देइ ज्ञान करम इंद्रिय, पूरन कार सरूप ।
कारु काया कल्प मनुज, किए जगत सूर भूप ।७०१ ।
भावार्थ : -- विधाता ने मनुष्य देह की रचना करते हुवे उसे पूर्ण रूप से सक्रिय पांच ज्ञानेद्रियाँ ( नयन, कर्ण, नासिका, रसन, चर्म) एवं पांच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त,पद,वाक्,गुदा,उपस्थ) दीं, और उसे सबसे शक्तिशाली प्राणी बनाकर संसार का राज घोषित कर दिया ॥
पसु पाख कंठ देइ सुर, सेष किये सुरहीन ।
मनख के मुख मुखरिते, केरे सकल अधीन ।७०२।
भावार्थ : -- पशु-पक्षी के कंठ को केवल स्वर दिया, और अचर प्रकृति को स्वरहिन किया । मनुष्य के मुख को शब्दायमान कर सारी सृष्टि उसके अधीन कर दी ॥
कारी काय कारन तिन, करे भूत के जोग ।
कारन भावन भूर के, लगे भाव भव भोग।७०३।
भावार्थ : -- (मनुष्य की ) काया की रचना इस उद्देश्य से की गई कि वह पञ्च भूत की रक्षा करे । पर उत्पत्ति उद्देश्यों को विस्मृत कर मनुष्य केवल सांसारिक सुख को साधने में ही अनुरक्त है ॥
लाह लालस लोभ मात , लोभ पाप के तात ।
कलुखित कारज कारनी, करे दोष के धात ।७०४।
भावार्थ : -- लाभलिप्सा लोभ की माता है, और लोभ पाप का पिता है । यह पाप ही है जो कलंकित कार्य कारित करने की प्रेरणा देता है,और दोषों के योग्य बनाता है ॥
धर्म अर्थ दौ सारनी, दोनउ महत प्रभूत ।
एक करमन की कारनी, दुजे फल वसीभूत ।७०५।
भावार्थ : -- दो प्रणाली है धर्म एवं अर्थ, दोनों अपने अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं । धर्मप्रणाली कर्म की प्रेरक है फल का नहीं, जबकि अर्थप्रणाली फल के अधीन है ॥
अर्थ अगार के भित जदि, सारे धर्म अधार ।
फल के दोषन परिहरत, धारे सकल अभार ।७०६।
भावार्थ : -- अर्थ के भवन की भित्तिका, धरम की नींव पर प्रस्तारित करना चाहिए । धर्म, परिणाम में निहित दोषों का परित्याग करता है, एवं अर्थ के आगार का समस्त भार भी वहन कर लेता है ॥ जैसे "किये गए प्रसंग से पुत्र की कामना" यहाँ किया गया प्रसंग अर्थ है, और पुत्र फल है । 'निमित्त मात्र प्रसंग' अर्थात मात-पिता निमित्त मात्र हों, परिणाम परिस्थिति के हाथों में हो तो वह धर्म है ॥
साधन उपजोग जिउ पथ, चरत भेद लखि देस ।
उपभोग रत साधक हथ, भै भव भूषन भेस ।७०७।
भावार्थ : -- साधन ( धन-संपत्त ,वस्त्र-वाहन , करण-कारण,हित-हेतु आदि )का यह कार्य है कि प्राणी इनका उपयोग सावधानी पूर्वक करते हुवे जीवन पथ पर संचालित होकर अपने काल रूपी लक्ष्य को सुगमता पूर्वक प्राप्त करे । किन्तु जो साधन संपन्न एवं भोगवादी हैं उनके लिए ये साधन वेश-भूषा हो गए हैं ।
जैसे : --निर्धारित स्थान पर पहुँचने हेतु केवल एक साधारण वाहन ही पर्याप्त है ,क्योंकि यह एक वाहन भी वही कार्य करेगा जो चमचमाते हुवे अथवा पंक्ति बढ वाहन करेंगें ॥
कार करम की कारनी, कार कारिका कार ।
कारे कंचन कोष कर, कूरा केर बहार ।७०८।
भावार्थ :-- काले कर्मों की प्रेरक यह काला व्यापार काली वृत्ति एवं आजीविका ही है । इनसे एकत्र हुवा धन
संपदा भंडार का कूड़ा करकट एवं एकत्र हुवे दोषों का बहिष्कार करना चाहिए ॥
भव बंधन भाव ब्यूह,सकल जीव भव भीत ।
कारु काया कल्प मनुज, किए जगत सूर भूप ।७०१ ।
भावार्थ : -- विधाता ने मनुष्य देह की रचना करते हुवे उसे पूर्ण रूप से सक्रिय पांच ज्ञानेद्रियाँ ( नयन, कर्ण, नासिका, रसन, चर्म) एवं पांच कर्मेन्द्रियाँ ( हस्त,पद,वाक्,गुदा,उपस्थ) दीं, और उसे सबसे शक्तिशाली प्राणी बनाकर संसार का राज घोषित कर दिया ॥
पसु पाख कंठ देइ सुर, सेष किये सुरहीन ।
मनख के मुख मुखरिते, केरे सकल अधीन ।७०२।
भावार्थ : -- पशु-पक्षी के कंठ को केवल स्वर दिया, और अचर प्रकृति को स्वरहिन किया । मनुष्य के मुख को शब्दायमान कर सारी सृष्टि उसके अधीन कर दी ॥
कारी काय कारन तिन, करे भूत के जोग ।
कारन भावन भूर के, लगे भाव भव भोग।७०३।
भावार्थ : -- (मनुष्य की ) काया की रचना इस उद्देश्य से की गई कि वह पञ्च भूत की रक्षा करे । पर उत्पत्ति उद्देश्यों को विस्मृत कर मनुष्य केवल सांसारिक सुख को साधने में ही अनुरक्त है ॥
लाह लालस लोभ मात , लोभ पाप के तात ।
कलुखित कारज कारनी, करे दोष के धात ।७०४।
भावार्थ : -- लाभलिप्सा लोभ की माता है, और लोभ पाप का पिता है । यह पाप ही है जो कलंकित कार्य कारित करने की प्रेरणा देता है,और दोषों के योग्य बनाता है ॥
धर्म अर्थ दौ सारनी, दोनउ महत प्रभूत ।
एक करमन की कारनी, दुजे फल वसीभूत ।७०५।
भावार्थ : -- दो प्रणाली है धर्म एवं अर्थ, दोनों अपने अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं । धर्मप्रणाली कर्म की प्रेरक है फल का नहीं, जबकि अर्थप्रणाली फल के अधीन है ॥
अर्थ अगार के भित जदि, सारे धर्म अधार ।
फल के दोषन परिहरत, धारे सकल अभार ।७०६।
भावार्थ : -- अर्थ के भवन की भित्तिका, धरम की नींव पर प्रस्तारित करना चाहिए । धर्म, परिणाम में निहित दोषों का परित्याग करता है, एवं अर्थ के आगार का समस्त भार भी वहन कर लेता है ॥ जैसे "किये गए प्रसंग से पुत्र की कामना" यहाँ किया गया प्रसंग अर्थ है, और पुत्र फल है । 'निमित्त मात्र प्रसंग' अर्थात मात-पिता निमित्त मात्र हों, परिणाम परिस्थिति के हाथों में हो तो वह धर्म है ॥
साधन उपजोग जिउ पथ, चरत भेद लखि देस ।
उपभोग रत साधक हथ, भै भव भूषन भेस ।७०७।
भावार्थ : -- साधन ( धन-संपत्त ,वस्त्र-वाहन , करण-कारण,हित-हेतु आदि )का यह कार्य है कि प्राणी इनका उपयोग सावधानी पूर्वक करते हुवे जीवन पथ पर संचालित होकर अपने काल रूपी लक्ष्य को सुगमता पूर्वक प्राप्त करे । किन्तु जो साधन संपन्न एवं भोगवादी हैं उनके लिए ये साधन वेश-भूषा हो गए हैं ।
जैसे : --निर्धारित स्थान पर पहुँचने हेतु केवल एक साधारण वाहन ही पर्याप्त है ,क्योंकि यह एक वाहन भी वही कार्य करेगा जो चमचमाते हुवे अथवा पंक्ति बढ वाहन करेंगें ॥
कार करम की कारनी, कार कारिका कार ।
कारे कंचन कोष कर, कूरा केर बहार ।७०८।
भावार्थ :-- काले कर्मों की प्रेरक यह काला व्यापार काली वृत्ति एवं आजीविका ही है । इनसे एकत्र हुवा धन
संपदा भंडार का कूड़ा करकट एवं एकत्र हुवे दोषों का बहिष्कार करना चाहिए ॥
भव बंधन भाव ब्यूह,सकल जीव भव भीत ।
ते भाव मन्यु मोचिते, भए भव सागर जीत । ७०९।
भावार्थ : -- संसार में जन्म-मरण ही चक्र है और भौतिक सत्ता में अनुरक्ति व्यूह रचना है,समस्त प्राणी इस चक्र व्यूह से भयभीत हैं ॥ जो मनुष्य आसक्त से विरक्त अवस्था में इस चक्रव्यूह को भेदने में सफल होता है, वह मनुष्य इस संसार रूपी सागर को पार कर परम गति प्राप्त करता है ॥
उयउ उर अंतर दिनकर, जब किये ज्ञान प्रकास ।
भव बंधन मोचन केर, तामस गुन के नास । ७१० ।
भावार्थ : --जब अंत:कारन में ज्ञान के सूर्य का उदयित होकर ज्ञान का प्रकाश प्रस्तारित करता है । वह अज्ञान, क्रोध एवं आलस्य आदि अँधेरों का नाश कर, भव बंधन के चक्र व्यूह को भेदन करने में समर्थ होता है ॥
उयउ उर अंतर दिनकर, जब किये ज्ञान प्रकास ।
भव बंधन मोचन केर, तामस गुन के नास । ७१० ।
भावार्थ : --जब अंत:कारन में ज्ञान के सूर्य का उदयित होकर ज्ञान का प्रकाश प्रस्तारित करता है । वह अज्ञान, क्रोध एवं आलस्य आदि अँधेरों का नाश कर, भव बंधन के चक्र व्यूह को भेदन करने में समर्थ होता है ॥
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