शनिवार, 7 सितंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 71॥ -----

गिनती के दिन रैन हैं, गिनती की है साँस । 
काल कर्मन माप जोग, लिए खडा दंड पास ।७११। 
भावार्थ : -- (क्योंकि) इस भाव संसार में प्राणियों के दिवस एवं रैन गिनती के ही हैं, और गिनती की ही उनकी साँसे हैं । मृत्यु दंड का पाश लिए सर ऊपर खडी है, और नियती और समय को माप रही है ॥

काल गति अति कार्पनइ, ऊपर एकहु न दाए । 
जेतक सारे सौर साँस, तेतक चरन लमाए ।७१२। 
भावार्थ : -- समय की गति भी बड़ी ही कंजुस है । उसने माप के दिन रेन और साँसे दी हैं वह एक भी अधिक नहीं देगी । सांसों की चादर की जितनी पसार है, उतने ही पाँव फैलाने चाहिए ॥ 

देखन मैं जागा लगे,मूरख गहरी निंद । 
सुधिगन जागे सोवते,जूँ श्री हरि अरविंद ।७१३। 
भावार्थ : -- बुद्धिहिन देखने में जागृत दिखाई देते हैं किन्तु वे गहरी नींद में होते हैं । किन्तु प्रबुद्ध जन शयनित अवस्था में भी जागृत रहते हैं जैसे भगवती के कमल सदृश्य स्वामी शयनित अवस्था में भी जागृत रहते हैं ॥ 

माया दीपाकार धरे, कायाकार पतंग । 
रागन सकल अंग जरे, चित किए कारे रंग ।७१४। 
भावार्थ : --भोग विषयों की साधन स्वरूपा यह माया दीपक के आकृति किये है । और यह काया की आकृति पतंग जैसी है ।  इससे अनुरक्ति होने पर यह समस्त अंगों जला कर भस्म करते हुवे अंतस को कलुषित कर देती है ॥

चित्त चेतस चीते जब, करन कोउ कल्यान । 
पहिलै त्याग होत बर, तेइ पर होत दान ।७१५।
भावार्थ:-- अंत:करण  का ज्ञान विवेक जब किसी का कल्याण करना चाहे, तो उस हेतु सर्वप्रथम असुंदरता  का त्याग श्रेष्ठ होता है, तत्पश्चात सुन्दरता किया हुवा दान श्रेष्ठ होता है ॥

आपन देह ढकाई के, बानी देइ उघार । 
धुनी लवन सिलाई के, दे पट रुप सिंगार ।७१६। 
भावार्थ : -- अपनी देह को आच्छादित कर  लिया किन्तु मुख की देह वाणी अनाच्छादित रही । सुन्दर शब्दों को बुन कर फिर ऐसे वस्त्र वाणी को पहना के उसका रूप-श्रृंगार करें ॥

मन के अंग अनेक हैं, मन के रंग अनेक । 
जिन अंग प्रियतम बसे, वाके रंग प्रबेक ।७१७। 
भावार्थ : -- ह्रदय के अनेक खंड है, ह्रदय की अनेक अनुभूतियाँ हैं । जिस खंड में प्रियतम का वास है,
उसकी अनुभूति सर्वोत्कृष्ट है ॥

 नयन पलक में हेमबर, राखे बहुसहि रंग । 
कोउ बिरहन आभूषित, को भूषित पिय संग ।७१८। 
भावार्थ : -- पलकों में विभिन्न रंगो एवं अनुभूतियों के मोती  सुशोभित हैं । कोई वियोग स्वरूप  में आभूषित हैं, तो कोई प्रीतम के संयोग रूप में विभूषित हैं ॥

प्रीति माँगे ह्रदय देस, देही माँगे काम। 
मति माँगे मत गुन ज्ञान, मुख माँगे हरि नाम।७१९। 
भावार्थ : --प्रीति  हृदय में स्थान की मांग करती है देह काम की मांग करती है, बुद्धि ज्ञान एवं गुण युक्त विचारों की मांग करती है तथा मुख ईश्वर के नाम स्वरूप उसके वर्ण-व्याख्या की मांग करता है ॥

कायाकर हरिदै कमलिन, बासे आसन कंत । 
सोंह जीवन जोत बरे, होए जान कब अंत ।७२०। 
भावार्थ : -- यह काया आकर स्वरूप है और हृदय कमलिन के सदृश्य है जिसके आसन में प्रियतम निवासित हैं ।प्रियतम के सम्मुख जीवन रूपी ज्योत प्रज्वलित है जाने कब यह ज्योत बुझ जाए ॥










  




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