -- "आभूषण उपरोक्त बारह प्रकार के होते हैं"

करतन अकरन बाँध्या, भइ करतब सो कार । 
करतन अकरन खोल्या, कहत सोइ अधिकार ।७३७-क। 

एक दु बार के अनुरोदन, कहत तिन्ह अनुरोध । 
बार बार बरपुरुख गह  , सो तो बलात् होत ।७३७-ख।  
भावार्थ : -- किसी कार्य को करने अथवा न करने कि बाध्यता कर्त्तव्य है । किसी कार्य को करने अथवा न करने की स्वतंत्रता ही अधिकार है ॥

एक दो बार का अनुरोदन, प्रार्थना  कहलाता है । बार बार का अनुरोदन, अनुचित दबाव ग्रहण कर बलात् अथवा हठ का स्वरुप ले लेता है ॥

टीप्पणी : - "मत दान करना एक अधिकार है कर्त्तव्य नहीं, इसे दान करने हेतु हम स्वतंत्र हैं बाध्य नहीं।"

प्रात किरन पानि परसत, भए पत पदम् प्रफूर । 
रात पानि म्लानि मिलत , भयउ सब एकै कूर ।७३८-क। 

पुरस्कार भए परिष्कृत, जोइ परसे सुजोग । 
भयउ असंस्कृत तब जब, परसे कोउ अजोग।७३८-ख। 

भावार्थ : --  जो पद्म पत्र भोर में किरणों के हाथों का स्पर्श प्राप्त कर प्रस्फुरित हो उठते हैं वही पत्र  रात्रि के हाथों की मलिनता का स्पर्श प्राप्त कर मंद कान्त होते हुवे एक ढेर में परिवर्तित हो जाते हैं  ॥

उसी प्रकार : --  सुयोग्य हाथों के स्पर्श से पुरस्कार सुसंस्कृत होते है, अयोग्य हाथों का स्पर्श उन्हें असंस्कृत कर देता हैं ॥

काल के कौन बिस्बास, आए काल बन काल । 
मराल को कागा किये, कागा किये मराल ।७३९। 
भावार्थ : -- कल का क्या भरोसा है, कल वह मृत्यु बन कर आ जाए । कल हंस कौआ हो जाए और कौआ हो जाए अर्थात रावण जैसे विद्वान को कल ने स्त्री हरण करने वाला डाकू बना दिया था, और डाकू रत्नाकर जो विद्यमान समय के आतंकवादी जैसे थे उसी स्त्री के पिता स्वरुप में महर्षि वाल्मीकि बना दिया था ॥

अर्थात : -- "कल की केवल कल्पना की जा सकती है, और कल्पनाए कुछ एक ही साकार स्वरुप होती है"

रंग धरे सब कमल ने, कीच धरा के साथ । 
मेहदी पाहन पिस गइ, लाली लसाए हाथ ।७४०। 
भावार्थ : -- सारे रंग सारी अनुभूतियाँ कमल का फूल ले गया, कीचड़ धरती में रहा । मेहंदी बिचारी पत्थर में पीस गई । उसकी लाली से हाथ सोना हो गया ॥

  

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